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Friday, May 1, 2020

राहु ग्रह और उसके नक्षत्र विचरण का फल

सभी ग्रहो के तीन तीन नक्षत्र होते हैं.गोचर में ग्रह जिस नक्षत्र में होता है उस नक्षत्र के अनुसार इनका फल भी परिवर्तित होता है.राहु जब बृहस्पति से केतु के नक्षत्र में होता है तो इस प्रकार से अपना फल देता है

राहु और बृहस्पति नक्षत्र (Rahu and Brahaspati Nakshatra) 
सभी ग्रहों के समान बृहस्पति के भी तीन नक्षत्र हैं पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद.राहु जन्म कुण्डली में अगर इन नक्षत्रों में स्थित होता है और गुरू शुभस्थ स्थान पर होता है तो राहु की दशा काल में आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है.आय के साधनों में वृद्धि होती है.भौतिक सुख प्राप्त होता है.परिवार में आनन्द और खुशियों का आगमन होता है.समाज एवं परिवार में उच्च स्थान प्राप्त होता है.गुरू मंद अथवा कमज़ोर होने पर कार्य में रूकावट का सामना करना होता है.धन की हानि होती है.पराजय का सामना करना होता है.अकारण अपमान सहना पड़ता है.


राहु और शुक्र नक्षत्र (Rahu and Shukra Nakshatra) 
शुक्र राहु का मित्र ग्रह है.शुक्र के साथ राहु शुभ फल देता है.जन्मपत्रिका में शुक्र के नक्षत्र भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा में राहु की स्थिति होने पर राहु अपनी दशा अवधि में शुक्र से सम्बन्धित वस्तुओं का लाभ देता है.भौतिक साधनों में वृद्धि होती है.वाहन सुख प्राप्त होता है.वस्त्राभूषण का लाभ मिलता है.स्त्री सुख प्राप्त होता है.स्त्रियों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त होता है.शुक्र नीच अथवा पीड़ित होने पर इस अवधि में सुख में कमी आती है.स्त्रियों के कारण नुकसान उठाना पड़ता है.इनके कारण अपमान भी सहना होता है.बनते हुए काम बिगड़ जाते हैं.स्वास्थ्य भी मंदा रहता है.


राहु और शनि नक्षत्र (Rahu and Shani Nakshatra)
राहु और शनि दोनों पाप ग्रह हैं.दोनो ग्रहों में मैत्री सम्बन्ध है.जन्मांग में राहु शनि के नक्षत्र पुष्य, अनुराधा अथवा उत्तराभाद्रपद में होता है तो राहु अपनी दशा अवधि में शनि के समान पीड़ा देता है.इस समय व्यक्ति की हड्डियो में कष्ट रहता है.चोट लगने की संभावना रहती है.स्वास्थ्य मंदा रहता है.तामसी भोजन के प्रति आसक्ति बढ़ती है.गृहस्थी में कलहपूर्ण स्थिति रहती है.जीवनसाथी से अनबन के कारण बात तलाक तक पहुंच जाती है.शनि शुभ स्थिति में होने पर परिश्रम का पूर्ण फल प्राप्त होता है.धन सम्बन्धी चिन्ताएं दूर होती है.


राहु और राहु नक्षत्र (Rahu and Rahu Nakshatra) 
आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा ये राहु के नक्षत्र हैं.जन्म कुण्डली में राहु जब स्वनक्षत्री होता है तो अपनी दशा काल में मानसिक एवं शारीरिक कष्ट देता है.दशा काल के दौरान हड्डियो में दर्द रहता है.चोट लगने की संभावना रहती है.कई प्रकार की चिंताओं से मन बेचैन रहता है.जीवनसाथी से दूरियां बढ़ती हैं.परिवार का कोई बुजुर्ग गम्भीर रूप से बीमार होता है जिससे मन दु:खी रहता है.मान सम्मान में कमी आती है एवं अपयश का भागी बनना पड़ता है.


राहु और केतु नक्षत्र (Rahu and Ketu Nakshatra) 
केतु राहु के समान नैसर्गिक पाप ग्रह होता है.जन्मपत्री में केतु मंदा हो और राहु केतु के नक्षत्र अश्विनी, मघा या मूल में है तो इस स्थिति व्यक्ति अविश्वासी होता है.ग्रहों की इस स्थिति में राहु की दशा के समय हड्डी टूटने की संभावना रहती है.सर्प दंश का भय होता है.स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां आती हैं.गृहस्थी मे तनाव रहता है.शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है.आर्थिक क्षति एवं मान सम्मान को आघात पहुंचता है.केतु शुभ स्थिति में होने पर भूमि एवं मकान का स्वामित्व प्राप्त होता है.नये सम्बन्ध बनते हैं.भौतिक सुख मिलता है.कारोबार एवं नौकरी में सफलता मिलती है.


Wednesday, April 22, 2020

बुधादित्य योग का बारह भावों में फल

*भावानुसार बुध आदित्य योग*
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वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार किसी कुंडली के किसी घर में जब सूर्य तथा बुध संयुक्त रूप से स्थित हो जाते हैं यूति होती हे  तो ऐसी कुंडली में बुध आदित्य योग का निर्माण हो जाता है।
इस योग का शुभ प्रभाव जातक को बुद्धि, विशलेषणात्मक क्षमता, वाक कुशलता, संचार कुशलता, नेतृत्व करने की क्षमता, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा तथा ऐसी ही अन्य कई विशेषताएं प्रदान कर सकता है। बुध हमारे सौर मंडल का सबसे भीतरी ग्रह है जिसका अर्थ यह है कि बुध सूर्य के सबसे समीप रहता है तथा बहुत सी कुंडलियों में बुध तथा सूर्य एक साथ ही देखे जाते हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि इन सभी कुंडलियों में बुध आदित्य योग बन जाता है जिससे अधिकतर जातक इस योग से मिलने वाले शुभ फलों को प्राप्त करते हैं।
जो वास्तविक जीवन में देखने को नहीं मिलता क्योंकि इस योग के द्वारा प्रदान की जाने वालीं विशेषताएं केवल कुछ विशेष जातकों में ही देखने को मिलतीं हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बुध आदित्य योग की परिभाषा अपने आप में पूर्ण नहीं है तथा किसी कुंडली में इस योग का निर्माण निश्चित करने के लिए कुछ अन्य तथ्यों के विषय में विचार कर लेना भी आवश्यक है।

किसी कुंडली में किसी भी शुभ योग के बनने के लिए यह आवश्यक है कि उस योग का निर्माण करने वाले सभी ग्रह कुंडली में शुभ रूप से काम कर रहे हों क्योंकि अशुभ ग्रह शुभ योगों का निर्माण नहीं करते अपितु अशुभ योगों अथवा दोषों का निर्माण करते हैं। इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कुंडली में बुध आदित्य योग के बनने के लिए कुंडली में सूर्य तथा बुध, दोनों का शुभ होना आवश्यक है तथा इन दोनों में से किसी एक ग्रह के अथवा दोनों के ही कुंडली में अशुभ होने से उस कुंडली में बुधादित्य योग का निर्माण नहीं होता बल्कि किसी प्रकार के दोष का निर्माण हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में सूर्य के अशुभ होने पर, बुध के शुभ होने पर तथा सूर्य बुध के संयुक्त होने पर कुंडली में बुधादित्य योग का निर्माण नहीं होगा बल्कि इस स्थिति में अशुभ सूर्य के कारण शुभ बुध को हानि पहुंचेगी जिसके कारण बुध की विशेषताओं से जुड़े हुए क्षेत्रों में जातक को हानि उठानी पड़ सकती है तथा कुंडली में बुध के अशुभ और सूर्य के शुभ होकर संयुक्त होने की स्थिति में भी इस दोष का निर्माण नहीं होगा बल्कि जातक को सूर्य की विशेषताओं से संबंधित क्षेत्रों में हानि उठानी पड़ेगी। किसी कुंडली में सबसे बुरी स्थिति तब पैदा हो सकती है जब कुंडली में सूर्य तथा बुध दोनों ही अशुभ होकर संयुक्त हों क्योंकि इस स्थिति में जातक को दोनों ही ग्रहों की विशेषताओं से संबंधित क्षेत्रों में हानि उठानी पड़ सकती है। इसलिए किसी कुंडली में बुधादित्य योग के निर्माण के लिए सूर्य तथा बुध दोनों का ही शुभ होना आवश्यक है।

यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि कुंडली में सूर्य तथा बुध दोनों के शुभ होकर संयुक्त हो जाने से बुधादित्य योग का निर्माण होने पर भी इस योग से संबंधित शुभ फलों को बताने से पहले कुंडली में सूर्य तथा बुध का बल तथा स्थिति देख लेनी अति आवश्यक है जिसके कारण इस योग के शुभ फलों में बहुत अंतर आ सकता है।
उदाहरण के लिए इस योग के किसी कुंडली में तुला अथवा मीन राशि में स्थित सूर्य तथा बुध के संयोग से बनने पर यह योग जातक के लिए अधिक फलदायी नहीं होगा क्योंकि तुला में सूर्य तथा मीन में बुध बलहीन अथवा नीच रहते हैं तथा कोई भी बलहीन ग्रह कोई शुभ योग बनाने पर भी जातक को बहुत अधिक शुभ फल प्रदान नहीं कर सकता। यह योग उस स्थिति में और भी कमजोर हो जाएगा जब शुभ सूर्य तथा बुध किसी कुंडली में मीन राशि में स्थित हों क्योंकि मीन राशि में बुधादित्य योग के बनने से बुध को दोहरी बलहीनता का सामना करना पड़ सकता है जिसमें से एक तो बुध के मीन राशि में स्थित होने से है तथा दूसरी सूर्य के अधिक पास होने के कारण बुध के अस्त हो जाने के कारण हो सकती है जिससे इस योग की फल प्रदान करने की क्षमता में और भी कमी आ जाएगी। इसी प्रकार कुंडली के किसी बलहीन घर में बनने वाला बुध आदित्य योग भी अपेक्षाकृत कम शुभ फल प्रदान करेगा तथा किसी कुंडली में सूर्य पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव होने के कारण पित्र दोष बनने पर भी इस योग का शुभ फल बहुत सीमा तक कम हो जाएगा। इसलिए बुध आदित्य योग के किसी कुंडली में बनने तथा इसके शुभ फलों से संबंधित निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों पर भली भांति विचार कर लेना चाहिए तथा उसके पश्चात ही किसी कुंडली में इस योग का बनना तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करना चाहिए।

किसी कुंडली में ठीक प्रकार से बनने पर बुधादित्य योग जातक को कुंडली के विभिन्न घर में अपनी स्थिति के आधार पर नीचे बताए गए कुछ संभावित फल प्रदान कर सकता है।

बुधादित्य योग यदि लग्न में हो तो
प्रथम भाव में बुधादित्य योग

👉  बालक का कद माता-पिता के बीच का होता है। यदि वृष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुंभ, राशि लग्न में हो तो लंबा कद होता है। जातक का स्वभाव कठोर तथा वात-पित्त-कफ से पीड़ित होता है।

बाल्यावस्था में कान, नाक, आंख, गला, दांत आदि में कष्ट सहन करना पड़ता है। स्वभाव से वीर, क्षमाशील, कुशाग्र बुद्धि, उदार, साहसी एवं आत्मसम्मानी होता है। स्त्री जातक में प्राय: चिड़चिड़ापन तथा बालों में भूरापन भी देखा जाता है।

मतांतर से लग्न में स्थित बुधादित्य योग जातक को मान, सम्मान, प्रसिद्धि, व्यवसायिक सफलता तथा अन्य कई प्रकार के शुभ फल प्रदान कर सकता है।

 द्वितीय भाव में यदि बु‍धादित्य योग हो तो
👉 जातक की तार्किक अभिव्यक्ति होती है, लेकिन व्यवहार में शून्यता-सी झलकती है। कई अभियंताओं, घूसखोरों एवं ऋण लेकर तथा दूसरों के धन से व्यवसाय करने वाले या दूसरों की पुस्तकें लेकर अध्ययन करने वाले लोगों के लिए स्‍थिति प्राय: बनी हुई होती है। यह योग जातक को धन, संपत्ति, ऐश्वर्य, सुखी वैवाहिक जीवन तथा अन्य कई प्रकार के शुभ फल प्रदान कर सकता है।

 तृतीय भाव में यदि बुधादित्य योग हो तो
👉  जातक स्वयं परिश्रमी होता है तथा भाई-बहनों में आत्मीय स्नेह नहीं पा सकता। मौसी को कष्ट रहता है तथा भाग्योदय के अनेक अवसर खो देता है। पात्रता के अनुरूप नौकरीपेशा तथा व्यवसाय अवश्य प्रदान करवाता है, लेकिन पारिवारिक खुशहाली में बाधक होता है।
तीसरे घर मे यह योग जातक को बहुत अच्छी रचनात्मक क्षमता प्रदान कर सकता है जिसके चलते ऐसे जातक रचनात्मक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त तीसर घर का बुध आदित्य योग जातक को सेना अथवा पुलिस में किसी अच्छे पद की प्राप्ति भी करवा सकता है।

चतुर्थ भाव में बुधादित्य योग
👉 इस भाव के योग को अधिकतर विद्वान एवं ग्रंथ श्रेष्ठ मानते हैं। चतुर्थ भाव में बुधादित्य योग मनुष्य को आशातीत सफलता प्रदान करने वाला होता है। संस्था प्रधान, तार्किक मति, कुलपति, प्रोफेसर, इंजीनियर, सफल राजनेता, न्यायाधीश या उच्च कोटि का अपराधी भी बना देता है।

माता का स्वास्थ्य चिंताजनक तथा पत्नी के भाग्य का भी सहारा मिलता है। अपनी स्थायी संपत्ति होते हुए भी दूसरों या सरकारी वाहनों, भवनों का उपयोग करने वाला तथा विषमलिंगी मित्रों का सहयोग एवं प्रेम करने वाला होता है। यह योग जातक को सुखमय वैवाहिक जीवन, ऐश्वर्य, रहने के लिए सुंदर तथा सुविधाजनक घर, वाहन सुख तथा विदेश भ्रमण आदि जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है।

पंचम भाव में 
👉  अल्प संतान लेकिन प्रतिभा संपन्न संतान प्रदान करवाता है। चित्त में उद्विग्नता वात रोग एवं यकृत विकार की प्रबल संभावना बन जाती है। घर में भाभी या बड़ी बहन से वैचारिक मतभेद होते हैं। मेष, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन राशि में यह योग अल्प संतान प्रदाता होता है। स्त्री ग्रहों से दृष्ट होने पर कन्या संतान की अधिकता संभव होती है। पांचवे घर का बुध आदित्य योग जातक को बहुत अच्छी कलात्मक क्षमता, नेतृत्व क्षमता तथा आध्यातमिक शक्ति प्रदान कर सकता है जिसके चलते ऐसा जातक अपने जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकता है।

छठवें भाव में  सूर्य बुध के साथ हो तो
👉  शत्रुओं की मिथ्या विरोधी क्रियाओं से चिंतायुक्त होते हुए भी आत्मविश्वास बना रहता है। मामा पक्ष से बचपन में लाभ मिलता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सहयोग नहीं मिल पाता है। इस भाव मे यह योग जातक को एक सफल वकील, जज, चिकित्सक, ज्योतिषी आदि बना सकता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसाय के माध्यम से बहुत धन तथा ख्याति अर्जित कर सकते हैं।

सप्तम भाव में सूर्य बुध के साथ हो तो
👉  शत्रुओं की मिथ्या विरोधी क्रियाओं से चिंतायुक्त होते हुए भी आत्मविश्वास बना रहता है। मामा पक्ष से बचपन में लाभ मिलता है लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सहयोग नहीं मिल पाता है। सप्तम भाव में बुधादित्य योग यौन रोगों को उत्पन्न करने वाला तथा अत्यंत कामी भाव को समय एवं परिस्थिति को ध्यान में रखकर उत्पन्न करने वाला होता है। ऐसे लोग अपने जीवनसाथी की उपेक्षा कर दूसरों की ओर विशेष आकृष्ट होने वाले होते हैं लेकिन कभी भी अंतरंग संबंधों में नहीं बंध पाते हैं। सप्तम के बुधादित्य योग वाले प्राय: चिकित्सक, अभिनेता निजी सहायक, रत्न व्यवसायी, समाजसेवा एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से संबद्ध होते हैं। सिंह या मेष राशि सप्तम में हो तो एकनिष्ठ होते हैं। शुभ ग्रहों की दृष्टि एवं सान्निध्य इन योगों में बड़ा भारी परिवर्तन भी कर देता है। जातक के वैवाहिक जीवन को सुखमय बना सकता है तथा यह योग जातक को सामाजिक प्रतिष्ठा तथा प्रभुत्व वाला कोई पद भी दिला सकता है।

आठवें भाव में यदि बु‍धादित्य योग हो तो
👉  जातक किसी को सहयोग करने के चक्कर में स्वयं उलझ जाता है। दुर्घटना में पैर, हाथ, गाल, नाखून एवं दांत पर चोट का भय बना रहता है। विदेशी मुद्रा से व्यापार, किडनी स्टोन, आमाशय में जलन तथा आंतों में विकार भी इस योग का परिणाम बन जाता है। कुंडली के आठवें घर में बनने वाला बुधादित्य योग जातक को किसी वसीयत आदि के माध्यम से धन प्राप्त करवा सकता है तथा यह योग जातक को आध्यात्म तथा परा विज्ञान के क्षेत्रों में भी सफलता प्रदान कर सकता है
नवमें भाव में 
👉 जातक को स्वाभिमानी के साथ-साथ अहंकारी बना देता है तथा प्रारंभ में कई सुअवसरों का परित्याग बड़े भारी पश्चाताप का कारण बनता है। नौवें घर में बुध आदित्य योग जातक को उसके जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफलता प्रदान कर सकता है तथा इस योग के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक सरकार में मंत्री पद अथवा किसी प्रतिष्ठित धार्मिक संस्था में उच्च पद भी प्राप्त कर सकते हैं।

दशम भाव में बुधादित्य योग
👉  बुद्धिमान, धन कमाने में चतुर, साहसी एवं संगीत प्रेमी बनाता है। पुत्र-पौत्रादि सुख से संपन्न लेकिन एक संतान से चिंतित भी बनाता है। धार्मिक स्थानों का निर्माण लंबी ख्याति प्रदान कराता है। इस घर में बनने वाला बुधादित्य योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में सफलता प्रदान कर सकता है तथा ऐसा जातक अपने किसी अविष्कार, खोज अथवा अनुसंधान के सफल होने के कारण बहुत ख्याति भी प्राप्त कर सकता है।

एकादश भाव में यदि सूर्य बुध के साथ हो तो
👉👉यशस्वी, ज्ञानी, संगीत विद्या प्रिय, रूपवान एवं धनधान्य से संपन्न करवाता है। लोकसेवा के लिए सरकार एवं अनेक प्रतिष्ठानों से धन की प्राप्ति होती है।ग्यारहवें घर में बनने वाला बुधादित्य योग जातक को बहुत मात्रा में धन प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के बुध आदित्य योग के प्रभाव में आने वाला जातक सरकार में मंत्री पद अथवा कोई अन्य प्रतिष्ठा अथवा प्रभुत्व वाला पद भी प्राप्त कर सकता है।

द्वादश भाव में बुधादित्य योग
👉  चाचा-ताऊ से विरोध करवाता है तथा अपनी संपत्ति उनके चंगुल में फंस जाती है। जुआ, सट्टा, शेयर या अन्य आकस्मिक धन-लाभ के व्यवसायों में फंसकर अपना सर्वस्व लूटा देता है। बारहवें घर में बुधादित्य योग जातक को विदेशों में सफलता, वैवाहिक जीवन में सुख तथा आध्यात्मिक विकास प्रदान कर सकता है।
इस योग के कई अपवाद भी है बुधादित्य योग को राशि एवं अन्य ग्रहों के संबंध भी प्रभावित करते हैं लेकिन अलग-अलग भावों में एकाकी हो तो ऐसा ही फल प्रदान करता है।

Monday, April 20, 2020

जानिए अष्टांग निमित्त क्या हैं ? उनसे आप सब कुछ जान साजरे हैं

अष्टांग निमत्त

जिन लक्षणों को देखकर भूत और भविष्यत् में घटित हुई और होने वाली घटनाओं का निरुपण किया जाता है, उन्हें निमित्त कहते हैं।

इन्हीं सूचक निमित्तों के संहिता ग्रन्थों में आठ भेद किये गये हैं।

(1) *व्यंजन* (2) *अंग*(3) *स्वर*(4) भौम
(5) *छिन्न*(6) *अंतरिक्ष*(7) लक्षण (8) स्वप्न ।

(1) व्यंजन- *तिल , मस्सा , चट्टा, आदि को देखकर शुभाशुभ का निरुपण करना व्यंजन निमित्त ज्ञान है*

*साधारणत: पुरुष के शरीर में दाहिनी और तिल मस्सा चट्टा शुभ समझा जाता है।*

* *नारी के शरीर में इन्ही व्यंजनों का बायीं ओर होना शुभ माना जाता है।*

(2) अंग निमित्त हाथ पांव, ललाट, मस्तक और वृक्ष: स्थल को देखकर शुभाशुभ फल का निरुपण करना अंग निमित्त है।*

*नासिका , नैत्र , दन्त , ललाट , मस्तक , वृक्ष स्थल ये छ: अवयव उन्नत होने से मनुष्य सुलक्षण युक्त होता है।*

*करतल , पदतल , नयनप्रान्त ,नख , तालु , अधर , और जिह्वा ये सात अंग लाल हो तो शुभप्रद है।*

(3)स्वर निमित्त - चेतन प्राणियों के और अचेतन वस्तुओं के शब्द सुनकर शुभाशुभ का निरुपण करना स्वर निमित्त कहलाता है।*

(4) भौम निमित्त भूमि के रंग, चिकनाहट ,रूखेपन , आदि के द्वारा शुभाशुभत्व अवगत करना भौम निमित्त कहलाता है।*

*(इस निमित्त से गृह-निर्माण योग्य भूमि , देवालय-निर्माण योग्य भूमि, , जलाशय- निर्माण योग्य भूमि आदि बातों की जानकारी प्राप्त की जाती है। )*

(5) छिन्न निमित्त - वस्त्र, शस्त्र , आसन और छत्रादि को हुआ देखकर शुभाशुभ फल कहना छिन्न निमित्त ज्ञान है।*

(6) अंतरिक्ष निमित्त- *ग्रह नक्षत्रों के उदयास्त द्वारा शुभाशुभ का निरुपण करना अन्तरिक्ष निमित्त है।*

*(शुक्र , बुध , मंगल , गुरु और शनि इन पांचों ग्रहों के उदयास्त द्वारा ही शुभाशुभ फल का निरुपण किया जाता है)*

(7) लक्षण निमित्त -स्वस्तिक , कलश , शंख , चक्र आदि चिन्हों के द्वारा एवं हस्त , मस्तक , और पदतल की रेखाओं द्वारा शुभाशुभ का निरुपण करना लक्षण निमित्त है।*

(8)  स्वप्न निमित्त-स्वप्न द्वारा शुभाशुभ का वर्णन करना स्वप्न निमित्त है।*

उपरोक्त निमित्तों का ज्ञान सम्यक रीत्या करना चाहिए 

Sunday, April 12, 2020

अपने जन्म नक्षत्र से करें अपना लक्ष्य निर्धारण

अपने जन्म नक्षत्र के अनुसार जानिए किस क्षेत्र में होंगे आप सफल...

1. अश्विनी नक्षत्र

अश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोग अगर यातायात से जुड़ा कोई कार्य करेंगे तो उन्हें सफलता मिलेगी। इसके अलावा खेल, दवाइयां, कृषि, जिम, जौहरी, सुनार आदि से संबंधित क्षेत्र भी फायदा पहुंचाएंगे।

2. भरणी नक्षत्र

भरणी नक्षत्र में जन्मे जातकों को जन्म देने वाली दाई, गृह सेवक, शवगृह अधिकारी, दाह-संस्कार से संबंधित कार्य करने चाहिए। वे बच्चों का ध्यान रखने वाले या नर्सरी स्कूल के अध्यापक के तौर पर भी कार्य कर सकते हैं। तम्बाकू, कॉफी, चाय से जुड़े क्षेत्र भी लाभ पहुंचाएंगे।

3. कृत्तिका नक्षत्र

कृत्तिका नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग ऐसे क्षेत्र में सफल हो सकते हैं, जो नुकीली चीज या तेज धार से जुड़े हों। आप चाकू, तलवार के निर्माण से जुड़ सकते हैं या फिर अच्छे लोहार या वकील भी साबित हो सकते हैं। अगर आप ऐसे किसी कार्य से जुड़ते हैं जिसके अनुसार नशे के आदी लोगों को सुधारा जाता है तो अवश्य सफलता मिलेगी।

4. रोहिणी नक्षत्र

रोहिणी नक्षत्र से संबंधित लोग खानपान के कार्य से जुड़ेंगे तो सफलता मिलेगी। खाना बनाना हो या फिर बांटना, ये कार्य आपके लिए उत्तम हैं। इसके अलावा कला का क्षेत्र भी आपके लिए है। आप अच्छे कलाकार, गायक, संगीतकार भी हो सकते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग रचनात्मक होते हैं।

5. मृगशिरा नक्षत्र

यात्रा से जुड़े कार्य में अगर आप संलग्न हैं तो आपको अवश्य ही सफलता मिलेगी। इसके अलावा शिक्षा, खगोलशास्त्र, पैसे का हिसाब-किताब रखना, ये सभी क्षेत्र भी आपको लाभ दिलवाएंगे। कपड़े के काम में लिप्त लोगों को भी लाभ मिलेगा।

6. आर्द्रा नक्षत्र

बिजली के उपकरण या बिजली से संबंधित कोई अन्य कार्य करना आपके लिए फायदेमंद रहेगा। कम्प्यूटर, तकनीक, गणित, वैज्ञानिक, गैमिंग आदि से संबंधित क्षेत्र आपके लिए हैं। इसके अलावा डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ का काम भी आपको सूट करेगा। अगर आप जासूस हैं या रहस्य सुलझाने जैसे कार्य कर रहे हैं तो भी आपको सफलता मिलेगी।

7. पुनर्वसु नक्षत्र

काल्पनिक कहानियां लिखने या खरीदने-बेचने से संबंधित कोई कार्य करना, ये आपके लिए फायदेमंद साबित होंगे। यात्रा और रखरखाव से संबंधित कार्य भी आप कर सकते हैं। अगर आप होटल मैनेजमेंट में कार्यरत हैं या फिर दीक्षा देने का काम करते हैं तो आपको फायदा मिलेगा। इतिहासकार या भेड़-बकरियों को पालने वाले लोग भी सफलता प्राप्त करेंगे।

8. पुष्य नक्षत्र

दूध से संबंधित व्यापार करने वाले लोग सफलता प्राप्त करेंगे। कैटरिंग करने वाले और होटल चलाने वाले लोग भी अच्छे व्यवसाय में हैं। नेता, शासक, धार्मिक कार्य करने वाले लोग, शिक्षक और अध्यापक आदि लोग लाभ प्राप्त करते हैं।

9. आश्लेषा नक्षत्र

पेट्रोलियम, सिगरेट, कानूनी, दवाइयों से संबंधित इंडस्ट्री से जुड़े लोग अवश्य लाभ प्राप्त करेंगे। इस नक्षत्र में जन्मे लोग तांत्रिक, सांप का जहर, बिल्ली पालने वाले, सीक्रेट सर्विस करने वाले, मनोवैज्ञानिक होते हैं। ये पोंगे पंडित और आत्माओं को बुलाने वाले भी होते हैं।


10. मघा नक्षत्र

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग शाही तो नहीं होते लेकिन उनका शाही घरानों से सीधा संपर्क रहता है। वे उनके मैनेजर भी हो सकते हैं और महत्वपूर्ण कर्मचारी भी। इसके अलावा सरकार के अधीन बड़े पदों में काम करने वाले, बड़े वकील, जज, नेता, वक्ता, ज्योतिष, पुरातत्व वैज्ञानिक भी इसी नक्षत्र में जन्म लेने वाले होते हैं।

11. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र

इस नक्षत्र में जन्मे लोग अगर महिलाओं से संबंधित सामान या बहुमूल्य रत्नों का व्यापार करते हैं तो उन्हें अवश्य ही सफलता मिलती है। ब्यूटीशियन, गायक, घर की साज-सज्जा या अन्य रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोग अवश्य ही सफलता प्राप्त करते हैं। विवाह से संबंधित हर करियर भी आप ही के लिए हैं।

12. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र

मनोरंजन, खेल और कला से संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोग अवश्य ही सफलता प्राप्त करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे धार्मिक संस्थानों के मुखिया या पुजारी, परोपकार करने वाले, दान-पुण्य के कार्य से जुड़े, शादी-विवाह से संबंधित सलाह देने वाले या अंतरराष्ट्रीय मसलों से संबंधित लोग भी सफलता प्राप्त करते हैं।

13. हस्त नक्षत्र

गहने बनाने वाले लोग, सेहत से संबंधित कार्य करने वाले, हास्य कलाकार, काल्पनिक कहानियां लिखने वाले, उपन्यासकार, रेडियो या टेलीविजन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का संबंध अगर हस्त नक्षत्र से है तो उन्हें अवश्य ही सफलता मिलती है।

14. चित्रा नक्षत्र

अपना बिजनेस चलाने वाले, घर की साज-सज्जा, गहने बनाने, फैशन डिजाइनर, मॉडल्स, कॉस्मेटिक, वास्तु-फेंगशुई, ग्राफिक आर्टिस्ट, सर्जन, प्लास्टिक सर्जन, स्टेज आर्टिस्ट, गायक, इन क्षेत्रों में कार्यरत लोग सफलता प्राप्त अवश्य करते हैं।

15. स्वाति नक्षत्र

व्यवसाय चलाने वाले, गायक, वाद्य यंत्र बजाने वाले, अध्ययन कार्य में संलिप्त, स्वतंत्र कार्य करने वाले, सामाजिक सेवा में लिप्त लोग सफल होते हैं। इसके अलावा न्यूज रीडर, कम्प्यूटर्स और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में काम करने वाले लोग सफलता पाते हैं।

16. विशाखा नक्षत्र

शराब, फैशन, कला और साथ ही बोलने संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले ओग सफलता हासिल करते हैं। इसके अलावा सफल राजनेता, खिलाड़ी, धार्मिक नेता, नर्तक, सैनिक, आलोचक, अपराधियों का संबंध भी इसी नक्षत्र से है।

17. अनुराधा नक्षत्र

सम्मोहन क्रिया में लिप्त, ज्योतिष शास्त्री, सिनेमा संबंधित क्षेत्र, फोटोग्राफर, फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर, औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, डेटा एक्सपर्ट, अंकशास्त्र विशेषज्ञ, खदानों में काम करने वाले, विदेश व्यापार से संबंधित लोग सफलता प्राप्त करते हैं।

18. ज्येष्ठा नक्षत्र

नीति निर्माण से संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोग, सरकारी अधिकारी, रिपोर्टर्स, रेडियो जॉकी, न्यूज रीडर, टॉक शो होस्ट, वक्ता, काला जादू करने वाले, जासूस, माफिया, सर्जन, हस्त कारीगर, एथलीट्स आदि क्षेत्रों से संबंधित लोग सफलता प्राप्त करते हैं।

19. मूल नक्षत्र

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों के लिए दवाइयों से संबंधित क्षेत्र, न्याय, जासूसी, रक्षा, अध्ययन जैसे कार्य सफलता दिलवाएंगे। इसके अलावा वक्ता, सार्वजनिक नेता, सब्जियों के व्यापारी, अंगरक्षक, मल्लयुद्ध करने वाले, गणितज्ञ, सोने की खदान में काम करने वाले, घुड़सवार भी सफल होते हैं।

20. पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र

शिप संबंधी उद्योग में काम करने वाले प्रेरण, अध्यापक, भाषण देने वाले, फैशन एक्सपर्ट्स, कच्चे सामान का विक्रय करने वाले, बालों की सजावट देखने वाले, तरल पदार्थों का कार्य करने वाले लोग सफलता प्राप्त करते हैं।

21. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र

ज्योतिष, वकील, सरकारी अधिकारी, सेना में कार्यरत, अध्ययनकर्ता, सुरक्षा कार्य, व्यापारी, प्रबंधक, क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता और उत्तरदायित्व निभाने वाले कार्यों को करने वाले लोग सफल होते हैं।

22. श्रवण नक्षत्र

किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले अध्यापक, वक्ता, बौद्धिक, छात्र, भाषाविद, कहानीकार, हास्य अभिनेता, गायन से संबंधित क्षेत्र से जुड़े लोग, टेलीफोन ऑपरेटर्स, मनोवैज्ञानिक, यातायात से संबंधित क्षेत्र में कार्यरत लोग सफलतम होते हैं।

23. धनिष्ठा नक्षत्र

गायन, वादन, नृत्य, म्यूजिक बैंड इन सबसे संबंधित क्षेत्र के लोग सफलता पाते हैं। इसके अलावा मनोरंजन उद्योग, रचनात्मक क्षेत्र, कवि, ज्योतिष शास्त्री, प्रेत आत्माओं को बुलाने वाले लोग सफलता हासिल करते हैं।

24. शतभिषा नक्षत्र

ड्रग्स या दवाइयों से संबंधित क्षेत्र में काम करने वाले लोग सफलता प्राप्त करते हैं। सर्जन, मदिरा से जुड़े क्षेत्रों में कार्यरत लोग भी सफलता पाते हैं।

25. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र

मृत्यु से संबंधित किसी भी व्यवसाय से जुड़े लोग सफल होते हैं। कॉफिन बनाने वाले, कब्र खोदने वाले, अंतिम संस्कार से संबंधित सामान का व्यापार करने वाले सफलता पाते हैं। इसके साथ-साथ आतंकवादी, हथियार बनाने वाले, काला जादू करने वाले लोग भी सफलता पाते हैं।

26. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र

योग और ध्यान से संबंधित क्षेत्रों में कार्यरत लोग सफलता प्राप्त करते हैं। तंत्र-मंत्र करने वाले और रूहानी ताकतों से संपर्क स्थापित करने वाले लोगों को सफलता अवश्य मिलती है। इसके अलावा दान-पुण्य करने वाले लोग भी सफल होते हैं।

27. रेवती नक्षत्र

सम्मोहन क्रिया करने वाले लोग, जादूगर, गायक, कलाकार, आर्टिस्ट, हास्य कलाकार, मनोरंजन करने वाले, कंस्ट्रक्शन बिजनेस से जुड़े लोग सफलता पाते हैं।,,


डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य
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Tuesday, August 27, 2019

नवम भाव का महत्व

नवम भाव का महत्व
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जन्मकुंडली का नौवां घर सर्वाधिक शुभ घरों में गिना जाता है | इस घर का अपना विशेष महत्व है | मैंने जीवन में इस घर का प्रभाव स्वयं अनुभव करके देखा है | अक्सर हम राजयोग के बारे में बात करते हैं | हर व्यक्ति की कुंडली में राजयोग और दरिद्र योग मिल जायेंगे | हर योग की कुछ समय अवधि रहती है | दो तीन साल से लेकर पांच छह साल तक ही ये योग प्रभावशाली रहते हैं | जिस राजयोग के विषय में मैं सोच रहा हूँ अलग है | नवम भाव से बनने वाला योग पूरे जीवन में प्रभाव कारी रहता है |
कुछ लोगों को आगे बढ़ने के अवसर ही नहीं मिल पाते और कुछ लोग अवसर मिलते ही बहुत दूर निकल जाते हैं | बदकिस्मती जो जीवन बदल दे इसी घर की देन होती है | खुशकिस्मती जो अगली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता साफ़ कर दे नवम भाव का प्रबल होना दर्शाती है |
मनपसंद जीवनसाथी पाने की आस में पूरा जीवन गुजर जाता है उसके साथ जिसे कभी पसंद किया ही नहीं |  जिन्दगी के साथ समझौता कर लेना या यह मान लेना कि यही नसीब था इन घटनाओं के लिए नवम भाव ही उत्तरदायी है |
आस लगाकर बैठे हजारों हजार लोग भाग्य के पीछे भागते रहते हैं और यह भी सच है कि इस दौड़ में हम सब हैं | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हर कोई भाग्य की और देख रहा है | किस्मत का यह ताना बाना अपने आप में विचित्र है | भाग्य को समझ पाना आसान नहीं परन्तु जन्मकुंडली के द्वारा एक कोशिश की जा सकती है | तो आइये जानते हैं कैसे आपकी जन्मकुंडली का नवम भाव आपके जीवन को प्रभावित करता है |

नवम भाव और राज योग
नवम भाव किस्मत का है | यहाँ बैठे ग्रह आपके भाग्य को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं | यदि यहाँ कोई भी ग्रह न हो तो भी यहाँ स्थित राशी के स्वामी को देखा जाता है | नवम भाव भाग्य का और दशम भाव कर्म का है | जब इन दोनों स्थानों के ग्रह आपस में किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखते हैं तब राजयोग की उत्पत्ति होती है | राजयोग में साधारण स्थिति में व्यक्ति सरकारी नौकरी प्राप्त करता है | नवम और दशम भाव का आपस में जितना गहरा सम्बन्ध होगा उतना ही अधिक बड़ा राज व्यक्ति भोगेगा | मंत्री, राजनेता, अध्यक्ष आदि राजनीतिक व्यक्तियों की कुंडली में यह योग होना स्वाभाविक ही है |

नवम भाव और दुर्भाग्य
यदि नवम भाव का स्वामी ग्रह सूर्य के साथ १० डिग्री के बीच में हो तो निस्संदेह व्यक्ति भाग्यहीन होता है | यदि नवमेश नीच राशी में हो तो व्यक्ति चाहे करोडपति क्यों न हो एक न एक दिन उसे सड़क पर आना पड़ ही जाता है | यदि नवमेश १२वे भाव में हो तो व्यक्ति का भाग्य अपने देश में नहीं चमकता | विदेश में जाकर वहां कष्ट उठाकर जीना पड़ता है | उसकी यही मेहनत उसके भाग्य का निर्माण करती है |
नवम भाव का स्वामी बलवान हो या निर्बल, उसकी दशा अन्तर्दशा में व्यक्ति को अवसर खूब मिलते हैं | यदि नवमेश अच्छी स्थिति में होगा तो व्यक्ति अवसर का लाभ उठा पायेगा | अन्यथा अवसर पर अवसर ऐसे ही निकल जाते हैं जैसे मुट्ठी में से रेत |
पाप ग्रह इस स्थान में बैठकर भाग्य की हानि करते हैं और शुभ ग्रह मुसीबतों से बचाते हैं | इस स्थान पर बुध, शुक्र, चन्द्र और गुरु का होना व्यक्ति के उज्ज्वल भविष्य को दर्शाता है | मंगल, शनि, राहू और केतु इस स्थान में बैठकर व्यक्ति को दुर्भाग्य के अवसर प्रदान करते हैं | सूर्य का यहाँ होना निस्संदेह एक बहुत बड़ा राजयोग है | सूर्य स्वयं ग्रहों का राजा है और जब राजा ही भाग्य स्थान में बैठ जाए तो राजयोग स्पष्ट हो जाता है |
कोई भी ग्रह चाहे वह पाप ग्रह मंगल, शनि ही क्यों न हों, इस स्थान में यदि अपनी राशी में हो तो व्यक्ति बहुत भाग्यशाली हो जाता है | पाप ग्रहों से अंतर केवल इतना पड़ता है कि उसके अशुभ कर्मों में भाग्य उसका साथ देता है |

Sunday, August 25, 2019

कुंडली मे चतुर्थ भाव का महत्व

कुंडली मे चतुर्थ भाव का महत्व
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चतुर्थ भाव सुख स्थान या मातृ स्थान के नाम से जाना जाता है| इस भाव में व्यक्ति को प्राप्त हो सकने वाले समस्त सुख विद्यमान है इसलिए इसे सुख स्थान कहते हैं| मनुष्य का प्रथम सुख माता के आँचल में होता है| केवल वही है जो व्यक्ति की तब तक रक्षा करती है जब तक वह अपने सुख को अर्जित करने में सक्षम न हो जाए| चतुर्थ भाव व्यक्ति की माता से संबंधित समस्त विषयों की जानकारी भी देता है इसलिए इसे मातृ भाव भी कहा जाता है| तृतीय भाव से दूसरा भाव होने के कारण यह भाई-बहनों के धन को भी सूचित करता है| ज्योतिष में यह विष्णु स्थान है तथा एक शुभ भाव माना जाता है| परंतु यदि शुभ ग्रह इस भाव का स्वामी हो तो उसे केन्द्राधिपत्य दोष लगता है|
यह केंद्र भावों में से एक भाव माना गया है| मानव जीवन में इस भाव का बहुत अधिक महत्व है| किसी भी मनुष्य के पास भौतिक साधन कितनी भी अधिक मात्रा में क्यों न हों यदि उसके जीवन में सुख-शांति ही नही तो क्या लाभ? इसलिए इस भाव से मनुष्य को प्राप्त होने वाले सभी प्रकार के सुखों का विचार किया जाता है| जन्मकुंडली में यह भाव उत्तर दिशा तथा अर्द्धरात्रि को प्रदर्शित करता है| इस भाव से सुख के अतिरिक्त माता, वाहन, शिक्षा, वक्षस्थल, पारिवारिक सुख, भूमि, कृषि, भवन, चल-अचल संपति, मातृ भूमि, भूमिगत वस्तुएं, मानसिक शांति आदि का विचार किया जाता है| चतुर्थ भाव मुख्य केंद्र स्थान है| “द्वितीय केंद्र” के नाम से प्रसिद्ध यह कालपुरुष के वक्षस्थल का कारक है| यही कारण है कि इस जीवन में पर्याप्त सुख व आनंद प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का हृदय निर्मल होना चाहिए|

चतुर्थ भाव से निम्नलिखित विषयों का विचार किया जाता है-
सुख- चतुर्थ भाव से हम किसी भी व्यक्ति के जीवन के समस्त सुखों का विश्लेषण करते हैं| यह भाव मातृ स्नेह एवं उनसे प्राप्त संरक्षण, पारिवारिक सदस्यों, निवास, वाहन आदि से प्राप्त होने वाले सुखों को दर्शाता है|
माता- यह भाव व्यक्ति की माता, उनका स्वभाव, चरित्र तथा विशेषताओं को सूचित करता है| मनुष्य की माता को जो सुख-सुविधाएं प्राप्त होंगी वे सब इस भाव से तथा मातृ कारक चन्द्र के आधार पर देखी जाती हैं|
निवास(घर)- यह भाव मनुष्य के निवास स्थान अथवा घर का भी प्रतीक है| किसी भी व्यक्ति के सुखमय जीवन के लिए उसके पास निवास स्थान होना अनिवार्य है व्यक्ति केवल गृह में ही विश्राम कर सकता है, अन्य किसी स्थान पर नहीं| मनुष्य का निजी घर उसका अतिरिक्त सुख ही है|
संपति- यह भाव चल व अचल दोनों प्रकार की संपति को दर्शाता है| शुक्र चल संपति जैसे मोटर, वाहन का कारक है तथा मंगल अचल संपति का कारक होता है|
कृषि- यह भाव भूमिगत वस्तुओं का प्रतीक है इसलिए यह स्थान कृषि से भी जुड़ा हुआ है| चतुर्थ भाव का दशम भाव व मंगल से संबंध होना कृषि अथवा कृषि-उत्पादों से संबंधित व्यवसाय का सूचक है|
जीवनसाथी का कर्मस्थान- यह भाव सप्तम स्थान(जीवनसाथी) से दशम है इसलिए यह जीवनसाथी के कार्यक्षेत्र व उसकी आय को बताता है|
शिक्षा- यह भाव व्यक्ति की शिक्षा संबंधी संभावनाओं को दर्शाता है| मनुष्य कितनी शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम है और वह किस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करेगा यह इस भाव से ज्ञात हो सकता है|
संतान अरिष्ट- यह भाव पंचम स्थान से द्वादश है अतः यह संतान के अरिष्ट का सूचक माना जाता है| इस भाव के स्वामी की दशा-अंतर्दशा में किसी भी व्यक्ति की संतान को शारीरिक कष्ट हो सकता है|
मानसिक शांति- यह भाव व्यक्ति की मानसिक शांति का प्रतीक भी है| चतुर्थ स्थान व चतुर्थेश के पीड़ित होने से व्यक्ति मानसिक शांति से वंचित हो सकता है| इसलिए इस भाव से यह भी पता चलता है कि मनुष्य को मानसिक शांति प्राप्त होगी या नहीं| इस भाव के पीड़ित होने से व्यक्ति को मनोरोग हो सकते हैं|
वक्षस्थल- यह भाव कालपुरुष के वक्षस्थल का सूचक है| इस भाव तथा इसके स्वामी के पीड़ित होने से व्यक्ति को छाती या वक्षस्थल से संबंधित रोग अथवा कष्ट हो सकता है|
वाहन- इस भाव से वाहन संबंधी सूचना भी प्राप्त होती है| किसी व्यक्ति के पास वाहन होगा या नहीं, वाहन की संख्या व उनसे मिलने वाले लाभ की जानकारी भी इस भाव से पता चल सकती है| यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थेश तथा वाहन कारक शुक्र कुडंली में बली हों तो मनुष्य को उत्तम वाहन सुख प्राप्त होता है| इसके विपरीत इन घटकों के पीड़ित होने से व्यक्ति वाहन सुख से वंचित हो जाता है|
स्थान परिवर्तन- यह भाव व्यक्ति के निवास से जुड़ा है अतः यदि चतुर्थ स्थान, चतुर्थेश पर शनि, सूर्य, राहु तथा द्वादशेश का प्रभाव हो तो इस पृथकता जनक प्रभाव के कारण मनुष्य को अपना घर-बार, जन्मस्थान तक छोड़ना पड़ता है|
जन-सेवा- चतुर्थ स्थान जनता से संबंधित भाव है| इसलिए यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थेश एवं चन्द्र के साथ लग्नेश का युति अथवा दृष्टि द्वारा संबंध हो तो मनुष्य जनसेवा व जनहितकारी कार्यों को कर सकता है|

चतुर्थ भाव में ग्रहों के प्रभाव
1. चौथे घर में सूर्यः इस घर में सूर्य हो तो जातक का जीवन उदासीपूर्ण और दुखों से भरा होता है। व्यक्ति का पूरा जीवन भ्रमण करते गुजर जाता है। जातक पैतृक संपत्ति का मालिक बनता है। चौथे घर में बैठा सूर्य जातक को दर्शनशास्त्र का ज्ञानी, जादू-टोना की जानकारी या चालबाजी करने वाला बनाता है। इस घर का सूर्य यदि मंगल या शनि से प्रभावित हो रहा हो तो जातक को जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
2. चौथे घर में चंद्रमाः जातक के पास स्वयं का निवास स्थान होगा। सगे-संबंधियों से मान-सम्मान मिलेगा। जातक ईगो रखने वाला और झगड़ालू प्रवृति का होगा। यदि चंद्रमा इस घर में पीड़ित हुआ तो जातक को माता से दूर करा देगा। चौथे घर में बैठे चंद्रमा परर यदिद गुरु की दृष्टि नहीं पड़ रही हो तो जातक कामुक प्रवृति में लिप्त रहेगा।
3. चौथे घर में मंगलः चौथे घर में मंगल की स्थित जातक के माता या दोस्तों से दूरियां को दर्शाता है। कम उम्र में ही जातक के सिर से मां का साया उठ जाता है। राजनीति के क्षेत्र में जातक को सफलता मिलती है। खुद का घर भी जातक के पास होता है लेकिन घर में खुशियां नहीं रहती हैं।
4. चौथे घर में बुधः इस घर में यदि बुध बैठा हो तो जातक का झुकाव शिक्षा अथवा प्रशासनिक विभाग की तरफ अधिक रहेगा। जातक सत्तारूढ़ सरकार का आलोचक होगा साथ ही अपने जीवन में बहुत ख्याति प्राप्त करेगा। जातक के पिता जमीन से जुड़े व्यक्ति होंगे। चौथे घर का बुध जातक को दूर की यात्रा का सुख प्रदान कराता है साथ ही उसे कला, संगीत का भी आनंद प्राप्त होता है।
5. चौथे घर में गुरुः जातक की सोच दार्शनिक होगी। चौथे घर का गुरु जातक को बहुत बुद्धिमान बनाता है। इस घर में गुरु होने से जातक को समय-समय पर भगवान का आशीर्वाद हासिल होता है। ये जातक बहुत अधिक धार्मिक, सभी काम पाप-पुण्य सोच कर करने वाला और दुश्मनों से डरने वाला होगा।
6. चौथे घर में शुक्रः इस घर में बैठा शुक्र जातक को बहुत भाग्यशाली बनाता है। जातक को जीवन में अनेक वाहनों का सुख प्राप्त होगा। खुद का घर नसीब होगा। जो बेहद साज-सज्जा वाला और साफ-सुथरा होगा। माता के प्रति जातक की बहुत ही अधिक श्रद्धा होगी। इसके जीवन में कई दोस्त बनेंगे।
7. चौथे घर में शनिः जातक का प्रारंभिक जीवन बीमारियों से घिरा होगा। माता से दूर जीवन बीतेगा। वात-पित्त की बीमारी से परेशान रहेगा। स्वभाव से सुस्त होगा। जातक को जीवन में खुद के घर का सुख नहीं मिलेगा और वाहन की तरफ से उसे हमेशा परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। रिशतेदार जातक को पसंद नहीं करेंगे। जातक अकेले जीवन जीना अधिक पसंद करेगा।
8. चौथे घर में राहुः चौथे घर में राहु के प्रभाव से जातक मंद बुद्धि का स्वामी बनता है। बुरे कामों के कारण बदनामी झेलता है। लोगों को ठगने का जातक काम करता है।
9. चौथे घर में केतुः घर और माता के सुख से दूर जातक का जीवन बीतेगा। पैतृक संपत्ति हासिल नहीं होगी। जीवन में कई बार अचानक बदलाव का सामना करना पड़ेगा, साथ ही कई तरह के बुरे अनुभव भी जातक को प्राप्त होंगे।

Saturday, August 10, 2019

जन्म दोष शांति के उपाय


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अशुभ जन्म समय जिनके उपाय करने जरूरी है।

हम जैसा कर्म करते हैं उसी के अनुरूप हमें ईश्वर सुख दु:ख देता है। सुख दु:ख का निर्घारण ईश्वर कुण्डली में ग्रहों स्थिति के आधार पर करता है। जिस व्यक्ति का जन्म शुभ समय में होता है उसे जीवन में अच्छे फल मिलते हैं और जिनका अशुभ समय में उसे कटु फल मिलते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह शुभ समय क्या है और अशुभ समय किसे कहते हैं

अमावस्या में जन्म

ज्योतिष शास्त्र में अमावस्या को दर्श के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि में जन्म माता पिता की आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव डालता है। जो व्यक्ति अमावस्या तिथि में जन्म लेते हैं उन्हें जीवन में आर्थिक तंगी का सामना करना होता है। इन्हें यश और मान सम्मान पाने के लिए काफी प्रयास करना होता है।

अमावस्या तिथि में भी जिस व्यक्ति का जन्म पूर्ण चन्द्र रहित अमावस्या में होता है वह अधिक अशुभ माना जाता है। इस अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए घी का छाया पात्र दान करना चाहिए, रूद्राभिषेक और सूर्य एवं चन्द्र की शांति कराने से भी इस तिथि में जन्म के अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है।

संक्रान्ति में जन्म

संक्रान्ति के समय भी संतान का जन्म अशुभ माना जाता है। इस समय जिस बालक का जन्म होता है उनके लिए शुभ स्थिति नहीं रहती है। संक्रान्ति के भी कई प्रकार होते हैं जैसे रविवार के संक्रान्ति को होरा कहते हैं, सोमवार को ध्वांक्षी, मंगलवार को महोदरी, बुधवार को मन्दा, गुरूवार को मन्दाकिनी, शुक्रवार को मिश्रा व शनिवार की संक्रान्ति राक्षसी कहलाती है।

अलग अलग संक्रान्ति में जन्म का प्रभाव भी अलग होता है। जिस व्यक्ति का जन्म संक्रान्ति तिथि को हुआ है उन्हें ब्राह्मणों को गाय और स्वर्ण का दान देना चाहिए इससे अशुभ प्रभाव में कमी आती है। रूद्राभिषेक एवं छाया पात्र दान से भी संक्रान्ति काल में जन्म का अशुभ प्रभाव कम होता है।

भद्रा काल में जन्म

जिस व्यक्ति का जन्म भद्रा में होता है उनके जीवन में परेशानी और कठिनाईयां एक के बाद एक आती रहती है। जीवन में खुशहाली और परेशानी से बचने के लिए इस तिथि के जातक को सूर्य सूक्त, पुरूष सूक्त, रूद्राभिषेक करना चाहिए। पीपल वृक्ष की पूजा एवं शान्ति पाठ करने से भी इनकी स्थिति में सुधार होता है।

कृष्ण चतुर्दशी में जन्म

पराशर महोदय कृष्ण चतुर्दशी तिथि को छ: भागों में बांट कर उस काल में जन्म लेने वाले व्यक्ति के विषय में अलग अलग फल बताते हैं। इसके अनुसार प्रथम भाग में जन्म शुभ होता है परंतु दूसरे भाग में जन्म लेने पर पिता के लिए अशुभ होता है, तृतीय भाग में जन्म होने पर मां को अशुभता का परिणाम भुगतना होता है, चौथे भाग में जन्म होने पर मामा पर संकट आता है, पांचवें भाग में जन्म लेने पर वंश के लिए अशुभ होता है एवं छठे भाग में जन्म लेने पर धन एवं स्वयं के लिए अहितकारी होता है।

कृष्ण चतुर्दशी में संतान जन्म होने पर अशु प्रभाव को कम करने के लिए माता पिता और जातक का सर्वोषधि से स्नान कराएं  साथ ही सत्पात्रों को आहार एवं संयम पात्र दान देना चाहिए।

समान जन्म नक्षत्र

ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार अगर परिवार में पिता और पुत्र का, माता और पुत्री का अथवा दो भाई और दो बहनों का जन्म नक्षत्र एक होता है तब दोनो में जिनकी कुण्डली में ग्रहों की स्थिति कमज़ोर रहती है उन्हें जीवन में अत्यंत कष्ट का सामना करना होता है।
इस स्थिति में नवग्रह पूजन, नक्षत्र देवता की पूजा, सत्पात्रों को भोजन एवं दान देने से अशुभ प्रभाव में कमी आती है।

सूर्य और चन्द्र ग्रहण में जन्म

सूर्य और चन्द्र ग्रहण को शास्त्रों में अशुभ समय कहा गया है। इस समय जिस व्यक्ति का जन्म होता है उन्हें शारीरिक और मानसिक कष्ट का सामना करना होता है। इन्हें अर्थिक परेशानियों का सामना करना होता है।

सूर्य ग्रहण में जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु की संभवना भी रहती है। इस दोष के निवारण के लिए नक्षत्र स्वामी की पूजा करनी चाहिए। सूर्य व चन्द्र ग्रहण में जन्म दोष की शांति के लिए सूर्य, चन्द्र और राहु की पूजा भी कल्यणकारी होती है।

सर्पशीर्ष में जन्म

अमावस्या तिथि में जब अनुराधा नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण होता है तो सर्पशीर्ष कहलाता है। सार्पशीर्ष को अशुभ समय माना जाता है। इसमें कोई भी शुभ काम नहीं होता है। सार्पशीर्ष मे शिशु का जन्म दोष पूर्ण माना जाता है।

जो शिशु इसमें जन्म लेता है उन्हें इस योग का अशुभ प्रभाव भोगना होता है। इस योग में शिशु का जन्म होने पर पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक कराना चाहिए और सत्पात्रों को भोजन एवं दान देना चाहिए इससे दोष के प्रभाव में कमी आती है।

गण्डान्त योग में जन्म

गण्डान्त योग को संतान जन्म के लिए अशुभ समय कहा गया है। इस समय संतान जन्म लेती है तो गण्डान्त शान्ति कराने के बाद ही पिता को शिशु का मुख देखना चाहिए। पराशर महोदय के अनुसार तिथि गण्ड में बैल का दान, नक्षत्र गण्ड में गाय का दान और लग्न गण्ड में स्वर्ण का दान करने से दोष मिटता है।

संतान का जन्म अगर गण्डान्त पूर्व में हुआ है तो पिता और शिशु का अभिषेक करने से और गण्डान्त के अतिम भाग में जन्म लेने पर माता एवं शिशु का सर्वोषधि से स्नान कराने से दोष कटता है।

त्रिखल दोष में जन्म

जब तीन पुत्री के बाद पुत्र का जन्म होता है अथवा तीन पुत्र के बाद पुत्री का जन्म होता है तब त्रिखल दोष लगता है। इस दोष में माता पक्ष और पिता पक्ष दोनों को अशुभता का परिणाम भुगतना पड़ता है। इस दोष के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए माता पिता को दोष शांति का उपाय करना चाहिए।

मूल में जन्म दोष

मूल नक्षत्र में जन्म अत्यंत अशुभ माना जाता है। मूल के प्रथम चरण में पिता को दोष लगता है, दूसरे चरण में माता को, तीसरे चरण में धन और अर्थ का नुकसान होता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर 1 वर्ष के अंदर पिता की, 2 वर्ष के अंदर माता की मृत्यु हो सकती है। 3 वर्ष के अंदर धन की हानि होती है।

इस नक्षत्र में जन्म लेने पर 1वर्ष के अंदर जातक की भी मृत्यु की संभावना रहती है। इस अशुभ स्थित का उपाय यह है कि मास या वर्ष के भीतर जब भी मूल नक्षत्र पड़े मूल शान्ति करा देनी चाहिए। अपवाद स्वरूप मूल का चौथ चरण जन्म लेने वाले व्यक्ति के स्वयं के लिए शुभ होता है।

अन्य दोष

ज्योतिषशास्त्र में इन दोषों के अलावा कई अन्य योग और हैं जिनमें जन्म होने पर अशुभ माना जाता है इनमें से कुछ हैं यमघण्ट योग, वैधृति या व्यतिपात योग एव दग्धादि योग हें। इन योगों में अगर जन्म होता है तो इसकी शांति अवश्य करानी चाहिए।

यहां ग्रहों की पूजन के लिए प्रेरित नहीं किया जा रहा है उनके अधिष्ठाता श्री जिनेन्द्र  प्रभु का पूजन विधानं अनुष्ठान करें ।

ज्योतिषीय योग

ज्योतिषीय योग
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अत्यन्त महत्वपूर्ण योग ।

दीर्घायु, संतान व समृद्धि - लग्नेश, गुरु या शुक्र केंद्र में स्थित हो।

पूर्णायु - लग्नेश गुरु से केंद्र में तथा कोई शुभ ग्रह लग्न से केंद्र में।

सुखी जीवन - लग्नेश लग्न से या चंद्र से केंद्र में हो तथा उदित भाग में हो। (सप्तम से दशम तक व दशम से लग्न तक उदित भाग) या नवमेश-लग्नेश की युति दशम में हो।

उच्च शिक्षा - नवमेश-लग्नेश की युति केंद्र में हो और उन पर पंचमेश की दृष्टि हो।

ख्याति व समृद्धि - लग्नेश उच्च राशि में हो और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, एक शुभ ग्रह चंद्र या लग्न से युत हो।

दुर्बल शरीर - निर्बल लग्नेश शुष्क राशि (मेष, 5, 9) में स्थित हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो।

राज्य कृपा - लग्न में शुभ ग्रह व नवमेश-दशमेश की युति हो।

जुड़वां संतान - राहु लग्न में, लग्न पर मंगल व शनि की दृष्टि तथा लग्नेश गुलिक से युत हो।

भरण पोषण - चंद्र व सूर्य  एक ही राशि व एक ही नवांश में हों तो जातक का भरण/पालन-पोषण माता सहित तीन स्त्रियां करेंगी।

अतुल धन लाभ - द्वितीयेश केंद्र में व एकादशेश उससे केंद्र में या त्रिकोण में तथा गुरु व शुक्र से युत या दृष्ट हो।

शत्रु से धन लाभ - द्वितीयेश की छठे भाव में एकादशेश से युति होने पर।

दरिद्रता - द्वितीयेश + एकादशेश नीचस्थ व पापग्रह युक्त होने पर।

धन कुबेर - द्वितीयेश परमोच्च स्थिति में होने पर

असीमित धन प्राप्ति - द्वितीयेश एकादश में वर्गोत्तम भी (नवांश में), स्वराशि, निम्न राशि या शुक्र/बुध से युक्त हो, गुरु की दृष्टि भी हो।

नेत्र - बली द्वितीयेश-सुंदर नेत्र, द्वितीयेश 6, 8, 12 में नेत्र कष्ट/नेत्र/प्रकाशहीन की संभावना।

क्रूर व असत्यवादी - द्वितीय में पापग्रह तथा द्वितीयेश भी पापयुक्त होने पर।

भाई-बहनों का सुख - तृतीयेश केंद्र/त्रिकोण/उच्च या स्वराशि के अथवा शुभवर्गों में हो और कारक (मंगल) शुभग्रह से युक्त हो तो भाई-बहनों का सुख निश्चित है।

सुख व वाहन - चतुर्थेश वर्गोत्तम या उच्चस्थ तथा शुभ ग्रह चतुर्थ भावस्थ।

समृद्धि - चतुर्थेश दशम में तथा नवमेश, दशमेश व लग्नेश चतुर्थस्थ।

प्रतिष्ठा - चतुर्थेश शुभ ग्रह हो, उस पर शुभ दृष्टि भी हो तथा चंद्र सशक्त हो।

माता की आयु - चतुर्थेश उच्चस्थ, चतुर्थ में शुभ ग्रह व चंद्रमा बली हो,

गृह तथा भूमि संपत्ति - चतुर्थेश स्थिर राशि (2, 5, 8, 11) तथा शुभ षडवर्गों में, दशमेश उच्चस्थ होने पर भी।

आयु व शिक्षा - गुरु व शुक्र लग्न या चंद्रमा से चतुर्थ में स्थित, बुध उच्चस्थ।

धार्मिक प्रवृत्ति - सूर्य-चतुर्थस्थ, चंद्र-नवमस्थ व मंगल एकादशस्थ।

शराबी - पाप ग्रह 6, 8, 12 में, चतुर्थ में नीचस्थ ग्रह या चतुर्थेश स्वयं नीचस्थ या नीच ग्रह से युति करे।

यात्रा - चतुर्थेश-अष्टमेश चर राशियों में (1, 4, 7, 10) या चर नवांश में हो,उनपर द्वादशेश की दृष्टि हो या द्वादशेश नीच हो।

ऋण - छठे भाव का स्वामी चतुर्थ में, चतुर्थ भाव का स्वामी स्थिर राशि में और दशमेश की दृष्टि पड़े।

गृह संपत्ति - चतुर्थेश निर्बल हो, अष्टम या नीच राशि के निकट हो तो गृह/सम्पत्ति नहीं, यदि जन्म नक्षत्रेश एकादशेश भी हो तो स्वयं के लिए गृह निर्माण करायेगा।

सुख-शांति - दशमेश जलीय राशि में हो तो जल संबंधी व्यवसाय से सुख (व्यवसाय, जल सेना, जल यान, यात्रा)।

दत्तक पुत्र - 1. पंचम में बुध या शनि की राशि तथा शनि/गुलिक से युत/दृष्ट हो। 2. पंचममेश षष्ठ में, षष्ठेश द्वादश में व द्वादशेश लग्न में हो तो।

संतान सुख - पंचमेश शुभ ग्रह युक्त शुभ राशि में हो। पंचम में शुभ ग्रह की दृष्टि हो।पंचम में वृष या तुला राशि हो, शुक्र हो, पाप ग्रह की दृष्टि/प्रभाव से भी कोई बाधा नहीं।

संतान हानि - शनि पंचम में, पंचमेश द्वादश में तथा चंद्र-राहु युति।

पर स्त्री/पुरुष से संतान - ए. स्वराशि के पंचमेश की पंचम में राहु से युति हो और गुरु व चंद्र की दृष्टि न हो। बी. चंद्रमा द्वादश में गुरु अष्टम में पाप प्रभाव में।

संतान संख्या - लग्नेश से पंचम भाव तक जितने अंश हों उन पर 12 से भाग देने पर शेष संख्या।

संतान नाश - राहु उच्चस्थ हो, पंचमेश पापग्रह हो और गुरु नीच राशिस्थ हो।

शत्रु नाशक योग - षष्ठ भाव ए. छठे में पापग्रह, छठे भाव का स्वामी पापस्थ तथा शनि-राहु युति। बी. मंगल छठे में षष्ठेश अष्टम में हो।

पाप कर्म - षष्ठेश व नवमेश दोनों पापग्रह युक्त होकर दशम में षष्ठ में स्थित हो।

मृत्यु - लग्नेश व नवमेश-दशमेश से युत या दृष्ट हो, एकादशेश शुभ हो तो शांतिपूर्ण मृत्यु।

दुर्घटना/प्रेतात्मा पीड़ा - अष्टम भाव का स्वामी छठे में, लग्नेश द्वादश में, चंद्रमा क्रूर राशि/ग्रहों के साथ दुर्घटना या प्रेतात्माओं की पीड़ा।

पीड़ित ग्रहों से रोग -

सूर्य - अग्नि, ज्वर, जलन, क्षय।
चंद्रमा - कफ, अग्नि, धात, घाव।
बुध - गुह्य, उदर, वायु, कुष्ठ।
गुरु - शाप दोष, गुल्भ (जिगर, तिल्ली)।
शुक्र - गुप्तांग।
शनि - रोगों की वृद्धि, गठिया, क्षय
राहु- मिर्गी, फांसी, संक्रामक, नेम, कृमि, प्रेत पिशाच भय। केतु - राहु व मंगल के समान।

दांपत्य सुख - ए. सप्तमेश शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो। बी. ग्रहों के बल से सुख की प्रचुरता का अनुमान। सप्तमस्थ ग्रहों से जातकों का संबंध पता चलता है। सूर्य सप्तम - जातक को अधिकार में रखने वाला/वाली। चंद्र- कल्पना के श्रोत में बहाव। मंगल - मासिक रक्तस्राव में भी रतिक्रिया पसंद/ आपत्ति नहीं। बुध - नपुंसकता/ बंध्या गुरु - ब्राह्मण/धार्मिक प्रवृत्ति। शुक्र - संदेहास्पद आचरण। शनि - राहु व केतु- नीच जाति या स्तर।

बंध्या - द्वादश में पापग्रह, निर्बल चंद्र व पंचम में सप्तमेश बंध्या।

आचरण संदेहास्पद - ए. शनि सप्तमस्थ व सप्तमेश शनि की राशि में बी. शुक्र मंगल युति राशि या नवांश में हो तो अधिक कामवासना/ अनैतिक व अप्राकृतिक क्रियायें करने वाले।

सदाचारी - सप्तमेश शुभग्रह, सप्तमस्थ शुभ ग्रह व शुक्र केंद्रस्थ हो।

पति/पत्नी की आयु - शुक्र नीचस्थ व दशमेश निर्बल होकर 6, 8, 12 में हो तो अल्पायु, मंगलीक योग भी जीवनसाथी की अल्पायु का कारण।

मंगलीक योग - मंगल 1, 4, 7, 8 या 12 में।

शीघ्र विवाह - बली सप्तमेश शुभ ग्रह की राशि में। शुक्र केंद्र या त्रिकोण में शुक्र द्वितीय में व एकादशेश अपने भाव में, शुक्र चंद्र से सप्तम में शुक्र, लग्न से केंद्र त्रिकोण में।

विलंब से विवाह - लग्न-लग्नेश, सप्तम-सप्तमेश व शुक्र स्थिर राशियों में हो और चंद्रमा चर राशि में हो। ग्रह निर्बल हो (लग्न का स्वामी, सप्तम भाव का स्वामी व शुक्र)। शनि भी ऊपरी योग बनाये तो वृद्धावस्था में विवाह।

अल्पायु - निर्बल अष्टमेश अष्टम में या केंद्र में और लग्नेश भी कमजोर।

मध्यायु - अल्पायु के योगों के साथ लग्नेश व चंद्र बली हो तो मध्यायु।

आयु की वृद्धि - तृतीय भाव में स्वराशि, उच्च या मित्र राशीश हों तो वृद्धि।

दीर्घायु - बुध, गुरु, शुक्र केंद्र त्रिकोणस्थ। - लग्न/लग्नेश चंद्र व सूर्य यदि बली हो तो दीर्घायु व भविष्य भी निष्कंटक व सुख-शांतिपूर्ण।

पैतृक संपत्ति - बली नवमेश दशम में, चंद्र सूर्य से नवम में व गुरु चंद्र से नवम।

धनहीन - पिता चंद्र-मंगल द्वितीय या नवमस्थ और नवमेश नीचस्थ।

समृद्धि व दीर्घायु - शुक्र चतुर्थ में, नवमेश परमोच्च में तथा नवम में गुरु।

पिता की समृद्धि - केंद्रस्थ नवमेश पर गुरु व सूर्य की दृष्टि हो।

पितृ भक्ति - सूर्य केंद्र या त्रिकोण में, नवम में शुभ ग्रह, गुरु लग्न में हो।

पिता की मृत्यु - नवमेश नीचस्थ और उसका स्वामी नवम में हो और तृतीय में पाप ग्रह हो उस पाप ग्रह की दशा में पिता की मृत्य

गंगा स्नान - राहु-सूर्य का संबंध। - संन्यास दशम में मीन राशि, सांसारिक प्रलोभनों का त्याग।

ज्ञान व सम्मान - गुरु-शुक्र की दशम में युति, लग्नेश बली, शनि उच्च के।

सफलता - दशमेश-लग्नेश की एकादश में युति पर मंगल की दृष्टि।

ख्याति - दशमेश केंद्र-त्रिकोण में और गुरु उससे त्रिकोण में

पापकर्म - अष्टमेश-दशमेश का परिवर्तन योग। -

असफलता - दशमेश निर्बल व दशम में पापग्रह युक्त हो।

प्रतिष्ठा - लग्न, दशम व चंद्र बली प्रतिष्ठा प्राप्त।

आयु - दशमेश - नवमेश द्वादश में अल्पायु - राजयोग - बली नवमेश व दशमेश हो, उच्च के ग्रह केंद्र/त्रिकोण में ।
राजदंड- दशम में सूर्य-राहु-मंगल युति हो और शनि द्वारा दृष्ट हो।

भारी आर्थिक लाभ - ए. एकादश में गुरु बी. एकादशेश तीव्रगति का ग्रह स्थिर राशि में हो।

धन लाभ - ए. चंद्रमा द्वितीय में, शुक्र नवम में और गुरु एकादश में। बी. 11 भाव चर राशि में, द्वितीयेश स्थिर ग्रह व द्वितीय में चंद्रमा। - लाभ की सीमा दशमेश व लग्नेश के बल पर निर्भर। - एकादश में पापग्रह व ग्यारहवां भाव का स्वामी पाप ग्रह युत/दृष्ट व लग्न में भी पापग्रह होने पर आप कम व जो भी हो वह भी तुरंत समाप्त। - एकादशेश अस्त हो तो भीख मांगकर उदर पूर्ति। सप्तमेश एकादश में हो तो विवाह पश्चात धनोपार्जन।

नर्क प्राप्ति- राहु, मंगल या सूर्य द्वादश में हो, द्वादशेश नीचस्थ हो तो नर्क प्राप्ति।

स्वर्गलोक - द्वादश में गुरु पर शुभ दृष्टि हो, केतु उच्च का हो तो स्वर्गलोक।

द्वादशेश पापयुक्त तथा द्वादश में भी पाप ग्रह हो तथा उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तो अपमानित होकर मातृभूमि का त्याग।

द्वादशेश शुभ ग्रह की राशि में, शुभ दृष्टि भी हो तो सुखपूर्वक भ्रमण।

शनि द्वादश में हो, मंगल की उस पर दृष्टि-संपत्ति दुष्कर्मों में नष्ट।

लग्नेश-द्वादशेश में परिवर्तन योग- दान, धार्मिक व परोपकार के कार्यों में धन व्यय।

Thursday, August 1, 2019

ज्योतिष की कुछ कहावतें

ज्योतिष के चमत्कारी योग - 2

1)  मंगल पांचवे घर मे-चैन से ना सोये तथा अपनों से धोखा खाये |
2)  गुरु केतू की युति-मुंह पर आलोचना करे |
3)  मंगल का संबंध लग्न या लग्नेश से-पुरुषार्थी बनाए |
4)  शनि का लग्न या लग्नेश से संबंध –स्वयं क्रोध मे अहंकार से सब कुछ गवाए |
5)  गुरु का लग्न या लग्नेश से संबंध- स्वयं ज्ञान की पराकाष्ठा होवे|
6)  गुरु अस्त/वक्री –पाचन तंत्र कमजोर एवं मोटापा |
7)  सम राशि का लग्न,गुरु बलवान-पत्नी शास्त्र मे निपुण वेदो का अर्थ जानने वाली |
8)  छठे भाव मे गुरु- कर्जा चढ़े |
9)  विवाह लग्न मे गुरु- धनवान,3रे सन्तानवान ,5वे-कई पुत्र,10वे-धार्मिक,7,8 मे अशुभ |
10) मंगल पर गुरु की दृस्टी –समझौता वादी प्रवर्ति |
11) मंगल संग राहू-कुछ भी कर ले,मारक गुण |
12) मंगल संग बुध- छल छद्म एवं शरीर मे तेजाब बने |
13) दशमेश का अस्ट्मेश या द्वादशेश से संबंध- जन्म स्थान से दूर सफलता |
14) मंगल का दूसरे घर व द्वितीयेश पर प्रभाव –पत्नी की मृत्यु बाद दूसरा विवाह |
15) सप्तम भाव से नवां भाव मे केतू-पति धार्मिक,शारीरिक सुख कम |
16) बुध लग्नेश हो तो- प्रबंधन कार्य,लेखाकार्य एवं बुध कार्य करे |
17) सप्तम भाव मे वक्री ग्रह –दाम्पत्य जीवन मे अडचने
18) बुध पूर्णस्त –स्मरण शक्ति मे कमी |
19) शुक्र संग चन्द्र-भावुकता ज़्यादा |
20) केंद्र स्थान खाली- गौड़ फादर नहीं |
21) चन्द्र 12वे घर मे –नींद कम रात को जागे |
22) सूर्य/बुध दूसरे भाव मे –पत्नी सुख मे कमी |
23) चन्द्र पर शनि दृस्टी-मानसिक अस्थिरता |डबल माईंड |
24) सप्तमेश नीच राशि का –विवाह मे धोखा |
25) लग्नेश छठे घर मे –सभी के प्रति आशंका एवं डर की भावना |
26) अस्ट्मेश नवमेश की युति-प्रेत बाधा
27) छठे व दूसरे घर के स्वामी का परिवर्तन-प्रतियोगिता द्वारा धननाश |
28) सूर्य चन्द्र जिस भाव मे संग- उस भाव का नाश|
29) सूर्य संग शनि लग्न मे –विवाह देर से |

Wednesday, July 31, 2019

कुंडली में सातवां भाव का फल

जन्म कुंडली में सातवें घर को सप्तम भाव कहते हैं एवं इसके  स्वामी को सप्तमेश कहते हैं ।

सप्तम भाव से पति पत्नी , वैवाहिक सुख , दैनिक रोजगार , पार्टनरशिप , काम शक्ति , मुतेन्द्रीय ,  गुप्तेन्द्रीय , वीर्य , नपुंसकता इत्यादि के बारे में विचार किया जाता है ।

सप्तम भाव का कारक शुक्र ग्रह होता है ।
पुरुषों के विवाह का कारक शुक्र को माना जाता है एवं स्त्रियों के विवाह का  कारण गुरु को माना जाता है ।

यदि सप्तम भाव , सप्तमेश एवं शुक्र ( गुरु ) पीड़ित ना हो तो  सामान्यतः  निम्न उम्र में विवाह होने की संभावना रहती है ।
 ( आधुनिक युग में सरकार के नियम एवं कानून के कारण कम उम्र में विवाह करना कानूनन अपराध है परंतु ज्योतिष के ग्रंथों में जो मान्य है मैं वह बता रहा हूँ । जिन ग्रहों के विवाह का समय  बिल्कुल कम  उम्र में बताए गए हैं  इसका मतलब यही मानना चाहिए कि विवाह बहुत जल्द होगा । )

बुध सप्तमेश हो तो  16 - 18 वर्ष में । मंगल 18 वर्ष में । शुक्र 20 वर्ष में । चंद्र 22 वर्ष में । गुरु 24 वर्ष में । सूर्य 26 वर्ष में । शनि 28 वर्ष में ।

सप्तमेश तथा शुक्र यदि लग्न पंचम नवम अथवा एकादश भाव में इकट्ठे हो तो व्यक्ति को विवाह के फलस्वरूप स्त्री  पक्ष से अच्छे धन की प्राप्ति होती है ।

सप्तम भाव में सम राशि हो ,  सप्तमेश भी सम राशि में विराजमान हो और सप्तम का कारक शुक्र सम राशि में हो तथा सप्तमेश शुभ एवं बलवान है तो ऐसे व्यक्ति को सुंदर पत्नी प्राप्त होती है ।

सूर्य , शनि  , राहु या द्वादशेश  में से दो अथवा दो से अधिक ग्रहों का प्रभाव   सप्तम भाव , सप्तमेश तथा सप्तम भाव के कारक शुक्र पर पड़ता है तो मनुष्य अपने जीवन साथी से पृथक (तलाक ) हो जाता है ।

सप्तम भाव के स्वामी को मारकेश  भी कहते हैं जिसका वर्णन द्वितीय भाव में कर चुका हूँ ।

यदि सप्तमेश एवं शुक्र कमजोर हो एवं सप्तम भाव पर किसी मित्र ग्रह की दृष्टि ना हो तो ऐसे व्यक्ति के विवाह में समस्या होती है या कई बार ऐसे व्यक्ति की विवाह नहीं  होती  है ।

सप्तम भाव या सप्तमेश पर किसी क्रूर एवं शत्रु ग्रह का प्रभाव  हो या किसी प्रकार का संबंध हो तो पति-पत्नी में आपस में मतभेद बना रहता हैं ।

जन्म कुंडली में यदि मंगल प्रथम भाव में , चतुर्थ भाव में ,  सप्तम भाव में , अष्टम भाव में या द्वादश भाव में विराजमान हो तो मांगलिक योग का निर्माण होता है।  परंतु कोई आवश्यक नहीं है की मांगलिक दोष के कारण वैवाहिक जीवन में परेशानी हो ।  उसके लिए और भी ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव एवं मंगल के बल को देखना भी आवश्यक है । ( कुछ लोगो का मानना है कि  ऐसे भी योग हैं जिसके कारण इन भावों में मंगल के विराजमान होने के बाद भी मांगलिक दोष नहीं लगता है । )

( सप्तम भाव से संबंधित बहुत सारे योग होते हैं जैसे प्रेम विवाह ,  नपुंसकता ,  चारित्रिक दोष परंतु मेरा मानना है कि ऐसे योगों को बारे में सोशल मीडिया पर नहीं लिखना चाहिए क्योंकि कई बार किसी की जन्म कुंडली गलत होती है और उसमें ऐसा योग दिख जाए तो  बिना वजह पति पत्नी में मतभेद हो सकता है।

राजयोग कैसे बनता है -नीच ग्रहों के द्वारा

नीच ग्रह भी बना सकते हैं राजयोग

किसी जन्म कुंडली में ग्रह जितने अधिक बली होते हैं, जन्म कुंडली उतनी ही अधिक प्रभाव शाली मानी जाती हैं । माना जाता हैं कि जिस जन्म कुंडली में जितने अधिक उच्च ग्रह होंगे वह उतनी ही मजबूत जन्म कुंडली होती है । इसके विपरीत नीच के ग्रह होने पर जन्म कुंडली प्रभाव हीन मानी जाती हैं, आजकल तो यह प्रथा सी बन गयी हैं कि नीच ग्रह को देखते ही सारे अशुभ फल का कारक उसे ही घोषित कर दिया जाता हैं । भले ही वह प्रभाव किसी भी अन्य ग्रह के द्वारा दिया गया हो । इस सबमे सबसे बडे दुर्भाग्य कि बात यह होती हैं की जिस वजह से व्यक्ति वास्तविक रूप से परेशान था, उस वजह को गौण कर दिया जाता हैं, और समस्या जैसी की तैसी बनी रहती हैं । उनके फलित में जमीन आसमान का फर्क होता हैं ।
हमारे अलग अलग ज्योतिषिय ग्रन्थो में इस बात का वर्णन हैं की जन्म कुंडली में नीच ग्रह का बुरा प्रभाव भंग भी हो जाता हैं । कई परिस्थिति में तो यह नीच ग्रह राजयोग तक का निर्माण करते हैं । इनका फल आश्चर्य जनक रूप से प्राप्त होता हैं । जो दिखता हैं वो वैसा ही हो यह जरुरी नही हैं, अर्थात हकीकत बिल्कुल विपरीत हैं जन्म कुंडली में सभी नीच ग्रह अशुभ फल नही देते हैं । अधिकतर इनका फल उसकी स्थिति तथा अन्य ग्रहो का उस पर पडने वाले फल पर निर्भर करता हैं ।
जिन जातको की जन्म कुंडली में नीचभंग राजयोग होता हैं वो जातक चट्टानो से जल निकालने की क्षमता रखते हैं । ऐसे जातक बहुत अधिक मेहनती होते है, और अपने दम पर एक मुकाम हासिल करते हैं । ये जातक जिस क्षेत्र में भी जाते हैं वही अपनी अमिट छाप बना देते हैं । चाहे दुनिया इनके पक्ष में हो या विपक्ष में इनको सफलता मिलना तय होता हैं । कैसे बनते हैं ये योग इस पर चर्चा करे –
1- किसी नीच ग्रह से कोई उच्च का ग्रह जब दृष्टी सम्बंध या क्षेत्र सम्बंध बनाता हैं तो यह स्थिति नीच भंग राज योग बनाने वाली होती हैं ।
2- नीच का ग्रह अपनी उच्च राशि के स्वामी के प्रभाव में हो ( युति या दृष्टी सम्बंध हो) नीच भंग योग बनता हैं ।
3- परस्पर दो नीच ग्रहो का एक दूसरे को देखना भी नीच भंग योग होता हैं ।
4- नीच राशि के स्वामी ग्रह के साथ होना या उसके प्रभाव में होना नीच भंग होता हैं ।
5- चंद सूर्य से केंद्रगत होने पर भी नीच ग्रह का दोष समाप्त हो जाता हैं ।
6- जन्म कुंडली के योगकारक ग्रह तथा लग्नेश से सम्बंध होने पर नीच भंग राजयोग बनता हैं
7- नीच ग्रह नवांश कुंडली में उच्च का हो तो नीच भंग राजयोग बनता हैं ।
8- दो उच्च ग्रहो के मध्य स्थित नीच ग्रह भी उच्च समान फल दायी होता हैं ।
9- नीच का ग्रह वक्री हो तो नीच भंग राज योग बनता हैं ।
10- नीच राशि में स्थित ग्रह उच्च ग्रह के साथ स्थित हो तो नीच भंग राजयोग बनाता हैं ।

ज्योतिष के आधार तत्व

अगर आप पता लगाना चाहें कि आपकी राशि क्या है और आपकी संगत राशियां कौन सी हैं, तो आप सही जगह पर हैं। यहाँ आप राशि ज्योतिष, राशि संगतता और राशि की तिथियों के बारे में सभी जानकारी प्राप्त कर पाएंगे।

कुल 12 ज्योतिष राशियाँ होती हैं, और प्रत्येक राशि की अपनी ताकत और कमजोरियां, अपने स्वयं के विशिष्ट गुण, इच्छा एवं जीवन तथा लोगों के प्रति रवैया होता है। आकाश की छवियों, या जन्म के समय ग्रहों की स्थिति के विश्लेषण के आधार पर ज्योतिष हमें एक व्यक्ति की बुनियादी विशेषताओं, प्राथमिकताओं, कमियों और भय की एक झलक दे सकता है। अगर हम राशियों की बुनियादी विशेषताओं को जान लें तो हम वास्तव में लोगों को बहुत बेहतर जान सकते हैं।

राशिफल की 12 राशियों में से प्रत्येक एक विशिष्ट राशि तत्व के अंतर्गत आती हैं। चार राशिचक्र तत्व हैं: वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल और उनमें से हरेक हमारे भीतर कार्यरत एक अनिवार्य प्रकार की उर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्योतिष का लक्ष्य हमें सकारात्मक पहलुओं पर इन ऊर्जा का ध्यान केंद्रित करना और हमारे सकारात्मक गुणों की एक बेहतर समझ पाने और नकारात्मकता से निपटने में मदद करना है।

हम सभी में यह चार तत्व मौजूद हैं और वे ज्योतिषीय राशियों से जुड़े चार विलक्ष्ण व्यक्तित्व प्रकारों का वर्णन करते हैं। चार राशिचक्र तत्व बुनियादी चरित्र गुणों, भावनाओं, व्यवहार और सोच पर गहरा प्रभाव दर्शाते हैं।

जल राशि
जल राशि के जातक असाधारण भावनात्मक और अति संवेदनशील लोग होते हैं। वे अत्यंत सहज होने के साथ ही समुद्र के समान रहस्यमयी भी हो सकते हैं। जल राशि की स्मृति तीक्ष्ण होती है और वे गहन वार्तालाप और अंतरंगता से प्यार करते है। वे खुले तौर पर अपनी आलोचना करते हैं और अपने प्रियजनों का समर्थन करने के लिए हमेशा मौजूद रहते हैं। जल राशियाँ हैं: कर्क, वृश्चिक और मीन।

अग्नि राशि
अग्नि राशि के जातक भावुक, गतिशील और मनमौजी प्रवृति के होते हैं। उन्हें गुस्सा जल्दी आता है, लेकिन वे सरलता से माफ भी कर देते हैं। वे विशाल ऊर्जा के साथ साहसी होते हैं। वे शारीरिक रूप से बहुत मजबूत और दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत होते हैं। अग्नि राशि के जातक हमेशा कार्रवाई के लिए तैयार, बुद्धिमान, स्वयं जागरूक, रचनात्मक और आदर्शवादी होते हैं। अग्नि राशियाँ हैं: मेष, सिंह और धनु।

पृथ्वी राशि
पृथ्वी राशि के लोग ग्रह पर "धरती" से जुड़े हुए होते हैं और वे हमें व्यवहारिक बनाते हैं। वे ज्यादातर रूढ़िवादी और यथार्थवादी होते हैं, लेकिन साथ ही वे बहुत भावुक भी हो सकते हैं। उन्हें विलासिता और भौतिक वस्तुओं से प्यार होता है। वे व्यावहारिक, वफादार और स्थिर होते हैं और वे कठिन समय में अपने लोगों का पूरा साथ देते हैं। पृथ्वी राशियाँ हैं: वृष, कन्या और मकर।

वायु राशि
वायु राशि के लोग अन्य लोगों के साथ संवाद करने और संबंध बनाने वाले होते हैं। वे मित्रवत्, बौद्धिक, मिलनसार, विचारक, और विश्लेषणात्मक लोग हैं। वे दार्शनिक विचार विमर्श, सामाजिक समारोह और अच्छी पुस्तकें पसंद करते हैं। सलाह देने में उन्हें आनंद आता है, लेकिन वे बहुत सतही भी हो सकती है। वायु राशियाँ हैं: मिथुन, तुला और कुंभ।

राशि प्रेम संगतता चार्ट
ज्योतिष में कोई भी असंगत राशि नहीं होती जिसका अर्थ है कि कोई भी दो राशि अधिक या कम संगत होती हैं। जिन दो लोगों की राशियों में अत्यधिक संगतता होती है, वे सरलता से निर्वाह करेंगे क्योंकि उनकी प्रवृति एक समान है। परंतु, ऐसे लोग जिनकी राशियों में संगतता कम होती हैं, उन्हें एक खुश और सौहार्दपूर्ण संबंध हासिल करने के क्रम में अधिक धैर्यवान एवं विनम्र बने रहने की आवश्यकता होगी।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, राशियाँ चार तत्वों से संबंधित हैं:

अग्नि: मेष, सिंह, धनु

पृथ्वी: वृष, कन्या, मकर

वायु: मिथुन, तुला, कुंभ

जल: कर्क, वृश्चिक, मीन

राशियाँ जिनके तत्व एक समान हैं, स्वाभाविक रूप से उनमें संगतता होती है क्योंकि वे एक दूसरे को सबसे बेहतर समझते हैं। ज्योतिष की एक शाखा काम ज्योतिष है जहाँ राशियों के बीच प्रेम संबंध की गुणवत्ता जानने के लिए दो जातक कुंडलियों में तुलना करते हैं। काम ज्योतिष या एक लग्न राशिफल उन जातकों के लिए एक उपयोगी उपकरण हो सकता है, जो अपने रिश्ते में शक्तियों और कमजोरियों का पता लगाना चाहते हैं। राशियों की तुलना करना जीवनसाथी को बेहतर समझ पाने में भी मदद कर सकता है, जिसका परिणाम एक बेहतर संबंध के रूप में होगा।

निम्नलिखित चार्ट राशियों की ज्योतिष प्रेम संगतता दर्शाता है। चार्ट पर एक नज़र डालें और देखें कौन सी राशियाँ एक साथ बेहतर कर रही हैं!

राशि संगतता चार्ट को पढ़ने के लिए, बस बाएँ कॉलम में अपनी राशि खोजें और अपने साथी की राशि के लिए संगत स्तंभ में स्थित दिल के आकार को देखें। जितना बड़ा दिल होगा, आपकी संगतता उतनी ही ज्यादा होगी!


राशि प्रेम संगतता चार्ट


चीनी ज्योतिष
चीनी ज्योतिष पारंपरिक खगोल विज्ञान पर आधारित है। चीनी ज्योतिष का विकास उस खगोल विज्ञान से बंधा है जो हान राजवंश के दौरान पनपा था। चीनी राशिचक्र दुनिया में सबसे पुरानी ज्ञात राशिफल प्रणाली मानी जाती है और बारह जानवर किसी विशेष वर्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। चीनी ज्योतिष के अनुसार, एक व्यक्ति के जन्म का वर्ष इन जानवरों में से किसी एक का प्रतिनिधित्व करता है। बारह पशु राशियां या राशि प्रतीक हैं चूहा, बैल, बाघ, खरगोश, ड्रैगन, सांप, घोड़ा, भेड़, बंदर, मुर्गा, कुत्ता और सुअर। चीनी ज्योतिष में भी प्रकृति के पांच तत्व हैं अर्थात्: जल, लकड़ी, अग्नि, पृथ्वी एवं धातु। चीनी ज्योतिष के अनुसार, एक व्यक्ति की किस्मत को ग्रहों की स्थिति और व्यक्ति के जन्म के समय सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से निर्धारित किया जा सकता है। चीनी लोग मानते हैं कि हमारा जन्म वर्ष हमारे दृष्टिकोण और क्षमता का पता लगा सकता है, और यह कि जानवर जन्म राशि में प्रतीकवाद होता है और किसी विशिष्ट व्यवहार को दर्शाते हैं।

वैदिक ज्योतिष
खगोल विज्ञान एवं ज्योतिषशास्त्र की पारंपरिक हिंदू प्रणाली ज्योतिष है, जिसे हिन्दू या भारतीय ज्योतिषशास्त्र या विगत कुछ समय से वैदिक ज्योतिष के रूप में जाना जाता है। वैदिक ज्योतिष राशिफल तीन मुख्य शाखाओं में विभाजित हैं: भारतीय खगोल विज्ञान, सांसारिक ज्योतिष और भविष्यसूचक ज्योतिष। भारतीय ज्योतिष में हमारे चरित्र को प्रकट किया जा सकता है, हमारे भविष्य की भविष्यवाणी की जा सकती है, और हमारी सबसे संगत राशियों को प्रकट किया जा सकता है। वैदिक ज्योतिष द्वारा हमें दिया गये सबसे उत्तम उपकरणों में से एक राशिफल संगतता है। निरायण (नक्षत्र राशिचक्र) 360 डिग्री का एक काल्पनिक क्षेत्र है, जिसे उष्णकटिबंधीय राशिचक्र की तरह बारह बराबर भागों में विभाजित किया गया है। पश्चिमी ज्योतिष के विपरीत जिसमें चलते राशिचक्र का उपयोग किया जाता है, वैदिक ज्योतिष स्थिर राशिचक्र का उपयोग करता है। तो, वैदिक राशिचक्र प्रणाली में आपकी ग्रह राशि वह नहीं है जो आपने सोची थी।

माया ज्योतिष
माया ज्योतिष माया कैलेंडर पर आधारित है और यह सबसे आगे की सोच रखने वाले ज्योतिष में से एक है। माया कैलेंडर या ज़ोल्किन ब्रह्मांड की अमूर्त ऊर्जा और सृष्टि के विकास पर आधारित है। ज़ोल्किन कैलेंडर में बीस दिवस राशियाँ (सौर जनजातियाँ) और तेरह आकाशगंगा संख्या होती हैं, जो 260 दिन का एक कैलेंडर वर्ष बनाते हैं। प्राचीन मायावासी मानते थे कि जीवन में शांति और सद्भाव के लिए, आपको इस सार्वभौमिक ऊर्जा को समझना और उसके साथ अपने आप को समायोजित करना होता था। इन बीस राशियों में से प्रत्येक माया कैलेंडर में एक दिन को दर्शाती हैं, इस प्रकार विभिन्न महीने और वर्ष के व्यक्तियों में एक समान दिवस चित्रलिपि साझा करने की अनुमति देती है। किसी की माया दिवस राशि उसकी/उसके व्यक्तित्व को परिभाषित करती है।

हम ज्योतिष में विश्वास क्यों करते हैं
हम जीवन में किसी भी अंधविश्वास पर विश्वास क्यों करते हैं, उपरोक्त प्रश्न का उत्तर उस दायरे में ही निहित है। लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं क्योंकि यह कई प्रकार की वांछनीय बातें प्रदान करता है जैसे जानकारी और भविष्य के बारे में आश्वासन, उनकी परेशानियों को हल करने, और अपने साथियों, परिवार और मित्रों के साथ अपने रिश्तों में सुधार करने के तरीके आदि।

ज्योतिषशास्त्र का दावा है कि जीवन में कुछ भी संयोगवश नहीं होता, और हमें जो कुछ भी होता है वह सब किसी एक विशेष कारण से है। ज्योतिष हमें कुछ अच्छे उत्तर प्रदान कर सकता है कि ऐसी चीजें हमारे साथ क्यों होती हैं, और यह उन्हें पहले से भविष्यवाणी भी कर सकता है। इस तरह, वास्तव में ज्योतिष लोगों को उनके चारों ओर दुनिया को बहुत बेहतर समझने में मदद करता है।

जैसा आज अभ्यास किया जाता है, ज्योतिष काफी अच्छी तरह से काम कर सकता है। ज्योतिषियों के पास जाने वाले या नियमित रूप से अपनी राशिफल का अध्ययन करने वाले लोग अंततः सबसे ज्यादा खुश और संतुष्ट महसूस करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी राशिफल तिथि के आधार पर ज्योतिषियों ने उनके भविष्य के लिए बिलकुल सटीक भविष्यवाणी की है, लेकिन इसका मतलब है कि वास्तव में एक राशिफल होना अपने आप में एक पूर्ण अनुभव हो सकता है।

पृथ्वी तारामंडल के नीचे स्थित है जिसे अब हर कोई अपनी ग्रहराशि के रूप में जानता है। बहुत से लोग लगन से अपनी राशिफल का अनुकरण करते हैं और अपनी ज्योतिष राशि के अर्थ में विश्वास करते हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि ज्योतिष व्यापक रूप से लोकप्रिय है और दुनिया में हर कोई अपनी राशिफल तिथि और राशियों को जानता है। लोग अपनी राशिफल राशियों की भविष्यवाणी को पढ़ने का आनंद लेते हैं और अक्सर यह व्यक्तित्व, व्यवहार और निर्णय लेने की प्रक्रिया में परिवर्तन की ओर ले जाता है।

ज्योतिषशास्त्र एक वास्तविक जीवन रक्षक हो सकता है क्योंकि यह आपको अग्रिम में भविष्य की बाधाओं और समस्याओं को बता देता है। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप एक राशिफल अध्ययन में दी गई सलाह और सावधानियों पर विश्वास करते हैं, और ज्यादा मेहनत किए बिना कष्ट से खुद को बचाना चाहते हैं अथवा नहीं।

लोग ज्योतिष में विश्वास करते हैं, क्योंकि यह बस मजेदार है। राशिचक्र तिथि, राशियाँ, थोड़ा भाग्य बताने के उपाय और बहुत कुछ। हम अपने जीवन के लगभग सभी पहलुओं को राशियों से संबद्ध कर सकते हैं और हम देखेंगे कि वे सही मायने में व्यावहारिक और ठीक हैं। हमारी राशिफल विलक्ष्ण होती है और वे हमारी ताकत, कमजोरी खोजने में मदद के साथ ही हमारे प्राकृतिक गुणों को भी प्रकट कर सकती है।

ज्योतिष हमें यह जानने में मदद कर सकता है कि कौन से रिश्ते संगत हैं - और कौन से नहीं। राशिफल संगतता अन्य राशियों के साथ हमारे रिश्तों में सुधार कर सकती है। अपने प्यार की क्षमता के बारे में जान कर, आप अवसरों का सबसे अच्छा उपयोग करते हुए एक खुशनुमा प्यारभरा या विवाहित जीवन व्यतीत करने के लिए उचित उपाय कर सकते हैं।

ज्योतिष दो प्रमुख पहलुओं को ध्यान में रखता है - हमारे संभावित जन्म और हमारी व्यक्तिगत राशिफल पर सितारों व ग्रहों का प्रभाव। यह हमें एक अच्छा और सफल जीवन व्यतीत करने के क्रम में हमारे लिए सही करियर और शिक्षा पथ चुनने में मदद कर सकता है।

अंततः हम ज्योतिष में विश्वास करते हैं क्योंकि यह हमारे बारे में है। मेरी राशिफल मेरे जीवन में उस एक ब्लूप्रिंट की तरह है, जिसे ठीक उस समय बनाया गया जब मैं पैदा हुआ था। इसका मतलब है कि मेरी जन्म राशिफल भी मेरी उंगलियों के निशान की तरह ही एकदम विलक्ष्ण है। मेरी राशिफल में प्रत्येक ग्रह की स्थिति मेरे व्यक्तित्व और भाग्य के बारे में बहुत कुछ बता सकती है।

ज्योतिषशास्त्र के बारे में कुछ सच्चे तथ्य
1999 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, राशिफल और ज्योतिष शब्द इंटरनेट पर दो सबसे अधिक खोजे गये विषय हैं।

ज्योतिषशास्त्र को कला और विज्ञान दोनों माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र कला है क्योंकि किसी व्यक्ति के चारित्रिक गुणों पर विचार बनाने के लिए अलग-अलग पहलुओं को एक साथ लाने के लिए व्याख्या करने की जरूरत होती है। हालांकि, ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान भी माना जाता है क्योंकि इसमें खगोल विज्ञान और गणित की समझ होना अति आवश्यक है।

सिक्सटस चतुर्थ राशिफल बनाने और उसकी व्याख्या करने वाला प्रथम कैथोलिक पोप था, लियो दशम और पॉल तृतीय ने सलाह के लिए हमेशा ज्योतिषियों पर भरोसा किया था, जबकि जूलियस द्वितीय ने अपनी ताजपोशी की तिथि को ज्योतिष की दृष्टि से चुना था।

नाजी जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के लिए ज्योतिषशास्त्र बहुत महत्वपूर्ण था। माना जाता है कि इस जर्मन नेता ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ज्योतिषियों से विचार विमर्श किया था।

स्थानिक ज्योतिषशास्त्र की एक विधि ज्योतिषीय मानचित्रीकरण है जो भौगोलिक स्थिति में अंतर के माध्यम से बदलती जीवन परिस्थितियों की पहचान करने का दावा करती है। कथित तौर पर आप सबसे अधिक सफल कहाँ होंगे, अपनी जन्म-पत्री की तुलना दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए करके उस क्षेत्र का निर्धारण कर सकते हैं।

Thursday, July 11, 2019

ग्रहों के फल

*कौन सा ग्रह क्या अशुभ फल देता है*

 *सूर्य*

सरकारी नौकरी या सरकारी कार्यों में परेशानी, सिर दर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, अस्थि रोग, चर्म रोग, पिता से अनबन आदि।

 *चंद्र*

मानसिक परेशानियां, अनिद्रा, दमा, कफ, सर्दी, जुकाम, मूत्र रोग, स्त्रियों को मासिक धर्म, निमोनिया।

 *मंगल*

अधिक क्रोध आना, दुर्घटना, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, बवासीर, भाइयों से अनबन आदि।

 *बुध*

गले, नाक और कान के रोग, स्मृति रोग, व्यवसाय में हानि, मामा से अनबन आदि।

 *गुरु*

धन व्यय, आय में कमी, विवाह में देरी, संतान में देरी, उदर विकार, गठिया, कब्ज, गुरु व देवता में अविश्वास आदि।

 *शुक्र*

जीवन साथी के सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, भौतिक सुखों में कमी व अरुचि, नपुंसकता, मधुमेह, धातु व मूत्र रोग आदि।

 *शनि*

वायु विकार, लकवा, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, पैरों में दर्द, नौकरी में परेशानी आदि।

 *राहु*

त्वचा रोग, कुष्ठ, मस्तिष्क रोग, भूत प्रेत वाधा, दादा से परेशानी आदि।

 *केतु*

नाना से परेशानी, भूत-प्रेत, जादू टोने से परेशानी, रक्त विकार, चेचक आदि।

इस प्रकार ग्रहों के कारकत्व को ध्यान में रखते हुए शास्त्र सम्मत उपाय करना चाहिए

Thursday, June 27, 2019

ग्रह अशुभ कब देते हैं जानिए

ग्रह कब नहीं देते शुभ फल और क्यों?

सूर्य
सूर्य का संबंध आत्मा से होता है। यदि आपकी आत्मा, आपका मन पवित्र है और आप किसी का दिल दुखाने वाला कार्य नहीं करते हैं तो सूर्यदेव आपसे प्रसन्न रहेंगे। लेकिन किसी का दिल दुखाने (कष्ट देने), किसी भी प्रकार का टैक्स चोरी करने एवं किसी भी जीव की आत्मा को ठेस पहुंचाने पर सूर्य अशुभ फल देता है। कुंडली में सूर्य चाहे जितनी मजबूत स्थिति में हो लेकिन यदि ऐसा कोई कार्य किया है, तो वह अपना शुभ प्रभाव नहीं दे पाता। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में कमी आती है और उसे पिता की संपत्ति से बेदखल होना पड़ता है।

चंद्र
परिवार की स्त्रियों जैसे, मां, नानी, दादी, सास एवं इनके समान पद वाली स्त्रियों को कष्ट देने से चंद्र का बुरा प्रभाव प्राप्त होता है। किसी से द्वेषपूर्वक ली गई वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है। चंद्रमा अशुभ हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है। उसके कार्यों में रुकावट आने लगती है और तरक्की रूक जाती है। जल घात की आशंका बढ़ जाती है। यहां तक कि व्यक्ति मानसिक रोगी भी हो सकता है।
 

मंगल
मंगल का संबंध भाई-बंधुओं और राजकाज से होता है। भाई से झगड़ा करने, भाई के साथ धोखा करने से मंगल अशुभ फल देता है। अपनी पत्नी के भाई का अपमान करने पर भी मंगल अशुभ फल देता है। मंगल की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति जीवन में कभी स्वयं की भूमि, भवन, संपत्ति नहीं बना पाता। जो संपत्ति संचय की होती है वह भी धीरे-धीरे हाथ से छूटने लगती है।

बुध
बहन, बेटी और बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को दुखी करने से बुध अशुभ फल देता है। किसी किन्नर को सताने से भी बुध नाराज हो जाता है और अशुभ फल देने लगता है। बुध की अशुभता के कारण व्यक्ति का बौद्धिक विकास रूक जाता है। शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अशुभ बुध विकट स्थितियां पैदा कर सकता है।

गुरु
अपने पिता, दादा, नाना को कष्ट देने अथवा इनके समान सम्मानित व्यक्ति को कष्ट देने एवं साधु संतों को सताने से गुरु अशुभ फल देने लगता है। जीवन में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा के कारक ग्रह बृहस्पति के रूठ जाने से जीवन अंधकारमय होने लगता है। व्यक्ति को गंभीर बीमारियां घेरने लगती है और उसका जीवन पल-प्रतिपल कष्टकारी होने लगता है। धन हानि होने लगती है और उसका अधिकांश पैसा रोग में लगने लगता है।

शुक्र
अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुक्र अशुभ फल देता है। चूंकि शुक्र भोग-विलास का कारक ग्रह है अतः शुक्र के अशुभ फलों के परिणामस्वरूप व्यक्ति गरीबी का सामना करता है। जीवन के समस्त भोग-विलास के साधन उससे दूर होने लगते हैं। लक्ष्मी रूठ जाती है। वैवाहिक जीवन में स्थिति विवाह विच्छेद तक पहुंच जाती है। शुक्र की अशुभता के कारण व्यक्ति अपने से निम्न कुल की स्त्रियों के साथ संबंध बनाता है।

शनि
ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतकश व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने एवं इसी के साथ शराब, मांस खाने से शनि देव अशुभ फल देते हैं। कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा मांगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है। शनि के अशुभ फल के कारण व्यक्ति रोगों से घिर जाता है। उसकी संपत्ति छिन जाती है और वह वाहनों के कारण लगातार दुर्घटनाग्रस्त होने लगता है।

ग्रह उपचार में किस वृक्ष की समिधा का प्रावधान है

ज्योतिषीय उपचारों के लिए यज्ञ में वनस्पति का इस्तेमाल बताया गया है।  जानिये माइंड मन्थन
👌▪️ज्योतिष केअनुसार ग्रह शांति का सबसे सशक्त माध्यम यज्ञ है। 👌

👌▪️बाद में विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि कौन-सी वनस्पति के काष्ठ की आहुति देने पर क्या उपचार हो सकता है।

👌▪️यज्ञाग्रि प्रज्वलित रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले काष्ठ को समिधा कहते हैं।

👌▪️प्रत्येक लकड़ी को समिधा नहीं बनाया जा सकता।

👌▪️आह्निक, सूत्रावली में ढाक, फल्गु, वट, पीपल, विकंकल, गूलर, चंदन, सरल, देवदारू, शाल, शैर का विधान है।

👌▪️वायु पुराण में ढाक, काकप्रिय, बड़, पिलखन, पीपल, विकंकत, गूलर, बेल, चंदन, पीतदारू, शाल, खैर को यज्ञ के लिए उपयोगी माना गया है।

👌यज्ञ के लिए पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आम व बिल्व को उपयोगी बताया है। 👌

👌▪️उन्होंने चंदन, पलाश और आम की लकड़ी को तो यज्ञ के लिए सर्वश्रेष्ठ बताया है।

1👌▪️सूर्य के लिए अर्क

2👌▪️चंद्र के लिए ढाक

3👌▪️मंगल के लिए खैर

4👌▪️बुध के लिए अपामार्ग

5👌▪️गुरु के लिए पीपल

6👌▪️शुक्र के लिए गूलर

7👌▪️शनि के लिए शमी

8👌▪️और राहु के लिए दूर्वा

9👌▪️व केतू के लिए कुश वनस्पतियों को उपचार का आधार बनाया जाता है।

👌▪️पर्वतों पर उगने वाले पौधे, मिर्च, शलजम, काली मिर्च व गेहूं को सूर्य के अधिकार में बताया गया है।

👌▪️इसी तरह खोपरा, ठंडे पदार्थ, रसीले फल, चावल और सब्जियां चंद्रमा से संबंधित हैं।

👌▪️नुकीले वृक्ष, अदरक, अनाज, जिन्सें, तुअर दाल और मूंगफली को मंगल से देखा जाएगा।

👌▪️बुध के अधिकार में नर्म फसल, ङ्क्षभडी, मूंग दाल और बैंगन आते हैं।

👌▪️बृहस्पति ग्रह से केले के वृक्ष, खड़ी फसल, जड़ें, बंगाली चना और गांठों वाले पादप जुड़े हैं।

👌▪️शुक्र के अधीन फलदार वृक्ष, फूलदार पौधे, पहाड़ी पादप, मटर, बींस और लताओं के अलावा मेवे पैदा करने वाले पादप आते हैं।

👌▪️शनि से संबंधित पादपों में जहरीले और कांटेदार पौधे, खारी सब्जियां, शीशम और तम्बाकू शामिल हैं।

👌▪️राहु और केतू के अधिकार में शनि से संबंधित पादपों के अलावा लहसुन, काले चने, काबुली चने और मसाले पैदा करने वाले पौधे आते हैं।

शरीर पर तिल का फल अंगों के अनुसार

शरीर के विभिन्न अंगों पर तिलों का फल
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भारतीय ज्योतिष में सामुद्रिक शास्त्र में शरीर के विभिन्न अंगों पर पाए जाने वाले तिलों का सामान्य फल इस प्रकार है।

१- ललाट पर तिल – ललाट के मध्य भाग में तिल निर्मल प्रेम की निशानी है। ललाट के दाहिने तरफ का तिल किसी विषय विशेष में निपुणता, किंतु बायीं तरफ का तिल फिजूलखर्ची का प्रतीक होता है। ललाट या माथे के तिल के संबंध में एक मत यह भी है कि दायीं ओर का तिल धन वृद्धिकारक और बायीं तरफ का तिल घोर निराशापूर्ण जीवन का सूचक होता है।

२-  भौंहों पर तिल – यदि दोनों भौहों पर तिल हो तो जातक अकसर यात्रा करता रहता है। दाहिनी पर तिल सुखमय और बायीं पर तिल दुखमय दांपत्य जीवन का संकेत देता है।

३- आंख की पुतली पर तिल – दायीं पुतली पर तिल हो तो व्यक्ति के विचार उच्च होते हैं। बायीं पुतली पर तिल वालों के विचार कुत्सित होते हैं। पुतली पर तिल वाले लोग सामान्यत: भावुक होते हैं।

४-  पलकों पर तिल – आंख की पलकों पर तिल हो तो जातक संवेदनशील होता है। दायीं पलक पर तिल वाले बायीं वालों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होते हैं।

५-  आंख पर तिल – दायीं आंख पर तिल स्त्री से मेल होने का एवं बायीं आंख पर तिल स्त्री से अनबन होने का आभास देता है।

६-  कान पर तिल – कान पर तिल व्यक्ति के अल्पायु होने का संकेत देता है।

७- नाक पर तिल – नाक पर तिल हो तो व्यक्ति प्रतिभासंपन्न और सुखी होता है। महिलाओं की नाक पर तिल उनके सौभाग्यशाली होने का सूचक है।

८-  होंठ पर तिल – होंठ पर तिल वाले व्यक्ति बहुत प्रेमी हृदय होते हैं। यदि तिल होंठ के नीचे हो तो गरीबी छाई रहती है।

९- मुंह पर तिल – मुखमंडल के आसपास का तिल स्त्री तथा पुरुष दोनों के सुखी संपन्न एवं सज्जन होने के सूचक होते हैं। मुंह पर तिल व्यक्ति को भाग्य का धनी बनाता है। उसका जीवनसाथी सज्जन होता है।

१०-  गाल पर तिल – गाल पर लाल तिल शुभ फल देता है। बाएं गाल पर कृष्ण वर्ण तिल व्यक्ति को निर्धन, किंतु दाएं गाल पर धनी बनाता है।

११-  जबड़े पर तिल – जबड़े पर तिल हो तो स्वास्थ्य की अनुकूलता और प्रतिकूलता निरंतर बनी रहती है।
ठोड़ी पर तिल – जिस स्त्री की ठोड़ी पर तिल होता है, उसमें मिलनसारिता की कमी होती है।

१२-  कंधों पर तिल – दाएं कंधे पर तिल का होना दृढ़ता तथा बाएं कंधे पर तिल का होना तुनकमिजाजी का सूचक होता है।

१३-  दाहिनी भुजा पर तिल – ऐसे तिल वाला जातक प्रतिष्ठित व बुद्धिमान होता है। लोग उसका आदर करते हैं।

१४-  बायीं भुजा पर तिल – बायीं भुजा पर तिल हो तो व्यक्ति झगड़ालू होता है। उसका सर्वत्र निरादर होता है। उसकी बुद्धि कुत्सित होती है।

१५-  कोहनी पर तिल – कोहनी पर तिल का पाया जाना विद्वता का सूचक है।

१६-  हाथों पर तिल – जिसके हाथों पर तिल होते हैं वह चालाक होता है। गुरु क्षेत्र में तिल हो तो सन्मार्गी होता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो बलवान और दायीं हथेली के पृष्ठ भाग में हो तो धनवान होता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो जातक खर्चीला तथा बायीं हथेली के पृष्ठ भाग पर तिल हो तो कंजूस होता है।

१७-  अंगूठे पर तिल – अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।

१८-  तर्जनी पर तिल – जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीड़ित होता है।

१९-  मध्यमा पर तिल – मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।

२०-  अनामिका पर तिल – जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।
कनिष्ठा पर तिल – कनिष्ठा पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।

२१-  जिसकी हथेली में तिल मुठ्ठी में बंद होता है वह बहुत भाग्यशाली होता है लेकिन यह सिर्फ एक भ्रांति है। हथेली में होने वाला हर तिल शुभ नहीं होता कुछ अशुभ फल देने वाले भी होते हैं।

२२-  सूर्य पर्वत मतलब रिंग फिंगर के नीचे के क्षेत्र पर तिल हो तो व्यक्ति समाज में कलंकित होता है। किसी की गवाही की जमानत उल्टी अपने पर नुकसान देती है। नौकरी में पद से हटाया जाना और व्यापार में घाटा होता है। मान- सम्मान पर प्रभावित होता है और नेत्र संबंधित रोग तंग करते हैं।

२३- बुध पर्वत यानी लिटिल फिंगर के नीचे के क्षेत्र पर तिल हो तो व्यक्ति को व्यापार में हानि उठानी पड़ती है। ऐसा व्यक्ति हिसाब-किताब व गणित में धोखा खाता है और दिमागी रूप से कमजोर होता है।

२४-  लिटिल फिंगर के नीचे वाला क्षेत्र जो हथेली के अंतिम छोर पर यानी मणिबंध से ऊपर का क्षेत्र जो चंद्र क्षेत्र कहलाता है, इस क्षेत्र पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति के विवाह में देरी होती है। प्रेम में लगातार असफलता मिलती है। माता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।

२५-  गले पर तिल – गले पर तिल वाला जातक आरामतलब होता है। गले पर सामने की ओर तिल हो तो जातक के घर मित्रों का जमावड़ा लगा रहता है। मित्र सच्चे होते हैं। गले के पृष्ठ भाग पर तिल होने पर जातक कर्मठ होता है।

२६-  छाती पर तिल – छाती पर दाहिनी ओर तिल का होना शुभ होता है। ऐसी स्त्री पूर्ण अनुरागिनी होती है। पुरुष भाग्यशाली होते हैं। शिथिलता छाई रहती है। छाती पर बायीं ओर तिल रहने से भार्या पक्ष की ओर से असहयोग की संभावना बनी रहती है। छाती के मध्य का तिल सुखी जीवन दर्शाता है। यदि किसी स्त्री के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है।

२७- कमर पर तिल – यदि किसी व्यक्ति की कमर पर तिल होता है तो उस व्यक्ति की जिंदगी सदा परेशानियों से घिरी रहती है।

२८-  पीठ पर तिल – पीठ पर तिल हो तो जातक भौतिकवादी, महत्वाकांक्षी एवं रोमांटिक हो सकता है। वह भ्रमणशील भी हो सकता है। ऐसे लोग धनोपार्जन भी खूब करते हैं और खर्च भी खुलकर करते हैं। वायु तत्व के होने के कारण ये धन संचय नहीं कर पाते।

२९-  पेट पर तिल – पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसा व्यक्ति भोजन का शौकीन व मिष्ठान्न प्रेमी होता है। उसे दूसरों को खिलाने की इच्छा कम रहती है।

३०-  घुटनों पर तिल – दाहिने घुटने पर तिल होने से गृहस्थ जीवन सुखमय और बायें पर होने से दांपत्य जीवन दुखमय होता है।

३१-  पैरों पर तिल – पैरों पर तिल हो तो जीवन में भटकाव रहता है। ऐसा व्यक्ति यात्राओं का शौकीन होता है। दाएं पैर पर तिल हो तो यात्राएं सोद्देश्य और बाएं पर हो तो निरुद्देश्य होती हैं।
समुद्र विज्ञान के अनुसार जिनके पांवों में तिल का चिन्ह होता है उन्हें अपने जीवन में अधिक यात्रा करनी पड़ती है। दाएं पांव की एड़ी अथवा अंगूठे पर तिल होने का एक शुभ फल यह माना जाता है कि व्यक्ति विदेश यात्रा करेगा। लेकिन तिल अगर बायें पांव में हो तो ऐसे व्यक्ति बिना उद्देश्य जहां-तहां भटकते रहते हैं।
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Saturday, June 22, 2019

ज्योतिष के अचूक सूत्र

🌹 *ज्योतिष के कुछ सटीक सूत्र* 🌹

1)जब गोचर में शनि ग्रह धनु, मकर, मीन व कन्या राशियों में गुजरता है तो भयंकर अकाल रक्त सम्बन्धी विचित्र रोग होते हैं।

2)"स्त्री की कुंडली में यदि चन्द्र वृष कन्या या सिहं राशी में स्थित हो तो स्त्री के कम पुत्र होते हैं "।

3)"जन्म लग्न में चन्द्र व शुक्र हो तो स्त्री क्रोधिनी परन्तु सुखी होती है "।

4)"किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष सोमवार ,बुध या गुरूवार को शपथ ले तो उसे प्रजा एवं राष्ट्राध्यक्ष के लिए शुभ माना जाता है"।।

5)"सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ ,अष्टम,या द्वादश भाव में हो और नीच या अस्त हो तो जातक के विवाह में बाधा आती है"

6)"चन्द्र से सम्बंधित चार विभिन्न योग बनते हैं जब कोई ग्रह चन्द्र से 10वें 7वें, 4थे, ओर पहले हो तो क्रमश:उत्तम,मध्यम, अधम ओर अधमाधम योग बनता है। यदि इनमें अंतिम योग बनता हो तो कुंडली के अन्य योग कमजोर और निष्फल हो जाते हैं"!!

7)जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए.

8)जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है।

9)जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है.

10)कोई भी ग्रह पहले नवाँशा में होने से जातक को एक प्रगतिशील और साहसिक नेता बनाता है ऐसे ग्रह की दशा /अन्तर्दशा के समय में जातक सक्रिय होता है।। और अपने सम्वन्धित क्षेत्र में सफलता पाता है।।

11)"सूर्य चन्द्र मंगल और लगन से गर्भाधान का विचार किया जाता है वीर्य की अधिकता से पुरुष तथा रक्त की अधिकता से कन्या होती है। रक्त और रज का बरावर होने से नपुंसक का जन्म होता है"।

12)जन्म से चार वर्ष के भीतर बालक की मृत्यु का कारण माता के कुकर्मों, चार से आठ वर्ष के बीच मृत्यु पिता के पाप कर्मों और आठ से बारह वर्ष की आयु के मध्य मृत्यु स्वयं के पूर्वजन्म के पापों के कारण मानी गई है.

13)शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म देने की जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है।

14)राशिचक्र के २७ नक्षत्रों के नौ भाग करके तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक भाग माना गया है। इनमें प्रथम 'जन्म नक्षत्र', दसवाँ 'कर्म नक्षत्र' तथा उन्नीसवाँ 'आधान नक्षत्र' माना गया है। शेष को क्रम से संपत्, विपत्, क्षेम्य, प्रत्वर, साधक, नैधन, मैत्र और परम मैत्र माना गया है। 15)किसी भी प्रकार का रिसाव राहु के अंतर्गत आता है.रिसाव किसी भी चीज का हो सकता है द्रव , शक्ति , धन , मान सम्मान या ओज का.।

16)बुध के निर्बल होने पर कुंडली में अच्छा शुक्र भी अपना प्रभाव खो देता है क्योंकि शुक्र को लक्ष्मी माना जाता है और विष्णु की निष्क्रियता से लक्ष्मी भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाती हैं.

17)शनि वचनबद्धता , कार्यबद्धता और समयबद्धता का कारक ग्रह है. जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन तीनो चीजों का अभाव होगा तो समझना चाहिए की उसकी पत्रिका में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है।

18)नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है. लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है. क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है. जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.। इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.। यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है. फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है. शनि या राहु.??????

 19)ज्योतिष में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं. यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है. इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है.

20)"लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है."।

21)"व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा"".।


Wednesday, June 19, 2019

मकर लग्न का परिचय और फल

मकर लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 270 डिग्री से 300 डिग्री तक के भाग को मकर राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जताक के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न मकर माना जाता है. मकर लग्‍न की कुंडली में में मन का स्‍वामी चंद्रमा सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्ठेश होने के नाते माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह संबंधी विषयों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि एकादशेश होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र पंचम और दशम भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने के कारण यह जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का और दशमेश होने के कारण राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का अधिपति होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. एक केंद्र और त्रिकोण का स्वामित्व मिलने शुक्र मकर लग्न में अति योगकारी होता है.

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति द्वादश भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है.
जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वितीय भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि एवम द्वितीयेश होने के कारण कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मकर लग्न में राहु नवम भाव का अधिपति होकर जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनकर अति शुभ हो जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में विशेष शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु यहां तॄतीयेश होकर जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मीन लग्न का परिचय एवं फल

मीन लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 330 डिग्री से 360 डिग्री तक के भाग को मीन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मीन माना जाता है. मीन लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्रमा पंचम भाव का स्‍वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी , वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है द्वितीय भाव का अधिपति होने के कारण जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है जबकि नवमेश होने के कारण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधि बनता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति दशम भाव का स्‍वामी होकर जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. एकादश भाव का स्वामी होने के कारण यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है जबकि द्वादशेश होने के नाते यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण.इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु को मीन लग्न में सप्तमेश होने का दायित्व मिलता है जिसकी वजह से यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होत है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु को मीन लग्न में लग्नेश होने का दायित्व मिलता है इस वजह से यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कुम्भ लग्न का परिचय एवम फल

कुंभ लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग को कुंभ राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कुंभ माना जाता है. कुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

समस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का कारक होता है. एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. कुंभ लग्न में एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामी होकर शुक्र अतीव शुभ और राजयोग कारक ग्रह बन जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में अतयंत शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से न्य़ून शुभ फ़लों के साथ अधिक अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध पंचम भाव का स्‍वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि का प्रतिनिधि होता है जबकि द्वादशेश होने के कारण यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु अष्टम भाव का स्वामी होकर यहां अष्टमेश होता है जिसके कारण उसे जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व मिलता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु द्वितीय भाव का स्वामी होकर यहां जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...