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Friday, June 21, 2019

कल्याण मंदिर स्तोत्र

*श्री कल्याणमन्दिर स्त्रोत*

कल्याण-मन्दिरमुदारमवद्यभेदि ,

भीता-भयप्रदमनिन्दितमङ्-धिपद्मम्।

संसार-सागर-निमज्जदशेषजंतु -

पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य॥ 1॥



यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:,

स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्।

तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतोस्

तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये॥ 2॥



सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-

मस्मादृशा: कथमधीश भवन्त्यधीशा:।

धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो

रूपं प्ररूपयति किं किल घर्मरश्मे: ॥ 3॥



मोहक्षयादनु-भवन्नपि नाथ मत्र्यो

नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।

कल्पान्तवान्तपयस: प्रकटोऽपि यस्मान्

मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशि:॥ 4॥



अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ ! जडाशयोऽपि

कर्तुं स्तवं लसदसंख्यगुणाकरस्य।

बालोऽपि किं न निजबाहुयुगं वितत्य

विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:॥5॥



ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश

वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाश:।

जाता तदेवमसमीक्षितकारितेयं

जल्पन्ति वा निजगिरा ननु पक्षिणोऽपि॥ 6॥



आस्तामचिन्त्यमहिमा जिन! संस्तवस्ते

नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।

तीव्रातपोपहतपान्थजनान्निदाघे

प्रीणाति पद्मसरस: सरसोऽनिलोऽपि॥ 7॥



हृद्वर्तिनि त्वयि विभो शिथिलीभवन्ति

जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा:।

सद्यो भुजङ्गममया इव मध्यभाग-

मभ्यागते वनशिखण्डिनि चन्दनस्य॥ 8॥



मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र !

रौद्रैरुपद्रवशतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।

गोस्वामिनि स्फुरिततेजसि दृष्टमात्रे

चौरैरिवाशु पशव: प्रपलायमानै: ॥ 9॥



त्वं तारको जिन ! कथं भविनां त एव

त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:।

यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-

मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:॥ 10॥



यस्मिन् हर-प्रभृतयोऽपि हतप्रभावा:

सोऽपि त्वया रतिपति: क्षपित: क्षणेन।

विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन

पीतं न किं तदपि दुद्र्धरवाडवेन॥ 11॥



स्वामिन्ननल्पगरिमाणमपि प्रपन्नास्-

त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।

जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन

चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:॥ 12॥



क्रोधस्त्वया यदि विभो ! प्रथमं निरस्तो-

ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचौरा:।

प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके

नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी॥ 13॥



त्वां योगिनो जिन ! सदा परमात्मरूप

मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुजकोशदेशे।

पूतस्य निर्मल-रुचे-र्यदि वा किमन्य

दक्षस्य सम्भवपदं ननु कर्णिकाया:॥ 14॥ 



ध्यानाज्जिनेश ! भवतो भविन: क्षणेन

देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति।

तीव्रानलादुपलभावमपास्य लोके

चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदा: ॥ 15॥



अन्त: सदैव जिन ! यस्य विभाव्यसे त्वं

भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।

एतत्स्वरूपमथ मध्यविवर्तिनो हि

यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:॥ 16॥



आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेदबुद्ध्या

ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभाव:।

पानीयमप्यमृत-मित्यनुचिन्त्यमानं

किं नाम नो विषविकारमपाकरोति॥ 17॥



त्वामेव वीततमसं परवादिनोऽपि

नूनं विभो हरिहरादिधिया प्रपन्ना:।

किं काचकामलिभिरीश सितोऽपि शङ्खो

नो गृह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ॥ 18॥



धर्मोपदेशसमये सविधानुभावा-

दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:।

अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि

किं वा विबोधमुपयाति न जीवलोक:॥ 19॥



चित्रं विभो ! कथमवाङ्मुखवृन्तमेव

विष्वक्पतत्यविरला सुरपुष्पवृष्टि:।

त्वद्-गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!

गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि॥ 20॥



स्थाने गभीरहृदयोदधिसम्भवाया:

पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति।

पीत्वा यत: परमसम्मदसङ्गभाजो

भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्॥ 21॥



स्वामिन्! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो

मन्ये वदन्ति शुचय: सुरचामरौघा:।

येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुङ्गवाय

ते नूनमूध्र्वगतय: खलु शुद्धभावा:॥ 22॥



श्यामं गभीरगिरमुज्ज्वलहेमरत्न-

सिंहासनस्थमिह भव्यशिखण्डिनस्त्वाम्।

आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चैश्-

चामीकराद्रिशिरसीव नवाम्बुवाहम्॥ 23॥



उद्गच्छता तव शितिद्युतिमण्डलेन

लुप्तच्छदच्छवि-रशोकतरुर्बभूव ।

सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!

नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि॥ 24॥



भो ! भो ! प्रमादमवधूय भजध्वमेन-

मागत्य निर्वृतिपुरीं प्रति सार्थवाहम्।

एतन्निवेदयति देव जगत्त्रयाय

मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते॥ 25॥



उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!

तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:।

मुक्ताकलाप-कलितोल्लसितातपत्र

व्याजात्त्रिधा धृततनुध्र्रुवमभ्युपेत:॥ 26॥



स्वेन प्रपूरितजगत्त्रयपिण्डितेन

कान्तिप्रतापयशसामिव सञ्चयेन।

माणिक्यहेमरजत-प्रविनिर्मितेन

सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि॥ 27॥



दिव्यस्रजो जिन नमत्त्रिदशाधिपाना-

मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबन्धान्।

पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वापरत्र

त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव॥ 28॥



त्वं नाथ ! जन्मजलधेर्विपराङ्मुखोऽपि

यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलग्नान्।

युक्तं हि पार्थिवनिपस्य सतस्तवैव

चित्रं विभो ! यदसि कर्मविपाकशून्य:॥ 29॥



विश्वेश्वरोऽपि जनपालक ! दुर्गतस्त्वं

किं वाक्षरप्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!

अज्ञानवत्यपि सदैव कथञ्चिदेव

ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकासहेतु:॥ 30॥



प्राग्भारसम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-

दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।

छायापि तैस्तव न नाथ हता हताशो

ग्रस्तस्त्वमी-भिरयमेव परं दुरात्मा॥ 31॥



यद्गर्जदूर्जित घनौघमदभ्रभीम

भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्।

दैत्येन मुक्तमथ दुस्तरवारि दध्रे

तेनैव तस्य जिन! दुस्तरवारिकृत्यम्॥ 32॥



ध्वस्तोध्र्वकेश-विकृताकृतिमत्र्यमुण्ड-

प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र विनिर्यदग्रि:।

प्रेतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:

सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भवदु:खहेतु:॥ 33॥



धन्यास्त एव भुवनाधिप ! ये त्रिसन्ध्य-

माराधयन्ति विधिवद् विधुतान्यकृत्या:।

भक्त्योल्लसत्पुलकपक्ष्मलदेहदेशा: ।

पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:॥34॥



अस्मिन्नपार-भव- वारिनिधौ मुनीश!

मन्ये न मे श्रवणगोचरतां गतोऽसि।

आकर्णिते तु तव गोत्रपवित्रमन्त्रे

किं वा विपद्विषधरी सविधं समेति॥ 35॥



जन्मान्तरेऽपि तव पादयुगं न देव!

मन्ये मया महितमीहितदानदक्षम्।

तेनेह जन्मनि मुनीश ! पराभवानां

जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्॥ 36॥



नूनं न मोहतिमिरावृतलोचनेन

पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।

मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:

प्रोद्यत्प्रबन्धगतय: कथमन्यथैते॥ 37॥



आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि

नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।

जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रम्

यस्मात्िक्रया: प्रतिफलन्ति न भावशून्या:॥ 38॥



त्वं नाथ ! दु:खिजनवत्सल! हे शरण्य!

कारुण्यपुण्यवसते ! वशिनां वरेण्य!

भक्त्या नते मयि महेश ! दयां विधाय

दु:खाङ्कुरोद्दलनतत्परतां विधेहि ॥ 39॥



नि:संख्यसारशरणं शरणं शरण्य-

मासाद्य सादितरिपु-प्रथितावदानम्।

त्वत्पादपङ्कजमपि प्रणिधानवन्ध्यो

वन्ध्योऽस्मि चेद्भुवनपावन! हा हतोऽस्मि॥४०॥



देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिलवस्तुसार!

संसारतारक ! विभो! भुवनाधिनाथ!

त्रायस्व देव! करुणाहृद ! मां पुनीहि

सीदन्तमद्य भयदव्यसनाम्बुराशे:॥ 41॥



यद्यस्ति नाथ ! भवदङ्िघ्रसरोरुहाणां

भक्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्िचताया:।

तन्मे त्वदेकशरणस्य शरण्य! भूया:

स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि॥ 42॥



इत्थंसमाहितधियो विधिवज्िजनेन्द्र!

सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:।

त्वद्बिम्बनिर्मल मुखाम्बुजबद्धलक्ष्या:

ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:॥ 43॥



जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्गसम्पदो भुक्त्वा।

ते विगलितमलनिचया अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते॥ 44॥

Saturday, March 23, 2019

चौरासी लाख योनियां का रहस्य

चौरासी लाख योनियों के रहस्य
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हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं।

सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है।

आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है।

हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है। मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। किन्तु दुर्भाग्य ये है कि लोग इस बात का महत्त्व समझते नहीं हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है।

एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है। इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो। इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके।

हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है। हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है।

पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है:

जलज नवलक्षाणी,
स्थावर लक्षविंशति
कृमयो: रुद्रसंख्यकः
पक्षिणाम् दशलक्षणं
त्रिंशलक्षाणी पशवः
चतुरलक्षाणी मानव

अर्थात,

जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख)
वृक्ष - २०००००० (बीस लाख)
कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख)
पक्षी - १०००००० (दस लाख)
जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख)
मनुष्य - ४००००० (चार लाख)
इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है।

जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है।

जैन धर्म के अनुसार:
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पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख)
जलकाय - ७००००० (सात लाख)
अग्निकाय - ७००००० (सात लाख)
वायुकाय - ७००००० (सात लाख)
वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख)
साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख)
द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) 
त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)
चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख)

इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४०००००

अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था।

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Monday, February 11, 2019

प्रमुख ग्रंथ और उनके रचनाकार

*☀प्रमुख जैन ग्रंथ,और रचनाकार☀*

1 - श्री आदि पुराण
*श्री जिनसेनाचार्य जी*

2 - श्री उत्तर पुराण
*श्री रविसेनाचार्य जी*

3 - श्री चौबीसी पुराण 
*श्री शुभचन्द्र आचार्य*

4 - श्री पांडव पुराण
*श्री शुभ चन्द्राचार्य जी*

5 - श्री श्रेणिक चरित्र
*श्री शुभ चन्द्राचार्य*

6 - श्री प्रद्युमनचरित्र
*श्री आचार्य सकल कीर्ति जी*

7 - श्री क्षत्रचूड़ामणि 
*आचार्य श्री वादीभसिंह जी*

8 - श्री गद्यचिंतामणी
*आचार्य श्री वादीभसिंह जी*

9 - श्री हरिवंश पुराण
*आचार्य श्री जिनसैन जी*

 10 - श्री श्रीपाल चरित्र
*श्री सकल कीर्ति आचार्य*

11 - श्री शांतिनाथ पुराण
*श्री महाकवि असग जी*

12 - श्री महापुराण 
  *आचार्य श्री पुष्पदंत जी*

 13 - श्री यशः तिलक चंपू
  *आचार्य श्री सोमदेव जी*

 14 - श्री चंदाप्रभू चरितम्
*आचार्य श्री वीर नंदी जी*

 15 - श्री धर्मशर्माभ्युदय
  *आचार्य श्री जिनसेन जी*

16 - तिलोयपण्णत्ति
  *आचार्यश्री यतिवृषभजी*

 17 - जम्बूद्वीप पण्णत्ति
  *आचार्यश्री यतिवृषभजी*

 18 - लब्धिसार
*आचार्य श्री नेमचन्द्र जी*

19 - क्षपणसार
 *आचार्य श्री नेमचन्द्र जी*

20  - त्रिलोकसार
**श्री नेमीचन्द्राचार्य*

21 -  मरण कंडिका
*आचार्य श्री अमितगति जी*

22 - षट्खंडगम
*आचार्य श्री भूतबली पुष्पदंत जी*

23 - कषाय पाहुड
 *श्रीगुणभद्राचार्य*

24 - कर्म प्रकृति ग्रन्थ
  *आचार्यश्रीअभयचन्द्र जी*

 25 - भारतीय ज्योतिष
  *पंडित डां. नेमीचन्द्र जी*

 26 - श्री मूलाचार ग्रन्थ
*आचार्य श्री वट्टकेर स्वामी*

 27 - श्री भगवाती आराधना
  *आ.श्री अपराजितसूरि*

 28 - श्री अमितगति श्रावकाचार
  *श्री अमितगति आचार्य*

 29 - प्रवचसार नियमसार
*श्री कुंदकुंदाचार्य*

 30 - श्री नियमसार के कर्ता
*श्री कुंदकुंदाचार्य*

 31 - सम्यक्त्व कौमद
*श्री पंडितपन्ना लाल साहित्याचार्य(हिन्दी टीका)* 

32 - *श्री कुंदकुंदाचार्य ने चौरासी पाहुड् ग्रन्थ लिखे*

 33 - श्री चारित्रसार ग्रन्थ
*श्री चामुंडराय जी*

 34 - श्री अनागार धर्मामृत
  *पं0 श्री आशाधर जी*

 35 - श्री पुरूषार्थ सिद्धिय्युपाय
*श्री अमृतचन्द्र आचार्य*

36 - श्री छहढाला
* पं0 श्री दौलतराम जी*

37- श्री पद्मनंदी पंचविंशतिका
  *श्री पद्मनंदी आचार्य*

38 - श्री समयसार जी
*श्री कुंदकुंदाचार्य*

39 - श्री प्रवचन सार जी
*श्री कुंदकुंदाचार्य*

40 - श्री तत्वार्थ सूत्र- (मोक्ष शास्त्र)
*श्री उमास्वामी आचार्य*

 41- श्री नियमसार जी
*श्री कुंदकुंदाचार्य*

 42 - श्री परमात्मप्रकाश जी
*आचार्य श्री योगीन्द्र देव*

 43 - श्री तत्वार्थ राजवार्तिक जी
*आचार्य श्री अकलंक देव*

44 - श्री द्रव्य संग्रह
*श्री नेमी चन्द्र आचार्य सिद्धांत चक्रवर्ती*

45 - श्री अष्टसहस्त्री ग्रन्थ जी
   *श्री विद्यानंदी आचार्य*

46 - लब्धिसार क्षपणासार
*आचार्य श्री नेमीचन्द सिद्धांत चक्रवर्ती*

47 - सर्वार्थसिद्धि जी
*आचार्य श्री पूज्यपाद जी*

48 - पंचास्तिकाय जी
*श्री कुन्दकुन्दाचार्य*

49 - अष्ठपाहुड जी
*श्री कुन्दकुन्दाचार्य*

50 - पद्मपुराण जी
*आचार्य श्री रविसेनाचार्य*

51 - त्रिलोकसार
 *श्री नेमीचन्दाचार्य*

52 - कातंत्र व्याकरण
*आचार्य श्री सर्ववमजी*

53 - धर्म परीक्षा
*आचार्य श्री अमितगति जी*

54 - जिनदत्त चरित्र
*आचार्यश्री गुणभद्र जी*

55 - जिनेन्द्र सिद्धांत कोष
*क्षुल्लक श्री जिनेन्द्र प्रसाद जी वर्णी*

56 - नय दर्पण
*श्री जिनेन्द्र जी वर्णी*

57 - चूर्णी सूत्र
*श्री यति वृषभाचार्य*

58 - गोम्मटसार कर्मकांड
*श्री नेमीचन्दाचार्य*

59 - मोक्षमार्ग प्रकाशक
*पंडित श्री टोडरमल जी*

60 - कार्तिकेयानुप्रेक्षा
*श्री स्वामी कार्तिकेयाचार्य*

61 - आराधना कथाकोष
*ब्रम्हचारी श्री नेमीचंद जी*

62 - पुण्यास्रव कथाकोष
*श्री रामसेन जी*

63 - सुर्दशन चरित्र
*आचार्य श्री विद्यानन्दि जी*

64 - शांति पथ प्रर्दशन
*श्री जिनेन्द्र जी वर्णी*

65 - न्याय दीपिका
*आचार्य श्री अकलंक देव जी*

66 - आलाप पद्धति
*आचार्य श्री देवसेन जी*

67 - बृहत्कथा कोष
*आचार्य श्री हरिषेण जी*

68 - सागार धर्मामृत
*पंडित श्री आशाधर जी*

69 - श्लोक वार्तिक
*आचार्य श्री विद्यानंद जी*

70 - तत्वार्थसार
*आचार्य श्री अमृतचंद जी*

71 - धन्यकुमार चरित्र
*श्री भदन्त गुणभ्रद जी*

72 - चन्द्रप्रभ चरित्र
*श्री वीरनंदी जी*

73 - मल्लिनाथ पुराण
*आचार्य श्री सकल कीर्ति जी*

74 - श्री महावीर पुराण
*आचार्य श्री सकलकीर्ति जी*

75 - श्री पाल पुराण
*पंडित श्री परिमल्ल जी*

76 - गोम्मटसार जीवकांड
 *श्री नेमीचन्दाचार्य*

77 - भद्रवाहु संहिता
*पंडित डां. नेमीचंद जी*

78 - आत्मानुशासन
*आचार्य श्री गुणभ्रद जी*

79 - चारित्र चक्रवर्ती
*पंडित सुमेरचंद जी दिवाकर*

80 - श्री विमल पुराण
*श्री ब्रम्हचारी कृष्णदास जी*

81 - पार्श्व पुराण
*पंडित श्री भूधर दास जी*

82 - मूकमाटी महाकाव्य
*आचार्य श्री विद्या सागर जी*

83 - भरतेश वैभव
*महाकवि रत्नाकर जी*

84 -  जैन लक्षणावलि
*सम्पादन पंडित बाल चंद सिद्धांत शास्त्री*


85 - परीक्षा मुख
*आचार्य श्री माणिक्य नंदी जी*

86 - णमोकार ग्रन्थ
*आचार्य श्री देशभूषण जी*

87 - जैन तत्व विद्या
*मुनि श्री प्रमाण सागर जी*

88 - जैन भारती
*आर्यिका श्री ज्ञान मति माता जी*

89 - षट् खण्डागम परिशीलन
*श्री बाल चंद जी सिद्धांत शास्त्री*

90 - इष्टोपदेश
*आचार्य श्री पूज्यपाद जी*

91 - समाधितंत्र
*आचार्य श्री पूज्यपाद जी*

92 - जैन व्रत विधि संग्रह
*आर्यिका श्री ज्ञानमति माता जी*

93 - आराधना सार
*आचार्य श्री देवसेन जी*

94 - योगसार
*आचार्य श्री योगीन्दु देव जी*

95 - नाममाला
*श्री धंनजय कवि जी*

96 - रयणसार
*आचार्य श्री कुन्दकुन्द जी*

97 - देवागम स्तोत्र
*आचार्य श्री समंतभद्र जी*

98 - तत्वसार
*श्री देवसेनाचार्य जी*

99 - ध्यान सूत्राणि
*आचार्यश्री माघ नन्दि जी*

100 - जैन सिद्धांत प्रवेशिका
*पंडित गोपाल दास जी वरैया*

101 - मेरु मन्दर पुराण
*श्री वामन मुनि जी*

102 - मलाचार प्रदीप
*आचार्य श्री सकल कीर्ति जी*

103 - गणित सार संग्रह
*आचार्य श्री महावीर जी*

104 - ज्ञानार्णव
*आचार्य श्री शुभचन्द्र जी*

105 - क्रिया कोष
*पंडित श्री किशन सिंह जी*

106 - कल्याण कारक ग्रन्थ
*आचार्य श्री उग्रादित्य जी*

107 - जैनेन्द्र महावृति
*आचार्य श्री अभय नन्दि जी*

108 - वरांग चरित्र
*श्री जटासिंह नन्दि जी*


गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...