Showing posts with label धर्म. Show all posts
Showing posts with label धर्म. Show all posts

Sunday, August 25, 2019

जैन धर्म का पुरा इतिहास

Digambar mat anusar
मध्य एशिया जैनधर्म

मध्य एशिया और दक्षिण एशिया में लेनिनग्राड स्थित पुरातत्व संस्थान के प्रोफेसर ‘यूरि जेडनेयोहस्की’ ने २० जून सन् १९६७ को दिल्ली में एक पत्रकार सम्मेलन में कहा था कि ‘‘भारत और मध्य एशिया के बीच संबंध लगभग एक लाख वर्ष पुराना है। अत: यह स्वाभाविक है कि जैनधर्म मध्य एशिया में फैला हुआ था।’’
प्रसिद्ध प्रसीसी इतिहासवेत्ता श्री जे.ए. दुबे ने लिखा है कि आक्सियाना कैस्मिया, बल्ख ओर समरकंद नगर जैनधर्म के आरंभिक केन्द्र थे। सोवियत आर्मीनिया में नेशवनी नामक प्राचीन नगर हैं। प्रोफेसर एम.एस. रामस्वामी आयंगर के अनुसार जैन मुनि संत ग्रीस, रोम, नार्वे में भी विहार करते थे। श्री जान लिंगटन आर्किटेक्ट एवं लेखक नार्वे के अनुसार नार्वे म्यूजियम में ऋषभदेव की मूर्तियाँ हैं। वे नग्न और खड्गासन हैं। तर्जिकिस्तान में सराज्य के पुरातात्विक उत्खनन में प्राप्त पंचमार्क सिक्कों तथा सीलों पर नग्न मुद्रायें बनीं हैं। जो कि सिंधु घाटी सभ्यता के सदृश हैं। हंगरी के ‘बुडापेस्ट’ नगर में ऋषभदेव की मूर्ति एवं भगवान महावीर की मूर्ति भूगर्भ से मिली हैं।
ईसा से पूर्व ईराक, ईरान और फिलिस्तीन में जैन मुनि और बौद्ध भिक्षु हजारों की संख्या में चहुं ओर फैले थे, पश्चिमी एशिया, मिर, यूनान और इथियोपिया के पहाड़ों और जंगलों में उन दिनों अगणित श्रमण-साधु रहते थे, जो अपने त्याग और विद्या के लिए प्रसिद्ध थे। ये साधु नग्न थे। वानक्रेपर के अनुसार मध्य-पूर्व में प्रचलित समानिया सम्प्रदाय श्रमण का अपभ्रंश है। यूनानी लेखक मिस्र एचीसीनिया और इथियोपिया में दिगम्बर मुनियों का अस्तित्व बताते हैं।
प्रसिद्ध इतिहास-लेखक मेजर जनरल जे.जी. आर फर्लांग ने लिखा है कि अरस्तू ने ईसवी सन् से ३३० वर्ष पहले कहा है, कि प्राचीन यहूदी वास्तव में भारतीय इक्ष्वाकु-वंशी जैन थे, जो जुदिया में रहने के कारण
‘यहूदी’ कहलाने लगे थे। इस प्रकार यहूदीधर्म का स्रोत भी जैनधर्म प्रतीत होता है। इतिहासकारों के अनुसार तुर्किस्तान में भारतीय-सभ्यता के अनेकानेक चिन्ह मिले हैं। इस्तानबुल नगर से ५७० कोस की दूरी पर स्थित तारा तम्बोल नामक विशाल व्यापारिक नगर में बड़े-बड़े विशाल जैन मंदिर उपाश्रय, लाखों की संख्या में जैन धर्मानुयायी चतुर्विध संघ तथा संघपति जैनाचार्य अपने शिष्यों-प्रशिष्यों के साथ विद्यमान थे। आचार्य का नाम उदयप्रभ सूरि था। वहाँ का राजा और सारी प्रजा जैन धर्मानुयायी थी।
प्रसिद्ध जर्मन-विद्वान वानक्रूर के अनुसार मध्य पूर्व एशिया प्रचलित समानिया सम्प्रदाय श्रमण जैन-सम्प्रदाय था। विद्वान जी.एफ कार ने लिखा है कि ईसा की जन्मशती के पूर्व मध्य एशिया ईराक, डबरान और फिलिस्तीन, तुर्कीस्तान आदि में जैन मुनि हजारों की संख्या में फैलकर अहिंसा धर्म का प्रचार करते रहे। पश्चिमी एशिया, मिस्र, यूनान और इथियोपिया के जंगलों में अगणित जैन-साधु रहते थे।
मिस्र के दक्षिण भाग के भू-भाग को राक्षस्तान कहते हैं। इन राक्षसों को जैन-पुराणों में विद्याधर कहा गया है। ये जैन धर्म के अनुयायी थे। उस समय यह भू भाग सूडान, एबीसिनिया और इथियोपिया कहलाता था। यह सारा क्षेत्र जैनधर्म का क्षेत्र था।
मिस्र (एजिप्ट) की प्राचीन राजधानी पैविक्स एवं मिस्र की विशिष्ट पहाड़ी पर मुसाफिर लेखराम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कुलपति आर्य मुसाफिर’ में इस बात की पुष्टि की है कि उसने वहाँ ऐसी मूर्तियाँ देखी है, जो जैन तीर्थ गिरनार की मूर्तियों से मिलती जुलती है।

प्राचीन काल से ही भारतीय
मिस्र, मध्य एशिया, यूनान आदि देशों से व्यापार करते थे, तथा अपने व्यापार के प्रसंग में वे उन देशों में जाकर बस गये थे। बोलान के अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ। पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (उच्चनगर) में भी जैनधर्म का बड़ा प्रभाव था। उच्चनगर का जैनों से अतिप्राचीनकाल से संबंध चला आ रहा है तथा तक्षशिला के समान ही वह जैनों का केन्द्र-स्थल रहा है। तक्षशिला, पुण्डवर्धन, उच्चनगर आदि प्राचीन काल में बड़े ही महत्वपूर्ण नगर रहे हैं, इन अतिप्राचीन नगरों में भगवान ऋषभदेव के काल से ही हजारों की संख्या में जैन परिवार आबाद थे। घोलक के वीर धवल के महामंत्री वस्तुपाल ने विक्रम सं. १२७५ से १३०३ तक जैनधर्म के व्यापक प्रसार के लिए योगदान किया था। इन लोगों ने भारत और बाहर के विभिन्न पर्वत शिखरों पर सुन्दर जैन मंदिरों का निर्माण कराया, और उनका जीर्णोद्धार कराया एवं सिंध (पाकिस्तान), पंजाब, मुल्तान, गांधार, कश्मीर, सिंधुसोवीर आदि जनपदों में उन्होंने जैन मंदिरों, तीर्थों आदि का नव निर्माण कराया था, कम्बोज (पामीर) जनपद में जैनधर्म पेशावर से उत्तर की ओर स्थित था। यहाँ पर जैनधर्म की महती प्रभावना और जनपद में बिहार करने वाले श्रमण-संघ कम्बोज, याकम्बेडिग गच्छ के नाम से प्रसिद्ध थे। गांधार गच्छ और कम्बोज गच्छ सातवीं शताब्दी तक विद्यामान थे। तक्षशिला के उजड़ जाने के समय तक्षशिला में बहुत से जैन मंदिर और स्तूप विद्यमान थे।
अरबिया में जैनधर्म इस्लाम के फैलने पर अरबिया स्थित आदिनाथ नेमिनाथ और बाहुबली के मंदिर और अनेक मूर्तियाँ नष्ट हो गई थीं। अरबिया स्थित पोदनपुर जैनधर्म का गढ था, और यह वहाँ की राजधानी थी। वहाँ बाहुबली की उत्तुंग प्रतिमा विद्यमान थी।

: अरबिया में जैनधर्म इस्लाम के फैलने पर अरबिया स्थित आदिनाथ नेमिनाथ और बाहुबली के मंदिर और अनेक मूर्तियाँ नष्ट हो गई थीं। अरबिया स्थित पोदनपुर जैनधर्म का गढ था, और यह वहाँ की राजधानी थी। वहाँ बाहुबली की उत्तुंग प्रतिमा विद्यमान थी।
ऋषभदेव को अरबिया में ‘‘बाबा आदम’’ कहा जाता है। मौर्य सम्राट सम्प्रति के शासनकाल में वहाँ और फारस में जैन संस्कृति का व्यापक प्रचार हुआ था, तथा वहाँ अनेक बस्तियाँ विद्यमान थी।
मक्का में इस्लाम की स्थापना के पूर्व वहाँ जैनधर्म का व्यापक प्रचार प्रसार था। वहाँ पर अनेक जैन मंदिर विद्यमान थे। इस्लाम का प्रचार होने पर जैन मूर्तियाँ तोड़ दी गई, और मंदिरों को मस्जिद बना दिया गया। इस समय वहाँ जो मस्जिदें हैं, उनकी बनावट जैन मंदिरों के अनुरूप है। इस बात की पुष्टि जैम्सफग्र्यूसन ने अपनी ‘विश्व की दृष्टि’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के पृष्ठ २६ पर की है। मध्यकाल में भी जैन दार्शनिकों के अनेक संघ बगदाद और मध्य एशिया गये थे, और वहाँ पर अहिंसा धर्म का प्रचार किया था।
यूनानियों के धार्मिक इतिहास से भी ज्ञात होता है, कि उनके देश में जैन सिद्धांत प्रचलित थे। पाइथागोरस, पायरों, प्लोटीन आदि महापुरूष श्रमणधर्म और श्रमण दर्शन के मुख्य प्रतिपादक थे। एथेन्स में दिगम्बर जैन संत श्रमणाचार्य का चैत्य विद्यमान है, जिससे प्रकट है कि यूनान में जैनधर्म का व्यापक प्रसार था। प्रोफेसर रामस्वामी ने कहा था कि बौद्ध और जैन श्रमण अपने-अपने धर्मों के प्रचारार्थ यूनान रोमानिया और नार्वें तक गये थे। नार्वे के अनेक परिवार आज भी जैन धर्म का पालन करते हैं। आस्ट्रिया और हंगरी में भूकम्प के कारण भूमि में से बुडापेस्ट नगर के एक बगीचे से महावीर स्वामी की एक प्राचीन मूर्ति हस्तगत हुई थी। अत: यह स्वत: सिद्ध है कि वहाँ जैन श्रावकों की अच्छी बस्ती थी।

सीरियां में निर्जनवासी
: सीरियां में निर्जनवासी श्रमण सन्यासियों के संघ और आश्रम स्थापित थे। ईसा ने भी भारत आकर संयास और जैन तथा भारतीय दर्शनों का अध्ययन किया था। ईसा मसीह ने बाइबिल में जो अहिंसा का उपदेश दिया था, वह जैन संस्कृति और जैन सिद्धांत के अनुरूप है।
स्केडिनेविया में जैन धर्म के बारे में कर्नल टाड अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘राजस्थान’ में लिखते हैं कि ‘‘मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में चार बुद्ध या मेधावी महापुरुष हुये हैं। इनमें पहले आदिनाथ और दूसरे नेमिनाथ थे। ये नेमिनाथ की स्केडिनेविया निवासियों के प्रथम औडन तथा चीनियों के प्रथम ‘फे’ नामक देवता थे। डॉ. प्राणनाथ विद्यालंकार के अनुसार सुमेर जाति में उत्पन्न बाबुल के सिल्दियन सम्राट नेबुचंद नेजर ने द्वारका जाकर ईसा पूर्व ११४० में लगभग नेमिनाथ का एक मंदिर बनवाया था। सौराष्ट में इसी सम्राट नेबुचंद नेजर का एक ताम्र पत्र प्राप्त हुआ है।’’ कोश्पिया में जैनधर्म मध्य एशिया में बलख क्रिया मिशी, माकेश्मिया, उसके बाद मासवों नगरों अमन, समरवंâद आदि में जैनधर्म प्रचलित था, इसका उल्लेख ईसापूर्व पांचवीं, छठी शती में यूनानी इतिहास में किया गया था। अत: यह बिल्कुल संभव है कि जैनधर्म का प्रचार केश्पिया, रूकाबिया और समरवंâद बोक आदि नगरों में रहा था।
इन्टरनेट से साभार

Sunday, August 4, 2019

अध्यात्म क्या है एक दृष्टि

*अध्यात्म*

*अध्यात्म वह है जो आत्मा के अध्यायों का अध्ययन करने लिए प्रेरित करता है । जिसके माध्यम से प्राणी मात्र के प्रति कल्याण की भावना स्वतः ही उत्पन्न होने लगती है ।* 
*अध्यात्म में भौतिक अभौतिक दोनों प्रकार के साधनों की आवश्यकता ही नहीं होती है उसका मूल साधन और साधना का केंद्र स्वय का चित्त  होता है  जो चित्त वृत्तियां पर नियंत्रण करने में सक्षम हो जाता है ।*

अध्यात्म के क्षेत्र में भौतिक उपकरणों की जरूरत ही नहीं होती है वहां तो -
योग, ध्यान , भाव,  परिणाम, आत्मा, स्वाध्याय , चित्त आदि अंतः उपकरण
 एवम गुरु, गुरु चर्या, चारित्र, ज्ञान ,तप, साधना, ग्रंथ, सत्संगति इसके बाह्य उपकरण के रूप में कार्य करते हैं ।

अतः कहा जा सकता है कि मानव आधात्मिक साधना से सुरक्षित है

क्योकि भौतिक साधनों से मुख्य रूप से आत्मा के आध्यात्म का घात होता है ।
कलिकाल के मानव का मन बहुत जल्दी चंचल एवम पतित भी हो जाता है । साधना को रोक साधनों के उपयोग से अपने साध्य से भृमित हो जाता है

भौतिक साधन संयम को भंग कर असंयम को उत्पन्न करने में निमित्त बन जाते हैं। साधनों के नाम --

टेलीविजन के असंयमित सीरियल और कामुक चित्र
मोबाइल 
इंटरनेट (अंतः जाल)


अध्यात्म का संबंध मन से होता है मन ही इंद्रियों का राजा होता है अर्थात छठी इंद्रिय जिस पर आधारित है। पांचों इंद्रियां यदि मन में आध्यात्मिकता का गुणारोपण वहो जाता है तो इंद्रियां संतुलित हो जाती हैं जो मानव के  मन वचन के सवांगीण विकास में सहायक होकर मानव जीवन को  लब्धियों से युक्त बना देता है ।

 *आधुनिकता मानव मन पर भौतिकता विषय भोग की इच्छाएं,  असंतुष्टि और वाञ्छाओं इच्छाओं के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने में सहायता प्रदान करता है ।*
 अध्यात्म  मानव जीवन को सफल एवं संतुष्ट बनाकर दर्शन ज्ञान चारित्र को उच्च शिखर तक पहुंचाती है।
 *अध्यात्म आत्मा से परमात्मा बनने का एक सोपान है जो आत्मा को बहिर्मुखता से अंतर्मुखता  की ओर ले जाता है जो जीव की युक्ति पूर्वक मुक्ति दिलाने में सहायक है ।*

*वही आधुनिकता मानव की अंतर्मुखता से  बहिर्मुखता की ओर लाती है ।*

*जो संसार को बढ़ाने तथा मानव जीवन को असंतुष्टीकरण की ओर ले जा उसे असंवेदनशील बना देती है यथा मानव के प्रति व्यक्तिगत संबंधों के प्रति, सामाजिकता के प्रति, परमार्थ के प्रति आदि अनेक असंवेदनशीलता उत्पन्न हो जाती है।*
आध्यात्मिकता मानव को अभ्यस्त बनाती है ---आत्म सुख के प्रति
किंतु आधुनिकता व्यस्त बनाती है- स्वार्थ के प्रति ।


अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर के चेतन तत्व को जानना,मनना और दर्शन करना अर्थात अपने आप के बारे में जानना या आत्मप्रज्ञ होना |गीता के आठवें अध्याय में अपने स्वरुप अर्थात जीवात्मा को अध्यात्म कहा गया है |
"परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते "|


आत्मा परमात्मा का अंश है यह तो सर्विविदित है | जब इस सम्बन्ध में शंका या संशय,अविश्वास की स्थिति अधिक क्रियमान होती है तभी हमारी दूरी बढती जाती है और हम विभिन्न रूपों से अपने को सफल बनाने का निरर्थक प्रयास करते रहते हैं जिसका परिणाम नाकारात्मक ही होता है |

ये तो असंभव सा जान पड़ता है-मिटटी के बर्तन मिटटी से अलग पहचान बनाने की कोशिश करें तो कोई क्या कहे ? यह विषय विचारणीय है |

अध्यात्म की अनुभूति सभी प्राणियों में सामान रूप से निरंतर होती रहती है | स्वयं की खोज तो सभी कर रहे हैं,परोक्ष व अपरोक्ष रूप से |

परमात्मा के असीम प्रेम की एक बूँद मानव में पायी जाती है जिसके कारण हम उनसे संयुक्त होते हैं किन्तु कुछ समय बाद इसका लोप हो जाता है और हम निराश हो जाते हैं,सांसारिक बन्धनों में आनंद ढूंढते ही रह जाते हैं परन्तु क्षणिक ही ख़ुशी पाते हैं |

जब हम क्षणिक संबंधों,क्षणिक वस्तुओं को अपना जान कर उससे आनंद मनाते हैं,जब की हर पल साथ रहने वाला शरीर भी हमें अपना ही गुलाम बना देता है | हमारी इन्द्रियां अपने आप से अलग कर देती है यह इतनी सूक्ष्मता से करती है - हमें महसूस भी नहीं होता की हमने यह काम किया है ?

जब हमें सत्य की समझ आती है तो जीवन का अंतिम पड़ाव आ जाता है व पश्चात्ताप के सिवाय कुछ हाथ नहीं लग पाता | ऐसी स्थिति का हमें पहले ही ज्ञान हो जाए तो शायद हम अपने जीवन में पूर्ण आनंद की अनुभूति के अधिकारी बन सकते हैं |हमारा इहलोक तथा परलोक भी सुधर सकता है |

अब प्रश्न उठता है की यह ज्ञान क्या हम अभी प्राप्त कर सकते हैं ? हाँ ! हम अभी जान सकते हैं की अंत समय में किसकी स्मृति होगी, हमारा भाव क्या होगा ? हम फिर अपने भाव में अपेक्षित सुधार कर सकेंगे | गीता के आठवें अध्याय श्लोक संख्या आठ में भी बताया गया है

यंयंवापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भाव भावितः ||

अर्थात-"हे कुंतीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है,  उस-उस को ही प्राप्त होता है ;क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है |"

एक संत ने इसे बताते हुए कहा था की सभी अपनी अपनी आखें बंद कर यह स्मरण करें की सुबह अपनी आखें खोलने से पहले हमारी जो चेतना सर्वप्रथम जगती है उस क्षण हमें किसका स्मरण होता है ? बस उसी का स्मरण अंत समय में भी होगा | अगर किसी को भगवान् के अतिरिक्त किसी अन्य चीज़ का स्मरण होता है तो अभी से वे अपने को सुधार लें और निश्चित कर लें की हमारी आँखें खुलने से पहले हम अपने चेतन मन में भगवान् का ही स्मरण करेंगे |बस हमारा काम बन जाएगा नहीं तो हम जीती बाज़ी भी हार जायेंगे |

कदाचित अगर किसी की बीमारी के कारण या अन्य कारण से बेहोशी की अवस्था में मृत्यु हो जाती है तो दीनबंधु भगवान् उसके नित्य प्रति किये गए इस छोटे से प्रयास को ध्यान में रखकर उन्हें स्मरण करेंगे और उनका उद्धार हो जाएगा क्योंकि परमात्मा परम दयालु हैं जो हमारे छोटे से छोटे प्रयास से द्रवीभूत हो जाते हैं |

ये विचार मानव-मात्र के कल्याण के लिए समर्पित है |

सत्यम शिवम् सुन्दरम


आध्यात्म शब्द संस्कृत भाषा का है। जिन लोगों को संस्कृत भाषा नहीं भी आती है वो भी इस शब्द का प्रयोग करते हैं क्योंकि यह लगभग हर भारतीय भाषा में वर्णित है। अध्यात्म का व्यापक रूप से अर्थ है परमार्थ चिंतन, लेकिन इस शब्द के मूल में इसके दूसरे अर्थ भी देखना आवश्यक है। यह एक संस्कृत शब्द है। ग्रीक, लेटिन और फारसी की तरह ही संस्कृत भी पुरातन भाषा है। कई पुरातन भाषाओं की तरह ही संस्कृत भाषा में ज़्यादातर शब्द जड़ या मूल से लिए गए हैं।

अध्यात्म शब्द उपसर्ग ‘आधी’ और ‘आत्मा’ का समास है। ‘आत्मा’, आत्मन शब्द का संक्षिप्त रूप है, जो सांस लेने, आगे बढने आदि से लिया गया है। ‘आत्मन’ शब्द का अर्थ आत्मा से है जिसमें जीवन और संवेदना के सिद्धान्त, व्यक्तिगत आत्मा, उसमें रहने वाले अस्तित्व, स्वयं, अमूर्त व्यक्ति, शरीर, व्यक्ति या पूरे शरीर को एक ही और विपरीत भी मानते हुए अलग-अलग अंगों में ज्ञान, मन, जीवन के उच्च व्यक्तिगत सिद्धान्त, ब्राह्मण, अभ्यास, सूर्य, अग्नि, और एक पुत्र भी शामिल है। उपसर्ग ‘आदी’ को क्रिया और संज्ञा के साथ जोड़ दिया जाता है और जिसका अर्थ यह भी हो सकता है कि ऊपर से, उसमें उपस्थित, बाद में, इसके बजाय, ऊपर, किसी की तुलना में, ऊपर, फिर उसके भी ऊपर और कोई विषय समाहित हो। अध्यात्म का अर्थ आत्मा या आत्मन, जो सर्वोच्च आत्मा है, का स्वागत करे, जो उसकी खुद की है, स्वयं से या व्यक्तिगत व्यक्तित्व से संबन्धित हो। इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि विवेकी व्यक्तित्व जो वास्तविकता को अवास्तविकता से अलग कर सके। साथ ही यह भी कि आध्यात्मिकता या अनुशासन जो स्वयं के स्वभाव की अनुभूति करा सके।

आध्यात्म का अर्थ व्यक्तिगत या खुद का स्वभाव होता है, जो हर शरीर में सर्वोच्च भाव के रूप में ब्राह्मण की तरह रहता है। इसका अर्थ, जो अस्तित्व के स्वयं के रूप में शरीर में निवास करती है, आत्मा, वह शरीर को उसके रहने के लिए अधिकृत करती है और जो परम विश्लेषण का उच्च स्तर है। अध्यात्म भी ज्ञान अर्जित करता है जो आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता और आखिरकार मोक्ष या मुक्ति तक ले जाता है। यह ज्ञान अध्यात्म से संबन्धित है, जो स्वयं से तो संबन्धित है ही साथ ही स्वयं और दूसरी आत्मा के बीच के संबंध से भी संबन्धित है। अध्यात्म, आत्मा के ज्ञान से संबन्धित है, और जिस रास्ते पर चलकर ये प्राप्त हो सकता है, वह ज्ञान अनंत है। अध्यात्म का अर्थ उस ब्राह्मण के बारे में बताना है, जो परम सच्चाई है। शास्त्रों के पढ़ने और किसी के आत्मा के स्वभाव को समझना ही अध्यात्म कहलता है। इसका अर्थ भगवान के सामने आत्म समर्पण करना और अपने अहंकार को तिलांजलि देना है।

वह जो कुछ स्वयं से संबन्धित है, जिसमें मन, शरीर, ऊर्जा शामिल हैं, अध्यात्म कहलता है। यह शरीर और चित्त में उत्पन्न होने वाली परेशानियां भी दर्शाता है, जो जीव में उत्पन्न होने वाली तीन परेशानियों में से एक है। बाकी दो परेशानियाँ, आधिभौतिका और अधिदैविका हैं। आधिभौतिका दूसरे जीवों के द्वारा होतीं हैं, और अधिदैविका प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय शक्तियों के द्वारा।

Monday, May 6, 2019

जैनागम में अक्षय तृतीया पर्व

जैनागम में अक्षय तृतीया

   

     भारतीय संस्कृति में पर्व, त्याहारों और व्रतों का अपना एक अलग महत्व है। ये हमें हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जहां जोड़ते हैं वहीं हमारे आत्मकल्याण में भी कार्यकारी होते हैं। वैशाख शुक्ला तृतीया को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इस दिन जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने राजा श्रेयांस के यहां इक्षु रस का आहार लिया था, जिस दिन तीर्थंकर ऋषभदेव का आहार हुआ था, उस दिन वैशाख शुक्ला तृतीया थी। उस दिन राजा श्रेयांस के यहां भोजन, अक्षीण (कभी खत्म न होने वाला ) हो गया था। अतः आज भी लोग इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। जैनधर्म के अनुसार भरत क्षेत्र में इसी दिन से आहार दान की परम्परा शुरू हुई। ऐसी मान्यता है कि मुनि का आहार देने वाला इसी पर्याय से या तीसरी पर्याय से मोक्ष प्राप्त करता है। राजा श्रेयांस ने भगवान आदिनाथ को आहारदान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त किया था, अतः यह तिथि अक्षय तृतीया के रूप में मानी जाती है। यह दिन बहुत ही शुभ होता है, इस दिन बिना मुर्हूत निकाले शुभ कार्य संपन्न होते हैं।

जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में विजयार्ध पर्वत से दक्षिण की ओर मध्य आर्यखण्ड में कुलकरों में अंतिम कुलकर नाभिराज हुए। उनके मरूदेवी नाम की पट्टरानी थी। रानी के गर्भ में जब जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव आये तब गर्भकल्याणक उत्सव देवों ने बडे़ ठाठ से मनाया और जन्म होने पर जन्म कल्याणक मनाया। फिर दीक्षा कल्याणक होने के बाद ऋषभदेव ने छःमाह तक घोर तपस्या की। छः माह के बाद चर्या (आहार) विधि के लिए ऋषभदेव भगवान ने अनेक ग्राम नगर शहर में विहार किया, किन्तु जनता व राजा लोगों को आहार की विधि मालूम न होने के कारण भगवान को धन, कन्या, पैसा, सवारी आदि अनेक वस्तु भेंट की। भगवान ने यह सब अंतराय का कारण जानकर पुनः वन में पहुंच छःमाह की तपश्चरण योग धारण कर लिया।


अवधि पूर्ण होने के बाद पारणा करने के लिए चर्या मार्ग से ईर्यापथ शुद्धि करते हुए ग्राम, नगर में भ्रमण करते-करते कुरूजांगल नामक देश में पधारे। वहां हस्तिनापुर में कुरूवंश के शिरोमणि महाराज सोम राज्य करते थे। उनके श्रेयांस नाम का एक भाई था उसने सर्वार्थसिद्धि नामक स्थान से चयकर यहां जन्म लिया था।

एक दिन रात्रि के समय सोते हुए उसे रात्रि के आखिरी भाग में कुछ स्वप्न आये। उन स्वप्नों में मंदिर, कल्पवृक्ष, सिंह, वृषभ, चंद्र, सूर्य, समुद्र, आग, मंगल द्रव्य यह अपने राजमहल के समक्ष स्थित हैं ऐसा उस स्वप्न मंे देखा तदनंतर प्रभात बेला मंे उठकर उक्त स्वप्न अपने जेष्ठ भ्राता से कहे, तब ज्येष्ठ भ्राता सोमप्रभ ने अपने विद्वान पुरोहित को बुलाकर स्वप्नों का फल पूछा। पुरोहित ने जबाव दिया- हे राजन! आपके घर श्री ऋषभदेव भगवान पारणा के लिए पधारेंगे, इससे सबको आनंद हुआ।

इधर भगवान ऋषभदेव आहार (भोजन) हेतु ईर्या समितिपूर्वक भ्रमण करते हुए उस नगर के राजमहल के सामने पधारे तब सिद्धार्थ नाम का कल्पवृक्ष की मानो अपने सामने आया है, ऐसा सबको भास हुआ। राजा श्रेयांस को भगवान ऋषभदेव का श्रीमुख देखते ही उसी क्षण अपने पूर्वभव में श्रीमती वज्रसंघ की अवस्था में एक सरोवर के किनारे दो चारण मुनियों को आहार दिया था-उसका जाति स्मरण हो गया। अतः आहारदान की समस्त विधि जानकर श्री ऋषभदेव भगवान को तीन प्रदक्षिणा देकर पड़गाहन किया व भोजन गृह में ले गये।


‘प्रथम दान विधि कर्ता’ ऐसा वह दाता श्रेयांस राजा और उनकी धर्मपत्नी सुमतीदेवी व ज्येष्ठ बंधु सोमप्रभ राजा अपनी लक्ष्मीपती आदि ने मिलकर श्री भगवान ऋषभदेव को सुवर्ण कलशों द्वारा तीन खण्डी (बंगाली तोल) इक्षुरस (गन्ना का रस) तो अंजुल में होकर निकल गया और दो खण्डी रस पेट में गया।

इस प्रकार भगवान ऋषभदेव की आहारचर्या निरन्तराय संपन्न हुई। इस कारण उसी वक्त स्वर्ग के देवों ने अत्यंत हर्षित होकर पंचाश्चर्य (रत्नवृष्टि, गंधोदक वृष्टि, देव दुदभि, बाजों का बजना व जय-जयकार शब्द होना) वृष्टि हुई और सभी ने मिलकर अत्यंत प्रसन्नता मनाई।

आहारचर्या करके वापस जाते हुए ऋषभदेव भगवान ने सब दाताओं को ‘अक्षय दानस्तु’ अर्थात् दान इसी प्रकार कायम रहे, इस आशय का आशीर्वाद दिया, यह आहार वैशाख सुदी तीज को सम्पन्न हुआ था।

जब ऋषभदेव निरंतराय आहार करके वापस विहार कर गए उसी समय से अक्षय तीज नाम का पुण्य दिवस (जैनधर्म के अनुसार) का शुभारंभ हुआ। इसको आखा तीज भी कहते हैं। यह दिन हिन्दू धर्म में भी बहुत पवित्र माना जाता है। इस दिन अनबूझा मुर्हूत मानकर शादी, विवाह एवं मंगलकार्य प्रचुर मात्रा में होते हैं।

जैनधर्म में दान का प्रवर्तन इसी तिथि से माना जाता है, क्योंकि इससे पूर्व दान की विधि किसी को मालूम नहीं थी। अतः अक्षय तृतीया के इस पावन पर्व को देश भर के जैन श्रद्धालु हर्षोल्लास व अपूर्व श्रद्धा भक्ति से मनाते हैं। इस दिन हस्तिनापुर में भी विशाल आयोजन किया जाता है। इस दिन व्रत, उपवास रखकर इस पर्व के प्रति अपनी प्रगाढ आस्था दिखाते हैं।

अक्षय तृतीया व्रत, विधि एवं मंत्र:-

यह व्रत जैन परम्परा के अनुसार वैशाख सुदी तीज से प्रारम्भ होता है। उस दिन शुद्धतापूर्वक एकाशन करें या 2 उपवास या 3 एकाशन करें।

इसकी विधि यह है कि व्रत की अवधि में प्रातः नैत्यिक क्रिया से निवृत्त होकर मंदिर जी को जावें। मंदिर जी में जाकर शुद्ध भावों से भगवान की दर्शन स्तुति करें। पश्चात् भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान कर कलशाभिषेक करें। नित्य नियम पूजा भगवान आदि तीर्थंकर (ऋषभदेव) की पूजा एवं पंचकल्याणक का मण्डल जी मंडवाकर मण्डल जी की पूजा करें। तीनों काल (प्रातः, मध्यान्ह, सांय) निम्नलिखित मंत्र जाप्य करें एवं सामायिक करें-

मंत्र – ओम् ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं श्री आदिनाथतीर्थंकराय नमः स्वाहा।

प्रातः सांय णमोकार मंत्र का शुद्धोच्चारण करते हुए जाप्य करें।

व्रत के समय में गृहादि समस्त क्रियाओं से दूर रहकर स्वाध्याय, भजन, कीर्तन आदि में समय यापन करें। दिन भर जिन चैत्यालय में ही रहें। व्रत अवधि में ब्रह्राचर्य से रहें। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों का अणुव्रत रूप से त्याग करें। क्रोध, मान, माया, लोभ कषायों को शमन करें।

व्रत पूर्ण होने पर यथाशक्ति उद्यापन करें। भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा मंदिरजी में भेंट करें तथा मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका चतुर्विध संघ को चार प्रकार का दान देवें। इस प्रकार शुद्धतापूर्वक विधिवत रूप से व्रत करने से सर्व सुख की प्राप्ति होती है तथा साथ ही क्रम से अक्षय सुख अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।

-डाॅ0 सुनील जैन: ‘संचय’ संस्कृति में पर्व, त्याहारों और व्रतों का अपना एक अलग महत्व है। ये हमें हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जहां जोड़ते हैं वहीं हमारे आत्मकल्याण में भी कार्यकारी होते हैं। वैशाख शुक्ला तृतीया को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इस दिन जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने राजा श्रेयांस के यहां इक्षु रस का आहार लिया था, जिस दिन तीर्थंकर ऋषभदेव का आहार हुआ था, उस दिन वैशाख शुक्ला तृतीया थी। उस दिन राजा श्रेयांस के यहां भोजन, अक्षीण (कभी खत्म न होने वाला ) हो गया था। अतः आज भी लोग इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। जैनधर्म के अनुसार भरत क्षेत्र में इसी दिन से आहार दान की परम्परा शुरू हुई। ऐसी मान्यता है कि मुनि का आहार देने वाला इसी पर्याय से या तीसरी पर्याय से मोक्ष प्राप्त करता है। राजा श्रेयांस ने भगवान आदिनाथ को आहारदान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त किया था, अतः यह तिथि अक्षय तृतीया के रूप में मानी जाती है। यह दिन बहुत ही शुभ होता है, इस दिन बिना मुर्हूत निकाले शुभ कार्य संपन्न होते हैं।

जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में विजयार्ध पर्वत से दक्षिण की ओर मध्य आर्यखण्ड में कुलकरों में अंतिम कुलकर नाभिराज हुए। उनके मरूदेवी नाम की पट्टरानी थी। रानी के गर्भ में जब जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव आये तब गर्भकल्याणक उत्सव देवों ने बडे़ ठाठ से मनाया और जन्म होने पर जन्म कल्याणक मनाया। फिर दीक्षा कल्याणक होने के बाद ऋषभदेव ने छःमाह तक घोर तपस्या की। छः माह के बाद चर्या (आहार) विधि के लिए ऋषभदेव भगवान ने अनेक ग्राम नगर शहर में विहार किया, किन्तु जनता व राजा लोगों को आहार की विधि मालूम न होने के कारण भगवान को धन, कन्या, पैसा, सवारी आदि अनेक वस्तु भेंट की। भगवान ने यह सब अंतराय का कारण जानकर पुनः वन में पहुंच छःमाह की तपश्चरण योग धारण कर लिया।


अवधि पूर्ण होने के बाद पारणा करने के लिए चर्या मार्ग से ईर्यापथ शुद्धि करते हुए ग्राम, नगर में भ्रमण करते-करते कुरूजांगल नामक देश में पधारे। वहां हस्तिनापुर में कुरूवंश के शिरोमणि महाराज सोम राज्य करते थे। उनके श्रेयांस नाम का एक भाई था उसने सर्वार्थसिद्धि नामक स्थान से चयकर यहां जन्म लिया था।

एक दिन रात्रि के समय सोते हुए उसे रात्रि के आखिरी भाग में कुछ स्वप्न आये। उन स्वप्नों में मंदिर, कल्पवृक्ष, सिंह, वृषभ, चंद्र, सूर्य, समुद्र, आग, मंगल द्रव्य यह अपने राजमहल के समक्ष स्थित हैं ऐसा उस स्वप्न मंे देखा तदनंतर प्रभात बेला मंे उठकर उक्त स्वप्न अपने जेष्ठ भ्राता से कहे, तब ज्येष्ठ भ्राता सोमप्रभ ने अपने विद्वान पुरोहित को बुलाकर स्वप्नों का फल पूछा। पुरोहित ने जबाव दिया- हे राजन! आपके घर श्री ऋषभदेव भगवान पारणा के लिए पधारेंगे, इससे सबको आनंद हुआ।

इधर भगवान ऋषभदेव आहार (भोजन) हेतु ईर्या समितिपूर्वक भ्रमण करते हुए उस नगर के राजमहल के सामने पधारे तब सिद्धार्थ नाम का कल्पवृक्ष की मानो अपने सामने आया है, ऐसा सबको भास हुआ। राजा श्रेयांस को भगवान ऋषभदेव का श्रीमुख देखते ही उसी क्षण अपने पूर्वभव में श्रीमती वज्रसंघ की अवस्था में एक सरोवर के किनारे दो चारण मुनियों को आहार दिया था-उसका जाति स्मरण हो गया। अतः आहारदान की समस्त विधि जानकर श्री ऋषभदेव भगवान को तीन प्रदक्षिणा देकर पड़गाहन किया व भोजन गृह में ले गये।


‘प्रथम दान विधि कर्ता’ ऐसा वह दाता श्रेयांस राजा और उनकी धर्मपत्नी सुमतीदेवी व ज्येष्ठ बंधु सोमप्रभ राजा अपनी लक्ष्मीपती आदि ने मिलकर श्री भगवान ऋषभदेव को सुवर्ण कलशों द्वारा तीन खण्डी (बंगाली तोल) इक्षुरस (गन्ना का रस) तो अंजुल में होकर निकल गया और दो खण्डी रस पेट में गया।

इस प्रकार भगवान ऋषभदेव की आहारचर्या निरन्तराय संपन्न हुई। इस कारण उसी वक्त स्वर्ग के देवों ने अत्यंत हर्षित होकर पंचाश्चर्य (रत्नवृष्टि, गंधोदक वृष्टि, देव दुदभि, बाजों का बजना व जय-जयकार शब्द होना) वृष्टि हुई और सभी ने मिलकर अत्यंत प्रसन्नता मनाई।

आहारचर्या करके वापस जाते हुए ऋषभदेव भगवान ने सब दाताओं को ‘अक्षय दानस्तु’ अर्थात् दान इसी प्रकार कायम रहे, इस आशय का आशीर्वाद दिया, यह आहार वैशाख सुदी तीज को सम्पन्न हुआ था।

जब ऋषभदेव निरंतराय आहार करके वापस विहार कर गए उसी समय से अक्षय तीज नाम का पुण्य दिवस (जैनधर्म के अनुसार) का शुभारंभ हुआ। इसको आखा तीज भी कहते हैं। यह दिन हिन्दू धर्म में भी बहुत पवित्र माना जाता है। इस दिन अनबूझा मुर्हूत मानकर शादी, विवाह एवं मंगलकार्य प्रचुर मात्रा में होते हैं।

जैनधर्म में दान का प्रवर्तन इसी तिथि से माना जाता है, क्योंकि इससे पूर्व दान की विधि किसी को मालूम नहीं थी। अतः अक्षय तृतीया के इस पावन पर्व को देश भर के जैन श्रद्धालु हर्षोल्लास व अपूर्व श्रद्धा भक्ति से मनाते हैं। इस दिन हस्तिनापुर में भी विशाल आयोजन किया जाता है। इस दिन व्रत, उपवास रखकर इस पर्व के प्रति अपनी प्रगाढ आस्था दिखाते हैं।

अक्षय तृतीया व्रत, विधि एवं मंत्र:-

यह व्रत जैन परम्परा के अनुसार वैशाख सुदी तीज से प्रारम्भ होता है। उस दिन शुद्धतापूर्वक एकाशन करें या 2 उपवास या 3 एकाशन करें।

इसकी विधि यह है कि व्रत की अवधि में प्रातः नैत्यिक क्रिया से निवृत्त होकर मंदिर जी को जावें। मंदिर जी में जाकर शुद्ध भावों से भगवान की दर्शन स्तुति करें। पश्चात् भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान कर कलशाभिषेक करें। नित्य नियम पूजा भगवान आदि तीर्थंकर (ऋषभदेव) की पूजा एवं पंचकल्याणक का मण्डल जी मंडवाकर मण्डल जी की पूजा करें। तीनों काल (प्रातः, मध्यान्ह, सांय) निम्नलिखित मंत्र जाप्य करें एवं सामायिक करें-

मंत्र – ओम् ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं श्री आदिनाथतीर्थंकराय नमः स्वाहा।

प्रातः सांय णमोकार मंत्र का शुद्धोच्चारण करते हुए जाप्य करें।

व्रत के समय में गृहादि समस्त क्रियाओं से दूर रहकर स्वाध्याय, भजन, कीर्तन आदि में समय यापन करें। दिन भर जिन चैत्यालय में ही रहें। व्रत अवधि में ब्रह्राचर्य से रहें। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों का अणुव्रत रूप से त्याग करें। क्रोध, मान, माया, लोभ कषायों को शमन करें।

व्रत पूर्ण होने पर यथाशक्ति उद्यापन करें। भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा मंदिरजी में भेंट करें तथा मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका चतुर्विध संघ को चार प्रकार का दान देवें। इस प्रकार शुद्धतापूर्वक विधिवत रूप से व्रत करने से सर्व सुख की प्राप्ति होती है तथा साथ ही क्रम से अक्षय सुख अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।


Saturday, May 4, 2019

धर्म सभा समवशरण

🙏 समवशरण के बारे मे, जानते है🙏

*प्रशन---१--*
समवशरण किसे कहते है
उत्तर---- तीर्थंकर भगवान की उपदेश सभा अर्थात धर्मसभा को समवशरण कहते है समता का जहा पर हो अवतरण उसे कहते है समवशरण । जहाँ पर बैठकर तिर्यंच ,मनुष्य ,देव दिव्यध्वनि का श्रवन कर सुख -- शान्ति का अनुभव करते है और वर्तमान, भूत व भविष्य को जानते है ,देखते है ,उसे समवशरण कहते है।

*प्रशन--२--*
समवशरण मे कितने भवो के बारे मे देखा व जाना जा सकता है ?

उत्तर---- समवशरण मे स्थित जीव तीन भूतकाल के ,तीन भविष्य काल के और एक वर्तमान भव को भामण्डल मे दर्पण की भाति देखकर जान सकता है भगवान से पूछने पर अनेक भवो के बारे मे ग्यान प्राप्त कर सकता है।

 *प्रशन--३--*
समवशरण की रचना कब होती है ?

उत्तर---- जब तीर्थंकर को तपस्या के पश्चात केवलग्यान प्राप्त होता है तब समवशरण की रचना होती है।

*प्रशन--४--*
समवशरण की रचना कहा होती है ?

उत्तर----आकाश मे पृथ्वी से पांच हजार धनुष ( २० हजार हाथ ) की ऊँचाई पर अधर मे समवशरण की रचना होती है।

*प्रशन--५--*
समवशरण की रचना कौन करता है ?
उत्तर---- सौधर्म इंद्र की आग्या से कुबेर विक्रिया के द्वारा सम्पूर्ण तीर्थंकरो के समवशरण की विचित्र रूप से रचना करता

*प्रशन--६--*
समवशरण मे मनुष्य व तिर्यंच कैसे पहुचते है?

उत्तर---- पृथ्वी से लेकर समवशरण तक एक-- एक हाथ की ऊंची ,लम्बी व चौडी स्वर्णमय समवशरण के  चारो ओर  बीस -- बीस हजार सीढिया होती है जिन्हे प्रत्येक प्राणी मात्र 48 मिन्ट से पहले ही चढ़कर पहुच जाता है?

*प्रशन--6--*
समवशरण मे पहुंचने के बाद वहा क्या करते है?

उत्तर---- जो भव्य जीव समवशरण मे प्रवेश करते है वह साक्षात् भगवान के दर्शनों से व उनकी अमृतमय वाणी से नेत्र ,कर्ण व जीवन को सफल करता है ।

*प्रशन--7--*
समवशरण की रचना किस आकार की होती है?

उत्तर---- समवशरण की रचना गोल आकार की होती है।

*प्रशन--8---*
समवशरण मे कितनी भूमिया होती है ?

 उत्तर---- समवशरण मे आठ भूमिया होती है ।

*प्रशन--9--*
समवशरण मे स्थित भूमियो के नाम क्या -- क्या होते है ?

उत्तर---- चैत्य प्रासाद भूमि , खातिका भूमि , लता भूमि ,उपवन भूमि , ध्वजा भूमि , कल्पवृक्ष भूमि , भवन भूमि , और श्री मण्डप भूमि यह आठ प्रकार की भूमिया होती है

*प्रशन--10--*
इन आठ भूमियो मे तीर्थकर भगवान कहां पर विराजमान रहते है ?

 उत्तर---- समवशरण मे जो आठवीं श्री मण्डप भूमि होती है उसके बीचोबीच तीन कटनी से युक्त गन्धकुटी बनी होती है उसमे तीर्थंकर भगवान पद्मासन मे विराजमान होते है ।

 *प्रशन--11--*
समवशरण मे कितनी सभा कहां पर व किस प्रकार लगती है ?

उत्तर---- समवशरण मे श्री मण्डप नामक अष्टम भूमि मे गन्धकुटी के निकट चारो ओर गोलाकार मे बारह सभाएं लगती है ।

*प्रशन--12--*
समवशरण मे कौन जीव कहा तक प्रवेश कर पाते है  ?

 उत्तर---- समवशरण मे अत्यन्त भावुक ,श्रद्धालु व भव्य जीव ही अष्टम भूमि मे प्रवेश कर पाते है ,अन्य जीव प्रारम्भ की सात मनोरम ,मनोरंजक भूमि मे मनोरंजन करते रहते है अष्टम भूमि मे प्रवेश नही कर पाते है ।

*प्रशन--13--*
समवशरण की आठवी भूमि मे अभव्य जीव प्रवेश क्यो नही कर पाते है ?

उत्तर-- समवशरण मे सातवीं भूमि के आगे भव्य कूट नामक स्तूप होते है जिन्हे अभव्य जीव देख नही पाते है और उनके नेत्रो के सामने अंधकार छा जाता है।

*प्रशन--14--*
क्या समवशरण मे मिथ्यादृष्टि जीव सम्यकदर्शन प्राप्त कर सकते है?

उत्तर---- हां , समवशरण की सातवीं भूमि के बाद आठवीं भूमि मे प्रवेश से पहले मानस्तम्भ के दर्शन करने से और पात्रता और योग्यता तैयार हो तो सम्यकदर्शन प्राप्त हो सकता है ।

*प्रशन-15-*
मानस्तम्भ किसे कहते है?
उत्तर---- जिसके देखने मात्र से मान युक्त मिथ्यादृष्टि जीव का अभिमान गलित हो जाता है उसे मानस्तम्भ कहते है ।

*प्रशन--- १६--*
दिव्यध्वनि किसे कहते है ?

उत्तर---- तीर्थकर केवली के सर्वांग से एक विचित्र गर्जना  रूप जो ऊँकार ध्वनि अर्द्ध मागधी भाषा मे खिरती है उसे दिव्यध्वनि कहते है।

*प्रशन-- १७--*
भगवान आदिनाथ जी के समवशरण मे प्रमुख गणधर कौन थे ?

उत्तर---- भगवान् आदिनाथ जी के समवशरण मे प्रमुख गणधर वृषभसेन जी थे ।

 *प्रशन-- १८--*
भगवान् महावीर स्वामी जी के समवशरण मे प्रमुख गणधर कौन थे ?

उत्तर---- भगवान् महावीर स्वामी जी के समवशरण मे प्रमुख गणधर इन्द्रभूति गौतम स्वामी थे
🙏🙏🙏 जय जिनेंद्र 🙏🙏

Sunday, April 21, 2019

सोलह प्रकार की शुद्धि बनाम सोला

सोलह प्रकार की बनाम सोला

सोला का भोजन 
 परमपूज्य मुनिराजों एवं त्यागी व्रतियों के चौको में अक्सर सोला शब्द प्रयोग किया जाता है कई बार जानकारी के अभाव में सोला शब्द एक रूढ़िवादी परम्परा सा लगने लगता है।
लेकिन सोला को सोला क्यों कहा जाता है आइये हम इस पर जैन आगम का सामान्य जानकारी देने वाली यह ज्ञान वर्धक पोस्ट का स्वाध्याय करे।

 भोजन निर्माण संबंधी सोलह नियम -
भोजन निर्माण प्रक्रिया के सोलह नियम चार वर्गों में विभाजित हैं । 
१ द्रव्य शुद्धि २ क्षेत्र शुद्धि ३ काल शुद्धि ४ भाव शुद्धि 

             द्रव्य शुद्धि -
अन्न शुद्धि - खाद्य सामग्री सड़ी गली घुनी एवं अभक्ष्य न हो । 
जल शुद्धि - जल जीवानी किया हुआ और प्रासुक हो । 
अग्नि शुद्धि -ईंधन देखकर शोध कर उपयोग किया गया हो । 
कर्त्ता शुद्धि -भोजन बनाने वाला स्वस्थ हो , स्नान करके धुले शुद्ध वस्त्र पहने हो , नाखून बडे न हो , अंगुली वगैरह कट जाने पर खून का स्पर्श खाद्य वस्तु से न हो , गर्मी में पसीने का स्पर्श न हो या पसीना खाद्य वस्तु में ना गिरे ।  

             क्षेत्र शुद्धि -
प्रकाश शुद्धि -रसोई में समुचित सूर्य का प्रकाश रहता है । 
वायु शुद्धि - रसोई में शुद्ध हवा का संचार हो । 
स्थान शुद्धि -रसोई लोगों के आवागमन का सार्वजनिक            स्थान  न हो एवं अधिक अंधेरे वाला स्थान न हो । 
दुर्गंध शुद्धि - हिंसादि कार्य न होता हो , गंदगी से दूर हो । 

              काल शुद्धि -  
ग्रहण काल - चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के काल में भोजन न बनाया जाय । 
शोक काल -शोक दुःख अथवा मरण के समय भोजन न बनाया जाय ।  
रात्रि काल - रात्रि के समय भोजन नहीं बनाना चाहिए । 
प्रभावना काल - धर्म प्रभावना अर्थात् उत्सव काल के समय भोजन नहीं बनाना चाहिए । 

                  भाव शुद्धि -
वात्सल्य भाव -पात्र और धर्म के प्रति वात्सल्य होना चाहिए । 
करुणा भाव - सब जीवों एवं पात्र के ऊपर दया का भाव रखना चाहिए । 
विनय भाव - पात्र के प्रति विनय का भाव होना चाहिए । 
दान भाव - दान करने का भाव रहना चाहिए ।  
इस तरह ये सोलह प्रकार की शुद्धि रखकर (आहार)भोजन का निर्माण करके उत्तम मध्यम जघन्य पात्रों को ग्रहण कराना उसके उपरांत त्यागी व्रती और स्वयं को ग्रहण करना । इसे ही सामान्य बोलचाल की भाषा में सोला कहा जाता है।

Wednesday, February 20, 2019

वर्ण व्यवस्था

वर्ण वयवस्था
उच्चता व नीचता में गुणकर्म व जन्म की कथंचित्‌ प्रधानता व गौणता
कथंचित्‌ गुणकर्म की प्रधानता
कुरल/९८/३ कुलीनोऽपि कदाचारात्‌ कुलीनो नैव जायते । निम्नजोऽपि सदाचारान्‌ न निम्नः प्रतिभासते ।३।
🍹अर्थ:- उत्तम कुल में उत्पन्न होने पर भी यदि कोई सच्चरित्र नहीं है तो वह उच्च नहीं हो सकता और हीन वंश में जन्म लेने मात्र से कोई पवित्र आचार वाला नीच नहीं हो सकता ।३ ।

म.पु./७४/४९१-४९५वर्णाकृत्यादिभेदानां देहेऽस्मिन्नप्यदर्शनात्‌ । ब्राह्मण्यादिषु शूद्राद्यैर्गर्भाधानप्रदर्शनात्‌ ।४९१। नास्ति जातिकृतो भेदो मनुष्याणां गवाश्ववत्‌ । आकृतिग्रहणात्तस्मादन्यथा परिकल्प्यते ।४९२। जातिगोत्रादिकर्माणि शुक्लध्यानस्य हेतवः । येषु ते स्युस्त्रयो वर्णाः शेषाः शूद्राः प्रकीर्तिता: ।४९३। अच्छेदो मुक्तियोग्याया विदेहे जातिसंततेः । तद्धेतुनामगोत्राढयजीवाविच्छन्नसंभवात्‌ ।४९४। शेषयोस्तु चतुर्थे स्यात्काले तज्जातिसंततिः । एवं वर्ण विभागः स्यान्मनुष्येषु जिनागमे ।४९५।

🍀अर्थ:-मनुष्यों के शरीरों में न तो कोई आकृति का भेद है और न ही गाय और घोड़े के समान उनमें कोई जाति भेद है, क्योंकि ब्राह्मणी आदि में शूद्र आदि के द्वारा गर्भ धारण किया जाना देखा जाता है । आकृतिका भेद न होने से भी उनमें जाति भेद की कल्पना करना अन्यथा है ।४९१-४९२ । जिनकी जाति तथा कर्म शुक्लध्यान के कारण हैं वे त्रिवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य) कहलाते हैं और बाकी शूद्र कह जाते हैं । (परन्तु यहाँ केवल जाति को ही शुक्लध्यान को कारण मानना योग्य नहीं है -।४९३।
विदेहक्षेत्र में मोक्ष जाने के योग्य जाति का कभी विच्छेद नहीं होता, क्योंकि वहाँ उस जाति में कारणभूत नाम और गोत्र से सहित जीवों की निरन्तर उत्पत्ति होती रहती है ।४९४।

किन्तु भरत और ऐरावत क्षेत्र में चतुर्थ काल में ही जाति की परम्परा चलती है, अन्य कालों में नहीं । जिनागम में मनुष्यों का वर्ण विभाग इस प्रकार बतलाया गया है ।४९५।

गो.क./मू./१३/९ उच्चं णीचं चरणं उच्चं णीचं हवे गोदं ।१३।

🌺अर्थ:-जहाँ ऊँचा आचरण होता है वहाँ उच्चगोत्र और जहाँ नीचा आचरण होता है वहाँ नीचगोत्र होता है ।
ज्ञान, संयम, तप आदि गुणों को धारण करने से ही ब्राह्मण है, केवल जन्म से नहीं ।)
ज्ञान, रक्षा, व्यवसाय व सेवा इन चार कर्मों के कारण ही इन चार वर्णों का विभाग किया गया है।

सा.ध./७/२० ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो भिक्षुश्च सप्तमे । चत्वारोऽगे क्रियाभेदादुक्ता वर्णवदाश्रमाः ।२०।

🍁अर्थ:- जिस प्रकार स्वाध्याय व रक्षा आदि के भेद से ब्राह्मण आदि चार वर्ण होते हैं, उसी प्रकार धर्म क्रियाओं के भेद से ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास ये चार आश्रम होते हैं । ऐसा सातवें अंग में कहा गया है ।

मो.मा.प्र./३/८९/९ कुल की अपेक्षा आपको ऊँचा नीचा मानना भ्रम है । ऊँचा कुल का कोई निन्द्य कार्य करै तो वह नीचा होइ जाय । अर नीच कुलविषै कोई श्लाघ्य कार्य करै तो वह ऊँचा होइ जाय ।

मो.मा.प्र./६/२५८/२ कुल की उच्चता तो धर्म साधनतैं है । जो उच्चकुलविषै उपजि हीन आचरन करै, तौ वाकौ उच्च कैसे मानिये ।.....धर्म पद्धतिविषै कुल अपेक्षा महंतपना नाहीं संभवै है ।
                        

Sunday, February 10, 2019

जैन साधु एवम उनके आचरण को जानिये


साधु परमेष्ठी(मुनिधर्म)

प्रश्न. साधु परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
जो सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान एवं सम्यकचारित्र रूप रत्नत्रयमय मोक्षमार्ग की निरन्तर साधना करते हैं तथा समस्त आरम्भ एवं परिग्रह से रहित होते हैं। पूर्ण नग्न दिगम्बर मुद्रा के धारी होते हैं जो ज्ञान,ध्यान और तप में लीन रहते हैं, उन्हें साधु परमेष्ठी कहते हैं।

प्रश्न. साधु परमेष्ठी के कितने मूलगुण होते हैं ?

साधु परमेष्ठी के २८ मूलगुण होते हैं  - ५ महाव्रत, ५ समिति, ५ इन्द्रिय निरोध, ६ आवश्यक और ७ शेष गुण।

प्रश्न. साधु परमेष्ठी के पर्यायवाची नाम कौन-कौन से हैं ?

श्रमण, संयत, वीतराग, ऋषि, मुनि, साधु और अनगार।
प्रश्न - महाव्रत किसे कहते हैं एवं उसके कितने भेद हैं ?
हिंसादि पाँचों पापों का मन, वचन, काय व कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करना महापुरुषों का महाव्रत है। इसके ५भेद हैं।
१ अहिंसा महाव्रत - छ: काय के जीवों को मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से पीड़ा नहीं पहुँचाना, सभी जीवों पर दया करना, अहिंसा महाव्रत है।

२ सत्य महाव्रत - क्रोध, लोभ, भय, हास्य के कारण असत्य वचन तथा दूसरों को संताप देने वाले सत्य वचन का भी त्याग करना, सत्य महाव्रत है।

३ अचौर्य महाव्रत - वस्तु के स्वामी की आज्ञा बिना वस्तु को ग्रहण नहीं करना, अचौर्य महाव्रत है।

४ ब्रह्मचर्य महाव्रत - जो मन, वचन, काय एवं कृत, कारित, अनुमोदना से वृद्धा, बाला, यौवन वाली स्त्री को देखकर अथवा उनकी फोटो को देखकर उनको माता, पुत्री, बहिन समझ स्त्री सम्बन्धी अनुराग को छोड़ता है, वह तीनों लोकों में पूज्य ब्रह्मचर्य महाव्रत है।

५ परिग्रह त्याग महाव्रत - अंतरंग चौदह एवं बाहरी दस प्रकार के परिग्रहों का त्याग करना तथा संयम, ज्ञान और शौच के उपकरणों में भी ममत्व नहीं रखना, परिग्रह त्याग महाव्रत है।

प्रश्न - समिति किसे कहते हैं एवं उसके कितने भेद हैं ?
‘सम्’अर्थात् सम्यक् ‘इति'अर्थात् गति या प्रवृत्ति को समिति कहते हैं। चलने-फिरने में, बोलने-चालने में, आहार ग्रहण करने में, वस्तुओं को उठाने-रखने में और मल-मूत्र का निक्षेपण करने में यत्न पूर्वक सम्यक् प्रकार से प्रवृत्ति करते हुए जीवों की रक्षा करना, समिति है।
१ - ईर्या समिति - प्रासुक मार्ग से दिन में चार हाथ (छ: फुट) प्रमाण भूमि देखकर चलना, यह ईयर्र समिति है। भूमि देखकर चलने का अर्थ भूमि पर चलने वाले जीवों को बचाकर चलना।

२- भाषा समिति - चुगली, निंदा, आत्म प्रशंसा आदि का परित्याग करके हित, मित और प्रिय वचन बोलना, भाषा समिति है। जैसे-कपड़ा मीटर से नापते हैं और धान्य आदि बाँट से तौलते हैं, वैसे ही नाप-तौल कर बोलना चाहिए अर्थात् हमारे वाक्य ज्यादा लम्बे न हों फिर भी अर्थ ठोस निकले।

३- एषणा समिति - 46 दोष एवं 32 अंतराय टालकर सदाचारी उच्चकुलीन श्रावक के यहाँ विधि पूर्वक निर्दोष आहार ग्रहण करना, एषणा समिति है।

४- आदाननिक्षेपण समिति - शास्त्र, कमण्डलु, पिच्छी आदि उपकरणों को देखकर-शोधकर रखना और उठाना, आदाननिक्षेपण समिति है।
५- उत्सर्ग समिति - जीव रहित स्थान में मल-मूत्र आदि का त्याग करना, उत्सर्ग समिति है।

प्रश्न- पञ्चेन्द्रिय निरोध किसे कहते हैं एवं उसके कितने भेद हैं ?

स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र इन पाँच इन्द्रियों के मनोज्ञ-अमनोज्ञ विषयों में राग-द्वेष का परित्याग करना पञ्चेन्द्रिय निरोध है।
स्पर्शन इन्द्रिय निरोध - शीत-उष्ण, कोमल - कठोर, हल्का - भारी और स्निग्ध - रूक्ष इन स्पर्शन इन्द्रिय के विषयों में राग - द्वेष नहीं करना, स्पर्शनेन्द्रिय निरोध है।

रसना इन्द्रिय निरोध - खट्टा, मीठा, कडुवा, कषायला और चरपरा इन रसना इन्द्रिय के विषयों में राग - द्वेष नहीं करना, रसना इन्द्रिय निरोध है।

घ्राण इन्द्रिय निरोध - सुगंध और दुर्गध इन घ्राण इन्द्रिय के विषयों में राग - द्वेष नहीं करना, घ्राण इन्द्रिय निरोध है।

चक्षु इन्द्रिय निरोध - काला, पीला, नीला, लाल और सफेद इन चक्षु इन्द्रिय के विषयों में राग - द्वेष नहीं करना, चक्षु इन्द्रिय निरोध है।

श्रोत्र इन्द्रिय निरोध - मधुर स्वर, गान, वीणा आदि को सुनकर राग नहीं करना एवं कठोर निंद्य, गाली आदि के शब्द सुनकर द्वेष नहीं करना, श्रोत्र इन्द्रिय निरोध है।

प्रश्न - आवश्यक किसे कहते हैं एवं उसके कितने भेद हैं ?
अवश्य करने योग्य क्रियाएँ आवश्यक कहलाती हैं। साधु को अपने उपयोग की रक्षा के लिए नित्य ही छ: क्रियाएँ करनी आवश्यक होती हैं, उन्हें ही छ: (षट्) आवश्यक कहते हैं।

जो कषाय, राग-द्वेष आदि के वशीभूत न हो वह अवश है। उस अवश का जो आचरण होता है व आवश्यक है, आवश्यक छ: होते हैं।
समता या सामायिक - राग-द्वेष आदि समस्त विकार भावों का तथा हिंसा आरम्भ आदि समस्त बहिरंग पाप कर्मो का त्याग करके जीवन - मरण, हानि - लाभ, सुख - दुःख आदि में साम्यभाव रखना समता या सामायिक है।
स्तुति - २४ तीर्थंकरो के गुणों का स्तवन करना स्तुति है।
वन्दना - चौबीस तिर्थंकरो में से किसी एक की एवं पज्चपरमेष्ठियों में से किसी एक की मुख्य रूप से स्तुति करना वंदना है। यह दिन में तीन बार करते हैं।

प्रतिक्रमण - व्रतों में लगे दोषों की आलोचना करना प्रतिक्रमण है। अथवा ‘‘मेरा दोष मिथ्या हो ' ऐसा कहना प्रतिक्रमण है। ‘तस्स मिच्छा मे दुक्कड”। प्रतिक्रमण भी दिन में तीन बार करते हैं। प्रतिक्रमण सात प्रकार के होते हैं। दैवसिक, रात्रिक, ईर्यापथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, संवत्सरिक (वार्षिक), औतमार्थिक प्रतिक्रमण जो सल्लेखना के समय होता है।

प्रत्याख्यान - आगामी काल में दोष न करने की प्रतिज्ञा करना प्रत्याख्यान है। अथवा सीमित काल के लिए आहारादि का त्याग करना प्रत्याख्यान है।

कायोत्सर्ग - परिमित काल के लिए शरीर से ममत्व का त्याग करना कायोत्सर्ग है। कायोत्सर्ग का अर्थ होता है शिथिलीकरण - रिलेक्सेशन। इससे शरीर की शक्ति शिथिल हो जाएगी एवं आत्मा की शक्ति सक्रिय हो जाएगी।

प्रश्न -  मुनियों के शेष ७ गुण कौन-कौन से हैं ?

अस्नान व्रत - स्नान करने का त्याग, साधु का शरीर धूल, पसीने से लिप्त रहता है, उसमें अनेक सूक्ष्म जीव रहते हैं, उनका घात न हो इससे स्नान नहीं करते हैं।

भूमि शयन - थकान दूर करने के लिए शयन/ सोना आवश्यक है। रात्रि में एक करवट से थोड़ा शयन करने के लिए भूमि, शिला, लकड़ी के पाटे, तृण अर्थात् सूखी घास या चटाई का उपयोग करते हैं। और किसी का नहीं।

अचेलकत्व - वस्त्र, चर्म और पत्ते आदि से शरीर को नहीं ढकना अर्थात् नग्न रहना। दिशाएँ ही जिनके अम्बर अर्थात् वस्त्र हैं, वे दिगम्बर हैं।

केशलोंच - दो माह से चार माह के बीच में प्रतिक्रमण सहित दिन में उपवास के साथ अपने हाथों से सिर, दाढ़ी एवं मूंछों के केशों को उखाड़ना केशलोंच है। दो माह में करना उत्कृष्ट है, चार माह में करना जघन्य है एवं दोनों के बीच में करना मध्यम है।

एक भुक्ती - चौबीस घंटों में मात्र एक बार आहार करना। सूर्योदय के ३ घड़ी के बाद (७२ मिनट) एवं सूर्यास्त से ३ घड़ी पहले। सामायिक का काल छोड़कर शेष काल में ३ मुहूर्त (२ घंटे २४ मिनट) तक आहार ले सकते हैं। (मूला.)

अदंतधावन - अंगुली, नख, दातुन, छाल, मंजन, ब्रुश, पेस्ट आदि से दाँतों के मल का शोधन/ साफ नहीं करना, इन्द्रिय संयम की रक्षा करने वाला अदंतधावन मूलगुण है।

स्थिति भोजन - दीवार आदि का सहारा लिए बिना खड़े होकर आहार करना। खड़े होते समय दोनों पैर के बीच ४ अंगुल का अंतर या पीछे ४ अर्जुल एवं आगे ४ से १२ अंगुल तक का अंतर रह सकता है। (आदि.पु.)

प्रश्न - मुनियों के उत्तर गुण कितने हैं ?
मुनियों के ३४ उत्तर गुण होते हैं। १२ तप और २२ परीषहजय
प्रश्न - क्या आचार्य, उपाध्याय परमेष्ठी के २८ मूलगुण नहीं होते हैं ?
साधु जिन २८ मूलगुणों का पालन करते हैं। उन २८ मूलगुणों का पालन आचार्य, उपाध्याय परमेष्ठी भी करते हैं, किन्तु आचार्य के अतिरिक्त ३६ मूलगुण एवं उपाध्याय के अतिरिक्त २५ मूलगुण होते हैं।
               

जैन धर्म क्या है जानिए


जैन दर्शन /जैन धर्म क्या है ?

जैन दर्शन एक प्राचीन भारतीय दर्शन है। इसमें अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जैन धर्म की मान्यता अनुसार २४ तीर्थंकर समय-समय पर संसार चक्र में फसें जीवों के कल्याण के लिए उपदेश देने इस धरती पर आते है। प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ से क्रमशः पारसनाथ भगवान के पश्चात सदी के ५०० ई॰ पू॰ यानी २५४५ वर्ष पूर्व में अंतिम तीर्थंकर, भगवान महावीर के द्वारा जैन दर्शन का पुनराव्रण (प्रवर्तन)हुआ ।
इसमें कर्मकाण्ड की अधिकता को मिथ्या(गलत) बताया गया इसमें अध्यात्म को प्रधानता दी गई है।
 जैन दर्शन के अनुसार जीव और कर्मो का यह सम्बन्ध अनादि काल से है। जब जीव इन कर्मो को अपनी आत्मा से सम्पूर्ण रूप से मुक्त कर देता हे तो वह स्वयं भगवान(सिद्ध आत्मा) बन जाता है। लेकिन इसके लिए उसे सम्यक पुरुषार्थ करना पड़ता है। यह जैन धर्म की मौलिकता है।

सत्य का मार्ग खोजने वाले 'जैन' शब्द की व्युत्पत्ति ‘जिन’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है- विजेता अर्थात् वह व्यक्ति जिसने इच्छाओं (कामनाओं) , इन्द्रियों
चक्छू इंद्री(आंख), कर्ण इन्द्री(कान), घ्राण इंद्री(नाक),रसना(जिव्हा), स्पर्शन(शरीर) एवं मन पर विजय प्राप्त करके हमेशा के लिए संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त कर ली है। इन्हीं जिनेन्द्र भगवान के उपदेशों को मानने वाले श्रावक जैन तथा उनके सिद्धान्त जैन दर्शन के रूप में प्रख्यात हैं।
जैन दर्शन ‘अर्हत दर्शन’ के नाम से भी जाना जाता है।
जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर (महापुरूष, ईश्वर,भगवान) हुए जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम महावीर (वर्धमान) हुए।
 हमारे कुछ तीर्थकरों के नाम ऋग्वेद में भी मिलते हैं, जिससे हमारी प्राचीनता अन्य संप्रदायों/धर्मों से भी प्राचीन प्रमाणित होती है।
हमारे जैन दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ प्राकृत (मागधी) भाषा में लिखे गये हैं। बाद में कुछ विद्वान आचार्यों और पंडितों ने संस्कृत में भी ग्रन्थों की रचनाएं कीं ।
हमारा संस्कृत भाषा में प्रथम ग्रंथ तत्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र)आचार्य उमस्वामी के द्वारा आज से २ हजार वर्ष पूर्व ईसा की प्रथम शताब्दी में लिखा गया।
यह आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित तत्त्वार्थ सूत्र बड़ा महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
 यह पहला ग्रन्थ है जिसमें संस्कृत भाषा के माध्यम से जैन सिद्धान्तों के सभी अंगों का पूर्ण रूप से वर्णन किया गया है। इसके पश्चात् अनेक जैन विद्वानों ने संस्कृत में व्याकरण, दर्शन, काव्य, स्त्रोत,पूजाएं, नाटक , पुराण आदि की रचना की।
हमारे ग्रंथों में छह द्रव्यों का वर्णन है ।
हमारे ग्रंथो में अहिंसा का सूक्ष्म विवेचन हुआ है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि इसका प्ररूपण(वर्णन) सर्वज्ञ-सर्वदर्शी जिनेन्द्र भगवान (जिनके ज्ञान से संसार की कोई भी बात छुपी हुई नहीं है, अनादि भूतकाल और अनंत भविष्य के ज्ञाता-दृष्टा), वीतरागी (जिनको किसी पर भी राग-द्वेष नहीं है) प्राणी मात्र के हितेच्छुक, अनंत अनुकम्पा युक्त इसे जिनेश्वर भगवंतों द्वारा हुआ है। उनके बताये हुए मार्ग पर चल कर प्रत्येक आत्मा( जीव) अपना कल्याण कर सकती है।

अपने सुख और दुःख का कारण जीव स्वयं है, कोई दूसरा उसे दुखी कर ही नहीं सकता.पुनर्जन्म, पूर्वजन्म, बंध-मोक्ष आदि को भी जैन धर्म मानता है। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और तप ये हमारा मूल लक्षण है।
हमारे ग्रंथों में सात तत्त्वों का वर्णन  है।
जीव
अजीव
आस्रव
बन्ध
संवर
निर्जरा
मोक्ष
जैन धर्म/जैन दर्शन
जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कही हुई वाणी के अनुसार इस संसार को किसी भगवान द्वारा बनाया हुआ स्वीकार नहीं करता है, अपितु शाश्वत (अनादिकालीन) मानता है। जन्म मरण आदि जो भी होता है, उसे नियंत्रित करने वाली कोई सार्वभौमिक सत्ता अथवा कोई व्यक्ति विशेष भगवान आत्मा उसका नियंत्रण नहीं करती है। जीव जैसे कर्म करता है, उन के परिणाम स्वरुप अच्छे या बुरे फलों को भुगतने क लिए वह मनुष्य, नरक देव, एवं तिर्यंच  योनियों में जन्म मरण करता रहता है।

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...