Tuesday, February 8, 2022

नवागढ़

 *नवागढ़ तीर्थक्षेत्र भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर* 

*नवागढ़ की ऐतिहासिकता और पुरा महत्व पर दिल्ली की अर्पिता रंजन  ने की  पीएचडी*

*शोधार्थी ने अपने अनुसंधान में नवागढ़ के बारे में अनेक तथ्य खोजे*

*नवागढ़ में 1959 से अब तक 200 से अधिक  प्रतिमाएं खुदाई में मिलीं*

नवागढ़ में मिले मध्य पाषाण काल के साक्ष्य

*ललितपुर*। जनपद में सुप्रसिद्ध प्रागैतिहासिक दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नवागढ़ विकासखंड महरौनी में स्थित है, प्रागैतिहासिक पुरा सम्पदा सम्पन्न श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नवागढ़ (ललितपुर) आज  प्राचीन संस्कृति एवं इतिहास के केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। सुप्रसिद्ध नवागढ़ जैन तीर्थक्षेत्र क्षेत्र जहां प्राचीन पुरातात्विक संपदा, चंदेल कालीन बावड़ी एवं कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है वहीं   हजारों वर्ष प्राचीन शैलचित्रों की संस्कृति एवं रॉक कट इमेज, चरण चिन्ह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनें हुए हैं। लगातार अन्वेषण से कई विशेष रहस्य निरंतर उदघाटित हो रहे हैं। 

नवागढ़ के पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण धरोहर भवन पुरालेख अनुभाग नई दिल्ली में सहायक अधीक्षण पुरालेखविद पद पर कार्यरत श्रीमती अर्पिता रंजन दिल्ली ने 'नवागढ़ से प्राप्त संस्कृत अभिलेख एवं पुरातात्विक साक्ष्यों का समीक्षात्मक अध्ययन' विषय पर अनुसंधान कार्य कर वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा के मानविकी संकाय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने यह महत्वपूर्ण शोध प्रबंध डॉ. श्रीप्रकाश राय आचार्य एवं अध्यक्ष संस्कृत विभाग वीर कुंवर सिंह विश्विद्यालय आरा के निर्देशन में पूर्ण कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। इस महत्वपूर्ण अनुसंधान पर कार्य करने के लिए शोधार्थी अर्पिता रंजन  अनेकबार नवागढ़ पहुँची जहॉं क्षेत्र के निर्देशक ब्रह्मचारी जयकुमार जी निशांत भैया जी के मार्गदर्शन में साक्ष्य और तथ्य जुटाए।

*विलक्षण है नवागढ़* :    अर्पिता रंजन ने अपने शोध प्रबंध में कहा है कि देश में जैन धर्म के कई क्षेत्र हैं, परंतु नवागढ़ क्षेत्र प्रागैतिहासिक होने के साथ-साथ अन्य कई विशेषताओं वाला है जिसमें अतिशय क्षेत्र के साथ  विशेष राजाओं के शीर्ष ,कप मार्क, शैल चित्र ,साधना शैलाश्रय, गुप्त कालीन उत्कीर्ण कायोत्सर्ग मुद्रा आदि अन्य क्षेत्रों पर दृष्टव्य नहीं होते हैं। इतिहास विधाओं के शोधकर्ताओं लिए पर्यटन , सांस्कृतिक धरोहर, ऐतिहासिक धरोहर एवं बुंदेलखंड की सभ्यता के विकास में रुचि रखने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए नवागढ़ एक विलक्षण तीर्थ,कला तीर्थ, धर्म तीर्थ है जहां उनके अन्वेषण हेतु विशेष सामग्री उपलब्ध है। 

प्रागैतिहासिक नवागढ़ अतिशय क्षेत्र जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरनाथ स्वामी के अतिशय से संपन्न है। यह मूलनायक प्रतिमा खुदाई में प्राप्त हुई थी। नवागढ़ में  हजारों श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए, संयम साधना की वृद्धि करने के लिए एवं अपने जीवन को मंगलमय बनाने के लिए अरनाथ भगवान की अर्चना पूजा करने आते हैं।नवागढ़ क्षेत्र से 3 किलोमीटर पश्चिम में फाइटोन (फाइवस्टोन) पहाड़ी के निकट जैन पहाड़ी पर कच्छप शिला के आधार एवं छत में अंकित शैल चित्रों की श्रंखला जो चितेरों की चंगेर के नाम से प्रसिद्ध है । नवागढ़ को प्रकाश में लाने का कार्य प्रतिष्ठा पितामह श्रद्धेय गुलाब चंद जी पुष्प  जी ने किया था।

*प्राचीन धातु,काष्ठ उपकरण, मृदा शिल्प एवं अनेक कलात्मक सामग्री संग्रहालय में संरक्षित* :

भगवान अरनाथ की 12वीं सदी की प्राचीन खड्गासन 4 फुट -9 इंच ऊंची  अतिशयकारी मूर्ति विराजमान है। विशाल संग्रहालय में पुरातत्त्व विभाग में रजिस्टर्ड शताधिक प्राचीन पुरावशेष को सुरक्षित किया गया है, जिसमें संवत् 1203 के मानस्तम्भ एवं  प्रतिहार कालीन मूर्ति शिल्प के साथ संवत1123,1188,1195,1490,

1548,1880 की मूर्तियां संग्रहालय  मेें हैं। बहुत सी प्राचीन धातु,काष्ठ उपकरण, मृदा शिल्प एवं अनेक कलात्मक सामग्री उपलब्ध है। *नवागढ़ में 1959 से अब तक 200 से अधिक  प्रतिमाएं खुदाई में मिलीं हैं जिनमें 138 का पुरातत्व विभाग झांसी में भी रजिस्ट्रेशन हो चुका है* ।

*सात अध्यायों में विभाजित है अनुसंधान* :

इस महत्वपूर्ण शोध प्रबंध को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिसमें प्रथम अध्याय में भारत का ह्रदय बुंदेलखंड शीर्षक के साथ नवागढ़ के प्राचीनतम स्वरूप एवं ऐतिहासिक परिचय, नवागढ़ का अर्वाचीन स्वरूप, प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर नवागढ़ में गुरुकुल परंपरा, प्रतिमाओं का अध्ययन, बुंदेलखंड एवं नवागढ़ की ऐतिहासिकता आदि पर प्रकाश डाला गया है। द्वितीय अध्याय में नवागढ़ से प्राप्त प्रतिमाओं के अभिलेखों का उद्भव, विकास एवं महत्व को रेखांकित किया है। तृतीय अध्याय में नवागढ़ से प्राप्त अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर सामाजिक एवं धार्मिक परिदृश्य का समीक्षात्मक अध्ययन किया गया है। चतुर्थ अध्याय में नवागढ़ में प्राप्त शैल एवं धातु जैन मूर्तियों का अनुशीलन किया गया है। पंचम अध्याय में प्राप्त शैलोत्कीर्ण चित्रकला का परिचय तथा षष्ठ अध्याय में नवागढ़ में प्राप्त प्राकृतिक शैल गुफाएं एवं पुरा पाषाण कालीन साक्ष्यों का समीक्षात्मक अध्ययन किया गया है। अंतिम सप्तम अध्याय में उपसंहार, संदर्भ ग्रंथ, शोध ग्रंथ के चित्रों की सूची दी गयी है।

इस महत्वपूर्ण श्रमसाध्य अनुसंधान कार्य में शोधार्थी अर्पिता रंजन ने साक्ष्यों के आधार पर नवागढ़ के संबंध में अनेक तथ्यों को उदघाटित किया है।

इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने में क्षेत्र के निर्देशक ब्र. जय निशांत भैया जी नवागढ़ तीर्थक्षेत्र कमेटी के साथ निरंतर प्रयासरत हैं।

*बेमिसाल विरासत की खान है नवागढ़ क्षेत्र* :

 डॉक्टर मारुति नंदन प्रसाद तिवारी सेवानिवृत्त प्रोफेसर काशी हिंदू विश्व विद्यालय वाराणसी, श्री डॉ गिरिराज कुमार सेक्रेटरी रॉक आर्ट सोसायटी आगरा, यशवंत मलैया कोलोराडो  विश्वविद्यालय अमेरिका ने यहां की पुरातात्विक धरोहर को देखते हुए कहा, हमने कई क्षेत्रों पर अन्वेषण किए, जहां जैन मूर्तियां प्राप्त हुई, परंतु नवागढ़ ऐसा विलक्षण क्षेत्र है , जहां जैनमूर्तियां,कलाकृतियां,शैलाश्रय का विशाल भंडार तो है ही यहां की ऐतिहासिकता, पुरा पाषाण कालीन औजार , रॉक कट मार्क, रॉक कट इमेज, शैलचित्र यह बताते हैं कि नवागढ़ केवल धार्मिक क्षेत्र ही नहीं था यहां पुरापाषाण काल 500000 वर्ष पूर्व से संस्कृति के आयाम स्थापित किए गए हैं। इसके विस्तार ,सम्पन्नता, कला वीथिका , विद्या अध्ययन केंद्र गुरुकुल होने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अन्य क्षेत्रों पर ऐसी पुरातात्विक धरोहर देखने को नहीं मिली।

 इतिहासविद एवं पुरातत्वविद के अनुसार नवागढ़ विद्या अध्ययन ,व्यवसाय एवं राजनीतिक नगर था जहां प्राचीनतम संस्कृति का सद्भाव विशेषण प्राप्त हो रहा है।          

बगाज टोरिया पर स्थित चट्टान पर उत्कीर्ण अभिलेख को देखकर कहा जा सकता है कि यहां कोई विशाल उपासना गृह होना चाहिए जो प्राकृतिक प्रकोप से नष्ट हो गया है। इसी टोरिया के पश्चिम में आचार्य शैलाश्रय को उद्घाटित करते हुए साबू पाहल का अभिलेख ,अंबिका एवं चमर धारणी मूर्ति के साथ और भी कलाकृतियां प्राप्त हुई थी, जिनका साक्षी संपूर्ण ग्राम है ।  यहां अत्यंत समृद्ध शाली चित्रांकन रहा होगा। जिसकी कला विशिष्ट रही होगी। वह धरोहर आज रखरखाव के अभाव में नष्ट हो गई है। यह बहुत गंभीरता से विचारणीय है ।

यहाँ खुदाई के दौरान अनेक पुरा महत्त्व के अति प्राचीन ऐतिहासिक तथ्य व साक्ष्य निरन्तर मिल रहे हैं जिन पर लगातार अन्वेषण जारी है।

 क्षेत्र निर्देशक ब्रह्मचारी जय कुमार निशांत ने बताया कि नवागढ़ के अभिलेखों के माध्यम से श्रीमती अर्पिता रंजन जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग लाल किला दिल्ली में कार्यरत हैं, नवागढ़ पर शोध  कार्य किया है। वह अनेकबार इस कार्य के लिए नवागढ़ आयीं ।आप यहां दर्शन हेतु आई थी आपने यहां की धरोहर देखकर इस पर शोध प्रबंध लिखने का संकल्प किया और इस कार्य में संलग्न रहकर अपने आपको धन्य किया।  शोध प्रबंध हेतु डॉक्टर संजय मंजुल, लाल किला दिल्ली , निदेशक सर्वेक्षण विभाग का विशेष सहयोग रहा है , आपके माध्यम से ब्रह्मचारी निशांत जी ने अन्वेषण के कई आयाम स्थापित किए हैं, जिनके बारे में श्रीमती अर्पिता रंजन ने अपने शोध प्रबंध में उल्लेख किया है। 

 *खुदाई में प्राप्त होते हैं पुरा अवशेष* : संत भवन एवं अनुष्ठान मंडप के  निर्माण हेतु किए गए खनन में प्राचीन मृदभांड प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण जनों का कहना है इस प्रकार के पात्र हमने कभी नहीं देखे हैं, इस प्रकार की रचना प्राचीन काल में रही होगी,वर्तमान काल में ऐसा निर्माण नहीं हो रहा है ।नवागढ़ में होने वाले निर्माण कार्य में जो भी खनन हो रहा है उसमें पूर्णत सावधानी रखी जाती रही है , जिससे कोई विशेष कला कीर्ति क्षतिग्रस्त ना हो। डॉ एस के दुबे झांसी के निर्देशानुसार यहां पर जहां भी खनन कार्य होता है उसमें यह सावधानी रखी जाती है। विगत दिनों रूप सिंह गुर्जर के यहां खनन में पार्श्वनाथ भगवान की खंडित प्रतिमा प्राप्त हुई थी,जो  अत्यंत मनोग एवं विलक्षण  प्राचीन है।

नवागढ़ के प्रागैतिहासिक साक्ष्य :

डॉ गिरिराज कुमार जनरल सेकेटरी रॉक आर्ट सोसायटी ऑफ इंडिया आगरा ने इस क्षेत्र के 10 किलोमीटर में स्थित विभिन्न पहाड़ियों का सतत अन्वेषण करते हुए 2 लाख से 5 लाख वर्ष प्राचीन प्री मिडिल एवं पोस्ट मेचुलियन काल के पाषाण के औजार खोज निकाले जो आज भी नवागढ़ के संग्रहालय में संग्रहित हैं।

*लगातार अन्वेषण जारी* सन 2017 से ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत के निर्देशन में नवागढ़ क्षेत्र में लगातार अन्वेषण जारी है, जिसमें प्रोफेसर डॉ मारुति नंदन प्रसाद तिवारी काशी हिंदू विश्वविद्यालय बनारस,डॉ गिरिराज कुमार, राष्ट्रीय सचिव रॉक आर्ट सोसायटी दयालबाग इंस्टीट्यूट आगरा ,डॉ एस,के दुबे झांसी ,नरेश पाठक ग्वालियर, हरि विष्णु अवस्थी टीकमगढ़, डॉ के पी त्रिपाठी टीकमगढ़ के द्वारा विशेष अन्वेषण किया गया ।

*भारतीय सांस्कृतिक पहचान संजोये है नवागढ़*

अन्वेषक दलों के अनुसार  नवागढ़ ऐसा क्षेत्र है जहां जैन मूर्तियों में उपलब्ध अभिलेख के माध्यम से प्राचीनता सिद्ध हो रही है, वही मूर्ति शिल्प के माध्यम से भी यहां के इतिहास के साक्ष्य प्राप्त हो रहे हैं। फाइटोन पहाड़ी के निकट जैन पहाड़ी में स्थित संघ साधना स्थल, गुफाओं में  उकेरी गई आकृति एवं चरण चिन्ह यहां की जैन विरासत का साक्षात्कार कराते हैं। रॉक पेंटिंग, कपमार्ग, हैंगिंग रॉक, बैलेंस रॉक, मैटेलिक साउंड रॉक इसके विशेष पर्यटन स्थल होने का साक्ष्य हैं। भारतीय सांस्कृतिक पहचान संजोये है नवागढ़। नवागढ़ में पिछले वर्ष से गुरुकुलम का भी संचालन एक नया आयाम स्थापित कर रहा है।

क्षेत्र के निर्देशक ब्र. जय निशांत भैया जी, अध्यक्ष सनत एडवोकेट, महामंत्री योगेन्द्र जैन बब्लू , नवागढ़ गुरुकुलम के महामंत्री प्रो. पी.के. जैन, प्रचारमंत्री डॉ. सुनील संचय , वीरचन्द्र नेकोरा,

कोषाध्यक्ष राजकुमार चूना, अशोक मैनवार, सुरेंद्र सोजना, इंजी. शिखरचंद जैन, चंद्रभान जैन, मनीष संजू आदि ने नवागढ़ पर पीएचडी उपाधि प्राप्त करने पर डॉ. अर्पिता रंजन को बधाई, शुभकामनाएं प्रेषित की हैं।

 


*डॉ. सुनील जैन  संचय, ललितपुर*

 प्रचारमंत्री, नवागढ़ क्षेत्र प्रबंधकारिणी कमेटी

9793821108

Sunday, January 9, 2022

भारत मे वंश परंपरा

 यह है  भर राजाओं की विरासत सावलगढ़ या साबलगढ़। इसकी चर्चा हमने अपनी पुस्तक ‘रोहतास का सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास’ में किया है। नयी यात्रा के क्रम में एक बार पुनः यहाँ पहुँचा। उसकी चर्चा यहाँ करना प्रासंगिक समझता हूँ। 

            दुबे की सरैयाँ गाँव के दक्षिण में स्थित पहाड़ी के पूरबी छोर पर उससे अलग एक अन्य पहाड़ी चट्टान है। उसपर एक छोटे गढ़ का अवशेष है। उसे ही सावलगढ़ या साबलगढ़ कहा जाता है। यह गढ़ कैमूर जिला मुख्यालय भभुआ से लगभग 18 कि0मी0 पश्चिम में अवस्थित है। इसको दक्षिण, पूरब और फिर उत्तर से घेरती हुई गेहुअनवाँ नदी बलखाती प्रवाहित होती है। फ्रांसिस बुकानन यहाँ 19 फरवरी 1813 ई0 को अपने सर्वेक्षण के क्रम में आया था। उसने इस गढ़ को ‘सावलगढ़’ कहा है, जबकि मार्टिन ने 1838 ई0 में लंदन से प्रकाशित अपने ‘इस्टर्न इंडिया’ भाग 1 में इस गढ़ को ‘श्यामलगढ़’ लिखा है। बुकानन को उस समय जानकारी मिली थी कि यह भर राजाओं का गढ़ है। वैसे इस क्षेत्र में भर और चेरो जनजाति के राजाओं का ही आधिपत्य था। भर और चेरो अपने को नागवंशी कहते हैं।


                 श्रीमद्भागवत और पद्मपुराण में बताया गया है कि महिर्षि कश्यप की पत्नी दिति से दैत्य,अदिति से आदित्य,विनीता से गरुण और कद्रु से सर्प की उत्पति हुई। नागों में आदि राजा शेषनाग को माना जाता है क्रमशः तक्षक,कार्कोट,धनंजय आदि हुए। 

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वॉल ::श्याम सुंदर तिवारी  जी

               विचारणीय विषय है नाग और नागवंशियों के संबंध का। नाग एक योनि है और नागों के पूजक ही नागवंशी कहलाये। जिस तरह से सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी,अग्निवंशी रहे है। भारत में प्राचीन परंपरा से नागवंशियों का शासन रहा है। नागों का प्राचीनतम वर्णन अथर्ववेद में है जिसमें कई तरह के नाग बताये गये है।


                त्रेतायुग में रावण ने कई नागवंशी राजा को पराजित किया था। मेघनाद की पत्नी सती सुलोचना एक नाग राजकुमारी थी। लक्ष्मण जी स्वयं शेष के अवतार थे। द्वापर में बलराम शेषावतार थे नागवंश का यहाँ भी वर्णन मिलता है। 


             हिमालय पर्वत के पास ही कश्मीर,मेघालय,

नगालैंड आदि में नागवंश के राजाओं का अधिकार रहा है। नागवंशियों में ब्राह्मण,क्षत्रिय, वनवासी सभी रहे है। छत्तीसगढ़ और झारखंड की जनजातियों में कई नागपूजक है अपने को नागवंशी कहते है।


              भारत के पश्चिमोत्तर भाग में रहने वाले ‘तक्षक नागों’ की एक शाखा का द्रविड़ों से मिश्रण हुआ था, जिससे एक नई जाति ‘भर’ के नाम से उद्भूत हुई। राहुल सांकृत्यायन अपनी कहानी ‘सतमी के बच्चे’ में लिखते हैं कि भर बहुत बलशाली थे और महाभारत से पहले पश्चिमी भारत में एक सभ्यता के निर्माता थे। महाभारत काल में इन नाग वंशियों को अर्जुन ने ‘खांडव वन’ से और श्रीकृष्ण ने ‘मथुरा’ से बाहर निकाला था। जन्मेजय ने नाग यज्ञ करके भी इनका संहार किया। इससे भर का पूरब की ओर पलायन को मजबूर हुए। इन भरों की एक शाखा जो गंगा के उत्तरी-पूर्वी भाग में उपहिमालयी क्षेत्र मोरांग में रहती थी, ‘चेरो’ कहलाती थी। ऐतरेयारण्यक में चेरो के लिये ‘चेरपादा’ यानी ‘माननीय चेरो’ का संबोधन है। भर और चेरो काली द्रविड़ प्रजाति के थे। नाग यानी मंगोल प्रजाति के साथ इनका रक्त मिश्रण हुआ। अतः उन्हें आनुवंश वैज्ञानिकों ने ‘अर्ध द्रविड़’ कहा है। आज भी जो भर या चेरो अन्य जातियों से मिश्रित संतति न होकर विशुद्ध हैं, उनकी आँखों के ऊपर किरातों यानी मंगोलों जैसी एक पट्टी भी लटकती हुई देखने को मिलती है। इनकी दाढ़ी और मूँछ में बाल कम होते हैं। खैर! इन नाग वंशियों ने अपना बदला अर्जुन से भी चुकाया और इसी शोक में अर्जुन की मृत्यु भी हुई थी। भर और चेरो दोनों पूरब की ओर चले।


         नागों के राजा तक्षक ने ही तक्षशिला नामक नगर बसाया था जोकि पाकिस्तान में है प्राचीन समय में शिक्षा का केंद्र रहा है। भारत में कार्कोट वंश का भी शासन रहा है। 


          नागों से सम्बंधित नगर,नदी,झीलें, जाति राज्य भी भारत में है जैसे नागोदा, नागपुर और यही नाग नदी, शेषनाग झील कश्मीर में और नागालैंड राज्य। नागा जनजाति नागपूजक है और अपने को नागवंशी कहते है।


            भर जहाँ गंगा के दक्षिणी किनारे से मिर्जापुर होकर कैमूर पहाड़ी के पूर्वी भाग सहसराम तक बस गये वहीं चेरो गंगा के उत्तरी भाग में बनारस में अपना राज्य स्थापित किया। 


                 उत्तर वैदिक भर्ग्य, पालि में भग्ग ओर प्राकृत में भर है। इनका गोत्र भरद्वाज है। यह मूलत: क्षत्रिय हैं और सुंसुमार गिरि चुनार क्षेत्र मे ६-५वी सदी ई पू में इनका गणराज्य था। 


              ईसा से आठवीं सदी पूर्व नागवंशी चेरो वंश में अश्वसेन हुए जिनके पुत्र जैन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ थे। बनारस से चेरो छपरा तक फैले। बाद में चेरो गंगा के दक्षिण में शाहाबाद और मगध तक फैल गये और शबर राजाओं के गढ़ों पर कब्जा जमा लिया। मगध के  ‘शैशुनागवंश’ और ‘हर्यंक’मूलतः चेरो राजवंश ही थे। पुराणों के अनुसार कलयुग में मगध साम्राज्य में शिशुनाग नाम के राजा का वंश सत्तासीन था। गुप्त शासन में समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में नाग राजाओं को पराजित करने का वर्णन मिलता है।


         भर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के पहाड़ी क्षेत्रों में बसे और अपनी स्थिति मजबूत की। पहले ये कलचुरी शासकों के सामंत बने। बी0ए0 स्मिथ (अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया, पृ0 429), आर.बी.रसेल (ट्राइब एंड कास्ट ऑफ सेंट्रल प्रोविंस, भाग 1, पृ0 175) और आर. एस. त्रिपाठी (हिस्ट्री ऑफ कन्नौज, पृ0 19) ने तो यहाँ तक सिद्ध किया है कि गहड़वाल राजपूतों का मूल स्थान मिर्जापुर था और इनके पूर्वज भर थे। गहड़वालों का आदि पूर्वज चंद्रदेव ग्यारहवी सदी के आखिर में राजा बना। गहड़वाल शासकों का शासन बारहवीं सदी तक चलता रहा। मदन पाल देव, विजय चंद्र, जयचंद्र आदि राजाओं का शासन वाराणसी से फैलकर कन्नौज और पूरे उत्तरी भारत पर हो गयौ। शाहाबाद वाराणसी और मिर्जापुर से नजदीक है अतः यहाँ गहड़वाल राजाओं के शिलालेख और ताम्रपत्र मिले हैं। चूँकि कैमूर जिले का यह क्षेत्र और सटा हुआ है अतः भर राजाओं का प्रभाव यहाँ और भी अधिक रहा। वैसे भर इस क्षेत्र में चेरो के आगमन के बाद ही आए हुए जान पड़ते हैं। शाहाबाद के दक्षिणी भाग में चेरो का प्रमुख गढ़ गढ़वट और चौंद (वर्तमान चैनपुर) में था। उत्तरी शाहाबाद में इनके प्रमुख गढ़ देवमार्कण्डेय (काराकाट) के साथ चकई, तुलसीपुर, रामगढ़वा, पीरी, बीरी, जोगीबार, भैरिया और घोषिया, जारन या तारन, महरथा (रामगढ़), रामगढ़ (तिलौथू) आदि में स्थापित हो गया। बुकानन (शाहाबाद, पृ0 144) और मार्टिन, दोनों ने लिखा है कि कर्मनाशा नदी के दोनों ओर उत्तर प्रदेश और बिहार में जितने भी नागवंशी राजपूत हैं वे सभी चेरो जनजातीय लोग हैं। बाद में उन्होंने राजपूत का दर्जा प्राप्त कर लिया। ये अपने को च्यवन ऋषि का वंशज और चौहान राजपूत कहने लगे। (गजेटियर शाहाबाद, पृ0 154) मुस्लिम आक्रमणों के कारण शेष चेरो पलामू में जाकर बसे और वहाँ राज्य स्थापित किया। जैसा कि हमने देखा भर शाहाबाद के दक्षिणी भाग में पहाड़ी पर और उसकी तराई में बसे थे। भर राजाओं के गढ़ों के अवशेष आज भी रघुवीरगढ़, पतेसर, भरारी, रामगढ़, धरहरा, साबलगढ़, उगहनी (चेनारी) आदि जगहों पर मौजूद हैं। भर जनजाति में तीन श्रेणियाँ हैं-राजा, बाबू और राज भर। राज परिवार के राजा होते थे। जमींदारों की श्रेणी बाबू या बाबूआन की है और गरीब तथा सामान्य भर अपने को राज भर कहते हैं। बुकानन के समय भर राजाओं ने अपने को परिहार राजपूत बतलाया था। बुकानन की भेंट कोइंदी गाँव में मंगल सिंह तथा घाटी गाँव में कृपा सिंह, पतेसर में रघुनाथ सिंह जैसे तत्कालीन क्षेत्रीय राजाओं से हुई थी। उन लोगों ने बताया था कि उनके संबंध सभी राजपूत राजपरिवारों में हैं। इस क्षेत्र के सबसे बड़े जमींदार का परिवार जो पूर्व में भर जनजातीय राजपरिवार से था, आज भी बढ़ौना गाँव में निवास करता है। इनके संबंध सभी राजपूतों में होते हैं। आज भी ये अपने को परिहार राजपूत कहते हैं। दक्षिण बिहार में आधुनिक काल तक स्थानीय स्तर पर इनका शासन रहा। कैमूर और रोहतास क्षेत्र में भरों के अनेक ध्वंसावशेष उनकी महानता की कहानी कह रहे हैं। बाद के मुस्लिम आक्रमणों के फलस्वरूप वे कमजोर हुए, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी ये ‘बाबू साहब’ ही कहलाते हैं। 


                   आगे हम भर राजाओं के अन्य गढ़ों की भी चर्चा करेंगे लेकिन अभी हम बात कर रहे हैं साबलगढ़ की। यह गढ़ दुबे की सरैयाँ गाँव के दक्षिण में पहाड़ी के पूरबी छोर पर नीचे में है। यह एक 50-60 फीट ऊँचा टीला है। पहाड़ी और टीले के बीच से सड़क जो नयी बनी हुई है, गुजर रही है। इस टीले का क्षेत्रफल लगभग 4 एकड़ है। इसपर कुछ लोग अपना घर बना चुके हैं। इसके कुछ भाग में खेती भी की जा रही है। इसके चारों ओर ध्वंसित अवशेष बिखरे पड़े हैं। गाँव वाले इसे कि़ला कहते हैं। इसपर बसने वालों ने बताया कि खुदाई करने पर पत्थर की बहुत मोटी लगभग 8 फीट चौड़ी दीवारें निकलती हैं। आज यहाँ देखने लायक कुछ भी नहीं है। यहाँ से थोड़ी दूरी पर पहाड़ी के उत्तर में एक मैदान है। इस मैदान का नाम ‘हुमायूँ मर्दन’ मैदान है। हमें नहीं पता कि इसका यह नाम क्यों पड़ा? बाद में यह विचारणीय होगा।

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वॉल: श्री श्याम सुंदर तिवारी जी

Thursday, December 30, 2021

यूरिया की जगह खेती में दही का उपयोग करे

 2 किलो दही 25 किलो यूरिया के बराबर करता है काम! 

🙏🙏 Mor Dairy Farm (एक नई सोच)  🙏🙏

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हाल के दिनों में यूरिया की किल्लत से परेशानी की खबर देश के हर जिले से आ रही है। घंटों मशक्कत के बाद भी किसानों को 1-2 बोरी यूरिया मिलने में परेशानी आ रही है। इस तरह के परेशानियों का सामना करने वाले सभी किसान भाइयों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है।

दरअसल खेती में दही का उपयोग करके आप यूरिया सहित अन्य उर्वरकों का दाम बचा सकते हैं।


दही का उपयोग करने के कई लाभ हैं।

 दही के उपयोग से खेती से लागत का 95 प्रतिशत बचता है और कृषि उत्पादन में कम से कम 15 प्रतिशत की वृद्धि होती है। दही के फायदों को देखकर, कई किसानों ने इसकी ओर रुख किया है। खासकर जब से इसका प्रयोग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और गुजरात के कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा किया गया है।  दही का उपयोग अब खेत में किया जा रहा है। 


पानी की बचत

अगर आप अपने खेतों में दही का उपयोग करते हैं तो

15 दिनों तक सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए यह प्रति एकड़ 1000 रुपये बचाता है। रासायनिक उर्वरक की प्रति एकड़ लागत रु 1100 है, लेकिन दही की कीमत 110 रुपये प्रति 2 किलो दूध है। कीटनाशकों पर 1500 रुपये प्रति एकड़ खर्च नहीं होता है। इस प्रकार, एक को प्रति एकड़ 3600 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन केवल 155 रुपये की मामूली लागत पर दहीं से काम चलता है।


दही कैसे बनाये

दही बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन में देशी गाय का दो लीटर दूध डालें। दो किलो दही में एक तांबे का टुकड़ा या एक तांबे का चम्मच डुबोएं और इसे 8 से 15 दिनों के लिए ढककर छाया में रखें। इसमें हरे रंग का तार होगा। तांबे या पीतल को धोकर दही में मिलाएं। 5 लीटर मिश्रण बनाने के लिए दो किलो दही में 3 लीटर पानी मिलाएं। एक एकड़ में एक पंप द्वारा पानी का छिड़काव किया जाता है। फिर 1 एकड़ में फसल पर पानी छिड़का जाता है। ऐसा करने से पौधे 25 से 45 दिनों तक हरे रहेंगे। नाइट्रोजन की अब जरूरत नहीं है,फसल हरी हो जाएगी।


2 किलो दही से 25 किलो यूरिया बचता है

उत्तर बिहार में 1 लाख किसान यूरिया की जगह दही का इस्तेमाल करते हैं। अनाज, सब्जी और बागों के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है। 30 मिलीलीटर दही का मिश्रण एक लीटर पानी में डाला जाता है। दिल्ली के आसपास, 9 साल से यूरिया के बजाय दही का उपयोग किया जाता है।


सभी फसलों में उपयोगी

यह सभी प्रकार की फसलों जैसे मक्का, गेहूं, आम, केला, सब्जियां, लीची, धान, गन्ना पर छिड़का जा सकता है।


गार्डन

बगीचे में फूल आने से 25 दिन पहले दही पानी का उपयोग किया जाता है। यह बगीचों को फास्फोरस और नाइट्रोजन प्रदान करता है। फसल पर जैविक पदार्थ तैयार हो जाएगा। सभी फल एक समान आकार के होते हैं।


जहरीला मक्खन

छाछ से निकलने वाला मक्खन किट नियंत्रक के रूप में काम करेगा। जहरीले मक्खन में वर्मीकम्पोस्ट डाल कर पौधे की जड़ों में रगड़ें। कीड़े और कीट चले जाएंगे। विषाक्त पदार्थों के बारे में पता होना महत्वपूर्ण है।


निस्संक्रामक

अगर ये किसान इसमें दही के अलावा मेथी का पेस्ट या नीम का तेल मिलाते हैं और इसे कीटनाशक के रूप में स्प्रे करते हैं, तो फसल को फंगस नहीं लगेगा। ऐसा करने से नाइट्रोजन प्रदान करता है, कीटों को समाप्त करता है और अनुकूल कीटों से बचाता है।


मिट्टी में खाद

दही का उपयोग मिट्टी में भी किया जा सकता है। 2 किलो दही प्रति एकड़ के हिसाब से लगायें। मिट्टी में माइक्रोबियल दर अधिक है। ऐसा करने से सभी फसलों में उत्पादन 25-30 प्रतिशत बढ़ सकता है। दही का उपयोग पंचगव्य में किया जाता है।


पानी की खपत कम हो जाती है

गर्मी में दही में 300 ग्राम और पानी में 300 ग्राम सेंधा नमक मिलाकर 300 ग्राम सेंधा नमक छिड़कने से फसल को 15 दिनों तक पानी की जरूरत नहीं होती है।


कृषि अनुसंधान संस्थान

जैसा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मार्च 2017 में इस नवाचार को मान्यता दी थी, मुजफ्फरपुर के किसानों को दही की खेती करके सम्मानित किया गया था।


भारत में, सालाना 500 लाख टन उर्वरक का उपयोग किया जाता है। उपर के अनुभव किसानो का है। कृषि अधिकारी से जानकर ही इसे उपयोग करना चाहीए।


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Wednesday, December 29, 2021

योग एवं रोग से सम्बंधित 100 महत्वपूर्ण जानकारियां

 *योग की कुछ 100 जानकारी जिसका ज्ञान सबको होना चाहिए*


1. योग, भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।

2. *लकवा* - सोडियम की कमी के कारण होता है।

3. *हाई वी पी में* -  स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे।

4. *लो बी पी* - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें।

5. *कूबड़ निकलना*- फास्फोरस की कमी।

6. *कफ* - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है, फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है। गुड व शहद खाएं‌।

7. *दमा, अस्थमा* - सल्फर की कमी।

8. *सिजेरियन आपरेशन* - आयरन , कैल्शियम की कमी।

9. *सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें*।

10. *अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें*।

11. *जम्भाई*- शरीर में आक्सीजन की कमी।

12. *जुकाम* - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पिये।

13. *ताम्बे का पानी* - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें।

14.  *किडनी* - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये।

15. *गिलास* एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है। गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें,  लोटे का कम  सर्फेसटेन्स होता है।

16. *अस्थमा, मधुमेह, कैंसर* से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं।

17. *वास्तु* के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा।

18. *परम्परायें* वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं।

19. *पथरी* - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है।

20. *RO* का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता। कुएँ का पानी पियें। बारिस का पानी सबसे अच्छा, पानी की सफाई के लिए *सहिजन* की फली सबसे बेहतर है।

21. *सोकर उठते समय* हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का *स्वर* चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें।

22. *पेट के बल सोने से* हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है। 

23.  *भोजन* के लिए पूर्व दिशा, *पढाई* के लिए उत्तर दिशा बेहतर है।

24.  *HDL* बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा।

25. *गैस की समस्या* होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें।

26.  *चीनी* के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है, यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से *पित्त* बढ़ता है। 

27.  *शुक्रोज* हजम नहीं होता है *फ्रेक्टोज* हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है।

28. *वात* के असर में नींद कम आती है।

29.  *कफ* के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है।

30. *कफ* के असर में पढाई कम होती है।

31. *पित्त* के असर में पढाई अधिक होती है।

33.  *आँखों के रोग* - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा, आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है।

34. *शाम को वात*-नाशक चीजें खानी चाहिए।

35.  *प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए।* 

36. *सोते समय* रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है।

37. *व्यायाम* - *वात रोगियों* के लिए मालिश के बाद व्यायाम, *पित्त वालों* को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए। *कफ के लोगों* को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए।

38. *भारत की जलवायु* वात प्रकृति की है, दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए।

39. *जो माताएं* घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं।

40. *निद्रा* से *पित्त* शांत होता है, मालिश से *वायु* शांति होती है, उल्टी से *कफ* शांत होता है तथा *उपवास* ( लंघन ) से बुखार शांत होता है।

41.  *भारी वस्तुयें* शरीर का रक्तदाब बढाती है, क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है।

42. *दुनियां के महान* वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों। 

43. *माँस खाने वालों* के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं।

44. *तेल हमेशा* गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का, दूध हमेशा पतला पीना चाहिए।

45. *छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है।* 

46. *कोलेस्ट्रोल की बढ़ी* हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है। ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है।

47. *मिर्गी दौरे* में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए। 

48. *सिरदर्द* में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें।

49. *भोजन के पहले* मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है। 

50. *भोजन* के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें। 

51. *अवसाद* में आयरन, कैल्शियम, फास्फोरस की कमी हो जाती है। फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है 

52.  *पीले केले* में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है। हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है। हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है।

53.  *छोटे केले* में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है।

54. *रसौली* की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं।

55.  हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है।

56. *एंटी टिटनेस* के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे।

57. *ऐसी चोट* जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें। बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें। 

58. *मोटे लोगों में कैल्शियम* की कमी होती है अतः त्रिफला दें। त्रिकूट ( सोंठ+ कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं।

59. *अस्थमा में नारियल दें।* नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है। दालचीनी + गुड + नारियल दें।

60. *चूना* बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है। 

61.  *दूध* का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है।

62.  *गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है।* 

63.  *जिस भोजन* में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए। 

64.  *गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें।*

65.  *गाय के दूध* में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है।

66.  *मासिक के दौरान* वायु बढ़ जाता है, 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है। दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें।

67. *रात* में आलू खाने से वजन बढ़ता है।

68. *भोजन के* बाद बज्रासन में बैठने से *वात* नियंत्रित होता है।

69. *भोजन* के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए। बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा।

70. *अजवाईन* अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है 

71. *अगर पेट* में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें।

72. *कब्ज* होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए।

73. *रास्ता चलने*, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए। 

74. *जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है।* 

75.  *बिना कैल्शियम* की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है।

76. *स्वस्थ्य व्यक्ति* सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है।

77. *भोजन* करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है।

78. *सुबह के नाश्ते* में फल, *दोपहर को दही* व *रात्रि को दूध* का सेवन करना चाहिए। 

79. *रात्रि* को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए। जैसे - दाल, पनीर, राजमा, लोबिया आदि। 

80.  *शौच और भोजन* के समय मुंह बंद रखें, भोजन के समय टी वी ना देखें। 

81. *मासिक चक्र* के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान, व आग से दूर रहना चाहिए।

82. *जो बीमारी जितनी देर से आती है, वह उतनी देर से जाती भी है।*

83. *जो बीमारी अंदर से आती है, उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए।*

84. *एलोपैथी* ने एक ही चीज दी है, दर्द से राहत। आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी, लीवर, आतें, हृदय ख़राब हो रहे हैं। एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है। 

85. *खाने* की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए, ब्लड-प्रेशर बढ़ता है। 

86 .  *रंगों द्वारा* चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें, पहले जामुनी, फिर नीला.... अंत में लाल रंग। 

87 . *छोटे* बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए, क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है, स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए। 

88. *जो सूर्य निकलने* के बाद उठते हैं, उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है, क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है।

89.  *बिना शरीर की गंदगी* निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है, मल-मूत्र से 5%, कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं। 

90. *चिंता, क्रोध, ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज, बबासीर, अजीर्ण, अपच, रक्तचाप, थायरायड की समस्या उतपन्न होती है।* 

91.  *गर्मियों में बेल, गुलकंद, तरबूजा, खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली, सोंठ का प्रयोग करें।*

92. *प्रसव* के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है। बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती  है।

93. *रात को सोते समय* सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा।

94. *दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं, हमें उपयोग करना आना चाहिए*।

95. *जो अपने दुखों* को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है, वही मोक्ष का अधिकारी है। 

96. *सोने से* आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है, लकवा, हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है। 

97. *स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है*। 

98 . *तेज धूप* में चलने के बाद, शारीरिक श्रम करने के बाद, शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है। 

99. *त्रिफला अमृत है* जिससे *वात, पित्त, कफ* तीनो शांत होते हैं। इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना।  देशी गाय का घी, गौ-मूत्र भी त्रिदोष नाशक है‌

100. इस विश्व की सबसे मँहगी *दवा लार* है, जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है, इसे ना थूके।


डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

Monday, December 27, 2021

मैथी और अजवायन के पानी के लाभ

 मेथी और अजवाइन का पानी पीने से सेहत को मिलते हैं ये 5 फायदे, जानें बनाने का तरीका

methi ajwain water: मेथी और अजवाइन पोषक तत्वों से भरपूर होता है। आप इन दोनों का पानी पीकर कई समस्याओं को दूर कर सकते हैं। 


Methi and Ajwain Water Benefits in Hindi: अगर आप हेल्दी मॉर्निग ड्रिंक के बारे में सोच रहे हैं, तो मेथी और अजवाइन का पानी फायदेमंद हो (healthy morning drink) सकता है। इस पानी को सुबह खाली पेट पीने से स्वास्थ्य समस्याएं दूर होने लगती हैं। अजवाइन और मेथी का पानी वजन कम करने, कब्ज को ठीक करने में लाभकारी होता है। इसके अलावा इस पानी को पीने से शरीर की रोग प्रतिरोधक (methi ajwain water for immunity) क्षमता भी बढ़ती है। जानें मेथी और अजवाइन का पानी पीने से होने वाले फायदे-


अजवाइन मेथी का पानी कैसे बनाये? (how to make ajwain methi water)

अगर आप रोज सुबह खाली पेट अजवाइन मेथी का पानी पीना चाहते हैं, तो आपको तैयारी रात को ही करनी पड़ेगी। इसके लिए 1 चम्मच अजवाइन और 1 चम्मच मेथी दाना रात को एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को छानकर खाली पेट पी जाएं। इस पानी को रोज पीने से वजन घटाने में मदद मिलती है। 


मेथी और अजवाइन की तासीर गर्म होती है, इसलिए सर्दियों में इस पानी को पीने से शरीर में गर्माहट भी बनी रहती है। इनकी तासीर गर्म होने की वजह से पित्त प्रकृति के लोगों को इसका सेवन डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए।


मेथी अजवाइन का पानी पीने के फायदे (methi ajwain water benefits)

मेथी अजवाइन का पानी पाने से सेहत को कई फायदे मिलते हैं। मेथी में प्रोटीन, वसा, कैल्शियम, आयरन, फाइबर, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, जिंक, कार्बोहाइड्रेट, एंटीऑक्सीडेंट, एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। इसके अलावा अजवाइन में प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और निकोटिनिक एसिड पाया जाता है। मेथी अजवाइन खाने से आप अपनी कई समस्याओं को दूर कर सकते हैं। जानें मेथी और अजवाइन का पानी पीने के फायदे (methi ajwain water benefits)-


वजन कम करे मेथी अजवाइन का पानी (methi ajwain water for weight loss)

मेथी अजवाइन का पानी वजन कम करने के लिए बेहतरीन घरेलू उपाय के तौर पर कार्य करता है। दरअसल, मेथी और अजवाइन में एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो मेटाबॉलिज्म को मजबूत बनाते हैं। इसके साथ ही मेथी अजवाइन का पानी फैट बर्न करता है। अगर आप वजन कम करना चाहते हैं, तो इसे अपनी मॉर्निग ड्रिंक में शामिल कर सकते हैं। यह वेट लॉस ड्रिंक (weight loss drink) का काम करता है।


2. कब्ज से राहत दिलाए मेथी अजवाइन का पानी (how to get rid from constipation in hindi)

अगर आपको गैस, कब्ज और अपच की समस्या रहती है, तो सुबह खाली पेट मेथी अजवाइन का पानी पानी (methi aur ajwain ka pani) पी सकते हैं। इस पानी को पीने से बॉडी डिट्रॉक्स होती है। अजवाइन और मेथी में फाइबर होता है, जो कब्ज से राहत दिलाता है। वहीं इनमें मौजूद पोषक तत्व गैस निकालने में भी मदद करता है। इस डिटॉक्स ड्रिंक को अपनी डाइट में जरूर शामिल करें। इससे शरीर में जमा गंदगी, अपशिष्ट पदार्थ आसानी से निकल जाएंगे। इससे मतली जैसी समस्या भी ठीक होती है।


ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल करे (Control blood sugar level)

अस्वस्थ खान-पान और इनएक्टिव लाइफस्टाइल डायबिटीज का कारण बनता जा रहा है। आजकल अधिकतर लोगों को डायबिटीज है। अगर आपका ब्लड शुगर लेवल कंटोल में नहीं रहता है, तो आप मेथी अजवाइन का पानी पी सकते हैं। इससे शरीर में शुगर लेवल को कंट्रोल रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा यह बैड कोलेस्ट्रॉल को भी कम करता है।


इसे भी पढ़ें - मेथी की चाय पीने से कम होगा बलगम, फेफड़ों (लंग्स) को हेल्दी रखने के तरीके जानें Luke Coutinho से


4. तनाव दूर करे मेथी अजवाइन का पानी

आजकल अधिकतर लोग तनाव, चिंता और एंग्जायटी का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही बॉडी स्ट्रेस भी एक समस्या है। अगर आप भी स्ट्रेस फील करते हैं, तो सुबह खाली पेट मेथी और अजवाइन का पानी पी सकते हैं। इस पानी में फाइबर, मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व होते हैं।


5. इम्यूनिटी बढ़ाए मेथी अजवाइन का पानी (methi ajwain water to boost your immunity)

मेथी और अजवाइन के पानी में विटामिन सी, आयरन, जिंक, एंटीऑक्सीडेंट और कैल्शियम भरपूर मात्रा में होता है। ऐसे में आप इस ड्रिंक को इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए भी पी सकते हैं। सर्दी में खाली पेट मेथी अजवाइन का पानी पीने (methi aur ajwain ka pani) से सर्दी, खांसी और जुकाम ठीक होता है। मेथी और अजवाइन का पानी इम्यूनिटी बढ़ाने का अच्छा उपाय है।


मेथी अजवाइन का पानी इम्यूनिटी बढ़ाने और ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने के साथ ही त्वचा के लिए भी फायदेमंद होता है। रोज इस ड्रिंक को पीने से रक्त साफ होता है। इसे पीने से कील-मुहांसे दूर होते हैं। झुर्रियों भी ठीक होती है।

Monday, December 20, 2021

मैथी दाना के फायदे

 *मेथी के बीज बढ़ा सकते हैं टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन, डॉक्टर से जानें पुरुषों के लिए इसे खाने के 5 फायदे*


पौष्टिक तत्वों से भरपूर न केवल खाने का स्वाद बढ़ाती है बल्कि इसका सेवन टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन लेवल भी बढ़ाता है। जानते हैं इसके अन्य लाभ।


पुरुषों के लिए मेथी के बीज के 5 फायदे-Fenugreek seeds benefits for men

1. स्पर्म क्वालिटी और वॉल्यूम को बढ़ाने में सहायक (Sperm Quality Gets Improve) 

स्पर्म और टेस्टोस्टेरॉन दोनों का उत्पादन पुरुष की टेस्टिकल द्वारा होता है। इसलिए इन दोनों में भी एक संबंध है। मेथी के बीजों का सेवन करने से स्पर्म क्वालिटी में भी सुधार आता है और इसकी वॉल्यूम भी बढ़ाता है। साथ ही लो टेस्टोस्टेरॉन लेवल में भी बढ़ोतरी होती है।


2. ब्लड शुगर लेवल नियंत्रण (Controls Blood Sugar)

मेथी के बीजों का सेवन करने से ब्लड शुगर लेवल में स्थिरता आती है जो इसे डायबिटिक लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प बनाता है। ब्लड ग्लूकोज लेवल में भी मेथी के बीजों का सेवन करने से कमी देखने को मिली है। रेड ब्लड सेल्स के सर्कुलेशन में भी मेथी के बीज अहम भूमिका निभाते हैं।


3. मूड और एनर्जी बूस्टर (Improves Mood)

कई बार लो टेस्टोस्टेरॉन लेवल के कारण भी मूड स्विंग अधिक होते रहते हैं। मूड हमेशा चिड़चिड़ा और खराब रहता है। साथ ही एनर्जी में भी थोड़ी कमी महसूस होती है। मेथी के बीजों का सेवन करने से आपकी इमोशनल सेहत काफी अच्छी रहती है और इससे आपके हार्मोन्स में संतुलन पैदा होता है जिस कारण आपका मूड अच्छा रहता है।


4.बाल बढ़ाने में फायदेमंद (Good For Hair Health)

जब पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन लेवल कम होने लगते हैं तो उनके सिर से बाल उड़ना शुरू हो जाते हैं और बहुत से पुरुषों में तो गंजेपन का भी यही कारण होता है। मेथी के बीजों से यह प्रभाव कम हो सकता है और आपके हेयर फॉलिकल भी मजबूत हो सकते हैं। इस प्रकार के उम्र बढ़ने से जुड़े लक्षणों में मेथी के बीजों का सेवन करने से राहत पाई जा सकती है।


. स्ट्रेंथ और मसल मास बढ़ाता है (Increases Muscle Mass)

जिन पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन लेवल कम होता है उनका फिटनेस लेवल भी कम होना शुरू हो जाता है। इसी वजह से उनका मसल मास भी काफी कम होना शुरू हो जाता है। मेथी के बीजों का सेवन करने से आपके शरीर में टेस्टोस्टेरॉन लेवल बढ़ते हैं। जिससे आपका मसल मास भी बढ़ता है और आपके शरीर में मजबूती भी आती है।


5.मेथी के बीजों से मोटापा बढ़ने से भी बचा जा सकता है। हालांकि मेथी के बीजों का सेवन करने से कुछ लोगों को पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं होने लग जाती हैं। इसलिए आपको अपने डॉक्टर से राय लेकर ही इनका सेवन करना चाहिए और गर्भवती महिलाओं को मेथी के बीजों को अवॉइड करना चाहिए।

Friday, October 29, 2021

राहु के साथ अन्य ग्रहों की युति का फल

 वैवाहिक जीवन को प्रभावित करने वाले योग


1. चन्द्र +राहू युति होतो - मानसिक चिंता , पति / पत्नी की मानसिक स्थिति में असंतुलन होता है।


2. मंगल+राहू की युति से - अड़ियल स्वभाव अथवा एक दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाना।


3. शुक्र +राहू की युति से - जातक के पत्नी के अलावा अन्य स्त्री से सम्बन्ध के कारण अथवा माता-पिता की इच्छा के बिना विवाह कारण तलाक।


4. सूर्य+राहू - पति, पत्नि के पद , ओहदे अथवा आर्थिक स्थिति को लेकर मतभेद , तथा तलाक की नौबत


5. शनि +राहू - एक दूसरे से अलग रहने के कारण , अशांति तथा तलाक।


6. बुध+राहू -दिमागी सोच में असमानता के कारण अशांति तथा तलाक।

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...