Thursday, January 26, 2023

सूर्य ग्रह और बारह भाव फल



जानिए कुंडली के अलग-अलग भावों में सूर्य शुभ और अशुभ प्रभाव


डिजिटल डेस्क ।  सूर्य के सभी 12 भाव में शुभ अशुभ फल कैसे होते हैं और अशुभ फल के क्या उपाय करने चाहिए? ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को राजा मना जाता है। ज्योतिष में सूर्य आत्मा एवं पिता का करक होता है। सूर्य से ही सभी ग्रहों को प्रकाश प्राप्त होता है और ग्रहों की इनसे दूरी या नजदीकी उन्हैं अस्त भी कर देती है। सूर्य सृष्टि को चलाने वाले प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले देवता हैं। कुंडली में सूर्य को पितृ का करक भी माना जाता है। सूर्य पर कुंडली में एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर उस कुंडली में पितृ दोष बन जाता है। जातक की आजीविका में सूर्य सरकारी पद का भी प्रतिनिधित्व करता है।


सूर्य प्रधान कुण्डली वाला जातक कार्यक्षेत्र में कठोर अनुशासन अधिकारी, उच्च पद पर आसीन अधिकारी, प्रशासक, समय के साथ-साथ उन्नति करने वाला, निर्माता, किसी कार्य का निरीक्षण करने वाला बनता है। बारह राशियों में से सूर्य मेष, सिंह तथा धनु में स्थित होकर विशेष रूप से बलवान होता है तथा मेष राशि में सूर्य को उच्च का माना जाता है। मेष राशि के अतिरिक्त सूर्य सिंह राशि और धनु राशि में भी बली हो जाता हैं। यदि जातक की कुंडली में सूर्य बलवान तथा किसी भी अशुभ ग्रह के प्रभाव से दूर है तो ऐसे जातक को जीवन में बहुत कुछ प्राप्त होता है और उसका स्वास्थ्य भी उत्तम रहता है। कुण्डली में सूर्य के बलवान होने से जातक शारीरिक रूप से बहुत चुस्त-दुरुस्त होता है।


कुंडली के प्रथम भाव लग्न में सूर्य होने पर  


कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य शुभ फल देने वाला होता है। पहला घर सूर्य का ही होता है, इसलिए सूर्य का इस भाव में होना बहुत शुभकारी मना जाता है। ऐसा जातक धार्मिक इमारतों या भवनों का निर्माण और सार्वजनिक रूप से उपयोग के लिए कुओं, नलकूप (हैंडपंप) की खुदाई करवाता है। उसकी आजीविका का स्थाई स्रोत अधिकांश रूप से सरकारी होता है।ईमानदारी से कमाये गए धन में बृद्धि होती है। ऐसा जातक अपनी आंखों देखी बातों पर ही विश्वास करता है, कानों से सुनी गयी बातों पर नहीं और यदि सूर्य अशुभ है तो जातक के पिता की मृत्यु बचपन में ही हो सकती है। प्रथम भाव का अशुभ सूर्य और पांचवें भाव का मंगल एक-एक संतान की मृत्यु का कारण होतें है।


प्रथम भाव लग्न में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय


1. ऐसे जातक को 24 वर्ष की आयु से पहले ही विवाह कर लेना चाहिए। 

2. दिन के समय शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करना चाहिए, इससे पत्नी बीमार रहेगी या हो सकता है की पत्नी की मृत्यु भी हो जाए। 

3. अपने पैतृक घर में पानी के लिए एक हैंडपंप या बोरिंग लगवाएं।

4. अपने घर के अंत में बाईं ओर एक छोटे और अंधेरे कमरे का निर्माण करवाएं।

5. पति या पत्नी दोनों में से किसी एक को गुड़ खाना या गुड़ से बनी सामग्री खाना बंद कर देना चाहिए। 


कुंडली के दूसरे भाव में सूर्य होने पर


कुंडली के दूसरे भाव में सूर्य यदि शुभ है तो जातक आत्मनिर्भर होगा, शिल्पकला में कुशल और माता-पिता, मामा, बहनों, बेटियों और ससुराल वालों का सहयोग करने वाला होगा।साथ में चंद्रमा छठवें भाव में है तो दूसरे भाव का सूर्य और भी शुभ प्रभाव देगा ही। साथ में आठवें भाव का केतू जातक को अधिक ईमानदार बना देगा। 


नौवें भाव का राहू जातक को बहुत प्रसिद्ध कलाकार या चित्रकार बन देता है। नवम भाव का केतू जातक को महान तकनीकी जानकार बना देता है। नवम भाव का मंगल जातक को आधुनिक बना देता है और यदि सूर्य दूसरे भाव बहव में  मंगल पहले भाव में और चंद्रमा बारहवें भाव में हो तो जातक की स्थिति गंभीर हो सकती है और वो हर तरीके से दयनीय हो जाता है। यदि दूसरे भाव में सूर्य अशुभ हो तो आठवें भाव में स्थित मंगल जातक को बहुत लालची बना देता है।


दूसरे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय


1. किसी धार्मिक स्थान में नारियल का तेल, सरसों का तेल और बादाम दान का करें।

2. धन, संपत्ति, और महिलाओं से जुड़े विवादों से बचें।

3. दान लेने से बचें, विशेषकर चावल, चांदी, और दूध का दान नहीं लेना चाहिए।


कुंडली के तीसरे भाव में सूर्य होने पर 


कुंडली के तीसरे भाव का सूर्य अगर शुभ है तो जातक अमीर, आत्मनिर्भर होगा और उसके कई छोटे भाई होंगे। जातक पर ईश्वरीय कृपा होगी और वह बौद्धिक व्यवसाय द्वारा लाभ कमाएगा। वो ज्योतिष और गणित में रुचि रखने वाला होगा। यदि तीसरे भाव में सूर्य अशुभ है और कुण्डली में चन्द्रमा भी अशुभ है तो जातक के घर में दिनदहाडे चोरी या डकैती हो सकती है। यदि पहला भाव पीडित है तो जातक के पडोसियों का विनाश हो सकता है।


तीसरे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय


1. मां को प्रसन्न रखें और उनका आशिर्वाद लें।

2. दूसरों को चावल या दूध परोसें या गरीबों को दान दें।

3. सदाचारी रहैं और बुरे कामों से बचने का प्रयास करें। 


कुंडली के चौथे भाव में सूर्य होने पर 


चौथे भाव में यदि सूर्य शुभ है तो जातक बुद्धिमान, दयालु और अच्छा प्रशासक होता है। ऐसे जातक के पास आमदनी का स्थिर श्रोत होता है। ऐसा जातक मृत्युउपरांत अपने वंशजों के लिए बहुत धन और बडी विरासत छोड कर जाता है। यदि चंद्रमा भी सूर्य के साथ चौथे भाव में स्थित है तो जातक किसी आधुनिक शोध के माध्यम से बहुतसारा धन अर्जित करता है और ऐसे में चौथे भाव या दसवें भाव का बुध जातक को बहुत ही प्रसिद्ध व्यापारी बनाता देता है। यदि सूर्य के साथ बृहस्पति भी चौथे भाव में स्थित है तो जातक सोने और चांदी के व्यापार से बहुत लाभ प्राप्त करता है। यदि शनि सातवें भाव में हो तो जातक को रतौंधी या आंख से संबंधित अन्य रोग हो सकता है। यदि सूर्य चौथे भाव में अशुभ हो और मंगल दसवें भाव में हो तो जातक की आंखों में दोष हो सकता है किन्तु उसका भाग्य कमजोर नहीं होगा।


चौथे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय


1. ऐसे जातक को चाहिए कि जरूरतमंद और अंधे लोगों को दान दें और खाना बांटें।

2. लोहै और लकड़ी के साथ जुड़ा व्यापार कदापी न करें।

3. सोने, चांदी और कपड़े से सम्बंधित व्यापार करे।


कुंडली के पांचवें भाव में सूर्य होने पर  


यदि सूर्य पांचवें भाव में शुभ है तो निश्चित ही जातक के परिवार तथा बच्चों की प्रगति और समृद्धि होगी। यदि पांचवें भाव में कोई सूर्य का शत्रु ग्रह स्थित है तो जातक को सरकार जनित कष्टों का सामना करना पड सकता है। यदि मंगल पहले अथवा आठवें भाव में हो एवं राहू या केतू और शनि नौवें और बारहवें भाव में हो तो जातक राजसी जीवन जीता है। यदि गुरु नौवें या बारहवें भाव में स्थित है तो जातक के शत्रुओं का विनाश होगा, लेकिन ये स्थिति जातक के संतान के लिए ठीक नहीं है और पांचवें भाव का सूर्य अशुभ है और बृहस्पति दसवें भाव में है तो जातक की पत्नी जीवित नहीं रहती और चाहै जितने विवाह करें पत्नियां मरती जाएंगी।


पांचवे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय :-


1. ऐसे जातक को संतान पैदा करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

2. घर (मकान) के पूर्वी भाग में ही रसोई घर का निर्माण करें।

3. लगातार 43 दिनों तक सरसों के तेल की कुछ बूंदे जमीन पर गिराएं।


कुंडली के छठे भाव में सूर्य होने पर 


यदि सूर्य छठे भाव में शुभ हो तो जातक भाग्यशाली, क्रोधी तथा सुंदर जीवनसाथी वाला होता है। यदि सूर्य छठे भाव में हो, चंद्रमा, मंगल और बृहस्पति दूसरे भाव में हो तो परंपरा का निर्वाह करना लाभदायक होता है और सूर्य छ्ठे भाव में हो और सातवें भाव में केतू या राहू हो तो जातक का एक पुत्र होगा और 48 सालों के बाद भाग्योन्नति होगी। यदि दूसरे भाव में कोई भी ग्रह न हो तो जातक को जीवन के 22वें साल में सरकारी नौकरी मिलने के योग बनते हैं। यदि सूर्य अशुभ हो तो जातक के पुत्र और ननिहाल के लोगों को काष्ठों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे जातक का स्वास्थ भी कभी ठीक नहीं रहेगा।


छठे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय :-


1. कुल परम्परा और धार्मिक परम्पराओं का कड़ाई से पालन करें अन्यथा परिवार की प्रगति और प्रसन्नता नष्ट हो जायेगी।

2. घर के आहाते (परिसर) में भूमिगत भट्टियों का निर्माण कदापि न करें।

3. रात में भोजन करने के बाद रसोई की आग और स्टोव आदि को दूध का छिड़काव करके बुझाएं।

4. अपने घर के परिसर में हमेशा गंगाजल रखें और बंदरों को सदा गुड़ और चना खिलाएं।


कुंडली के सातवें भाव में सूर्य होने पर


सातवें भाव में स्थित सूर्य यदि शुभ है और यदि बृहस्पति, मंगल अथवा चंद्रमा इनमे से कोई दूसरे भाव में है तो जातक सरकार में मंत्री जैसा पद प्राप्त करता है। बुध उच्च का हो या पांचवें भाव में हो अथवा सातवां भाव मंगल का हो तो जातक के पास आमदनी का कभी न अंत होने वाला श्रोत होगा यदि सातवें भाव में स्थित सूर्य हानिकारक हो और बृहस्पति, शुक्र या कोई और अशुभ ग्रह ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो तथा बुध किसी भी भाव में नीच का हो तो जातक की मृत्यु किसी मुठभेड(विवाद) में परिवार के कई सदस्यों के साथ होती है। सातवें भाव में हानिकारक सूर्य हो और मंगल या शनि दूसरे या बारहवें भाव में स्थित हो तथा चंद्रमा पहले भाव में हो तो जातक को कुष्ट या चर्म रोग हो सकते हैं।


सातवे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय :-


1. ऐसे जातक नमक का उपयोग कम मात्रा में करें।

2. किसी भी काम को शुरू करने से पहले मीठा खाएं और उसके बाद पानी जरूर पिएं।

3. भोजन करने से पहले रोटी का एक टुकड़ा रसोई घर की आग में डालें।

4. काली अथवा बिना सींग वाली गाय को पालें और उसकी सेवा करें, सफेद गाय कभी ना पालें।


कुंडली के आठवें भाव में सूर्य होने पर 


आठवें भाव में स्थित सूर्य यदि शुभ हो तो आयु के 22वें वर्ष से सरकार का सहयोग मिलता है। 

ऐसा सूर्य जातक को सच्चा, पुण्य और राजा की तरह बनाता है। कोई उसे नुकसान नही पहुंचा पाता। 

यदि आठवें भाव स्थित सूर्य अनुकूल न हो तो दूसरे भाव में स्थित बुध आर्थिक संकट पैदा करेगा। 

ऐसा जातक अस्थिर स्वभाव, अधीर और अस्वस्थ्य रहैगा। ऐसा जातक ईमानदार होता है किसी की भी बातों में आ जाता है, जिससे कभी-कभी उसे नुकसान भी हो जाता है। 


आठवे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय


1. ऐसे जातक को चाहिए कि वह घर में कभी भी सफेद कपड़े न रखे।

2. जातक का घर दक्षिण मुखी न हो. उत्तरमुखी घर अत्यधिक फायदे पहुंचाने वाला हो सकता है। 

3. हमेशा किसी भी नये काम को शुरू करने से पहले मीठा खाकर पानी पिना फायदेमंद होगा।

4. यदि संभव हो तो किसी जलती हुई चिता में तांबे के सिक्के डालें और बहती नदी में गुड़ बहाएं। 


कुंडली के नौवें भाव में सूर्य होने पर 


नवमें भाव में सूर्य शुभ हो तो जातक भाग्यशाली, अच्छे स्वभाव वाला, अच्छे पारिवारिक जीवन वाला और हमेशा दूसरों की मदद करने वाला होगा। यदि बुध पांचवें घर में होगा तो जातक का भाग्योदय 34 साल के बाद होगा। यदि नवें भाव में स्थित सूर्य शुभ न हो तो जातक बुरा और अपने भाइयों के द्वारा परेशान किया जाएगा। सरकार से दण्ड और प्रतिष्ठा की हानि हो सकती है। ऐसा जातक भाई के साथ सुखी नहीं रहैगा। 


नौवें भाव में अशुभ सूर्य होने पर करे ये उपाय


1. उपहार या दान के रूप में चांदी की वस्तुएं कभी स्वीकार न करें। हां चांदी की वस्तुएं दान अवश्य करें।

2. ऐसे जातक को अपने पैतृक बर्तन और पीतल के बर्तन नहीं बेचना चाहिए। 

3. अत्यधिक क्रोध और अत्यधिक कोमलता से बचें रहना चाहिए।


कुंडली के दसवें भाव में सूर्य होने पर 


दसवें भाव में स्थित सूर्य यदि शुभ हो तो सरकार से लाभ और सहयोग मिल सकता है। 

ऐसे जातक का स्वास्थ्य अच्छा और वह आर्थिक रूप से मजबूत भी होगा। ऐसे जातक को सरकारी नौकरी, वाहनों और कर्मचारियों का सुख मिलता रहैगा। ऐसा जातक सदा दूसरों पर शक करता रहैगा और यदि दसवें भाव में स्थित सूर्य अशुभ हो और शनि चौथे भाव में हो तो जातक के पिता की मृत्यु बचपन में ही हो जाती है। सूर्य दसवें भाव में हो और चंद्रमा पांचवें घर में हो तो जातक अल्पायु होगा। यदि चौथे भाव में कोई ग्रह न हों तो जातक सरकारी सहयोग और लाभ से वंचित रह जाएगा।


दसवे भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय


1. ऐसे जातक को कभी भी काले और नीले कपड़े नही पहनने चाहिए।

2. किसी नदी या नहर में लगातार 43 दिनों तक तांबें का एक सिक्का डालना अत्यंत शुभ फल देगा। 

3. जातक का मांस मदिरा के सेवन से बचें रहना लाभकारी होगा। 


कुंडली के ग्यारहवें भाव में सूर्य होने पर 


यदि ग्यारहवें भाव सूर्य शुभ है तो जातक शाकाहारी और परिवार का मुखिया होगा। जातक के तीन बेटे होंगे और उसे सरकार से लाभ मिलेगा। ग्यारहवें भाव में बैठा सूर्य यदि शुभ नहीं है और चंद्रमा पांचवें भाव में है और सूर्य पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी नही है तो वह जातक की आयु कम होती है।


ग्याहरवें भाव में अशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय 



1. जातक को चाहिए कि वह मांसहार और शराब के सेवन से बचे। 

2. जातक को रात में सोते समय बिस्तर के सिरहने बादाम या मूली रखकर सोना चाहिये।  

3. दूसरे दिन उस बादाम या मूली को मंदिर में दान करने से आयु और संतान सुख मिलता है। 


कुंडली के बारहवें भाव में सूर्य होने पर 


यदि बारहवें भाव में सूर्य शुभ हो तो जातक 24 वर्ष की आयु के बाद बहुत धन कमाएगा और जातक का पारिवारिक जीवन अच्छा बितेगा। यदि शुक्र और बुध एक साथ हो तो जातक को व्यापार से लाभ मिलता है और जातक के पास आमदनी के बहुत अच्छे स्रोत होते हैं। यदि बारहवें भाव का सूर्य अशुभ हो तो जातक अवसाद ग्रस्त, मशीनरी से आर्थिक हानि उठाने वाला और सरकार द्वारा दंडित होगा। यदि पहले भाव में कोई और पाप ग्रह हो तो जातक को रात में चैन की नींद नहीं आएगी।


बारहवें भाव में आशुभ सूर्य होने पर करें ये उपाय 



1. जातक को हमेशा अपने घर में एक आंगन रखना चाहिए। 

2. ऐसे जातक को चाहिए कि वह हमेशा धार्मिक और सच्चा बने। 

3. ऐसे जातक को अपने घर में एक चक्की रखना चाहिए।

4. अपने दुश्मनों को हमेशा क्षमा कर देना चाहिए

Friday, January 6, 2023

मेडम शब्द का अर्थ

 *मैडम (MADAME) शब्द का मतलब*

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है, मैडम (MADAME) जो कि फ्रेंच भाषा से लिया गया है। MADAME दो शब्दो MA+ DAME से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है MA = मेरा/मेरी और DAME का अर्थ होता है महिला/स्त्री/औरत। जिसका पूरा अर्थ होता है मेरी महिला या मेरी स्त्री या मेरी औरत। अब हमें यह समझने वाली बात है कि हर स्त्री मेरी कैसे हो सकती? क्योंकि, भारत में सभी रिश्ते स्पष्ट हैं और भारत में सभी रिश्तों की अपनी अलग व्याख्या और अर्थ हैं। फ्रेंच में मैडम शब्द का उपयोग वेश्यावृत्ति से जोड़ कर किया जाता है, क्योंकि अंग्रेजी भाषा में दुनिया के ज्यादातर देशों से शब्दों को लेकर शामिल किया गया है। इसी तरह मैडम शब्द को भी शामिल कर लिया गया है। फ्रेंच में मैडम शब्द का उपयोग कोठा चलाने वाली बाई के लिए किया जाता है। यानि वो महिला जो देह व्यापार करने वालों की मालकिन हो उसे मैडम कहा जाता है। 




*मैडम शब्द के इतिहास एवं उसके प्रचलन की कहानी*

मैडम शब्द के इतिहास एवं उसके प्रचलन की कहानी

दुनिया में हर एक देश की अपनी एक भाषा, शिक्षा और ज्ञान की परंपरा होती है, उस भाषा को राष्ट्र की आत्मा कहा जाता है। इसी के आधार पर दुनिया के सारे देशों की अपनी एक पहचान होती है। उसी तरह हर भाषा और हर भाषा के हर शब्द का अपना इतिहास होता है।


*क्या हम बोलने से पहले सोचते हैं?*

जो भी शब्द, यदि किसी भाषा से जुड़ा है तो उसका अपना एक अलग इतिहास होता है। किसी ना किसी घटना के बाद कोई भी शब्द किसी भाषा में जोड़ा जाता है। इस लिए हर इंसान का यह दायित्व बनता है कि वह किसी भाषा से आने वाले शब्द को बिना जाने नहीं बोलना चाहिए। कई बार हमारे देश भारत में यह देखा जाता है कि स्वयं को ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी बताने की होड़ में लोग अंग्रेजी भाषा से लिए गए कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर देते हैं, जिसका उन्हें इतिहास और उस शब्द का सही अर्थ मालूम नहीं होता है।


वे इसलिए ऐसा करते हैं कि क्योंकि ऐसे शब्द या तो वो किसी के मुंह से बोलते हुए सुन लेते हैं या फिर किसी को कहीं उनका इस्तेमाल करते देख लेते हैं। उसी में से एक अंग्रेजी का शब्द है मैडम (MADAME)। भारत में मैडम शब्द का अर्थ जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि अंग्रेज हिंदी भाषा के महत्व को खत्म करने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत आमजनमानस के बीच ऐसे शब्दों को प्रचलित कर दिया करते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द, जिनका अर्थ कुछ और ही होता है उन्हें प्रचलित कर दिया गया है। वहीं शब्द आज हिंदी में बिना उनके सही अर्थ जाने आमजनमानस के द्वारा हिंदी की तरह उपयोग किए जा रहे हैं।


*मैडम (MADAME) शब्द का मतलब*

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है, मैडम (MADAME) जो कि फ्रेंच भाषा से लिया गया है। MADAME दो शब्दो MA+ DAME से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है MA = मेरा/मेरी और DAME का अर्थ होता है महिला/स्त्री/औरत। जिसका पूरा अर्थ होता है मेरी महिला या मेरी स्त्री या मेरी औरत। अब हमें यह समझने वाली बात है कि हर स्त्री मेरी कैसे हो सकती? क्योंकि, भारत में सभी रिश्ते स्पष्ट हैं और भारत में सभी रिश्तों की अपनी अलग व्याख्या और अर्थ हैं।




फ्रेंच में मैडम शब्द का उपयोग वेश्यावृत्ति से जोड़ कर किया जाता है, क्योंकि अंग्रेजी भाषा में दुनिया के ज्यादातर देशों से शब्दों को लेकर शामिल किया गया है। इसी तरह मैडम शब्द को भी शामिल कर लिया गया है। फ्रेंच में मैडम शब्द का उपयोग कोठा चलाने वाली बाई के लिए किया जाता है। यानि वो महिला जो देह व्यापार करने वालों की मालकिन हो उसे मैडम कहा जाता है।


*भारत में चलन क्यों?*

किसी भी देश की भाषा एवं शिक्षा उस देश की आत्मा मानी जाती है। इस लिए जब अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया, तब भारत की संस्कृति, भाषा, ज्ञान आदि को बर्बाद करने के लिए भारत में इस तरह के शब्दों का चलन बढ़ाया, जिससे भारत की भाषा एवं संस्कृति को पूरी तरह से खत्म किया जा सके। इसका श्रेय लॉर्ड मैकाले को जाता है, जिनका पूरा नाम थॉमस बैबिंगटन मैकाले था।


भारतीय भाषा को पूरी तरह बिगाड़ने के उद्देश्य से 1834 में लॉर्ड मैकाले को गवर्नर-जनरल की एक्जीक्यूटिव काउंसिल का पहला कानून सदस्य नियुक्त करके भारत भेजा गया था। लॉर्ड मैकाले 1823 में बैरिस्टर बने जो कि प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि, निबंधकार, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ भी थे, जिसको अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा पद्धति को बिगाड़ कर नई शिक्षा पद्धति बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी।


तभी से हमारे देश में इस तरह के शब्दों का चलन आम बोल-चाल में बढ़ गया। लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति को बदल कर एक नई शिक्षा पद्धति की शुरुआत की जो कि आज भी भारत में चल रही है। *भारत की परंपरा क्या रही है?*

भारत में यानी की हिंदी भाषा में श्रीमती और श्रीमान जैसे सम्मानित शब्दों को रखा गया है। चूंकि मैडम शब्द की बात चल रही है तो यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि हिंदी में उपयोग होने वाले श्रीमती शब्द का अर्थ क्या होता है। हिंदी में उपयोग होने वाला श्रीमती शब्द दो शब्दों श्री और मती से बना है। श्री+मती = लक्ष्मी+बुद्धि यानी श्रीमती शब्द का उच्चारण करने पर महिला को लक्ष्मी और सरस्वती दोनों के बराबर रख कर संबोधित किया जाता है,


लेकिन अंग्रेजों ने श्रीमती जैसे शब्दों का चलन खत्म करके मैडम, मिसेज और बेटर हाफ जैसे शब्दों का चलन शुरू कर दिया जिससे भारत की भाषा एवं संस्कृति को नष्ट किया जा सके।

Saturday, December 17, 2022

सम्मेद शिखर की प्राचीनता

*सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है:* 
डॉ. आशीष शिक्षाचार्य ,निदेशक
संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्य विद्या अनुसंधान केंद्र दमोह ,अध्यक्ष, संस्कृत विभाग,एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह म. प्र. 

 सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है क्योेंकि जैन धर्म के अनुसार अयोध्या एवं सम्मेदरशिखर ये दोनों भूमियाँ शाश्वत् कही गई हैं। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में एवं निर्वाण सम्मेद शिखर में होने के नियोग का वर्णन प्राप्त होता है इसलिए ये शाश्वत् अनादि निधन भूमियां हैं। हुण्डावसर्पिणी काल दोष के कारण वर्तमान चौवीसी के 20 तीर्थकरों का निर्वाण इस पवित्र भूमि की टांेक (पर्वतश्रृंखला) से हुआ है। यह बात ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी प्राकृत भाषा की निर्वाणि भक्ति में लिखते हैं-

वीसं तु जिणवरिंदा अमरा सुरावंदिदा धुदकिलेसा ।
सम्मेदे गिरि - सिहरे निव्वाणगया णमो तेसिं॥2
स्वस्तिकांका नराधीश, सोपि अनादिकालाट्ठि 
सम्मेदामिध भूधरः । 

 जैन शास्त्रों पुराणों एवं आगम ग्रन्थों की माने तो इस पर्वत की भूमि के नीचे जब से सृष्टि का आरम्भ है तब से स्वस्तिक का चिन्ह स्थित है ।  इसका कण-कण पवित्र है और बाल की नोंक के बराबर भी ऐसा स्थान शेष नहीं जहॉं से मुनियों का कल्याण ना हुआ हो । सम्मेद शिखर पर्वत की प्राचीनता के विषय में विचार करें तो 13वीं शताब्दी में भट्टारक मदनकीर्ति  ने ‘‘शासनचतुस्त्रिंशतिका’’ में सौधर्म इन्द्र देव के द्वारा इस पर्वत की प्रतिष्ठा एवं पूजा का उल्लेख किया है तथा जहॉ से भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण हुआ है उसे शास्त्रों में स्वर्णभद्र कूट कहा जाता है उस जिनालय का निर्माण व जीर्णोद्धार‘‘सम्मेदशिखर माहात्म्य’’ ग्रन्थ के अनुसार जम्बूदीप के भरत क्षेत्र अंगदेश की अन्धपुरी नगरी के राजा प्रभासेन- शांतसेना रानी के द्वारा स्वर्णभद्र कूट की प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है तथा उनके पुत्र भावसेत्र के द्वारा 84 लाख भव्यों के साथ सम्मेद शिखर की वंदना,मुनिदीक्षा धारण व मोक्ष के प्रमाण प्राप्त होते हैं।  16 शताब्दी में सम्राट अकबर ने300 बीघा जमीन श्वेताम्बर जैन साधु के प्रभाव से व 18 वीं शताब्दी में अहमदशाह ने 300 बीघा जमीन सेठ महेतावराय को तीर्थ क्षेत्र हेतु प्रदान की थी । 16-17 शताब्दी में भट्टारक ज्ञानकीर्ति द्वारा प्रणीत ‘‘यशोधर चरित्र‘‘ में तथा जैन पुराण ग्रन्थों एवं जैन साहित्य में सम्म्ेादशिखर की प्राचीनता एवं तप साधना के कई प्रमाण बिखरे पडे हैं और वर्तमान में सभी को ज्ञात है कि यह जैन तीर्थ है भारत सरकार  आजादी के पूर्व से लेकर अद्यतन भारतीय रेल्वे से एवं स्थानीय विभागों से  सर्वे करा ले कि यहां सबसे ज्यादा जैन यात्री दर्शनार्थ आते हैं, जिससे भारत सरकार को कितना रेवेन्यु प्राप्त होता है। अतः जैन तीर्थ सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है, जहां से अनन्तानंत जीवों का कल्याण हुआ है ।। 
*निदेशक,संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्यविद्या अनुसन्धान केंद्र दमोह*

सम्मेद शिखर की प्राचीनता

 *सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है:* 

डॉ. आशीष शिक्षाचार्य ,निदेशक

संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्य विद्या अनुसंधान केंद्र दमोह ,अध्यक्ष, संस्कृत विभाग,एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह म. प्र. 


 सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है क्योेंकि जैन धर्म के अनुसार अयोध्या एवं सम्मेदरशिखर ये दोनों भूमियाँ शाश्वत् कही गई हैं। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में एवं निर्वाण सम्मेद शिखर में होने के नियोग का वर्णन प्राप्त होता है इसलिए ये शाश्वत् अनादि निधन भूमियां हैं। हुण्डावसर्पिणी काल दोष के कारण वर्तमान चौवीसी के 20 तीर्थकरों का निर्वाण इस पवित्र भूमि की टांेक (पर्वतश्रृंखला) से हुआ है। यह बात ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी प्राकृत भाषा की निर्वाणि भक्ति में लिखते हैं-


वीसं तु जिणवरिंदा अमरा सुरावंदिदा धुदकिलेसा ।

सम्मेदे गिरि - सिहरे निव्वाणगया णमो तेसिं॥2

स्वस्तिकांका नराधीश, सोपि अनादिकालाट्ठि 

सम्मेदामिध भूधरः । 


 जैन शास्त्रों पुराणों एवं आगम ग्रन्थों की माने तो इस पर्वत की भूमि के नीचे जब से सृष्टि का आरम्भ है तब से स्वस्तिक का चिन्ह स्थित है ।  इसका कण-कण पवित्र है और बाल की नोंक के बराबर भी ऐसा स्थान शेष नहीं जहॉं से मुनियों का कल्याण ना हुआ हो । सम्मेद शिखर पर्वत की प्राचीनता के विषय में विचार करें तो 13वीं शताब्दी में भट्टारक मदनकीर्ति  ने ‘‘शासनचतुस्त्रिंशतिका’’ में सौधर्म इन्द्र देव के द्वारा इस पर्वत की प्रतिष्ठा एवं पूजा का उल्लेख किया है तथा जहॉ से भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण हुआ है उसे शास्त्रों में स्वर्णभद्र कूट कहा जाता है उस जिनालय का निर्माण व जीर्णोद्धार‘‘सम्मेदशिखर माहात्म्य’’ ग्रन्थ के अनुसार जम्बूदीप के भरत क्षेत्र अंगदेश की अन्धपुरी नगरी के राजा प्रभासेन- शांतसेना रानी के द्वारा स्वर्णभद्र कूट की प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है तथा उनके पुत्र भावसेत्र के द्वारा 84 लाख भव्यों के साथ सम्मेद शिखर की वंदना,मुनिदीक्षा धारण व मोक्ष के प्रमाण प्राप्त होते हैं।  16 शताब्दी में सम्राट अकबर ने300 बीघा जमीन श्वेताम्बर जैन साधु के प्रभाव से व 18 वीं शताब्दी में अहमदशाह ने 300 बीघा जमीन सेठ महेतावराय को तीर्थ क्षेत्र हेतु प्रदान की थी । 16-17 शताब्दी में भट्टारक ज्ञानकीर्ति द्वारा प्रणीत ‘‘यशोधर चरित्र‘‘ में तथा जैन पुराण ग्रन्थों एवं जैन साहित्य में सम्म्ेादशिखर की प्राचीनता एवं तप साधना के कई प्रमाण बिखरे पडे हैं और वर्तमान में सभी को ज्ञात है कि यह जैन तीर्थ है भारत सरकार  आजादी के पूर्व से लेकर अद्यतन भारतीय रेल्वे से एवं स्थानीय विभागों से  सर्वे करा ले कि यहां सबसे ज्यादा जैन यात्री दर्शनार्थ आते हैं, जिससे भारत सरकार को कितना रेवेन्यु प्राप्त होता है। अतः जैन तीर्थ सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है, जहां से अनन्तानंत जीवों का कल्याण हुआ है ।। 

*निदेशक,संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्यविद्या अनुसन्धान केंद्र दमोह*

Wednesday, November 16, 2022

ऋषि, मुनि, सन्यासी में अंतर

 ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर :------


भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?


ऋषि कौन होते हैं


भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं। 


ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है "ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है। 


ऋषि शब्द का अर्थ


ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे। 


ऋषियों के प्रकार


ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि। 


सप्त ऋषि


पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है। 


मुनि किसे कहते हैं


मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं। 


मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि। 


मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।


जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं। 


मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं 


साधु कौन होते हैं 


किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया। 


कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि "साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है। 


साधु के लिए यह भी कहा गया है "आत्मदशा साधे " अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं। 


संन्यासी किसे कहते हैं


सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है। 


सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है। 


हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है


परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे। 


परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है। 


यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 


वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है। 


उपसंहार


ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।

Wednesday, September 21, 2022

राम और रामायण के तथ्य

 💥 #रामायण_के_कुछ_रोचक_तथ्य 🚩

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🔸1. रामायण को महर्षि वाल्मीकि जी ने लिखा था तथा इस महाग्रंथ में 24,000 श्लोक, 500 उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड है।


🔸2. जिस समय दशरथ जी ने पुत्रेष्ठी यज्ञ किया था उस समय दशरथ जी की आयु 60 वर्ष थी।


🔸3. तुलसीरामायण में लिखा है की सीता जी के स्वयंवर में श्री राम ने भगवान शिव का धनुष बाण उठाया व इन्हें तोड़ दिया परंतु इस घटना का वाल्मीकि रामायण में कोई उल्लेख नहीं है।


🔸4. रामचरितमानस के अनुसार परशुरामजी सीता स्वयंवर के मध्य में आए थे परंतु बाल्मीकि रामायण के अनुसार जब प्रभु श्री राम, माता सीता के साथ अयोध्या जा रहे थे उस समय बीच रास्ते में परशुराम जी इन्हें मिले थे।


🔸5. जब भगवान श्री राम वनवास के लिए जा रहे थे तब उनकी आयु 27 वर्ष थी।


🔸6. जब लक्ष्मण जी आए और उन्हें पता चला कि श्री राम को वनवास का आदेश मिला है तब वह बहुत क्रोधित हुए तथा श्री राम के पास जाकर उनसे अपने ही पिता के विरुद्ध युद्ध के लिए बोला परंतु बाद में श्री रामजी के समझाने पर वह शांत हो गए।


🔸7. जब दशरथ जी ने श्री राम को वनवास के लिए कहा, तब वह चाहते थे कि श्री राम जी बहुत सा धन एवं दैनिक उपयोग की चीजें अपने साथ ले जाए परंतु कैकई ने इन सब चीजों के लिए भी मना कर दिया।


🔸8. भरत जी को सपने में ही इनके पिता दशरथ की मृत्यु का अनुमान हो गया था क्योंकि उन्होंने अपने सपने में दशरथ जी को काले कपड़े पहने एवं उदास देखा था।


🔸9. हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में 33 करोड़ देवी-देवता है लेकिन बाल्मीकि रामायण के के अनुसार 33 करोड़ नहीं अपितू 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के देवी देवता है।


🔸10. प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि जब माता सीता का अपहरण रावण के द्वारा हुआ तब जटायु ने उन्हें बचाने का प्रयास किया और अपना बलिदान दिया परंतु राम वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह जटायु नहीं थे अपितु उनके पिता अरुण थे।


🔸11. जिस दिन रावण ने माता सीता का हरण किया तथा उन्हें अशोक वाटिका लेकर आया, उसी रात भगवान ब्रह्मदेव ने इंद्रदेव को एक विशेष प्रकार की खीर सीता जी को देने के लिए कहा, तब इंद्रदेव ने पहले अपनी अलौकिक शक्तियों के द्वारा अशोक वाटिका में उपस्थित सारे राक्षसों को सुला दिया, उसके बाद वह खीर माता सीता को दी।


🔸12. जब भगवान श्री राम, लक्ष्मण जी, माता सीता की खोज में जंगल में गए तब वहां उनकी राह में कंबंध नाम का एक राक्षस आया जो श्री राम व लक्ष्मण के हाथ मारा गया परंतु वास्तव में कंबंध एक श्रापित देवता था और एक श्राप के कारण राक्षस योनी में जन्मा और जब प्रभु श्रीराम ने उसकी उसका मृत शरीर जलाया तब उसकी आत्मा मुक्त हो गई एवं उसने ही उसने ही श्रीराम व लक्ष्मण को सुग्रीव से मित्रता करने का मार्ग सुझाया।


🔸13. एक बार रावण कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने गया और उसने वहां उपस्थित नंदी का मजाक उड़ाया इससे क्रोधित नंदी ने रावण को श्राप दिया कि एक वानर तेरी मृत्यु एवं पतन करण बनेगा।


🔸14. वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब रावण ने कैलाश पर्वत उठाया था तब माता पार्वती ने क्रोधित होकर श्राप दिया था की तेरी मृत्यु का कारण एक स्त्री बनेगी।


🔸15. विद्युतजिन, रावण की बहन शुर्पणखां का पति था तथा यह कालकेय नामक राजा का सेनापति भी था। जब रावण पूरी दुनियाँ को जीतने निकला तब उसने कालकेय से भी युद्ध किया तथा इस युद्ध में विद्युतजिन मारा गया तब क्रोधित शुर्पणखां ने रावण को श्राप दिया की वही एक दिन अपने भाई रावण की मृत्यु का कारण बनेगी।


🔸16. जब राम और रावण के मध्य अंतिम युद्ध लड़ा जा रहा था तब इंद्रदेव ने अपना चमत्कारिक रथ श्रीराम के लिए भेजा था और इस रथ पर बैठ कर ही श्री राम ने रावण का वध किया।


🔸17. एक बार रावण अपने पुष्पक विमान पर कही जा रहा था तब उसने एक सुंदर स्त्री को भगवान विष्णु की तपस्या करते हुए देखा जो श्री हरि विष्णु को पति रूप में पाना चाहती थी। रावण ने उसके बाल पकड़ कर उसे घसीटते हुए अपने साथ चलने को कहा परंतु उस स्त्री ने उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए और रावण को अपने कुल सहित नष्ट हो जाने का श्राप दिया।


🔸18. रावण को अपनी सोने की लंका पर बहुत अहंकार था, परंतु इस लंका पर रावण से पहले उसके भाई कुबेर का राज था। रावण ने लंका को अपने भाई कुबेर से युद्ध करके जीता था।


🔸19. रावण राक्षसों का राजा था तथा उस समय लगभग सभी बालक इससे बहुत ज्यादा डरते थे क्योंकि इसके दस सिर थे परन्तु रावण, शिव का बहुत बड़ा भक्त था तथा बहुत ही बुद्धिमान विद्यार्थी भी था, जिसने सारे वेद का अध्ययन किया।


🔸20. रावण के रथ की ध्वजा पर अंकित वीणा के चिन्ह से यह पता लगता है कि रावण को संगीत थी प्रिय था तथा कई जगह इस बात का उल्लेख है कि रावण वीणा बजाने में भी निपुण था।


🔸21. राजधर्म का निर्वाह करते हुए एक धोबी के कारण श्री राम ने माता सीता की अग्नि परीक्षा ली तथा इसके पश्चात माता सीता को वाल्मीकि आश्रम में छोड़ दिया, बाद में जब पुनः श्री राम ने माता सीता को परीक्षा के लिए कहा तो माता सीता धरती में समा गयी, तब श्री राम व इनके पुत्र कुश, माता सीता को पकड़ने के लिए दौड़े परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस घटना के पश्चात श्री राम को अत्यंत ही ग्लानी हुई की उन्होंने राजधर्म का निर्वाह तो किया लेकिन अपनी प्राणों से भी प्रिय पत्नी को उनके कारण कितने ही दुःख झेलने पडे, इसके कुछ समय पश्चात ही भगवान श्री राम ने सरयू नदी में जल समाधि ले ली एवं बैकुंठ धाम प्रस्थान कर गये।


🔸22. जब सीता हरण के पश्चात रावण को पता चला की श्री राम, लंका की ओर युद्ध के लिए आ रहे है तब इनके भाई विभीषण ने माता सीताजी को लौटाकर राम से संधि करने को कहाँ लेकिन तब रावण बोला की अगर वह साधारण मानव है तब वह मुझे नहीं हरा सकते लेकिन अगर वह वास्तव में ईश्वर है तब उनके हाथो मेरी मृत्यु नहीं अपितु मोक्ष प्राप्ति होगी, अतः में युद्ध अवश्य करूँगा।


🔸23. लक्ष्मण जी 14 सालो तक नहीं सोयें थे तथा इसी कारण इन्हें गुडाकेश भी कहा जाता है। रावण पुत्र मेघनाद को वरदान था की उसकी मृत्यु वही करेगा जो 14 वर्षो तक न सोया हो और इसी कारण मेघनाद, लक्ष्मण के द्वारा मारा गया।


💥 24

      👇👇

🔹1:~मानस में राम शब्द=1443 बार आया है।


🔸2:~मानस में सीता शब्द=147 बार आया है।


🔹3:~मानस में जानकी शब्द= 69 बार आया है।


🔸4:~मानस में बड़भागी शब्द=58 बार आया है।


🔹5:~मानस में कोटि शब्द=125 बार आया है।


🔸6:~मानस में एक बार शब्द= 18 बार आया है।


🔹7:~मानस में मन्दिर शब्द= 35 बार आया है।


🔸8:~मानस में मरम शब्द =40  आर आया है।


🔹9:~मानस में श्लोक संख्या=27 है।


🔸10:~लंका में राम जी =111 दिन रहे।


🔹11:~लंका में सीताजी =435 दिन रही।


🔸12:~मानस में चोपाई संख्या=4608 है।


🔹13:~मानस में दोहा संख्या=1074 है।


🔸14:~मानस में सोरठा=207 है।


🔹15:~मानस में छन्द=86 है।


🔸16:~सुग्रीव में बल था=10000 हाथियों का! 


🔹17:~सीता रानी बनी=33वर्ष की उम्र में।


🔸18:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र=77 वर्ष


🔹19:~पुष्पक विमान की चाल=400 मील/घण्टा


🔸20:~रामादल व् रावण दल का युद्ध=87 दिन चला


🔹21:~राम रावण युद्ध=32 दिन चला।


🔸22:~सेतु निर्माण=5 दिन में हुआ।


🔹23:~नलनील के पिता=विश्वकर्मा


🔸24:~त्रिजटा के पिता=विभीषण


🔹25:~दशरथ की उम्र थी=60000 वर्ष।


🔸26:~सुमन्त की उम्र=9999 वर्ष।


🔹27:~विश्वामित्र राम को ले गए=10 दिन के लिए।


🔸28:~मानस में बैदेही शब्द=51 बार आया है।


🔹29:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था=6 वर्ष की उम्र में।


🔸30:~रावण को जिन्दा किया=सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।



Monday, September 19, 2022

वैराग्य

 #सुंदर_कथा 🌹


एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।


राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।


राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।


विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।


कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं?


संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।


संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो  सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।


सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है।


अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।


ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। 


उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।


शिक्षा: अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है।


उसको (भगवान्) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।


कभी आप बहुत परेशान हो, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो।


आप आँखे बंद कर के विश्वास के साथ पुकारे, सच मानिये 

थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...