Friday, June 14, 2019

वृष लग्न का परिचय एवम फल

वृष लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 30 डिग्री से 60 डिग्री तक के भाग को वृष राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न वृष माना जाता है. वृष लग्‍न की कुंडली में मन का कारक ग्रह चंद्रमा तृतीय भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास इत्यादि का प्रतिनिधित्‍व करता है. इसलिए वृष लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सभी कार्य ही होते है. जन्‍मकुंडली एवम दशाकाल में चंद्र के शुभ रहने पर उपरोक्त वर्णित संदर्भों में जातक को शुभ फ़ल मिलकर वृष लग्‍न के जातक का मन प्रसन्न रहता है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्र के कमजोर अथवा पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्त संदर्भों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और जातक को मानसिक क्लेश की प्राप्ति होती है.

प्रकाश पुंज सूर्य वॄष लग्न में चतुर्थ भाव का स्‍वामी हो कर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जातक अपने नाम यश और कीर्ति के लिये चतुर्थ भाव के संदर्भों का उपयोग करता हैं. वॄष लग्न के जातकों का अपने नाम यश, कीर्ति प्रसिद्धि के लिए इनका सर्वाधिक ध्‍यान उपरोक्त वर्णित संदर्भों में लगा होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के शुभ और बलवान रहने से जातक की कीर्ति यश फ़ैलकर बडे शुभकारी फ़ल प्राप्त होते हैं और सूर्य के कमजोर और पाप प्रभाव में रहने पर से उपरोक्त वर्णित संदर्भों में कमी से इनकी यश कीर्ति में कमी होती है.

सप्‍तम और द्वादश भाव का स्‍वामी वृष लग्‍न में मंगल होता है. सप्तमेश होने के नाते यह जातक के घर गृहस्‍थी सहित लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि का कारक होता है और द्वादशेश होने के नाते यह खर्च का प्रतिनिधित्‍व करता है. जाहिर है इस लग्‍न के जातकों के घर गृहस्‍थी (सप्तम भाव) के वातावरण में खर्च (द्वादश भाव) की अहम भूमिका होती है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल के बलवान एवम शुभ प्रभाव में रहने पर वृष लग्‍न वाले जातक की खर्च शक्ति की योग्यता बढने से से घर गृहस्‍थी के कार्य कार्यान्वित करने में सुख और सहजता प्राप्त होती है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल कमजोर हो अथवा पाप प्रभाव में हो तो जातक की खर्च शक्ति की कमी के कारण घर गृहस्‍थी का वातावरण कष्‍टमय हो जाता है.

शुक्र प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के कारण यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. तथा षष्ठेष होने के कारण जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी जैसे सभी प्रकार के संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है. इन दोनों ही भावों का वृष लग्‍न के जातक के स्‍वास्‍थ्‍य और आत्‍म विश्‍वास से अति गहन संबंध होता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में शुक्र के शुभ प्रभाव व बलवान होने पर हर प्रकार से शरीर व स्वास्थ्य का लाभ होता है एवम वर्णित संदर्भों में शुभ फ़ल मिलकर जातक का आत्मविश्वास बढा हुआ होता है. इसके विपरीत जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के कमजोर या पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्‍त वर्णित विषयों में परेशानी पैदा होकर इनके स्‍वास्‍थ्‍य मे परेशानी एवम आत्‍म विश्‍वास में कमजोरी बनी रहती है.

बुध द्वितीय भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के कुल, कुटुंब, विद्या, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल बुध के शुभ प्रभाव में रहने पर वॄष लग्न के जातकों को उपरोक्त वर्णित विषयों में सहजता और शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. जबकि इसके विपरीत बुध कमजोर या पाप प्रभावगत हो तो , उपरोक्त वर्णित संदर्भों में न्यूनता औए कठिनाईयो का सामना करना पडता है.

बृहस्‍पति अष्‍टम भाव का स्‍वामी होकर व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एव शुभ प्रभाव में रहने पर उपरोक्त वर्णित विषयों में शुभ फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत पाप प्रभाव एवम कमजोर वॄहस्पति के कारण इन फ़लों के विपरीत फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि नवम और दशम जैसे दो महत्वपूर्ण भावों का स्‍वामी होता है. यह नवमेश होने के नाते जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. एवम दशमेश होने के नाते यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे संदर्भों का प्रतिनिधी होता है. ये दोनों ही भाव वॄष लग्न के जातकों के धार्मिक, राजनैतिक सामाजिक जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. जन्मकुंडली या दशाकाल में शनि के बलवान व शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त वर्णित विषयों एवम मुख्यत भाग्य और कर्म से संबंधित अत्यधिक शुभ व सकारात्मक फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत कमजोर व पाप प्रभाव में होने पर इन विषयों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु पंचम स्थान का स्वामी होकर पंचमेश बनता है और एक अत्यधिक महत्वपूर्ण त्रिकोण का स्वामी बनता है. और जीवन के अति महत्वपूर्ण विषयों जैसे बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली अथवा अपने दशाकाल में बलवान और शुभ प्रभाव गत राहु उपरोक्त विषयों में अत्यधिक शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत राहु इन विषयों में न्य़ुनता देकर अशुभ फ़ल ही अधिक देता है.

केतु एकादश भाव का स्वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि भावों का प्रतिनिधि होता है. जनम्कुंडली मे अथवा अपने दशाकाल में बलवान व शुभ प्रभाव गत राहु अत्यंत शुभ फ़ल देकर सभी तरह से आमदनी बनाये रखता है वहीं कमजोर एवम अशुभ प्रभाव गत केतु उपरोक्त फ़लों में कमी करके अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

मेष लग्न का परिचय एवम फल

मेष लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक के भाग को मेष राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म के समय यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मेष माना जाता है.

मेष लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्र चतुर्थ भाव का अधिपति (चतुर्थेश) होता है एवम यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह को अभिव्यक्त करता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में चंद्रमा के कमजोर/बलशाली होने से ऊपर बताये गये विषयों के सुख दुख की प्राप्ति होती है. इन सब के लिये चंद्र्मा के साथ साथ अन्य ग्रहों की युति एवम दॄष्टि का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये.

प्रकाश फ़ैलाने वाला सूर्य पंचम भाव का स्‍वामी (पंचमेश) होता है. जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार को अभिव्यक्त करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य की अच्छी बुरी स्थिति अनुसार ही इन फ़लों की न्यूनाधिकता रहती है. भलिभांति सूर्य की स्थिति का अध्ययन करके इन बातों का जातक कितना लाभ ले सकेगा, यह पता लगता है. सूर्य बली हो तो अच्छे फ़लों में वॄद्धि होती है और कमजोर सुर्य इन फ़लों में कमी उत्पन्न करता है.

मंगल प्रथम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. मेष लग्न में अगर मंगल बलशाली हो तो समस्त कुंडली में शुभ फ़ल अधिक प्राप्त होते हैं, बलवान और शुभ मंगल फ़लों में वॄद्धिकारक होता है जबकि कमजोर मंगल इन फ़लों में न्यूनता पैदा करता है.

लग्नेश के साथ साथ मेष लग्न में मंगल अष्ट भाव का प्रतिनिधि यानि अष्टमेश भी होता है. अष्टमेश होने नाते मंगल, व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का भी प्रतिनिधि है. इन समस्त फ़लों के बारे में मंगल की स्थिति का अध्ययन करके ही जाना जा सकता है. मेष लग्न में मंगल लग्नेश होकर अष्टमेश है इसलिये उसे अष्टमेश होने का दोषी नही माना जाता, अगर मंगल शुभ और बलि हो तो मेष लग्न में शुभ फ़लों की अतिशय वॄद्धि ही करता है. अशुभ अथवा नीच, कमजोर होने से किंचित अशुभ फ़ल भी प्रदान करता है.

शुक्र द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है , यहां शुक्र की स्थिति का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. क्योंकि शुक्र यहां द्वितियेश होने के नाते धन और कुटुंब का प्रतिनिधि है और सप्तमेष होने से जीवन के एक प्रमुख भाव यानि विवाह का भी प्रतिनिधि है.

कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब एवम विद्या के मामले यहां द्वितियेश होने के कारण शुक्र के अधीन है, बलि और शुभ प्रभाव वाला शुक्र इन फ़लों में वॄद्धि करेगा और हीनबलि व कमजोर शुक्र इन मामलों में न्यूनता प्रदान करेगा.

लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि के मामले मेष लग्न में सप्तमेष होने के नाते शुक्र के अधीनस्थ होते हैं. शुभ और बलवान शुक्र इन फ़लों में अतिशय शुभ फ़लकारी होता है और कमजोर और पाप प्रभाव वाला शुक्र इन मामलों में न्यूनता देता है.

बुध, मेष लग्न में तृतीय भाव का स्‍वामी यानि तॄतीयेश होता है. यहां बुध नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. शुभ और बलवान बुध यहां शुभ फ़लों का वॄद्धिकारक होता है जबकि कमजोर और पाप प्रभाव वाला बुध इन फ़लों में कमी और अशुभता प्रदान करता है.

बृहस्‍पति नवम भाव का स्‍वामी यानि नवमेश होता है. इस लग्न मे धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि का प्रतिनिधि वॄहस्पति यानि गुरू होता है. शुभ और बलवान वॄहस्पति की स्थिति मेष लग्न के जातको को वर्णित फ़लों की अतिशय शुभकारक प्राप्ति करवाता है जबकि हीनबलि और पाप प्रभाव वाला गुरू जैसा शुभ ग्रह भी इन फ़लों को देने में असमर्थ होता है.

शनि दशम (दशमेश) और एकादश भाव (एकादशेश) का अधिपति होता है. दशमाधिपति होने के नाते राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. एवम एकादश भाव का प्रतिनिधि होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषय का प्रतिनिधि होता है.

बलि और शुभ प्रभाव वाला शनि उपरोक्त विषयगत फ़लों में शुभ और कमजोर व पाप प्रभाव वाला शनि अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

राहु षष्ठ भाव का अधिपति यानि षष्ठेश होता है. रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि के फ़लों का दायित्व राहु पर होता है. अगर राहु शुभ प्रभाव युक्त हो तो शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और अशुभ प्रभाव वाले राहु की वजह से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु बारहवें भाव का अधिपति यानि द्वादशेश होता है. निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का दायित्व केतु पर होता है. अगर केतु शुभ प्रभाव युक्त हो तो अत्यंत शुभ प्राप्त होते हैं और अशुभ और पाप प्रभाव युक्त केतु के अतिशय अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

Tuesday, June 11, 2019

मुक्तागिरी सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ

#मुक्तागिरी_सिद्धक्षेत्र....
★★★★★★

इस पवित्र मंदिर पर आज भी होती है केसर और चंदन की बारिश।
सौंदर्य और धार्मिक स्थल मुक्तागिरी ऐसा स्थल है जहां माना जाता है कि केसर और चंदन की आज भी बारिश होती है। इस पवित्र स्थल पर  दिगम्बर जैन संप्रदाय के 52 मंदिर हैं। एक से बढ़कर एक शिल्पकला का नमूना यहां की मूर्तियों में देखने को मिलता है। मन को सुख और शांति देने वाले इस स्थल पर सैकड़ों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। यह स्थान MP के बैतूल जिले की भैंसदेही में स्थित है।
थपोड़ा गांव में स्थित यह पवित्र स्थल धार्मिक प्रभाव के कारण लोगों को अपनी ओर खींचता है। यही कारण है कि देश के कोने-कोने से जैन धर्मावलंबी यहां आते हैं ही हैं, साथ ही दूसरे धर्मों को मानने वाले भी इस मनोहारी दृश्यों को देखकर भावविभोर हो जाते हैं।

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के बीच हरे-भरे जंगलों में बसा है यह स्थल। बताया जाता है कि यहीं से साढ़े तीन करोड़ मुनिराज मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं। इसीलिए कहा गया है कि...

"अचलापूर की दिशा ईशान तहां मेंढागिरी नाम प्रधान
   साढ़े तीन कोटी मुनीराय तिनके चरण नमु चितलाय"

शास्त्रों में इसका अर्थ बताया गया है कि साढ़े तीन करोड़ संतों को नमन करों, जिन्हें पवित्र नगरी अचलपुर के उत्तर-पूर्व मेढ़ागिरी के शिखर पर निर्वाण प्राप्त किया हो।

*यहां अक्सर होती है केशर की बारिश*-

मुक्तागिरी के मेढ़ागिरी नाम के पीछे किंवदंती है कि यहां अक्सर केशर की बारिश होती है। करी एक हजार वर्ष पहले आसमान से एक मेढ़ा ध्यानमग्न एक मुनिराज के सामने आकर गिरा था। ध्यान के बाद मुनिराज ने जब उस मरणासन्न मेढ़े के कान में नमोकार मंत्र पढ़ा, तो वह मेढ़ा मरने के बाद देव बन गया। अपने मोक्ष के बाद देव बने मेढ़ा को मोक्षदाता मुनिराज का ध्यान आया। तभी से निर्वाण स्थल पर हर साल कार्तिक पूर्णिमा की रात में देव प्रतिमाओं पर केशर के छींटों का दर्शन होता है। यह कुदरती होने के कारण यह आज भी आश्चर्य का विषय बना हुआ है। केशर की यह बारिश 52 मंदिरों में से 10वें मंदिर में साफ देखी जा सकती है।


*मुक्तागिरी का दूसरा नाम है मेंढ़ागिरी*-

मुक्तागिरी का दूसरा नाम मेंढ़ागिरी भी है। निर्वाण कांड में इसका उल्लेख भी है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ का समवशरण आया था। ऐसा मोतियों की बारिश मानने से इसे मुक्तागिरी कहा जाने लगा। बताया जाता है कि भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन करने के लिए रोज अनेक श्रद्धालु आते हैं, जो बीमारी, भूत-पिशाच आदि सांसारिक परेशानियों को दूर करने की मंशा से आते हैं। लोगों की मनोकामना भी इस स्थान से पूरी हो जाती है।

श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है यहां का झरना
सतपुड़ा पर्वत की 250 फीट ऊंचा झरना भी है, जो प्राकृतिक सौंदर्य को और भी बढ़ा देता है। यहां दूर-दूर तक फैली हरियाली, पेड़-पौधे, पूरे क्षेत्र को और भी आकर्षक बना देते हैं। यहां आने वाले लोग एक अलग ही प्रकार का शांत वातावरण महसूस करते हैं। 52 मंदिरों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को 250 सीढ़ियां चढ़कर 350 सीढ़ियां उतरना पड़ती है। मान्यता है कि यहां 600 सीढ़ियां चढ़ने-उतरने से एक मनोकामना परी हो जाती है।

*पवित्रता को बचाने खरीदा था पहाड़*-

अचलपुर का पहले नाम एलिच‍पूर था। यहां स्थित मुक्त‍ागिरी सिद्धक्षेत्र को दानवीर नत्थुसा पासुसा,स्व. रायसाहेब रूखबसंगई और स्व. गेंदालाल हीरालाल बड़जात्या ने मिलकर खरीदा था। अंग्रेजों के कार्यकाल में खापर्डे के मालगुजारी में 1928 में इसे खरीदा गया था। बताया जाता है कि उस दौरान शिकार के लिए पहाड़ पर जूते-चप्पल पहन कर जाते थे और जानवरों का शिकार करते थे। इसी वजह से इस सिद्ध क्षेत्र की पवित्रता को बनाए रखने के लिए उन्होंने यह पहाड़ ही खरीद लिया था।।                          तो विलंब कैसा आइये जहाँ अभी आचार्य भगवन का समोसरण विराजित है जहाँ 51 वर्षो के बाद 5 कल्याणक का सुअवसर आया है.. पुण्य संचय का सुअवसर आ गया है..

ग्रहों की अवस्थाएं

ग्रहों की अवस्थाएं

राशि, अंशों, भावों तथा पारस्परिक सम्बन्धों के अनुसार ग्रहों की भिन्न-भिन्न प्रकार से अवस्थाएं मानी गयी हैं। ग्रह अपनी अवस्थानुसार ही फल देते हैं। ग्रहों की अवस्था का वर्गीकरण निम्नानुसार है:-

१. अंशों के आधार पर अवस्था

अंशों के आधार पर ग्रहों को पांच आयुवर्गों में बांटा गया है। विषम राशियों में बढ़ते हुए अंशों में बालक से मृत तथा सम राशियों में घटते हुए अंशों में बालक से मृत के क्रम में ग्रहों की आयु मानी गयी है।

क)  ग्रह विषम राशियों में ६° तक बालक, ६° से १२° तक कुमार, १२° से १८° तक युवा, १८° से २४° तक वृद्ध तथा २४° से ३०° तक मृत अवस्था में रहता है।

ख) ग्रह सम राशियों में ३०° से २४° तक बालक, २४° से १८° तक कुमार, १८° से १२° तक युवा, १२° से ६° तक वृद्ध तथा ६° से नीचे मृत अवस्था में होता है।

बाल्यावस्था में ग्रह का फल कम, कुमारावस्था में आधा, युवावस्था में पूर्ण, वृद्धावस्था में कम तथा मृतावस्था में नगण्य रहता है।

२. चैतन्यता के आधार पर अवस्था

क)  विषम राशि में ग्रह १०° तक जागृत, १०° से २०° तक स्वप्न तथा २०° से ३०° तक सुषुप्तावस्था में रहते हैं।

ख)  सम राशि में ग्रह १०° तक सुषुप्त, १०° से २०° तक स्वप्न तथा २०° से ३०° तक जागृत अवस्था में रहता है।

ग्रह की जागृत अवस्था कार्यसिद्धि करती है, स्वप्नावस्था मध्यम फल देती है तथा सुषुप्तावस्था निष्फल होती है।

३. दीप्ति के अनुसार अवस्था

दीप्ति के अनुसार अवस्था

क)  दीप्त - उच्च राशिस्थ ग्रह दीप्त कहलाता है। जिसका फल कार्यसिद्धि है।

ख ) स्वस्थ - स्वगृही ग्रह स्वस्थ होता है, जिसका फल लक्ष्मी व कीर्ति प्राप्ति है।

ग) मुदित - मित्रक्षेत्री ग्रह मुदित होता है, जो आनन्द देता है।

घ) दीन - नीच राशिस्थ ग्रह दीन होता है, जो कष्टदायक होता है।

ड़ ) सुप्त - शत्रुक्षेत्री ग्रह सुप्त होता है, जिसका फल शत्रु से भय होता है।

च) निपीड़ित - जो ग्रह किसी अन्य ग्रह से अंशो में पराजित हो जाये उसे निपीड़ित कहते हैं, यानि एक ग्रह की गति तीव्र हो तथा वह किसी दूसरे ग्रह से कम अंशों पर उसी राशि में हो, परन्तु गति वाला ग्रह उस ग्रह के बराबर अंशों में आगे आकर बढ़ जाए तो पीछे रहने वाला ग्रह पराजित अथवा निपीड़ित ग्रह कहलाता है, जिसका फल धनहानि है।

छ) हीन - नीच अंशोन्मुखी ग्रह हीन कहलाता है, जिसका फल धनहानि है।

ज) सुवीर्य - उच्च अंशोन्मुखी ग्रह सुवीर्य कहलाता है, जो सम्पत्ति वृद्धि करता है।

झ) मुषित - अस्त होने वाले ग्रह को मुषित कहते हैं, जिसका फल कार्यनाश है।

ञ) अधिवीर्य - शुभ वर्ग में अच्छी कांति वाले ग्रह को अधिवीर्य कहते हैं, जिसका फल कार्यसिद्धि है।

४. क्षेत्र ,युति-दृष्टि के आधार पर अवस्था

क्षेत्र, युति तथा दृष्टि के आधार पर अवस्था

क) लज्जित - पंचम स्थान में राहु-केतु के साथ अथवा सूर्य, शनि या मंगल के साथ अन्य ग्रह लज्जित होता है।

ख ) गर्वित - उच्च राशि या मूल त्रिकोण का ग्रह गर्वित होता है।

ग) क्षुधित - शत्रु के घर में, शत्रु से युक्त अथवा दृष्ट अथवा शनि से दृष्ट ग्रह क्षुधित होता है।

घ) तृषित - जल राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) में शत्रु से दृष्ट, परन्तु शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो ग्रह तृषित कहलाता है।

ड़ ) मुदित - मित्र के घर में, मित्र से युक्त, अथवा दृष्ट अथवा गुरु से युक्त ग्रह मुदित कहलाता है।

च) क्षोभित - सूर्य से युक्त, पाप या शत्रु से दृष्ट ग्रह क्षोभित कहलाता है।

फल

क) जिस भाव में क्षुधित या क्षोभित ग्रह हों उस भाव की हानि करते हैं।

ख) गर्वित या मुदित ग्रह भाव की वृद्धि करते हैं।

ग) यदि कर्म स्थान में क्षोभित, क्षुधित, तृषित अथवा लज्जित ग्रह हों तो जातक दरिद्र तथा दुःखी होता है।

घ) पंचम स्थान में लज्जित ग्रह संतान नष्ट करता है।

ड़) सप्तम स्थान में क्षोभित, क्षुधित अथवा तृषित ग्रह पत्नी का नाश करता है।

कुल मिला कर गर्वित व मुदित ग्रह एक प्रकार से सुख देते हैं, जबकि लज्जित, क्षुधित, तृषित एवं क्षोभित ग्रह कष्ट देने वाले होते हैं।

५. सूर्य से दूरी के अनुसार अवस्था


क) अस्तंगत - सूर्य से युक्त ग्रह (राहु केतु को छोड़कर) अस्त कहलाते हैं। चंद्रमा सूर्य से १२°, मंगल १०°, वक्री बुध १२°, मार्गी बुध १४°, गुरु ११°,  वक्री शुक्र ८°, मार्गी शुक्र १०° तथा शनि १५° की दूरी तक सूर्य की प्रखर किरणों के कारण अस्तंगत होते हैं। ऐसे ग्रहों को मुषित कहते हैं।

ख ) उदयी - सूर्य से उपरोक्त अंशों से अधिक दूर हो जाने पर ग्रह उदय हो जाते हैं।

पूर्वोदयी -  जो ग्रह सूर्य से धीमा हो तथा सूर्य से अंशों में कम हो उसका उदय पूर्व में होता है।

पश्चिमोदयी - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा तीव्र हों तथा सूर्य से अधिक अंशों पर हो, उसका उदय पश्चिम से होता है।

पूर्वास्त - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा तीव्र हों और सूर्य से कम अंशों में हों, उसका अस्त पूर्व में होता है।

पश्चिमास्त - जो ग्रह सूर्य की अपेक्षा धीमा हो और सूर्य से अधिक अंशों में हों, उस ग्रह का अस्त पश्चिम में होता है।

६.गति के अनुसार अवस्था-

गति के अनुसार अवस्था -

क) सूर्य तथा चंद्रमा सदैव मार्गी रहते हैं। मेष से वृषभ, मिथुन आदि के क्रम में चलने वाले।

ख) राहु और केतु सदैव वक्री रहते हैं। मिथुन से वृषभ आदि के क्रम में चलने वाले।

ग) शेष ग्रह मंगल, बुध, गुरु व शनि सामान्यतः मार्गी होते हैं पर बीच-बीच में वक्री भी हो जाते हैं।

घ) इन ग्रहों की गति  मार्गी से वक्री तथा मार्गी से वक्री होते समय अति मंद हो जाती है।

ड़) यह ग्रह वक्री होने के कुछ दिन पहले व कुछ दिन बाद तक स्थिर दिखाई पड़ते हैं।

७, सूर्य से भावों की दूरी के अनुसार अवस्था -

क ) सूर्य से दूसरे स्थान पर ग्रहों की गति तीव्र हो जाती है।

ख ) सूर्य से तीसरे स्थान पर सम तथा चौथे स्थान पर गति मंद हो जाती है।

ग)  सूर्य से पांचवे व छठे स्थान पर ग्रह वक्री हो जाता है।

घ)  सूर्य से सातवें व आठवें स्थान पर ग्रह अतिवक्री हो जाता है।

ड़ ) सूर्य से नवें व दसवें स्थान पर ग्रह मार्गी हो जाता है।

च)  सूर्य से ग्यारहवें व बारहवें स्थान पर ग्रह पुनः तीव्र हो जाता है।

 क्रूर ग्रह वक्री  होने पर अधिक क्रूर फल देते हैं, परन्तु सौम्य ग्रह वक्री होने पर अति शुभ फल देते हैं।

डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य
अविनाश कॉलोनी सागर नाका दमोह
9826443973

दशा एवम महादशा में ग्रहों का प्रभाव

ग्रहों की स्थिति के आधार पर दशा का अवलोकन |

   जन्म कुण्डली में महादशा के फल अथवा अन्तर्दशा के फल ग्रहों की कुंडली में स्थिति पर निर्भर करते हैं और महादशा में अन्तर्दशा के फल दोनो ग्रहों की एक-दूसरे से परस्पर स्थिति पर निर्भर करते हैं. आइए इसे कुछ बिंदुओ की सहायता से समझने का प्रयास करते हैं.

महादशानाथ यदि राहु/केतु अक्ष पर स्थित है तब यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है.
जब द्वादशेश की युति द्वित्तीयेश के साथ होती है या दृष्टि होती है तब वह अपनी दशा/अन्तर्दशा में वह एक बली मारक बन सकता है.
जन्म कुंडली में केन्द्र के शुभ स्वामी ग्रह अपने मित्र की दशा/अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करते हैं.
सर्वाष्टकवर्ग में जिस ग्रह से 11वें भाव में अधिकतम बिंदु होते हैं या जो ग्रह स्वयं अधिक बिंदुओ के साथ कुंडली में स्थित होता है उस ग्रह की दशा/अन्तर्दशा शुभ फल प्रदान करती है.
यदि जन्म कुंडली में शुक्र तथा शनि दोनो ही बली अवस्था में स्थित हो तब यह दोनो अपनी दशा/अन्तर्दशा में व्यक्ति को असफलताएँ प्रदान कराते हैं. लेकिन यदि यह दोनो ग्रह एक-दूसरे से छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों या एक-दूसरे से त्रिक भावों में स्थित हो तब यह यह एक-दूसरे की दशा में शुभ फल प्रदान करते हैं.
यदि जन्म कुंडली का उच्च का ग्रह नवांश में नीच का हो जाता है तब वह शुभ व अच्छे फल देने में असफल रहता है. यदि जन्म कुंडली का नीच का ग्रह नवांश में उच्च का हो जाता है तब वह अपनी दशा/अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करता है.
राहु यदि त्रिक भाव में स्थित होकर केन्द्रेश अथवा त्रिकोणेश से युति करता है तब अपनी आरंभ की दशा में शुभ फल देता है लेकिन बाद की दशा में व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए अशुभ हो जाती है.
यदि जन्म कुंडली में शुक्र व बृहस्पति दोनो ही वृश्चिक राशि में स्थित हों या दोनो में से एक ग्रह वृश्चिक राशि में हो लेकिन एक-दूसरे की दृष्टि में हों तब शुक्र की दशा में शुभ परिणाम मिलते हैं.
यदि जन्म कुंडली में सूर्य तथा बुध की युति होती है तब बुध की दशा शुभता प्रदान करती है.
जन्म कुंडली में चंद्रमा तथा मंगल की युति होने पर या परस्पर दृष्टि संबंध बनने पर चंद्रमा की दशा अत्यधिक शुभ हो जाती है लेकिन मंगल की दशा सामान्य सी ही रहती है.
जन्म कुंडली में यदि शनि तथा बृहस्पति की युति अथवा दृष्टि संबंध बन रहा हो तब शनि की दशा तो शुभ हो जाएगी लेकिन बृहस्पति की दशा सामान्य लाभ देने वाली होगी.
इसी प्रकार यदि चंद्रमा व बृहस्पति युति कर रहे हो या दृष्टि संबंध बना रहे हों तब चंद्रमा की दशा शुभ हो जाएगी लेकिन बृहस्पति की दशा साधारण रह सकती है.
किसी भी भाव विशेष से आठवें भाव का स्वामी अपनी दशा में भाव का नाश करता है.
किसी भी भाव विशेष से 22वें द्रेष्काण का स्वामी ग्रह अपनी दशा में उस भाव के संबंध में अशुभ फल प्रदान करता है.
किसी भी भाव से छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठे ग्रह यदि निर्बल अवस्था में हों तब अपनी दशा में अशुभ फल प्रदान करते हैं.
यदि महादशानाथ से अन्तर्दशानाथ दूसरे, चौथे, पांचवें, नवें, दसवें या ग्यारहवें भाव में हो तब शुभ फल मिलते हैं.
अन्तर्दशानाथ और महादशानाथ एक-दूसरे से समसप्तक हो तो इसे सामान्य स्थिति माना जाता है और यह हल्के परिणाम देती है.
यदि अन्तर्दशानाथ, महादशानाथ से तीसरे, छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित होता है तब अशुभ फल मिलते हैं.
यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ नैसर्गिक मित्र होते हैं तथा शुभ भावों के स्वामी होते हैं तब अपनी दशा में अच्छे परिणाम देते हैं.
जन्म कुंडली में महादशानाथ की उच्च राशि में यदि अन्तर्दशानाथ स्थित होता है तब यह अपनी दशा में अनुकूल फल प्रदान करता है.
महादशानाथ से चौथे, पांचवें, नवम व दशम भाव के स्वामियों की दशा व्यक्ति को अनुकूल फल प्रदान करती है.
महादशानाथ और उसके नक्षत्रेश(महादशानाथ जिस नक्षत्र में स्थित है) की दशा/अन्तर्दशा में जीवन की मई महत्वपूर्ण घटनाएँ घटती हैं.
जन्म कुंडली में जिस ग्रह की महादशा चल रही है उसकी गोचर में स्थिति फलों का निर्धारण करती है अथवा महादशानाथ से गोचर के अन्य ग्रहों की स्थिति दशा के प्रभावों में परिवर्तन लाती है.
दशानाथ यदि त्रिक भाव का स्वामी ना होकर शुभ भाव का स्वामी होता है और गोचर में जब वह अपनी उच्च, स्वराशि, मूलत्रिकोण राशि में आता है या जिस भाव में दशानाथ स्थित है उस भाव से तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें भाव में आता है तब शुभ फलों की प्राप्ति होती है.।।

वास्तु के अनुसार अशुभ वास्तु के उपाय

वास्तुशास्त्र घर की नेगेटिव एनर्जी को दूर करने में कारगर है

हर किसी को अपने घर का सपना होता हैं। हर कोई चाहता है कि वह अपने सपने का आशियाना बनाए। महंगाई और प्रतिस्पर्द्धा के दौर में जिसे, जहां जो जगह मिलती है, वह अपना घर बना लेता है। घर बनाने के दौरान यदि घर में वास्तु की कमी रह जाती है तो वे हमें मानसिक तनाव के साथ-साथ कई प्रकार की बीमारियां घेर लेती हैं।

वास्तुशास्त्र बहुत ही गूढ़ विधा है। ऐसे में आज हम केवल घर के मालिक के शयन कक्ष (बैड रूम) की स्थिति पर ही केंद्रित यह आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। घर का मुखिया स्वस्थ और तनाव रहित रहेगा तो घर में भी समृद्धि बरसेगी।

वास्तुशास्त्र का कहना है कि यदि हमारा घर यूनिवर्सल एनर्जी सिस्टम के आधार पर बना हो तो कोई भी बाहरी तत्व वहां रहने वालों को तनावपूर्ण या चिंतित नहीं कर सकता। वास्तु शास्त्र के अनुसार बनाया गया घर यह सुनिश्चित करता है कि घर में रहने वाले लोग हमेशा शांति महसूस करेंगे।

 *गलत दिशा में सोना, यानी सबकुछ खोना*

वास्तुशास्त्र कहता है कि जब किसी घर के लोग गलत दिशा में सोना शुरू कर देते हैं तो उन्हें चिंताएं और विभिन्न प्रकार की बीमारियां घेर लेती हैं। ऐसे लोगों में जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आना, आपा खोना, नौकरी छूटने या व्यवसाय डूबने के डर के साथ जीना, हमेशा नुक्सान होने का अंदेशा रहना या किसी बीमारी का भ्रम होना आम हो जाता है। इन सब अनिश्चितताओं की स्थितियों के चलते ऐसे लोगों में मानसिक तनाव, ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर, सामाजिक चिंता और पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस जैसी बीमारियों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

‘पूर्व-दक्षिण-पूर्व’ दिशा में नहीं होना चाहिए बैडरूम

वास्तुशास्त्र कहला है कि आदर्श स्थिति में कभी भी पूर्व-दक्षिण-पूर्व में बैडरूम नहीं होना चाहिए। वास्तुशास्त्र केवल आदर्श दिशा के बारे में ही नहीं बताता बल्कि यह भी बताता है कि यदि आपके घर में वास्तुदोष है तो किस तरह निगेटिव एनर्जी को खत्म किया जा सकता है। यह शास्त्र केवल दोषों का पता नहीं लगाता, यह समस्याओं का समाधान भी बताता है।

 *ऐसे पा सकते है वास्तुदोष से मुक्ति*

यदि आपका बेडरूम पहले से पूर्व-दक्षिण-पूर्व क्षेत्र में है और आप इसे किसी ओर दिशा में नहीं बना सकते है तो घबराएं नहीं, वास्तुशास्त्र में इसका भी समाधान है।

सबसे पहले आपको इस स्थान के नकारात्मक प्रभाव को ठीक करना होगा। इसके लिए आप बैडरूम की दीवारों को लाइट क्रीम या हल्के पीले रंग के शेड या पेस्टल ग्रीन के लाइट टोन में रंगवाएं। ऐसा करने से बैडरूम की नेगेटिव एनर्जी दूर हो जाएगी। वास्तु के अनुसार बैडरूम की दीवारों पर ये रंग लगाने से काफी हद तक तनाव और चिंता का खात्मा हो जाता है।

वास्तुदोष के कारण होने वाली बीमारियों के मूल कारण को जानने की कोशिश किए बिना आज बहुत से लोग तनाव, चिंता और डिप्रेशन के साथ जी रहे हैं। डॉक्टर्स के पास भी वास्तुदोष के कारण होने वाली बीमारियों का कोई पुख्ता इलाज नहीं है। कई बार आपने डॉक्टर्स के मुंह से यह भी सुना होगा कि जल्दी ठीक होना चाहते हो तो कुछ कहीं अच्छी जगह घूमने जाओ, ताजी हवा और सुरम्य स्थलों की सैर करो। शायद ऐसा करने से वास्तुदोष के कारण पैदा होने वाली नेगेटिव एनर्जी से छुटकारा मिलता हो और व्यक्ति शीघ्रता से स्वस्थ हो जाता है।

 *ऐसे काम करता है वास्तुशास्त्र*

वास्तुशास्त्र ने घर में की जाने वाली हर गतिविधि के लिए कुछ दिशाओं का वर्गीकरण किया है। ये वर्गीकरण हर दिशा में मौजूद एनर्जी के स्तर के अनुसार किए गए हैं, जब किसी घर में रहने वाले लोग ‘मन मंथन वाली दिशा’ यानी ‘पूर्व-दक्षिण-पूर्व’ में सोना शुरू कर देते हैं तो उन्हें चिंताएं घेर लेती हैं।

चिंता का दूसरा कारण इस क्षेत्र में योग या प्रार्थना करना भी घर में नेगेटिव एनर्जी को बढ़ा देता है। गत 12वर्षों के दौरान वास्तु के क्षेत्र में किए गए शोध एक आश्चर्यजनक तथ्य करते हैं। इस तथ्य के अनुसार डायबिटीज और हाई ब्लडप्रेशर से जूझ रहे अधिकतर लोगों के घरों में रसोई  ‘पूर्व-दक्षिण-पूर्व’ दिशा में बनी होती है।

पूर्व-दक्षिण-पूर्व दिशा में सोने वाले या इस दिशा में रसोई बनी होने से ऐसे घरों में रहने वाले लोगों में सही निर्णय ले पाने की क्षमता खो देता है और उसे कई मामलों में नुकसान का सामना करना पड़ता है। इससे कई स्तरों पर उसकी चिंता और भी बढ़ जाती है।  ‘पूर्व-दक्षिण-पूर्व’ दिशा में सोने से व्यक्ति की चिंता का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने के कारण उसे उलझते रिश्ते और खराब स्वास्थ्य का सामना करना पड़ सकता है। उसके दिमाग में विचारों की उधेड़बुन चलती रहती है।

समझदारी से लें काम

आजकल वास्तुशास्त्र या धर्म के नाम पर चारों ओर लूटने वालों की फौज खड़ी है। ऐसे में आप किसी बहकावे में नहीं आएं। पूरी तरह से पड़ताल के बाद वास्तु सलाहकार का चुनाव करें। यदि वास्तव में कोई वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञाता होगा, तो आपको बिना किसी तोड़फोड़ के कम खर्च में ही वास्तुदोष निवारण के कुछ ऐसे अचूक उपाय सुझाएगा, जो आपके जीवन में पॉजिटिव एनर्जी भर देंगे।

कुंडली में उच्च मंगल ग्रह का फल

कुंडली में उच्च ग्रह

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मकर राशि में स्थित होने पर मंगल को उच्च का मंगल कहा जाता है जिसका साधारण शब्दों में अर्थ यह होता है कि मकर राशि में स्थित होने पर मंगल अन्य सभी राशियों की तुलना में सबसे बलवान हो जाते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में उच्च का मंगल सदा शुभ फलदायी होता है जो सत्य नहीं है क्योंकि कुंडली में मंगल का उच्च होना केवल उसके बल को दर्शाता है तथा उसके शुभ या अशुभ स्वभाव को नहीं जिसके चलते किसी कुंडली में उच्च का मंगल शुभ अथवा अशुभ दोनों प्रकार के फल ही प्रदान कर सकता है जिसका निर्णय उस कुंडली में मंगल के शुभ अशुभ स्वभाव को देखकर ही लिया जा सकता है। आज के इस लेख में हम कुंडली के विभिन्न 12 घरों में स्थित होने पर उच्च के मंगल द्वारा प्रदान किये जाने वाले कुछ संभावित शुभ तथा अशुभ फलों के बारे में विचार करेंगे।

उच्चस्थ मंगल ग्रह के कुंडली में भावानुसार फल

प्रथम भाव-

  1  कुंडली के पहले घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के पहले घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन से संबंधित शुभ फल दे सकता है विशेषतया तब जब ऐसा शुभ मंगल कुंडली के पहले घर में स्थित होकर कुंडली में शुभ फलदायी मांगलिक योग बनाता हो। इस प्रकार का शुभ उच्च मंगल जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में भी शुभ फल प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसाय के माध्यम से बहुत धन कमा सकते हैं। कुंडली के पहले घर में स्थित शुभ मंगल जातक की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने में सहायता कर सकता है जिसके कारण इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातक आर्थिक रूप से समृद्ध अथवा बहुत समृद्ध हो सकते हैं तथा इस प्रकार का शुभ प्रभाव जातक को सुख, सुविधा तथा ऐश्वर्य से युक्त जीवन भी प्रदान कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के पहले घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकतीं हैं तथा ये समस्याएं उस स्थिति में और भी दुखदायी हो सकतीं हैं जब कुंडली के पहले घर में स्थित ऐसा अशुभ उच्च मंगल कुंडली में मांगलिक दोष का निर्माण कर दे। कुंडली के किसी भी घर में अशुभ उच्च के मंगल द्वारा बनाया गया मांगलिक दोष जातक के वैवाहिक जीवन को बहुत कष्टमय बना सकता है क्योंकि ऐसा अशुभ मंगल उच्च होने के कारण बहुत अधिक बलवान हो जाता है जिसके कारण ऐसे बलवान मंगल द्वारा बनाया गया मांगलिक दोष भी साधारण मांगलिक दोष की तुलना में अधिक बलवान होता है जिसके कारण इस प्रकार के मांगलिक दोष से पीड़ित जातक का एक विवाह तो आसानी से टूट सकता है तथा जातक की शेष कुंडली अनुकूल न होने की स्थिति में जातक के एक से अधिक विवाह भी टूट सकते हैं। कुंडली के पहले घर में स्थित अशुभ उच्च का मंगल जातक के व्यवसायिक क्षेत्र में भी बाधाएं पैदा कर सकता है जिसके कारण इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों को लंबे समय तक व्यवसायहीन रहना पड़ सकता है।
द्वितीय भाव

2  कुंडली के दूसरे घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के दूसरे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन को बहुत सुखमय बना सकता है, विशेषतया तब जब इस प्रकार का शुभ उच्च मंगल कुंडली में शुभ फलदायी मांगलिक योग बना रहा हो जिसके चलते ऐसे जातक को अपने विवाह से बहुत सुख प्राप्त हो सकता है। कुंडली में इस प्रकार के उच्च मंगल का शुभ प्रभाव जातक को बहुत मात्रा में धन भी प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपने व्यवसाय से बहुत मात्रा में धन कमाने के अतिरिक्त नाम तथा यश भी कमाते हैं। कुंडली के दूसरे घर में स्थित शुभ उच्च का मंगल जातक को बहुत अच्छी अथवा उत्तम संतान भी प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के प्रभाव में आने वाले जातक की संतान जातक की सेवा करने वाली और जातक को सहायता प्रदान करने वाली होती है। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के दूसरे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन में गंभीर अथवा अति गंभीर समस्याएं पैदा हो सकतीं हैं तथा यह समस्याएं उस स्थिति में और भी गंभीर बन सकती हैं जब इस प्रकार का अशुभ उच्च मंगल कुंडली में मांगलिक दोष का निर्माण कर दे। इस प्रकार के मांगलिक दोष से पीड़ित कुछ जातकों का विवाह देरी से अथवा बहुत ही देरी से हो सकता है जबकि इस प्रकार के मांगलिक दोष के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ अन्य जातकों के 2 या इससे भी अधिक विवाह बहुत बुरी स्थितियों में टूट सकते हैं। कुंडली के दूसरे घर में स्थित अशुभ उच्च का मंगल जातक की आर्थिक स्थिति पर भी अशुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले जातकों को समय समय पर अनचाहे खर्चों से पीड़ित रहना पड़ सकता है जिससे इन जातकों की आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। कुंडली के दूसरे घर में स्थित अशुभ उच्च का मंगल जातक को अनेक प्रकार के रोगों से पीड़ित भी कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के अशुभ प्रभाव में आने वाले विभिन्न जातक भिन्न भिन्न प्रकार के रोगों के कारण लंबे समय तक कष्ट उठा सकते हैं।


तृतीय भाव
3  कुंडली के तीसरे घर में उच्च का मंगल : कुंडली के तीसरे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक को स्वस्थ तथा बलवान शरीर प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया जीवन भर स्वस्थ तथा सक्रिय रहते हैं। इस प्रकार का शुभ प्रभाव जातक को बहुत साहस, पराक्रम तथा शौर्य प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के उच्च मंगल के शुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातक युद्ध कला में बहुत प्रवीण हो सकते हैं तथा पुलिस बल, सेना बल अथवा ऐसी किसी अन्य संस्था में कार्यरत हो सकते हैं जहां इन्हें अपने शौर्य प्रदर्शन का भरपूर अवसर प्राप्त हो सके। कुंडली के तीसरे घर में स्थित शुभ उच्च के मंगल के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी साहस, आशा तथा प्रयत्न का साथ नहीं छोड़ते तथा अपनी निरंतर संघर्ष करते रहने की क्षमता के कारण विकट से विकट परिस्थितियों में से भी निकल कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार के जातक सामान्यतया बहुत अच्छे मित्र भी सिद्ध होते हैं तथा विपत्ति में फंसे अपने किसी मित्र की सहायता करने के लिए ऐसे जातक अपने प्राणों को संकट में भी डाल सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के तीसरे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक को अपने विरोधियों तथा शत्रुओं के कारण बहुत विकट परिस्थितियों तथा संकटों का सामना करना पड़ सकता है तथा ऐसे जातक के विरोधी अथवा शत्रु जातक को हानि पहुंचाने के लिए समय समय पर जातक के विरुद्ध षड़यंत्र रचते रहते हैं। कुंडली के तीसरे घर में स्थित अशुभ उच्च मंगल के प्रभाव में आने वाले जातकों को अपने मित्रों, सहयोगियों अथवा भाईयों के कारण भी संकट अथवा हानि का सामना करना पड़ सकता है तथा कुछ स्थितियों में इस प्रकार के अशुभ प्रभाव के कुंडली में बहुत प्रबल होने पर जातक का कोई करीबी मित्र या जातक का सगा भाई भी जातक के साथ विश्वासघात करके उसे गंभीर आर्थिक हानि पहुंचा सकता है अथवा उसे किसी अन्य प्रकार के गंभीर संकट में डाल सकता है।

चतुर्थ भाव

4  कुंडली के चौथे घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के चौथे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक के विवाह तथा वैवाहिक जीवन पर शुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते जातक का वैवाहिक जीवन बहुत सुखमय तथा आनंदमय बन सकता है तथा यह संभावनाएं उस स्थिति में और भी बलवान हो जातीं हैं जब कुंडली में स्थित ऐसा शुभ उच्च का मंगल कुंडली में शुभ फलदायी मांगलिक योग बनाता हो। इस प्रकार का शुभ उच्च मंगल जातक को सुंदर तथा धनी पत्नी प्रदान कर सकता है तथा ऐसे शुभ प्रभाव में आने वाले जातकों को अपने जीवन में अनेक प्रकार के सुखों, सुविधाओं तथा साधनों आदि की प्राप्ति होती है जिसके चलते इन जातकों का जीवन सुविधापूर्वक तथा आनंदमय होता है। कुंडली के चौथे घर में स्थित शुभ उच्च का मंगल जातक को विभिन्न प्रकार के सुविधापूर्वक वाहन, आलीशान घर, सुख सुविधा के अन्य साधन तथा बहुत से अन्य लाभ प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसायिक जीवन में भी सफल अथवा बहुत सफल रहते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के चौथे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर सकता है तथा जातक के वैवाहिक जीवन में आने वाली मुसीबतें उस स्थिति में और भी बढ़ सकतीं हैं जब इस प्रकार का अशुभ उच्च मंगल कुंडली में मांगलिक दोष बनाता हो। इस प्रकार के मांगलिक दोष के दुष्प्रभाव में आने वाले जातक का विवाह किसी कठोर अथवा बहुत कठोर स्वभाव वाली अथवा बुरे आचरण वाली स्त्री के साथ हो सकता है जो अपने स्वभाव और आचरण के चलते जातक के वैवाहिक जीवन को बहुत कष्टमय अथवा नर्क समान बना सकती है। कुंडली के चौथे घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का दुष्प्रभाव जातक की मानसिक शांति पर अशुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते ऐसे जातक किसी न किसी प्रकार की चिंता के कारण मानसिक रूप से पीड़ित तथा अशांत ही रहते हैं।
पंचम भाव
5   कुंडली के पांचवें घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के पांचवें घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक की आर्थिक समृद्धि पर शुभ प्रभाव डाल सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक आर्थिक रूप से समृद्ध अथवा बहुत समृद्ध हो सकते हैं। इस प्रकार का शुभ प्रभाव जातक को रचनात्मक विशेषताएं भी प्रदान कर सकता है जिसके चलते ऐसे जातक रचनात्मकता से जुड़े व्यवसायिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। कुंडली के पांचवें घर में स्थित शुभ उच्च का मंगल जातक को आध्यात्म तथा परा विज्ञान जैसे क्षेत्रों के प्रति रूचि तथा इन क्षेत्रों में विकास करने की क्षमता भी प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के कुछ जातक ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, हस्त रेखा शास्त्र आदि जैसे क्षेत्रों में भी कार्यरत पाये जा सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के पांचवें घर में स्थित उच्च का मंगल अशुभ होने की स्थिति में जातक की शिक्षा पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है जिसके कारण इस प्रकार के कुछ जातक उच्च शिक्षा प्राप्त ही नहीं कर पाते जबकि इस प्रकार के कुछ अन्य जातकों की शिक्षा बहुत रुकावटों के पश्चात ही पूर्ण हो पाती है। कुंडली के पांचवें घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का प्रभाव जातक को किसी असामान्य प्रेम संबंध में पड़ने के कारण बहुत समस्याएं दे सकता है। उदाहरण के लिए इस प्रकार के कुछ जातक किसी विवाहित स्त्री के साथ प्रेम संबंध स्थापित कर सकते हैं जिसका भेद खुल जाने के कारण इन जातकों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली के पांचवें घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का प्रभाव जातक को स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से भी पीड़ित कर सकता है तथा इस प्रकार के अशुभ मंगल के प्रबल प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों को अपने जीवन में एक से अधिक बार शल्य चिकित्सा अर्थात सर्जरी का सामना करना पड़ सकता है।

षष्ट भाव
6  कुंडली के छठे घर में उच्च का मंगल : किसी कुंडली के छठे घर में स्थित उच्च का मंगल शुभ होने की स्थिति में जातक को स्वस्थ शरीर तथा लंबी आयु प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ मंगल के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया स्वस्थ ही रहते हैं। कुंडली में उच्च मंगल का इस प्रकार का प्रभाव जातक के व्यवसायिक क्षेत्र में भी शुभ फल प्रदान कर सकता है जिसके चलते इस प्रकार के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक विभिन्न व्यवसायिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। कुंडली के छठे घर में स्थित शुभ उच्च के मंगल का विशिष्ट प्रबल प्रभाव जातक को सरकार में कोई उच्च आधिकारिक पद प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के कुछ जातक राजनीति के माध्यम से भी सरकार में लाभ तथा प्रभुत्व वाला कोई पद प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के शुभ मंगल के प्रभाव में आने वाले राजनेता सामान्यता जनता के मध्य बहुत लोकप्रिय होते हैं तथा जन समुदाय के समर्थन के कारण ही ऐसे नेता सरकार में प्रभुत्व का कोई पद प्राप्त करते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुंडली के छठे घर में स्थित उच्च के मंगल के अशुभ होने की स्थिति में जातक को अपनी संपत्ति आदि से संबंधित विवादों के चलते लंबे समय तक कोर्ट केसों का सामना करना पड़ सकता है तथा इस प्रकार के अशुभ प्रभाव के कुंडली में बहुत प्रबल होने की स्थिति में जातक को न्यायालय के प्रतिकूल निर्णय के कारण संपत्ति अथवा धन की हानि भी उठानी पड़ सकती है। कुंडली के छठे घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल के प्रभाव के कारण जातक को अपने पिता के माध्यम से आने वाली अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है जिसके चलते इस प्रकार के कुछ जातकों को अपने पिता द्वारा लिया गया कर्ज चुकाना पड़ सकता है जबकि कुछ अन्य जातकों को बहुत लंबे समय तक अपने पिता के किसी रोग के उपचार के लिए बहुत धन व्यय करना पड़ सकता है जिससे इन जातकों को धन की कमी का सामना भी करना पड़ सकता है। कुंडली के छठे घर में स्थित अशुभ उच्च के मंगल का दुष्प्रभाव जातक को किसी गंभीर रोग से पीड़ित भी कर सकता है।।

शेष 6 भाव का फल  अगले ब्लॉग में देंगें ।

डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...