Thursday, June 27, 2019

शरीर पर तिल का फल अंगों के अनुसार

शरीर के विभिन्न अंगों पर तिलों का फल
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भारतीय ज्योतिष में सामुद्रिक शास्त्र में शरीर के विभिन्न अंगों पर पाए जाने वाले तिलों का सामान्य फल इस प्रकार है।

१- ललाट पर तिल – ललाट के मध्य भाग में तिल निर्मल प्रेम की निशानी है। ललाट के दाहिने तरफ का तिल किसी विषय विशेष में निपुणता, किंतु बायीं तरफ का तिल फिजूलखर्ची का प्रतीक होता है। ललाट या माथे के तिल के संबंध में एक मत यह भी है कि दायीं ओर का तिल धन वृद्धिकारक और बायीं तरफ का तिल घोर निराशापूर्ण जीवन का सूचक होता है।

२-  भौंहों पर तिल – यदि दोनों भौहों पर तिल हो तो जातक अकसर यात्रा करता रहता है। दाहिनी पर तिल सुखमय और बायीं पर तिल दुखमय दांपत्य जीवन का संकेत देता है।

३- आंख की पुतली पर तिल – दायीं पुतली पर तिल हो तो व्यक्ति के विचार उच्च होते हैं। बायीं पुतली पर तिल वालों के विचार कुत्सित होते हैं। पुतली पर तिल वाले लोग सामान्यत: भावुक होते हैं।

४-  पलकों पर तिल – आंख की पलकों पर तिल हो तो जातक संवेदनशील होता है। दायीं पलक पर तिल वाले बायीं वालों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होते हैं।

५-  आंख पर तिल – दायीं आंख पर तिल स्त्री से मेल होने का एवं बायीं आंख पर तिल स्त्री से अनबन होने का आभास देता है।

६-  कान पर तिल – कान पर तिल व्यक्ति के अल्पायु होने का संकेत देता है।

७- नाक पर तिल – नाक पर तिल हो तो व्यक्ति प्रतिभासंपन्न और सुखी होता है। महिलाओं की नाक पर तिल उनके सौभाग्यशाली होने का सूचक है।

८-  होंठ पर तिल – होंठ पर तिल वाले व्यक्ति बहुत प्रेमी हृदय होते हैं। यदि तिल होंठ के नीचे हो तो गरीबी छाई रहती है।

९- मुंह पर तिल – मुखमंडल के आसपास का तिल स्त्री तथा पुरुष दोनों के सुखी संपन्न एवं सज्जन होने के सूचक होते हैं। मुंह पर तिल व्यक्ति को भाग्य का धनी बनाता है। उसका जीवनसाथी सज्जन होता है।

१०-  गाल पर तिल – गाल पर लाल तिल शुभ फल देता है। बाएं गाल पर कृष्ण वर्ण तिल व्यक्ति को निर्धन, किंतु दाएं गाल पर धनी बनाता है।

११-  जबड़े पर तिल – जबड़े पर तिल हो तो स्वास्थ्य की अनुकूलता और प्रतिकूलता निरंतर बनी रहती है।
ठोड़ी पर तिल – जिस स्त्री की ठोड़ी पर तिल होता है, उसमें मिलनसारिता की कमी होती है।

१२-  कंधों पर तिल – दाएं कंधे पर तिल का होना दृढ़ता तथा बाएं कंधे पर तिल का होना तुनकमिजाजी का सूचक होता है।

१३-  दाहिनी भुजा पर तिल – ऐसे तिल वाला जातक प्रतिष्ठित व बुद्धिमान होता है। लोग उसका आदर करते हैं।

१४-  बायीं भुजा पर तिल – बायीं भुजा पर तिल हो तो व्यक्ति झगड़ालू होता है। उसका सर्वत्र निरादर होता है। उसकी बुद्धि कुत्सित होती है।

१५-  कोहनी पर तिल – कोहनी पर तिल का पाया जाना विद्वता का सूचक है।

१६-  हाथों पर तिल – जिसके हाथों पर तिल होते हैं वह चालाक होता है। गुरु क्षेत्र में तिल हो तो सन्मार्गी होता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो बलवान और दायीं हथेली के पृष्ठ भाग में हो तो धनवान होता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो जातक खर्चीला तथा बायीं हथेली के पृष्ठ भाग पर तिल हो तो कंजूस होता है।

१७-  अंगूठे पर तिल – अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।

१८-  तर्जनी पर तिल – जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीड़ित होता है।

१९-  मध्यमा पर तिल – मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।

२०-  अनामिका पर तिल – जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।
कनिष्ठा पर तिल – कनिष्ठा पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।

२१-  जिसकी हथेली में तिल मुठ्ठी में बंद होता है वह बहुत भाग्यशाली होता है लेकिन यह सिर्फ एक भ्रांति है। हथेली में होने वाला हर तिल शुभ नहीं होता कुछ अशुभ फल देने वाले भी होते हैं।

२२-  सूर्य पर्वत मतलब रिंग फिंगर के नीचे के क्षेत्र पर तिल हो तो व्यक्ति समाज में कलंकित होता है। किसी की गवाही की जमानत उल्टी अपने पर नुकसान देती है। नौकरी में पद से हटाया जाना और व्यापार में घाटा होता है। मान- सम्मान पर प्रभावित होता है और नेत्र संबंधित रोग तंग करते हैं।

२३- बुध पर्वत यानी लिटिल फिंगर के नीचे के क्षेत्र पर तिल हो तो व्यक्ति को व्यापार में हानि उठानी पड़ती है। ऐसा व्यक्ति हिसाब-किताब व गणित में धोखा खाता है और दिमागी रूप से कमजोर होता है।

२४-  लिटिल फिंगर के नीचे वाला क्षेत्र जो हथेली के अंतिम छोर पर यानी मणिबंध से ऊपर का क्षेत्र जो चंद्र क्षेत्र कहलाता है, इस क्षेत्र पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति के विवाह में देरी होती है। प्रेम में लगातार असफलता मिलती है। माता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।

२५-  गले पर तिल – गले पर तिल वाला जातक आरामतलब होता है। गले पर सामने की ओर तिल हो तो जातक के घर मित्रों का जमावड़ा लगा रहता है। मित्र सच्चे होते हैं। गले के पृष्ठ भाग पर तिल होने पर जातक कर्मठ होता है।

२६-  छाती पर तिल – छाती पर दाहिनी ओर तिल का होना शुभ होता है। ऐसी स्त्री पूर्ण अनुरागिनी होती है। पुरुष भाग्यशाली होते हैं। शिथिलता छाई रहती है। छाती पर बायीं ओर तिल रहने से भार्या पक्ष की ओर से असहयोग की संभावना बनी रहती है। छाती के मध्य का तिल सुखी जीवन दर्शाता है। यदि किसी स्त्री के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है।

२७- कमर पर तिल – यदि किसी व्यक्ति की कमर पर तिल होता है तो उस व्यक्ति की जिंदगी सदा परेशानियों से घिरी रहती है।

२८-  पीठ पर तिल – पीठ पर तिल हो तो जातक भौतिकवादी, महत्वाकांक्षी एवं रोमांटिक हो सकता है। वह भ्रमणशील भी हो सकता है। ऐसे लोग धनोपार्जन भी खूब करते हैं और खर्च भी खुलकर करते हैं। वायु तत्व के होने के कारण ये धन संचय नहीं कर पाते।

२९-  पेट पर तिल – पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसा व्यक्ति भोजन का शौकीन व मिष्ठान्न प्रेमी होता है। उसे दूसरों को खिलाने की इच्छा कम रहती है।

३०-  घुटनों पर तिल – दाहिने घुटने पर तिल होने से गृहस्थ जीवन सुखमय और बायें पर होने से दांपत्य जीवन दुखमय होता है।

३१-  पैरों पर तिल – पैरों पर तिल हो तो जीवन में भटकाव रहता है। ऐसा व्यक्ति यात्राओं का शौकीन होता है। दाएं पैर पर तिल हो तो यात्राएं सोद्देश्य और बाएं पर हो तो निरुद्देश्य होती हैं।
समुद्र विज्ञान के अनुसार जिनके पांवों में तिल का चिन्ह होता है उन्हें अपने जीवन में अधिक यात्रा करनी पड़ती है। दाएं पांव की एड़ी अथवा अंगूठे पर तिल होने का एक शुभ फल यह माना जाता है कि व्यक्ति विदेश यात्रा करेगा। लेकिन तिल अगर बायें पांव में हो तो ऐसे व्यक्ति बिना उद्देश्य जहां-तहां भटकते रहते हैं।
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Saturday, June 22, 2019

ज्योतिष के अचूक सूत्र

🌹 *ज्योतिष के कुछ सटीक सूत्र* 🌹

1)जब गोचर में शनि ग्रह धनु, मकर, मीन व कन्या राशियों में गुजरता है तो भयंकर अकाल रक्त सम्बन्धी विचित्र रोग होते हैं।

2)"स्त्री की कुंडली में यदि चन्द्र वृष कन्या या सिहं राशी में स्थित हो तो स्त्री के कम पुत्र होते हैं "।

3)"जन्म लग्न में चन्द्र व शुक्र हो तो स्त्री क्रोधिनी परन्तु सुखी होती है "।

4)"किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष सोमवार ,बुध या गुरूवार को शपथ ले तो उसे प्रजा एवं राष्ट्राध्यक्ष के लिए शुभ माना जाता है"।।

5)"सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ ,अष्टम,या द्वादश भाव में हो और नीच या अस्त हो तो जातक के विवाह में बाधा आती है"

6)"चन्द्र से सम्बंधित चार विभिन्न योग बनते हैं जब कोई ग्रह चन्द्र से 10वें 7वें, 4थे, ओर पहले हो तो क्रमश:उत्तम,मध्यम, अधम ओर अधमाधम योग बनता है। यदि इनमें अंतिम योग बनता हो तो कुंडली के अन्य योग कमजोर और निष्फल हो जाते हैं"!!

7)जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए.

8)जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है।

9)जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है.

10)कोई भी ग्रह पहले नवाँशा में होने से जातक को एक प्रगतिशील और साहसिक नेता बनाता है ऐसे ग्रह की दशा /अन्तर्दशा के समय में जातक सक्रिय होता है।। और अपने सम्वन्धित क्षेत्र में सफलता पाता है।।

11)"सूर्य चन्द्र मंगल और लगन से गर्भाधान का विचार किया जाता है वीर्य की अधिकता से पुरुष तथा रक्त की अधिकता से कन्या होती है। रक्त और रज का बरावर होने से नपुंसक का जन्म होता है"।

12)जन्म से चार वर्ष के भीतर बालक की मृत्यु का कारण माता के कुकर्मों, चार से आठ वर्ष के बीच मृत्यु पिता के पाप कर्मों और आठ से बारह वर्ष की आयु के मध्य मृत्यु स्वयं के पूर्वजन्म के पापों के कारण मानी गई है.

13)शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म देने की जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है।

14)राशिचक्र के २७ नक्षत्रों के नौ भाग करके तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक भाग माना गया है। इनमें प्रथम 'जन्म नक्षत्र', दसवाँ 'कर्म नक्षत्र' तथा उन्नीसवाँ 'आधान नक्षत्र' माना गया है। शेष को क्रम से संपत्, विपत्, क्षेम्य, प्रत्वर, साधक, नैधन, मैत्र और परम मैत्र माना गया है। 15)किसी भी प्रकार का रिसाव राहु के अंतर्गत आता है.रिसाव किसी भी चीज का हो सकता है द्रव , शक्ति , धन , मान सम्मान या ओज का.।

16)बुध के निर्बल होने पर कुंडली में अच्छा शुक्र भी अपना प्रभाव खो देता है क्योंकि शुक्र को लक्ष्मी माना जाता है और विष्णु की निष्क्रियता से लक्ष्मी भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाती हैं.

17)शनि वचनबद्धता , कार्यबद्धता और समयबद्धता का कारक ग्रह है. जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन तीनो चीजों का अभाव होगा तो समझना चाहिए की उसकी पत्रिका में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है।

18)नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है. लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है. क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है. जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.। इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.। यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है. फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है. शनि या राहु.??????

 19)ज्योतिष में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं. यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है. इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है.

20)"लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है."।

21)"व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा"".।


ज्योतिष के अटल योग जिनका फल निश्चित है

*ज्योतिषीय भविष्यवाणियां जो कभी असत्य नहीं होती*
✍🏻यद्यपि ज्योतिष ऐसा उलझा हुआ विज्ञान है कि जिस में निपुणता प्राप्त करना बहुत कठिन विषय है। तथापि इसके कुछ स्थूल पक्ष भी हैं जिनको ज्योतिष के आलोचक अथवा पूर्ण रूप से अनभिज्ञ व्यक्ति भी सहज रूप में पहचान कर ज्योतिष की विज्ञान रूप में वैधता सत्यता को अंगीकार कर सकते हैं। ✍🏻

१.-यदि किसी जन्म कुंडली में चंद्र 10 वें अंक के साथ किसी भी घर में है तो उस व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार भयंकर विफलता भोगनी पड़ेगी। यह अपराध इतना भयंकर होगा कि वह जनता में अपना मुंह दिखाने में भी संकोच अनुभव करेगा। स्पष्ट है कि मकर राशि के व्यक्ति के जीवन में उक्त भविष्यवाणी घटित होती ही है।

२.-जब कभी चंद्र के साथ (एक ही घर में) शनि और राहु अथवा राहु एवं मंगल जैसे दो दुष्ट ग्रह हो तो वह व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान होता है कि पूर्ण रूपेण पागल मालूम पड़ता है अथवा ऐसा अनुभव करता है कि वह पागल होने वाला है।

३.-शनि जब तुला लग्न में होता है। तब वह व्यक्ति विद्वान होता है तथा प्रथम श्रेणी का विद्यार्थी होता है।

 ४.-जब गुरु कर्क लग्न में होता है तो वह व्यक्ति विश्वास योग्य, उदार हृदय, सादा जीवन, स्पष्ट वक्ता, सत्य प्रिय तथा चारित्रिक शुद्धता और विद्वत्ता के लिए प्रख्यात होता है। यही परिणाम तब भी होते हैं जबकि गुरु पांचवे या नवे घर में होता है।

५.-यदि लग्न में किसी भी राशि में मंगल स्थित हो तो व्यक्ति शीघ्र क्रोधी स्वभाव का होता है।

६.-यदि कर्क लग्न में अथवा नवे घर में कर्क राशि में गुरु और चंद्र स्थित हो तो वह व्यक्ति महान नेता तथा सत्य का निडर पुजारी एवं महान ख्याति प्राप्त करता है।

 ७.-यदि मंगल किसी भी राशि में तीसरे घर में हो तो वह व्यक्ति बहादुर और साहसी होता है। तथा किसी भी युद्ध, संघर्ष अथवा लड़ाई में भाग लेने के लिए सहसा आगे बढ़ जाने से भयभीत नहीं होता है।

 ८.-यदि किसी भी घर में कर्क राशि में गुरु और चंद्र अथवा शुक्र और चंद्र एकत्र हैं तो संबंधित व्यक्ति अत्यंत सुंदर एवं स्वस्थ होगा।

 ९.-चंद्र और शनि का चौथे घर में इकट्ठा होना व्यक्ति के लिए शैशवावस्था और किशोरावस्था में घोर विपदाओं का फल देने वाला होता है। उत्तरोत्तर जीवन में भी यह संगति नौकरियों की अकस्मात हानि अथवा वित्तीय हानियों का कारण होती है.इत्यादि...!

Friday, June 21, 2019

कल्याण मंदिर स्तोत्र

*श्री कल्याणमन्दिर स्त्रोत*

कल्याण-मन्दिरमुदारमवद्यभेदि ,

भीता-भयप्रदमनिन्दितमङ्-धिपद्मम्।

संसार-सागर-निमज्जदशेषजंतु -

पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य॥ 1॥



यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:,

स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्।

तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतोस्

तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये॥ 2॥



सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-

मस्मादृशा: कथमधीश भवन्त्यधीशा:।

धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो

रूपं प्ररूपयति किं किल घर्मरश्मे: ॥ 3॥



मोहक्षयादनु-भवन्नपि नाथ मत्र्यो

नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।

कल्पान्तवान्तपयस: प्रकटोऽपि यस्मान्

मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशि:॥ 4॥



अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ ! जडाशयोऽपि

कर्तुं स्तवं लसदसंख्यगुणाकरस्य।

बालोऽपि किं न निजबाहुयुगं वितत्य

विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:॥5॥



ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश

वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाश:।

जाता तदेवमसमीक्षितकारितेयं

जल्पन्ति वा निजगिरा ननु पक्षिणोऽपि॥ 6॥



आस्तामचिन्त्यमहिमा जिन! संस्तवस्ते

नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।

तीव्रातपोपहतपान्थजनान्निदाघे

प्रीणाति पद्मसरस: सरसोऽनिलोऽपि॥ 7॥



हृद्वर्तिनि त्वयि विभो शिथिलीभवन्ति

जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा:।

सद्यो भुजङ्गममया इव मध्यभाग-

मभ्यागते वनशिखण्डिनि चन्दनस्य॥ 8॥



मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र !

रौद्रैरुपद्रवशतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।

गोस्वामिनि स्फुरिततेजसि दृष्टमात्रे

चौरैरिवाशु पशव: प्रपलायमानै: ॥ 9॥



त्वं तारको जिन ! कथं भविनां त एव

त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:।

यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-

मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:॥ 10॥



यस्मिन् हर-प्रभृतयोऽपि हतप्रभावा:

सोऽपि त्वया रतिपति: क्षपित: क्षणेन।

विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन

पीतं न किं तदपि दुद्र्धरवाडवेन॥ 11॥



स्वामिन्ननल्पगरिमाणमपि प्रपन्नास्-

त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।

जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन

चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:॥ 12॥



क्रोधस्त्वया यदि विभो ! प्रथमं निरस्तो-

ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचौरा:।

प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके

नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी॥ 13॥



त्वां योगिनो जिन ! सदा परमात्मरूप

मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुजकोशदेशे।

पूतस्य निर्मल-रुचे-र्यदि वा किमन्य

दक्षस्य सम्भवपदं ननु कर्णिकाया:॥ 14॥ 



ध्यानाज्जिनेश ! भवतो भविन: क्षणेन

देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति।

तीव्रानलादुपलभावमपास्य लोके

चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदा: ॥ 15॥



अन्त: सदैव जिन ! यस्य विभाव्यसे त्वं

भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।

एतत्स्वरूपमथ मध्यविवर्तिनो हि

यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:॥ 16॥



आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेदबुद्ध्या

ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभाव:।

पानीयमप्यमृत-मित्यनुचिन्त्यमानं

किं नाम नो विषविकारमपाकरोति॥ 17॥



त्वामेव वीततमसं परवादिनोऽपि

नूनं विभो हरिहरादिधिया प्रपन्ना:।

किं काचकामलिभिरीश सितोऽपि शङ्खो

नो गृह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ॥ 18॥



धर्मोपदेशसमये सविधानुभावा-

दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:।

अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि

किं वा विबोधमुपयाति न जीवलोक:॥ 19॥



चित्रं विभो ! कथमवाङ्मुखवृन्तमेव

विष्वक्पतत्यविरला सुरपुष्पवृष्टि:।

त्वद्-गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!

गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि॥ 20॥



स्थाने गभीरहृदयोदधिसम्भवाया:

पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति।

पीत्वा यत: परमसम्मदसङ्गभाजो

भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्॥ 21॥



स्वामिन्! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो

मन्ये वदन्ति शुचय: सुरचामरौघा:।

येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुङ्गवाय

ते नूनमूध्र्वगतय: खलु शुद्धभावा:॥ 22॥



श्यामं गभीरगिरमुज्ज्वलहेमरत्न-

सिंहासनस्थमिह भव्यशिखण्डिनस्त्वाम्।

आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चैश्-

चामीकराद्रिशिरसीव नवाम्बुवाहम्॥ 23॥



उद्गच्छता तव शितिद्युतिमण्डलेन

लुप्तच्छदच्छवि-रशोकतरुर्बभूव ।

सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!

नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि॥ 24॥



भो ! भो ! प्रमादमवधूय भजध्वमेन-

मागत्य निर्वृतिपुरीं प्रति सार्थवाहम्।

एतन्निवेदयति देव जगत्त्रयाय

मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते॥ 25॥



उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!

तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:।

मुक्ताकलाप-कलितोल्लसितातपत्र

व्याजात्त्रिधा धृततनुध्र्रुवमभ्युपेत:॥ 26॥



स्वेन प्रपूरितजगत्त्रयपिण्डितेन

कान्तिप्रतापयशसामिव सञ्चयेन।

माणिक्यहेमरजत-प्रविनिर्मितेन

सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि॥ 27॥



दिव्यस्रजो जिन नमत्त्रिदशाधिपाना-

मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबन्धान्।

पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वापरत्र

त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव॥ 28॥



त्वं नाथ ! जन्मजलधेर्विपराङ्मुखोऽपि

यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलग्नान्।

युक्तं हि पार्थिवनिपस्य सतस्तवैव

चित्रं विभो ! यदसि कर्मविपाकशून्य:॥ 29॥



विश्वेश्वरोऽपि जनपालक ! दुर्गतस्त्वं

किं वाक्षरप्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!

अज्ञानवत्यपि सदैव कथञ्चिदेव

ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकासहेतु:॥ 30॥



प्राग्भारसम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-

दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।

छायापि तैस्तव न नाथ हता हताशो

ग्रस्तस्त्वमी-भिरयमेव परं दुरात्मा॥ 31॥



यद्गर्जदूर्जित घनौघमदभ्रभीम

भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्।

दैत्येन मुक्तमथ दुस्तरवारि दध्रे

तेनैव तस्य जिन! दुस्तरवारिकृत्यम्॥ 32॥



ध्वस्तोध्र्वकेश-विकृताकृतिमत्र्यमुण्ड-

प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र विनिर्यदग्रि:।

प्रेतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:

सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भवदु:खहेतु:॥ 33॥



धन्यास्त एव भुवनाधिप ! ये त्रिसन्ध्य-

माराधयन्ति विधिवद् विधुतान्यकृत्या:।

भक्त्योल्लसत्पुलकपक्ष्मलदेहदेशा: ।

पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:॥34॥



अस्मिन्नपार-भव- वारिनिधौ मुनीश!

मन्ये न मे श्रवणगोचरतां गतोऽसि।

आकर्णिते तु तव गोत्रपवित्रमन्त्रे

किं वा विपद्विषधरी सविधं समेति॥ 35॥



जन्मान्तरेऽपि तव पादयुगं न देव!

मन्ये मया महितमीहितदानदक्षम्।

तेनेह जन्मनि मुनीश ! पराभवानां

जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्॥ 36॥



नूनं न मोहतिमिरावृतलोचनेन

पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।

मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:

प्रोद्यत्प्रबन्धगतय: कथमन्यथैते॥ 37॥



आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि

नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।

जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रम्

यस्मात्िक्रया: प्रतिफलन्ति न भावशून्या:॥ 38॥



त्वं नाथ ! दु:खिजनवत्सल! हे शरण्य!

कारुण्यपुण्यवसते ! वशिनां वरेण्य!

भक्त्या नते मयि महेश ! दयां विधाय

दु:खाङ्कुरोद्दलनतत्परतां विधेहि ॥ 39॥



नि:संख्यसारशरणं शरणं शरण्य-

मासाद्य सादितरिपु-प्रथितावदानम्।

त्वत्पादपङ्कजमपि प्रणिधानवन्ध्यो

वन्ध्योऽस्मि चेद्भुवनपावन! हा हतोऽस्मि॥४०॥



देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिलवस्तुसार!

संसारतारक ! विभो! भुवनाधिनाथ!

त्रायस्व देव! करुणाहृद ! मां पुनीहि

सीदन्तमद्य भयदव्यसनाम्बुराशे:॥ 41॥



यद्यस्ति नाथ ! भवदङ्िघ्रसरोरुहाणां

भक्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्िचताया:।

तन्मे त्वदेकशरणस्य शरण्य! भूया:

स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि॥ 42॥



इत्थंसमाहितधियो विधिवज्िजनेन्द्र!

सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:।

त्वद्बिम्बनिर्मल मुखाम्बुजबद्धलक्ष्या:

ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:॥ 43॥



जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्गसम्पदो भुक्त्वा।

ते विगलितमलनिचया अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते॥ 44॥

Wednesday, June 19, 2019

मकर लग्न का परिचय और फल

मकर लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 270 डिग्री से 300 डिग्री तक के भाग को मकर राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जताक के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न मकर माना जाता है. मकर लग्‍न की कुंडली में में मन का स्‍वामी चंद्रमा सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्ठेश होने के नाते माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह संबंधी विषयों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि एकादशेश होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र पंचम और दशम भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने के कारण यह जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का और दशमेश होने के कारण राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का अधिपति होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. एक केंद्र और त्रिकोण का स्वामित्व मिलने शुक्र मकर लग्न में अति योगकारी होता है.

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति द्वादश भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है.
जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वितीय भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि एवम द्वितीयेश होने के कारण कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मकर लग्न में राहु नवम भाव का अधिपति होकर जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनकर अति शुभ हो जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में विशेष शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु यहां तॄतीयेश होकर जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मीन लग्न का परिचय एवं फल

मीन लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 330 डिग्री से 360 डिग्री तक के भाग को मीन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मीन माना जाता है. मीन लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्रमा पंचम भाव का स्‍वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी , वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है द्वितीय भाव का अधिपति होने के कारण जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है जबकि नवमेश होने के कारण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधि बनता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति दशम भाव का स्‍वामी होकर जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. एकादश भाव का स्वामी होने के कारण यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है जबकि द्वादशेश होने के नाते यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण.इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु को मीन लग्न में सप्तमेश होने का दायित्व मिलता है जिसकी वजह से यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होत है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु को मीन लग्न में लग्नेश होने का दायित्व मिलता है इस वजह से यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कुम्भ लग्न का परिचय एवम फल

कुंभ लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग को कुंभ राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कुंभ माना जाता है. कुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

समस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का कारक होता है. एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. कुंभ लग्न में एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामी होकर शुक्र अतीव शुभ और राजयोग कारक ग्रह बन जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में अतयंत शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से न्य़ून शुभ फ़लों के साथ अधिक अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध पंचम भाव का स्‍वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि का प्रतिनिधि होता है जबकि द्वादशेश होने के कारण यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु अष्टम भाव का स्वामी होकर यहां अष्टमेश होता है जिसके कारण उसे जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व मिलता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु द्वितीय भाव का स्वामी होकर यहां जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...