Sunday, June 30, 2019

लग्न कुंडली और प्रश्न कुंडली मे अंतर


लग्न कुंडली और प्रश्न कुंडली की विशेषताएं

प्रश्न: लग्न कुंडली और चलित कुंडली में क्या अंतर है?

उत्तर :  लग्न कुंडली का शोधन चलित कुंडली है, अंतर सिर्फ इतना है कि लग्न कुंडली यह दर्शाती है कि जन्म के समय क्या लग्न है और सभी ग्रह किस राशि में विचरण कर रहे हैं और चलित से यह स्पष्ट होता है कि जन्म समय किस भाव में कौन सी राशि का प्रभाव है और किस भाव पर कौन सा ग्रह प्रभाव डाल रहा है।

प्रश्न: चलित कुंडली का निर्माण कैसे करते हैं ?

उत्तर: जब हम जन्म कुंडली का सैद्धांतिक तरीके से निर्माण करते हैं तो सबसे पहले लग्न स्पष्ट करते हैं, अर्थात भाव संधि और भाव मध्य के उपरांत ग्रह स्पष्ट कर पहले लग्न कुंडली और उसके बाद चलित कुंडली बनाते हैं। लग्न कुंडली में जो लग्न स्पष्ट अर्थात जो राशि प्रथम भाव मध्य में स्पष्ट होती है उसे प्रथम भाव में अंकित कर क्रम से आगे के भावों में अन्य राशियां अंकित कर देते हैं और ग्रह स्पष्ट अनुसार जो ग्रह जिस राशि में स्पष्ट होता है, उसे उस राशि के साथ अंकित कर देते हैं। इस तरह यह लग्न कुंडली तैयार हो जाती है। चलित कुंडली बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि किस भाव में कौन सी राशि भाव मध्य पर स्पष्ट हुई अर्थात प्रथम भाव में जो राशि स्पष्ट हुई उसे प्रथम भाव में और द्वितीय भाव में जो राशि स्पष्ट हुई उसे द्वितीय भाव में अंकित करते हैं। इसी प्रकार सभी द्वादश भावों मे जो राशि जिस भाव मध्य पर स्पष्ट हुई उसे उस भाव में अंकित करते हैं न कि क्रम से अंकित करते हैं। इसी तरह जब ग्रह को मान में अंकित करने की बात आती है तो यह देखा जाता है कि भाव किस राशि के कितने अंशों से प्रारंभ और कितने अंशों पर समाप्त हुआ। यदि ग्रह स्पष्ट भाव प्रारंभ और भाव समाप्ति के मध्य है तो ग्रह को उसी भाव में अंकित करते हैं। यदि ग्रह स्पष्ट भाव प्रारंभ से पहले के अंशों पर है तो उसे उस भाव से पहले वाले भाव में अंकित करते हैं और यदि ग्रह स्पष्ट भाव समाप्ति के बाद के अंशों पर है तो उस ग्रह को उस भाव के अगले भाव में अंकित किया जाता है। उदाहरण के द्वारा यह ठीक से स्पष्ट होगा। मान लीजिए भाव स्पष्ट और ग्रह स्पष्ट इस प्रकार हैं:
भाव स्पष्ट और ग्रह स्पष्ट से चलित कुंडली का निर्माण करते समय सब से पहले हर भाव में राशि अंकित करते हैं। उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत चलित कुंडली में प्रथम भाव मध्य में मिथुन राशि स्पष्ट हुई है। इसलिए प्रथम भाव में मिथुन राशि अंकित होगी। द्वितीय भाव में भावमध्य पर कर्क राशि स्पष्ट है, द्वितीय भाव में कर्क राशि अंकित होगी। तृतीय भाव मध्य पर भी कर्क राशि स्पष्ट है। इसलिए तृतीय भाव में भी कर्क राशि अंकित की जाएगी। चतुर्थ भाव में सिंह राशि स्पष्ट है इसलिए चतुर्थ भाव में सिंह राशि अंकित होगी। इसी प्रकार यदि उदाहरण कुंडली में देखें तो पंचम भाव में कन्या, षष्ठ में वृश्चिक, सप्तम में धनु, अष्टम में मकर, नवम में फिर मकर, दशम में कुंभ, एकादश में मीन और द्वादश में वृष राशि स्पष्ट होने के कारण ये राशियां इन भावों में अंकित की जाएंगी। लेकिन लग्न कुंडली में एक से द्वादश भावों में क्रम से राशियां अंकित की जाती हैं। राशियां अंकित करने के पश्चात भावों में ग्रह अंकित करते हैं। लग्न कुंडली में जो ग्रह जिस भाव में अंकित है, चलित में उसे अंकित करने के लिए भाव का विस्तार देखा जाता है अर्थात भाव का प्रारंभ और समाप्ति स्पष्ट।
उदाहरण लग्न कुंडली में तृतीय भाव में गुरु और चंद्र अंकित हैं पर चलित कुंडली में चंद्र चतुर्थ भाव में अंकित है क्योंकि जब तृतीय भाव का विस्तार देखकर अंकित करेंगे तो ऐसा होगा। तृतीय भाव कर्क राशि के 150 32‘49’’ से प्रारंभ होकर सिंह राशि के 120 21‘07’’ पर समाप्त होता है। गुरु और चंद्र स्पष्ट क्रमशः सिंह राशि के 080 02‘12’’ और 220 55‘22‘‘ पर हैं। यहां यदि देखें तो गुरु के स्पष्ट अंश सिंह 080 02‘12’’, तृतीय भाव प्रारंभ कर्क 150 32‘49’’ और भाव समाप्त सिंह 210 21‘07’’ के मध्य हैं, इसलिए गुरु तृतीय भाव में अंकित होगा। चंद्र स्पष्ट अंश सिंह 220 55‘22’’ भाव मध्य से बाहर आगे की ओर है, इसलिए चंद्र को चतुर्थ भाव में अंकित करेंगे। इसी तरह सभी ग्रहों को भाव के विस्तार के अनुसार अंकित करेंगे। उदाहरण कुंडली में सूर्य, बुध एवं राहु के स्पष्ट अंश भी षष्ठ भाव के विस्तार से बाहर आगे की ओर हैं, इसलिए इन्हें अग्र भाव सप्तम में अंकित किया गया है।

प्रश्न: चलित कुंडली में ग्रहों के साथ-साथ राशियां भी भावों में बदल जाती हैं, कहीं दो भावों में एक ही राशि हो तो इससे फलित में क्या अंतर आता है?

उत्तर: हर भाव में ग्रहों के साथ-साथ राशि का भी महत्व है। चलित कुंडली का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हमें भावों के स्वामित्व का भली-भांति ज्ञान होता है। लग्न कुंडली तो लगभग दो घंटे तक एक सी होगी लेकिन समय के अनुसार परिवर्तन तो चलित कुंडली ही बतलाती है। जैसे ही राशि भावों में बदलेगी भाव का स्वामी भी बदल जाएगा। स्वामी के बदलते ही कुंडली में बहुत परिवर्तन आ जाता है। कभी योगकारक ग्रह की योगकारकता समाप्त हो जाती है तो कहीं अकारक और अशुभ ग्रह भी शुभ हो जाता है। ग्रह की शुभता-अशुभता भावों के स्वामित्व पर निर्भर करती है। इसलिए फलित में विशेष अंतर आ जाता है। उदाहरण लग्न कुंडली में एक से द्वादश भावों के स्वामी क्रमशः बुध, चंद्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि, गुरु, मंगल और शुक्र और चलित में एक से द्वादश भावों के स्वामी क्रमशः बुध, चंद्र, चंद्र, सूर्य, बुध, मंगल, गुरु, शनि, शनि, शनि, गुरु और शुक्र हैं। इस तरह से देखें तो लग्न कुंडली में मंगल अकारक है लेकिन चलित में वह अकारक नहीं रहा। सूर्य लग्न में तृतीय भाव का स्वामी होकर अशुभ है लेकिन चलित में चतुर्थ का स्वामी होकर शुभ फलदायक हो गया है। शुक्र, जो शुभ है, सिर्फ द्वादश का स्वामी होकर अशुभ फल देने वाला हो गया है। इसलिए भावों के स्वामित्व और शुभता-अशुभता के लिए भी चलित कुंडली फलित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न: चलित में ग्रह जब भाव बदल लेता है तो क्या हम यह मानें कि ग्रह राशि भी बदल गई?

उत्तर: ग्रह सिर्फ भाव बदलता है, राशि नहीं। ग्रह जिस राशि में जन्म के समय स्पष्ट होता है उसी राशि में रहता है। ग्रह उस भाव का फल देगा जिस भाव में चलित कुंडली में वह स्थित होता है। जैसे कि उदाहरण लग्न कुंडली में सूर्य, बुध, राहु वृश्चिक राशि में स्पष्ट हुए लेकिन चलित में ग्रह सप्तम भाव में हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि वे धनु राशि के होंगे। ये ग्रह वृश्चिक राशि में रहते हुए सप्तम भाव का फल देंगे।

प्रश्न: क्या चलित में ग्रहों की दृष्टि में भी परिवर्तन आता है?

उत्तर: ग्रहों की दृष्टि कोण के अनुसार होती है। अतः लग्नानुसार दृष्टि का विचार करना चाहिए। लेकिन जो ग्रह चलित में भाव बदल लेते हैं उनकी दृष्टि लग्नानुसार करना ठीक नहीं है और न ही चलित कुंडली के अनुसार। अतः दृष्टि के लिए ग्रहों के अंशादि का विचार करना ही उत्तम है।

प्रश्न: निरयण भाव चलित और चलित कुंडली में क्या अंतर है?

उत्तर: चलित कुंडली में भाव का विस्तार भाव प्रारंभ से भाव समाप्ति तक है और भावमध्य भाव का स्पष्ट माना जाता है। लेकिन निरयण भाव में लग्न को ही भाव का प्रारंभ माना जाता है अर्थात जो भाव चलित कुंडली में भाव मध्य है, निरयण भाव चलित में वह भाव प्रारंभ या भाव संधि है। इस प्रकार एक भाव का विस्तार भाव प्रारंभ से दूसरे भाव के प्रारंभ तक माना जाता है। वैदिक ज्योतिष मे चलित को ही महत्व दिया गया है। कृष्णमूर्ति पद्धति में निरयण भाव को महत्व दिया गया है।

प्रश्न: जन्मपत्री लग्न कुंडली से देखनी चाहिए या चलित कुंडली से?

उत्तर: जन्मपत्री चलित कुंडली से देखनी चाहिए क्योंकि चलित में ग्रहों और भाव राशियों की स्पष्ट स्थिति दी जाती है।

प्रश्न: क्या भाव संधि पर ग्रह फल देने में असमर्थ हैं?

उत्तर: कोई ग्रह उसी भाव का फल देता है जिस भाव में वह रहता है। जो ग्रह भाव संधि में आ जाते हैं वे लग्न के अनुसार भाव के फल न देकर चलित के अनुसार भाव फल देते हैं, लेकिन वे फल कम देते हैं ऐसा नहीं है। वे चलित भाव के पूरे फल देते हैं।

प्रश्न: चलित कुंडली में दो भावों में एक राशि कैसे आ जाती है?

उत्तर: हां, ऐसा हो सकता है। यदि दोनों भावों में भाव मध्य पर एक ही राशि स्पष्ट हो जैसे द्वितीय भाव में कर्क 20 08‘40’’ पर है और तृतीय भाव में कर्क 280 56‘58’’ पर स्पष्ट हुई तो दोनों भावों, द्वितीय और तृतीय में कर्क राशि ही अंकित की जाएगी।

प्रश्न: यदि चलित कुंडली में ग्रह उस भाव में विचरण कर जाए जहां पर उसकी उच्च राशि है तो क्या उसे उच्च का मान लेना चाहिए?

उत्तर: नहीं। ग्रह उच्च राशि में नजर आता है। वास्तव में ग्रह ने भाव बदला है, राशि नहीं। इसलिए वह ग्रह उच्च नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न: चलित कुंडली को बनाने में क्या अंतर है ?

उत्तर: चलित कुंडली दो प्रकार से बनाई जाती है - एक, जिसमें भाव की राशियों को दर्शित कर ग्रहों को भावानुसार रख देते हैं। दूसरे, दो भावों के मध्य में भाव संधि बना दी जाती है एवं जो ग्रह भाव बदलते हैं उन्हें भाव संधि में रख दिया जाता है। उदाहरणार्थ निम्न कुंडली दी गई है।

प्रश्न: यदि मंगल लग्न कुंडली में षष्ठ भाव में है और चलित में सप्तम भाव में तो क्या कुंडली मंगली हो जाती है?

उत्तर: चलित कुंडली में ग्रह किस भाव में है इसका महत्व है और मंगली कुंडली भी मंगल की भाव स्थिति के अनुसार ही मंगली कही जाती है। इसलिए यदि चलित में मंगल सप्तम में है तो कुंडली मंगली मानी जाएगी।

प्रश्न: यदि मंगल सप्तम भाव में लग्न
कुंडली में और चलित कुंडली में अष्टम भाव में हो तो क्या कुंडली को मंगली मानें?

उत्तर: मंगल की सप्तम और अष्टम दोनों स्थितियों से कुंडली मंगली मानी जाती है, इसलिए ऐसी स्थिति में मंगल दोष भंग नहीं होता।

प्रश्न: ग्रह किस स्थिति में चलायमान होता है?

उत्तर: यदि ग्रह के स्पष्ट अंश भाव के विस्तार से बाहर हैं तो ग्रह चलायमान हो जाता है।

प्रश्न: किन स्थितियों में चलित में ग्रह और राशि बदलती है?

उत्तर: यदि लग्न स्पष्ट प्रारंभिक या समाप्ति अंशों पर हो तो चलित में ग्रह का भाव बदलने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं क्योंकि किसी भी भाव के मध्य राशि के एक छोर पर होने के कारण यह दो राशियों के ऊपर फैल जाता है। अतः दूसरी राशि में स्थित ग्रह पहली राशि में दृश्यमान होते हैं।

प्रश्न: ग्रह चलित में किस स्थिति में लग्न जैसे रहते हैं?

उत्तर: यदि लग्न स्पष्ट राशि के मध्य में हो और ग्रह भी अपनी राशि के मध्य में अर्थात 5 से 25 अंश के भीतर हों तो ऐसी स्थिति में लग्न और चलित एक से ही रहते हैं।

Thursday, June 27, 2019

ग्रह अशुभ कब देते हैं जानिए

ग्रह कब नहीं देते शुभ फल और क्यों?

सूर्य
सूर्य का संबंध आत्मा से होता है। यदि आपकी आत्मा, आपका मन पवित्र है और आप किसी का दिल दुखाने वाला कार्य नहीं करते हैं तो सूर्यदेव आपसे प्रसन्न रहेंगे। लेकिन किसी का दिल दुखाने (कष्ट देने), किसी भी प्रकार का टैक्स चोरी करने एवं किसी भी जीव की आत्मा को ठेस पहुंचाने पर सूर्य अशुभ फल देता है। कुंडली में सूर्य चाहे जितनी मजबूत स्थिति में हो लेकिन यदि ऐसा कोई कार्य किया है, तो वह अपना शुभ प्रभाव नहीं दे पाता। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में कमी आती है और उसे पिता की संपत्ति से बेदखल होना पड़ता है।

चंद्र
परिवार की स्त्रियों जैसे, मां, नानी, दादी, सास एवं इनके समान पद वाली स्त्रियों को कष्ट देने से चंद्र का बुरा प्रभाव प्राप्त होता है। किसी से द्वेषपूर्वक ली गई वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है। चंद्रमा अशुभ हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है। उसके कार्यों में रुकावट आने लगती है और तरक्की रूक जाती है। जल घात की आशंका बढ़ जाती है। यहां तक कि व्यक्ति मानसिक रोगी भी हो सकता है।
 

मंगल
मंगल का संबंध भाई-बंधुओं और राजकाज से होता है। भाई से झगड़ा करने, भाई के साथ धोखा करने से मंगल अशुभ फल देता है। अपनी पत्नी के भाई का अपमान करने पर भी मंगल अशुभ फल देता है। मंगल की प्रतिकूलता के कारण व्यक्ति जीवन में कभी स्वयं की भूमि, भवन, संपत्ति नहीं बना पाता। जो संपत्ति संचय की होती है वह भी धीरे-धीरे हाथ से छूटने लगती है।

बुध
बहन, बेटी और बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को दुखी करने से बुध अशुभ फल देता है। किसी किन्नर को सताने से भी बुध नाराज हो जाता है और अशुभ फल देने लगता है। बुध की अशुभता के कारण व्यक्ति का बौद्धिक विकास रूक जाता है। शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए अशुभ बुध विकट स्थितियां पैदा कर सकता है।

गुरु
अपने पिता, दादा, नाना को कष्ट देने अथवा इनके समान सम्मानित व्यक्ति को कष्ट देने एवं साधु संतों को सताने से गुरु अशुभ फल देने लगता है। जीवन में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा के कारक ग्रह बृहस्पति के रूठ जाने से जीवन अंधकारमय होने लगता है। व्यक्ति को गंभीर बीमारियां घेरने लगती है और उसका जीवन पल-प्रतिपल कष्टकारी होने लगता है। धन हानि होने लगती है और उसका अधिकांश पैसा रोग में लगने लगता है।

शुक्र
अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुक्र अशुभ फल देता है। चूंकि शुक्र भोग-विलास का कारक ग्रह है अतः शुक्र के अशुभ फलों के परिणामस्वरूप व्यक्ति गरीबी का सामना करता है। जीवन के समस्त भोग-विलास के साधन उससे दूर होने लगते हैं। लक्ष्मी रूठ जाती है। वैवाहिक जीवन में स्थिति विवाह विच्छेद तक पहुंच जाती है। शुक्र की अशुभता के कारण व्यक्ति अपने से निम्न कुल की स्त्रियों के साथ संबंध बनाता है।

शनि
ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतकश व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने एवं इसी के साथ शराब, मांस खाने से शनि देव अशुभ फल देते हैं। कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा मांगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है। शनि के अशुभ फल के कारण व्यक्ति रोगों से घिर जाता है। उसकी संपत्ति छिन जाती है और वह वाहनों के कारण लगातार दुर्घटनाग्रस्त होने लगता है।

ग्रह उपचार में किस वृक्ष की समिधा का प्रावधान है

ज्योतिषीय उपचारों के लिए यज्ञ में वनस्पति का इस्तेमाल बताया गया है।  जानिये माइंड मन्थन
👌▪️ज्योतिष केअनुसार ग्रह शांति का सबसे सशक्त माध्यम यज्ञ है। 👌

👌▪️बाद में विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि कौन-सी वनस्पति के काष्ठ की आहुति देने पर क्या उपचार हो सकता है।

👌▪️यज्ञाग्रि प्रज्वलित रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले काष्ठ को समिधा कहते हैं।

👌▪️प्रत्येक लकड़ी को समिधा नहीं बनाया जा सकता।

👌▪️आह्निक, सूत्रावली में ढाक, फल्गु, वट, पीपल, विकंकल, गूलर, चंदन, सरल, देवदारू, शाल, शैर का विधान है।

👌▪️वायु पुराण में ढाक, काकप्रिय, बड़, पिलखन, पीपल, विकंकत, गूलर, बेल, चंदन, पीतदारू, शाल, खैर को यज्ञ के लिए उपयोगी माना गया है।

👌यज्ञ के लिए पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आम व बिल्व को उपयोगी बताया है। 👌

👌▪️उन्होंने चंदन, पलाश और आम की लकड़ी को तो यज्ञ के लिए सर्वश्रेष्ठ बताया है।

1👌▪️सूर्य के लिए अर्क

2👌▪️चंद्र के लिए ढाक

3👌▪️मंगल के लिए खैर

4👌▪️बुध के लिए अपामार्ग

5👌▪️गुरु के लिए पीपल

6👌▪️शुक्र के लिए गूलर

7👌▪️शनि के लिए शमी

8👌▪️और राहु के लिए दूर्वा

9👌▪️व केतू के लिए कुश वनस्पतियों को उपचार का आधार बनाया जाता है।

👌▪️पर्वतों पर उगने वाले पौधे, मिर्च, शलजम, काली मिर्च व गेहूं को सूर्य के अधिकार में बताया गया है।

👌▪️इसी तरह खोपरा, ठंडे पदार्थ, रसीले फल, चावल और सब्जियां चंद्रमा से संबंधित हैं।

👌▪️नुकीले वृक्ष, अदरक, अनाज, जिन्सें, तुअर दाल और मूंगफली को मंगल से देखा जाएगा।

👌▪️बुध के अधिकार में नर्म फसल, ङ्क्षभडी, मूंग दाल और बैंगन आते हैं।

👌▪️बृहस्पति ग्रह से केले के वृक्ष, खड़ी फसल, जड़ें, बंगाली चना और गांठों वाले पादप जुड़े हैं।

👌▪️शुक्र के अधीन फलदार वृक्ष, फूलदार पौधे, पहाड़ी पादप, मटर, बींस और लताओं के अलावा मेवे पैदा करने वाले पादप आते हैं।

👌▪️शनि से संबंधित पादपों में जहरीले और कांटेदार पौधे, खारी सब्जियां, शीशम और तम्बाकू शामिल हैं।

👌▪️राहु और केतू के अधिकार में शनि से संबंधित पादपों के अलावा लहसुन, काले चने, काबुली चने और मसाले पैदा करने वाले पौधे आते हैं।

शरीर पर तिल का फल अंगों के अनुसार

शरीर के विभिन्न अंगों पर तिलों का फल
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भारतीय ज्योतिष में सामुद्रिक शास्त्र में शरीर के विभिन्न अंगों पर पाए जाने वाले तिलों का सामान्य फल इस प्रकार है।

१- ललाट पर तिल – ललाट के मध्य भाग में तिल निर्मल प्रेम की निशानी है। ललाट के दाहिने तरफ का तिल किसी विषय विशेष में निपुणता, किंतु बायीं तरफ का तिल फिजूलखर्ची का प्रतीक होता है। ललाट या माथे के तिल के संबंध में एक मत यह भी है कि दायीं ओर का तिल धन वृद्धिकारक और बायीं तरफ का तिल घोर निराशापूर्ण जीवन का सूचक होता है।

२-  भौंहों पर तिल – यदि दोनों भौहों पर तिल हो तो जातक अकसर यात्रा करता रहता है। दाहिनी पर तिल सुखमय और बायीं पर तिल दुखमय दांपत्य जीवन का संकेत देता है।

३- आंख की पुतली पर तिल – दायीं पुतली पर तिल हो तो व्यक्ति के विचार उच्च होते हैं। बायीं पुतली पर तिल वालों के विचार कुत्सित होते हैं। पुतली पर तिल वाले लोग सामान्यत: भावुक होते हैं।

४-  पलकों पर तिल – आंख की पलकों पर तिल हो तो जातक संवेदनशील होता है। दायीं पलक पर तिल वाले बायीं वालों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होते हैं।

५-  आंख पर तिल – दायीं आंख पर तिल स्त्री से मेल होने का एवं बायीं आंख पर तिल स्त्री से अनबन होने का आभास देता है।

६-  कान पर तिल – कान पर तिल व्यक्ति के अल्पायु होने का संकेत देता है।

७- नाक पर तिल – नाक पर तिल हो तो व्यक्ति प्रतिभासंपन्न और सुखी होता है। महिलाओं की नाक पर तिल उनके सौभाग्यशाली होने का सूचक है।

८-  होंठ पर तिल – होंठ पर तिल वाले व्यक्ति बहुत प्रेमी हृदय होते हैं। यदि तिल होंठ के नीचे हो तो गरीबी छाई रहती है।

९- मुंह पर तिल – मुखमंडल के आसपास का तिल स्त्री तथा पुरुष दोनों के सुखी संपन्न एवं सज्जन होने के सूचक होते हैं। मुंह पर तिल व्यक्ति को भाग्य का धनी बनाता है। उसका जीवनसाथी सज्जन होता है।

१०-  गाल पर तिल – गाल पर लाल तिल शुभ फल देता है। बाएं गाल पर कृष्ण वर्ण तिल व्यक्ति को निर्धन, किंतु दाएं गाल पर धनी बनाता है।

११-  जबड़े पर तिल – जबड़े पर तिल हो तो स्वास्थ्य की अनुकूलता और प्रतिकूलता निरंतर बनी रहती है।
ठोड़ी पर तिल – जिस स्त्री की ठोड़ी पर तिल होता है, उसमें मिलनसारिता की कमी होती है।

१२-  कंधों पर तिल – दाएं कंधे पर तिल का होना दृढ़ता तथा बाएं कंधे पर तिल का होना तुनकमिजाजी का सूचक होता है।

१३-  दाहिनी भुजा पर तिल – ऐसे तिल वाला जातक प्रतिष्ठित व बुद्धिमान होता है। लोग उसका आदर करते हैं।

१४-  बायीं भुजा पर तिल – बायीं भुजा पर तिल हो तो व्यक्ति झगड़ालू होता है। उसका सर्वत्र निरादर होता है। उसकी बुद्धि कुत्सित होती है।

१५-  कोहनी पर तिल – कोहनी पर तिल का पाया जाना विद्वता का सूचक है।

१६-  हाथों पर तिल – जिसके हाथों पर तिल होते हैं वह चालाक होता है। गुरु क्षेत्र में तिल हो तो सन्मार्गी होता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो बलवान और दायीं हथेली के पृष्ठ भाग में हो तो धनवान होता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो जातक खर्चीला तथा बायीं हथेली के पृष्ठ भाग पर तिल हो तो कंजूस होता है।

१७-  अंगूठे पर तिल – अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।

१८-  तर्जनी पर तिल – जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीड़ित होता है।

१९-  मध्यमा पर तिल – मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।

२०-  अनामिका पर तिल – जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।
कनिष्ठा पर तिल – कनिष्ठा पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।

२१-  जिसकी हथेली में तिल मुठ्ठी में बंद होता है वह बहुत भाग्यशाली होता है लेकिन यह सिर्फ एक भ्रांति है। हथेली में होने वाला हर तिल शुभ नहीं होता कुछ अशुभ फल देने वाले भी होते हैं।

२२-  सूर्य पर्वत मतलब रिंग फिंगर के नीचे के क्षेत्र पर तिल हो तो व्यक्ति समाज में कलंकित होता है। किसी की गवाही की जमानत उल्टी अपने पर नुकसान देती है। नौकरी में पद से हटाया जाना और व्यापार में घाटा होता है। मान- सम्मान पर प्रभावित होता है और नेत्र संबंधित रोग तंग करते हैं।

२३- बुध पर्वत यानी लिटिल फिंगर के नीचे के क्षेत्र पर तिल हो तो व्यक्ति को व्यापार में हानि उठानी पड़ती है। ऐसा व्यक्ति हिसाब-किताब व गणित में धोखा खाता है और दिमागी रूप से कमजोर होता है।

२४-  लिटिल फिंगर के नीचे वाला क्षेत्र जो हथेली के अंतिम छोर पर यानी मणिबंध से ऊपर का क्षेत्र जो चंद्र क्षेत्र कहलाता है, इस क्षेत्र पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति के विवाह में देरी होती है। प्रेम में लगातार असफलता मिलती है। माता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।

२५-  गले पर तिल – गले पर तिल वाला जातक आरामतलब होता है। गले पर सामने की ओर तिल हो तो जातक के घर मित्रों का जमावड़ा लगा रहता है। मित्र सच्चे होते हैं। गले के पृष्ठ भाग पर तिल होने पर जातक कर्मठ होता है।

२६-  छाती पर तिल – छाती पर दाहिनी ओर तिल का होना शुभ होता है। ऐसी स्त्री पूर्ण अनुरागिनी होती है। पुरुष भाग्यशाली होते हैं। शिथिलता छाई रहती है। छाती पर बायीं ओर तिल रहने से भार्या पक्ष की ओर से असहयोग की संभावना बनी रहती है। छाती के मध्य का तिल सुखी जीवन दर्शाता है। यदि किसी स्त्री के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है।

२७- कमर पर तिल – यदि किसी व्यक्ति की कमर पर तिल होता है तो उस व्यक्ति की जिंदगी सदा परेशानियों से घिरी रहती है।

२८-  पीठ पर तिल – पीठ पर तिल हो तो जातक भौतिकवादी, महत्वाकांक्षी एवं रोमांटिक हो सकता है। वह भ्रमणशील भी हो सकता है। ऐसे लोग धनोपार्जन भी खूब करते हैं और खर्च भी खुलकर करते हैं। वायु तत्व के होने के कारण ये धन संचय नहीं कर पाते।

२९-  पेट पर तिल – पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसा व्यक्ति भोजन का शौकीन व मिष्ठान्न प्रेमी होता है। उसे दूसरों को खिलाने की इच्छा कम रहती है।

३०-  घुटनों पर तिल – दाहिने घुटने पर तिल होने से गृहस्थ जीवन सुखमय और बायें पर होने से दांपत्य जीवन दुखमय होता है।

३१-  पैरों पर तिल – पैरों पर तिल हो तो जीवन में भटकाव रहता है। ऐसा व्यक्ति यात्राओं का शौकीन होता है। दाएं पैर पर तिल हो तो यात्राएं सोद्देश्य और बाएं पर हो तो निरुद्देश्य होती हैं।
समुद्र विज्ञान के अनुसार जिनके पांवों में तिल का चिन्ह होता है उन्हें अपने जीवन में अधिक यात्रा करनी पड़ती है। दाएं पांव की एड़ी अथवा अंगूठे पर तिल होने का एक शुभ फल यह माना जाता है कि व्यक्ति विदेश यात्रा करेगा। लेकिन तिल अगर बायें पांव में हो तो ऐसे व्यक्ति बिना उद्देश्य जहां-तहां भटकते रहते हैं।
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Saturday, June 22, 2019

ज्योतिष के अचूक सूत्र

🌹 *ज्योतिष के कुछ सटीक सूत्र* 🌹

1)जब गोचर में शनि ग्रह धनु, मकर, मीन व कन्या राशियों में गुजरता है तो भयंकर अकाल रक्त सम्बन्धी विचित्र रोग होते हैं।

2)"स्त्री की कुंडली में यदि चन्द्र वृष कन्या या सिहं राशी में स्थित हो तो स्त्री के कम पुत्र होते हैं "।

3)"जन्म लग्न में चन्द्र व शुक्र हो तो स्त्री क्रोधिनी परन्तु सुखी होती है "।

4)"किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष सोमवार ,बुध या गुरूवार को शपथ ले तो उसे प्रजा एवं राष्ट्राध्यक्ष के लिए शुभ माना जाता है"।।

5)"सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ ,अष्टम,या द्वादश भाव में हो और नीच या अस्त हो तो जातक के विवाह में बाधा आती है"

6)"चन्द्र से सम्बंधित चार विभिन्न योग बनते हैं जब कोई ग्रह चन्द्र से 10वें 7वें, 4थे, ओर पहले हो तो क्रमश:उत्तम,मध्यम, अधम ओर अधमाधम योग बनता है। यदि इनमें अंतिम योग बनता हो तो कुंडली के अन्य योग कमजोर और निष्फल हो जाते हैं"!!

7)जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए.

8)जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है।

9)जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है.

10)कोई भी ग्रह पहले नवाँशा में होने से जातक को एक प्रगतिशील और साहसिक नेता बनाता है ऐसे ग्रह की दशा /अन्तर्दशा के समय में जातक सक्रिय होता है।। और अपने सम्वन्धित क्षेत्र में सफलता पाता है।।

11)"सूर्य चन्द्र मंगल और लगन से गर्भाधान का विचार किया जाता है वीर्य की अधिकता से पुरुष तथा रक्त की अधिकता से कन्या होती है। रक्त और रज का बरावर होने से नपुंसक का जन्म होता है"।

12)जन्म से चार वर्ष के भीतर बालक की मृत्यु का कारण माता के कुकर्मों, चार से आठ वर्ष के बीच मृत्यु पिता के पाप कर्मों और आठ से बारह वर्ष की आयु के मध्य मृत्यु स्वयं के पूर्वजन्म के पापों के कारण मानी गई है.

13)शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म देने की जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है।

14)राशिचक्र के २७ नक्षत्रों के नौ भाग करके तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक भाग माना गया है। इनमें प्रथम 'जन्म नक्षत्र', दसवाँ 'कर्म नक्षत्र' तथा उन्नीसवाँ 'आधान नक्षत्र' माना गया है। शेष को क्रम से संपत्, विपत्, क्षेम्य, प्रत्वर, साधक, नैधन, मैत्र और परम मैत्र माना गया है। 15)किसी भी प्रकार का रिसाव राहु के अंतर्गत आता है.रिसाव किसी भी चीज का हो सकता है द्रव , शक्ति , धन , मान सम्मान या ओज का.।

16)बुध के निर्बल होने पर कुंडली में अच्छा शुक्र भी अपना प्रभाव खो देता है क्योंकि शुक्र को लक्ष्मी माना जाता है और विष्णु की निष्क्रियता से लक्ष्मी भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाती हैं.

17)शनि वचनबद्धता , कार्यबद्धता और समयबद्धता का कारक ग्रह है. जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन तीनो चीजों का अभाव होगा तो समझना चाहिए की उसकी पत्रिका में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है।

18)नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है. लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है. क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है. जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.। इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.। यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है. फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है. शनि या राहु.??????

 19)ज्योतिष में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं. यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है. इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है.

20)"लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है."।

21)"व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा"".।


ज्योतिष के अटल योग जिनका फल निश्चित है

*ज्योतिषीय भविष्यवाणियां जो कभी असत्य नहीं होती*
✍🏻यद्यपि ज्योतिष ऐसा उलझा हुआ विज्ञान है कि जिस में निपुणता प्राप्त करना बहुत कठिन विषय है। तथापि इसके कुछ स्थूल पक्ष भी हैं जिनको ज्योतिष के आलोचक अथवा पूर्ण रूप से अनभिज्ञ व्यक्ति भी सहज रूप में पहचान कर ज्योतिष की विज्ञान रूप में वैधता सत्यता को अंगीकार कर सकते हैं। ✍🏻

१.-यदि किसी जन्म कुंडली में चंद्र 10 वें अंक के साथ किसी भी घर में है तो उस व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार भयंकर विफलता भोगनी पड़ेगी। यह अपराध इतना भयंकर होगा कि वह जनता में अपना मुंह दिखाने में भी संकोच अनुभव करेगा। स्पष्ट है कि मकर राशि के व्यक्ति के जीवन में उक्त भविष्यवाणी घटित होती ही है।

२.-जब कभी चंद्र के साथ (एक ही घर में) शनि और राहु अथवा राहु एवं मंगल जैसे दो दुष्ट ग्रह हो तो वह व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान होता है कि पूर्ण रूपेण पागल मालूम पड़ता है अथवा ऐसा अनुभव करता है कि वह पागल होने वाला है।

३.-शनि जब तुला लग्न में होता है। तब वह व्यक्ति विद्वान होता है तथा प्रथम श्रेणी का विद्यार्थी होता है।

 ४.-जब गुरु कर्क लग्न में होता है तो वह व्यक्ति विश्वास योग्य, उदार हृदय, सादा जीवन, स्पष्ट वक्ता, सत्य प्रिय तथा चारित्रिक शुद्धता और विद्वत्ता के लिए प्रख्यात होता है। यही परिणाम तब भी होते हैं जबकि गुरु पांचवे या नवे घर में होता है।

५.-यदि लग्न में किसी भी राशि में मंगल स्थित हो तो व्यक्ति शीघ्र क्रोधी स्वभाव का होता है।

६.-यदि कर्क लग्न में अथवा नवे घर में कर्क राशि में गुरु और चंद्र स्थित हो तो वह व्यक्ति महान नेता तथा सत्य का निडर पुजारी एवं महान ख्याति प्राप्त करता है।

 ७.-यदि मंगल किसी भी राशि में तीसरे घर में हो तो वह व्यक्ति बहादुर और साहसी होता है। तथा किसी भी युद्ध, संघर्ष अथवा लड़ाई में भाग लेने के लिए सहसा आगे बढ़ जाने से भयभीत नहीं होता है।

 ८.-यदि किसी भी घर में कर्क राशि में गुरु और चंद्र अथवा शुक्र और चंद्र एकत्र हैं तो संबंधित व्यक्ति अत्यंत सुंदर एवं स्वस्थ होगा।

 ९.-चंद्र और शनि का चौथे घर में इकट्ठा होना व्यक्ति के लिए शैशवावस्था और किशोरावस्था में घोर विपदाओं का फल देने वाला होता है। उत्तरोत्तर जीवन में भी यह संगति नौकरियों की अकस्मात हानि अथवा वित्तीय हानियों का कारण होती है.इत्यादि...!

Friday, June 21, 2019

कल्याण मंदिर स्तोत्र

*श्री कल्याणमन्दिर स्त्रोत*

कल्याण-मन्दिरमुदारमवद्यभेदि ,

भीता-भयप्रदमनिन्दितमङ्-धिपद्मम्।

संसार-सागर-निमज्जदशेषजंतु -

पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य॥ 1॥



यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:,

स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्।

तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतोस्

तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये॥ 2॥



सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप-

मस्मादृशा: कथमधीश भवन्त्यधीशा:।

धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो

रूपं प्ररूपयति किं किल घर्मरश्मे: ॥ 3॥



मोहक्षयादनु-भवन्नपि नाथ मत्र्यो

नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।

कल्पान्तवान्तपयस: प्रकटोऽपि यस्मान्

मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशि:॥ 4॥



अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ ! जडाशयोऽपि

कर्तुं स्तवं लसदसंख्यगुणाकरस्य।

बालोऽपि किं न निजबाहुयुगं वितत्य

विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:॥5॥



ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश

वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाश:।

जाता तदेवमसमीक्षितकारितेयं

जल्पन्ति वा निजगिरा ननु पक्षिणोऽपि॥ 6॥



आस्तामचिन्त्यमहिमा जिन! संस्तवस्ते

नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति।

तीव्रातपोपहतपान्थजनान्निदाघे

प्रीणाति पद्मसरस: सरसोऽनिलोऽपि॥ 7॥



हृद्वर्तिनि त्वयि विभो शिथिलीभवन्ति

जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा:।

सद्यो भुजङ्गममया इव मध्यभाग-

मभ्यागते वनशिखण्डिनि चन्दनस्य॥ 8॥



मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र !

रौद्रैरुपद्रवशतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि।

गोस्वामिनि स्फुरिततेजसि दृष्टमात्रे

चौरैरिवाशु पशव: प्रपलायमानै: ॥ 9॥



त्वं तारको जिन ! कथं भविनां त एव

त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:।

यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-

मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:॥ 10॥



यस्मिन् हर-प्रभृतयोऽपि हतप्रभावा:

सोऽपि त्वया रतिपति: क्षपित: क्षणेन।

विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन

पीतं न किं तदपि दुद्र्धरवाडवेन॥ 11॥



स्वामिन्ननल्पगरिमाणमपि प्रपन्नास्-

त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।

जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन

चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:॥ 12॥



क्रोधस्त्वया यदि विभो ! प्रथमं निरस्तो-

ध्वस्तास्तदा वद कथं किल कर्मचौरा:।

प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके

नीलद्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी॥ 13॥



त्वां योगिनो जिन ! सदा परमात्मरूप

मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुजकोशदेशे।

पूतस्य निर्मल-रुचे-र्यदि वा किमन्य

दक्षस्य सम्भवपदं ननु कर्णिकाया:॥ 14॥ 



ध्यानाज्जिनेश ! भवतो भविन: क्षणेन

देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति।

तीव्रानलादुपलभावमपास्य लोके

चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदा: ॥ 15॥



अन्त: सदैव जिन ! यस्य विभाव्यसे त्वं

भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्।

एतत्स्वरूपमथ मध्यविवर्तिनो हि

यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:॥ 16॥



आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेदबुद्ध्या

ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभाव:।

पानीयमप्यमृत-मित्यनुचिन्त्यमानं

किं नाम नो विषविकारमपाकरोति॥ 17॥



त्वामेव वीततमसं परवादिनोऽपि

नूनं विभो हरिहरादिधिया प्रपन्ना:।

किं काचकामलिभिरीश सितोऽपि शङ्खो

नो गृह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ॥ 18॥



धर्मोपदेशसमये सविधानुभावा-

दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:।

अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि

किं वा विबोधमुपयाति न जीवलोक:॥ 19॥



चित्रं विभो ! कथमवाङ्मुखवृन्तमेव

विष्वक्पतत्यविरला सुरपुष्पवृष्टि:।

त्वद्-गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!

गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि॥ 20॥



स्थाने गभीरहृदयोदधिसम्भवाया:

पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति।

पीत्वा यत: परमसम्मदसङ्गभाजो

भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्॥ 21॥



स्वामिन्! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो

मन्ये वदन्ति शुचय: सुरचामरौघा:।

येऽस्मै नतिं विदधते मुनिपुङ्गवाय

ते नूनमूध्र्वगतय: खलु शुद्धभावा:॥ 22॥



श्यामं गभीरगिरमुज्ज्वलहेमरत्न-

सिंहासनस्थमिह भव्यशिखण्डिनस्त्वाम्।

आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चैश्-

चामीकराद्रिशिरसीव नवाम्बुवाहम्॥ 23॥



उद्गच्छता तव शितिद्युतिमण्डलेन

लुप्तच्छदच्छवि-रशोकतरुर्बभूव ।

सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग!

नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि॥ 24॥



भो ! भो ! प्रमादमवधूय भजध्वमेन-

मागत्य निर्वृतिपुरीं प्रति सार्थवाहम्।

एतन्निवेदयति देव जगत्त्रयाय

मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते॥ 25॥



उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!

तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:।

मुक्ताकलाप-कलितोल्लसितातपत्र

व्याजात्त्रिधा धृततनुध्र्रुवमभ्युपेत:॥ 26॥



स्वेन प्रपूरितजगत्त्रयपिण्डितेन

कान्तिप्रतापयशसामिव सञ्चयेन।

माणिक्यहेमरजत-प्रविनिर्मितेन

सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि॥ 27॥



दिव्यस्रजो जिन नमत्त्रिदशाधिपाना-

मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिबन्धान्।

पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वापरत्र

त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव॥ 28॥



त्वं नाथ ! जन्मजलधेर्विपराङ्मुखोऽपि

यत्तारयस्यसुमतो निजपृष्ठलग्नान्।

युक्तं हि पार्थिवनिपस्य सतस्तवैव

चित्रं विभो ! यदसि कर्मविपाकशून्य:॥ 29॥



विश्वेश्वरोऽपि जनपालक ! दुर्गतस्त्वं

किं वाक्षरप्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!

अज्ञानवत्यपि सदैव कथञ्चिदेव

ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्वविकासहेतु:॥ 30॥



प्राग्भारसम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा-

दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि।

छायापि तैस्तव न नाथ हता हताशो

ग्रस्तस्त्वमी-भिरयमेव परं दुरात्मा॥ 31॥



यद्गर्जदूर्जित घनौघमदभ्रभीम

भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्।

दैत्येन मुक्तमथ दुस्तरवारि दध्रे

तेनैव तस्य जिन! दुस्तरवारिकृत्यम्॥ 32॥



ध्वस्तोध्र्वकेश-विकृताकृतिमत्र्यमुण्ड-

प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र विनिर्यदग्रि:।

प्रेतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:

सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भवदु:खहेतु:॥ 33॥



धन्यास्त एव भुवनाधिप ! ये त्रिसन्ध्य-

माराधयन्ति विधिवद् विधुतान्यकृत्या:।

भक्त्योल्लसत्पुलकपक्ष्मलदेहदेशा: ।

पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:॥34॥



अस्मिन्नपार-भव- वारिनिधौ मुनीश!

मन्ये न मे श्रवणगोचरतां गतोऽसि।

आकर्णिते तु तव गोत्रपवित्रमन्त्रे

किं वा विपद्विषधरी सविधं समेति॥ 35॥



जन्मान्तरेऽपि तव पादयुगं न देव!

मन्ये मया महितमीहितदानदक्षम्।

तेनेह जन्मनि मुनीश ! पराभवानां

जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्॥ 36॥



नूनं न मोहतिमिरावृतलोचनेन

पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि।

मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:

प्रोद्यत्प्रबन्धगतय: कथमन्यथैते॥ 37॥



आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि

नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या।

जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रम्

यस्मात्िक्रया: प्रतिफलन्ति न भावशून्या:॥ 38॥



त्वं नाथ ! दु:खिजनवत्सल! हे शरण्य!

कारुण्यपुण्यवसते ! वशिनां वरेण्य!

भक्त्या नते मयि महेश ! दयां विधाय

दु:खाङ्कुरोद्दलनतत्परतां विधेहि ॥ 39॥



नि:संख्यसारशरणं शरणं शरण्य-

मासाद्य सादितरिपु-प्रथितावदानम्।

त्वत्पादपङ्कजमपि प्रणिधानवन्ध्यो

वन्ध्योऽस्मि चेद्भुवनपावन! हा हतोऽस्मि॥४०॥



देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिलवस्तुसार!

संसारतारक ! विभो! भुवनाधिनाथ!

त्रायस्व देव! करुणाहृद ! मां पुनीहि

सीदन्तमद्य भयदव्यसनाम्बुराशे:॥ 41॥



यद्यस्ति नाथ ! भवदङ्िघ्रसरोरुहाणां

भक्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्िचताया:।

तन्मे त्वदेकशरणस्य शरण्य! भूया:

स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि॥ 42॥



इत्थंसमाहितधियो विधिवज्िजनेन्द्र!

सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:।

त्वद्बिम्बनिर्मल मुखाम्बुजबद्धलक्ष्या:

ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:॥ 43॥



जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्गसम्पदो भुक्त्वा।

ते विगलितमलनिचया अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते॥ 44॥

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...