Saturday, January 16, 2021

राम, अयोध्या और जैन धर्म का अनादि सम्बन्ध

 *श्री राम ,अयोध्या और जैन धर्म का अनादि सम्बन्ध: एक चिंतन*


*डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य*

*संकायाध्यक्ष- कला एवं मानविकी संकाय*

*विभागाध्यक्ष-संस्कृत विभाग, एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्य प्रदेश*

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*नमः इक्ष्वाकुवंशाय, सूर्यवंशाय जन्मने ।*

*मर्यादारूप रामाय, विश्वज्ञानात्मने नमः ।।*

भगवान वृषभ देव के इक्ष्वाकु वंश के लिए नमस्कार हो , सूर्यवंश में उत्पन्न मर्यादा रूप राम  और  उनके वैश्विक ज्ञान के लिए  नमस्कार हो ।



राम शब्द नहीं हैं ,राम एक व्यक्तित्व हैं पर समझने के लिए राम शब्द की व्याख्या शास्त्रों में इस प्रकार प्राप्त होती है - राम शब्द संस्कृत की *रम् धातु और  घञ् प्रत्यय  के संयोग से निष्पन्न होता है ।रम् धातु का अर्थ रमण -निवास -विहार करने में होता है । वे प्राणी मात्र के हृदय में रमण निवास करते हैं ।


 रमते कणे-कणे  इति रामः ।

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 जैन धर्म में राम की व्याख्या 


रमन्ते योगिनः यस्मिन् स: रामः ।


जिनमें योगी जन रमते हैं । वह राम हैं । वे केवल सीता  के ही राम नहीं , वे केवल दशरथ के ही राम नहीं , वे केवल अयोध्या के ही राम नहीं हैं ,वे केवल  पारिवारिक सम्बन्धों में बंधे राम   नहीं हैं वे तो प्रत्येक आत्मा में रमने वाले राम हैं ।  यह व्यापक अर्थ  जैन धर्म के राम है ।


राम का व्यक्तित्व  जैन पुराण के अनुसार 

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जैन बाल्मीकि रविषेणाचार्य विरचित पदमपुराण  नामक ग्रन्थ में श्री राम को आठवां बलभद्र , उसी जन्म से निर्वाण पद प्राप्त करने वाले तदभव मोक्षगामी जीव  स्वीकार किया गया है । जिसमें श्री राम के सम्पूर्ण चरित्र को  मर्यादा , श्रेष्ठ पुत्र-पिता-पिता -राजा  एवं ज्ञान, वैराग्य तथा अध्यात्म का प्रतीक माना है । 


जैन बीजाक्षर विज्ञान के अनुसार राम शब्द का अर्थ -र +अ+म=  राम

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र=

 अग्निबीज है, जो शुभाशुभ कर्मों को जलाकर समाप्त कर  स्वर्ग-नरक-पशुगति के फल का अभाव करने में सक्षम हैं, वे राम हैं ।


अ-= सूर्य बीज ,भानु बीज है । जो मोहरूपी अंधकार को दूर कर अनश्वर शांति देने में सक्षम हैं , वे राम हैं ।


म= चंदबीज है, जो अमृत से परिपूर्ण अखंड चैतन्य आत्मा के ममत्व भावना को दूर करने में मर्यादा संयम में बांधने की क्षमता रखते हैं , वे राम हैं  ।

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अयोध्या  के नाम - अवध, कौशल  अपरजिता, साकेत  आदि नाम शब्दकोशों से प्राप्त होते हैं । नामों की सार्थकता 


1.अयोध्या शब्द का सर्वोपरि अर्थ ये है कि -जहाँ युद्ध ना हुए हों , दूसरा अर्थ है जिसे युद्ध में हराया ना जा सके अथवा जिससे कोई युद्ध की इच्छा न रखता हो । 


2.अपराजिता-जो अपराजेय हो वह है अयोध्या ।


3.अवध- जहाँ प्राणी मात्र का वध ना हुआ हो। अहिंसक अयोध्या ।

4.  कौशल- जो धर्म ,शांति, जीव रक्षा, न्याय ,असि-मसि-कृषि-विद्या-वणिज्य, शिल्प एवं अन्य विद्याओं में कुशल हो वह है अयोध्या ।


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*जैन धर्म का सनातन सम्बन्ध अयोध्या से -*

जैन धर्म  के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों के जन्म स्थली जैन शास्त्रों में  सनातन नियम के रूप में उल्लेख प्राप्त होने से इसे शाश्वत (अविनाशीक) भूमि कहा जाता हैं ।

जैन मानता के अनुसार काल चक्र को 6 काल संज्ञाओं में विभाजित किया गया है । जब कई कल्प व्यतीत हो जाते हैं तब हुडावसर्पिणी काल आता है । जिसमें सब यथावत रहता है पर कुछ विसंगतियां रहती हैं , उसी कारण से वर्तमान के 24 तीर्थंकरों में केवल 5 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में हुआ । 

जिसमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान वृषभदेव का जन्म 14 वे मनु (कुलकर) के नाभिराय के यहां हुआ , इनके अतिरिक्त 

श्री अजितनाथ, श्री अभिनन्दननाथ, श्री सुमतिनाथ और  श्री अनन्तनाथ भगवान का जन्म  भी अयोधया में हुआ । 

जैन शास्त्रों में जहाँ तीर्थंकर का जन्म होता है वहां गर्भ के 6 माह पूर्व से जन्म तक कुल 15 माह तक कुबेर इन्द्र    द्वारा प्रहर क्रम से रत्नों की वर्षा करता है । इसलिए उस भूमि को हिरण्य- गर्भा,रत्न -गर्भा, स्वर्ण -गर्भा आदि नामों से भी उल्लेखित किया गया है ।

जैन धर्म ग्रंथों में श्री सम्मेदशिखर एवं अयोध्या को शाश्वत भूमि के रूप में स्वीकार किया गया है ।

यह शाश्वत भूमि है -जिसका विनाश कल्पकाल के  अंत में भी नहीं होता है ।केवल दोनों के ध्रुव परिवर्तित होते हैं । इन भूमियों के नीचे शाश्वत स्वस्तिक स्थित है । इसलिए भी इन्हें शाश्वत कहा जाता है । 

भगवान राम का जन्म अयोध्या में और कुंडलपुर के बड़े बाबा के रूप में विश्व विख्यात  प्रथम तीर्थंकर का जन्म ,कुल  आदि में समानता की कड़ी को जोड़कर रखती है । 

भगवान वृषभ देव के पुत्र भरत चक्रवर्ती एवं श्री राम के अनुज भरत के नाम पर भारत का नामोल्लेख यह भी इस कड़ी को मजबूत करता है ।


द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजित नाथ के समय में  श्री राम के पूर्वज  महाराज सगर चक्रवती उनके पुत्र एवं भगीरथ -   गंगावतरण  आदि की कथा वर्णित है ।

उपरोक्त साक्ष्य जैन धर्म और राम को बेजोड़ बनाते हैं ।

Friday, January 1, 2021

बेल पत्र ,अनाज,पुप्ष और शंकर का सम्बंध

 🔱 ॐ नमः शिवाय 🔥

 

बिल्व_वृक्ष_विशेष_पंचपत्रबिल्व_दर्शनम् l


🌿1. बिल्व वृक्ष के पत्ते शंकर जी का आहार माने गए हैं, इसलिए भक्त लोग बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर चढ़ाते हैं। शिव की पूजा के लिए बिल्व-पत्र बहुत ज़रूरी माना जाता है। शिव-भक्तों का विश्वास है कि पत्तों के त्रिनेत्रस्वरूप् तीनों पर्णक शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं।भगवान शंकर को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं।

🌿2. अगर किसी की बिल्व वृक्ष के नीचे मृत्यु हो जाए तो उसको मोक्ष मिल जाता है l

🌿3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है ।

🌿4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है ।

🌿5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

🌿6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।

🌿7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

🌿8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

🌿9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।

🌿10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है ।

🌿11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

🌿कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । 

बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं।


🌿 शिवजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य बात :-🌿

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से क्या फल मिलता है । किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन

मिलता है कि भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है।


🌿 शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है ? 🌿

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाताहै।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।


🌿 शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सा रस(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है ? 🌿

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है।


🌿 शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है-? 🌿

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती

है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।


यदि जीवन में समस्याएं हैं, तो उनका समाधान भी है, समाधान बस आप समर्पित भाव से शिवजी की भक्ति करके शिवजी को प्रसन्न कीजिए , शिवजी के आशीर्वाद से आपकी समस्याओ का समाधान भी हो जायेगा l


आप सभी शिव भक्तों से निवेदन है,आप जहां 

पर भी हैं, वहीं से देवों के देव महादेव को साक्षात अपने समक्ष मानते हुए नमन अवश्य कर लें l


     

       🌿 ॐ  🌿

  

Tuesday, December 22, 2020

वास्तु शास्त्र एवं दिशाओं के प्रभाव

 वास्तु शास्त्र’ मुख्यतः दिशाओं पर आधारित सैद्धांतिक विज्ञान है। अतः दिशाओं से संबंधित कौन-कौन से दोष हमारे घर एवं व्यवसायिक संस्थान में मौजूद हैं, यह जानकर तथा दिशाओं से संबंधित ग्रहों को मजबूत करके हम आज के भौतिकतावादी युग में तनाव एवं परेशानियों को दूर कर सकते हैं। इतना ही नहीं वरन् वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष के नियमों के आधार पर दिशाओं एवं ज्योतिषीय ग्रहों में समन्वय स्थापित करके हम धन, संपदा, सुख, शांति, ऐश्वर्य संपदा। सभी कुछ प्राप्त कर सकते हैं।


ज्योतिष एवं वास्तु दोनों ही शास्त्रों में चार मुख्य दिशाओं एवं चार उपदिशाओं अर्थात कुल आठ दिशाओं को मान्यता प्राप्त है। ये आठ दिशायें तथा उनसे संबंधित ग्रह एवं देवता इस प्रकार हैं- दिशा अधिपति ग्रह देवता 1. पूर्व सूर्य इंद्र 2. पश्चिम शनि वरुण 3. उत्तर बुध कुबेर 4. दक्षिण मंगल यम 5. उत्तर-पूर्व गुरु शिव 6. उत्तर पश्चिम चंद्र वायु देवता 7. दक्षिण पूर्व शुक्र अग्नि देवता 8.दक्षिण पश्चिम राहु-केतु नैति उ. पू. पू. द.पूउ. प. प. द.प उ. द. (गुरु) (सूर्य) (शुक्र) (बुध) (मंगल) (चंद्र) (शनि) (राहु-केतु) गायत्री मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। पश्चिम दिशा: इस दिशा का स्वामी ग्रह शनि है। शनि ग्रह को मुख्यतः आयु, रोग, कठोर वाणी, सेवक, कर्मचारी इत्यादि का कारक ग्रह माना जाता है।



पश्चिम दिशाः सफलता, संपन्नता एवं उज्जवल भविष्य की नियामक दिशा है। इस दिशा में दोष होने पर वायु विकार कुष्ठ रोग, पैरों में दर्द एवं जीवन में प्रसिद्धि एवं सफलता की कमी बनी रहती है।

उपाय: पश्चिम दिशा के भूखंड या पश्चिमी भाग में गड्ढा, दरार या नीचा स्थान नहीं होना चाहिये। शनि यंत्र की उपासना करें। मांस मदिरा का सेवन न करें। भैरो की उपासना करें। 

उत्तर दिशा: ज्योतिष के अनुसार उत्तर दिशा का पूर्ण स्वामित्व ‘बुध ग्रह’ को प्राप्त है। बुध ग्रह ज्योतिषीय दृष्टि से, ज्योतिष, शिल्प, कानून हास्य-विनोद एवं वित्त व्यवस्था से संबंधित ग्रह पूर्व दिशा - ज्योतिष के अनुसार पूर्व दिशा का आधिपत्य सूर्य ग्रह को प्राप्त है। सूर्य आत्मा, आरोग्य, स्वभाव, राज्य प्रतिष्ठा, प्रभाव, यश, सौभाग्य तथा पिता का कारक ग्रह माना गया है। वास्तु एवं ज्योतिषीय दोनों ही दृष्टियों से पूर्व दिशा अच्छे स्वास्थ्य, धन, वृद्धि एवं सुख समृद्धि की दिशा मानी गई है। यदि पूर्व दिशा में दोष है अर्थात् पूर्व दिशा में कहीं भी खुला स्थान नहीं है तो घर में मुख्यतः (पितृ दोष) की संभावना होती है। जिसके फलसवरूप किसी भी कार्य में सफलता न मिलना पिता एवं बाॅस से संबंध खराब होना। घर के मुखिया का स्वास्थ्य खराब रहना तथा सरकारी नौकरी में परेशानी होती है। साथ ही सिर दर्द, नेत्र रोग, क्षय रोग, अस्थि रोग, हृदय रोग, दांत एवं जीभ के रोग मस्तिष्क एवं बुद्धि की दुर्बलता जैसी भयानक बीमारियों का सामना भी करना पड़ सकता है।


उपाय: भवन निर्माण करते समय पूर्व दिशा का कुछ हिस्सा खुला छोड़ देना चाहिए एवं पूर्व दिशा के भूखंड को थोड़ा नीचा रखना चाहिये। है। वास्तु शास्त्र के अनुसार सभी प्रकार की भौतिक सुख समृद्धि एवं भोग विलास की प्राप्ति उत्तर दिशा के शुभ होने पर ही प्राप्त की जा सकती है। इस दिशा में दोष हो अथवा बुध ग्रह कुपित हो तो घर में हमेशा नीरवता का वातावरण रहेगा, व्यवसाय मंे हानि, आर्थिक तंगी, वाणी दोष, विद्या प्राप्ति में बाधा/ त्वचा रोग एवं मतिभ्रम होने का भय रहता है। दोष दूर करने के उपाय: उत्तर दिशा को अधिक ऊंचा न रखें। उत्तर दिशा में थोड़ा खाली स्थान अवश्य रखें। बुध यंत्र की स्थापना करनी चाहिये। कुबेर, दुर्गा जी अपना गणेश जी की पूजा अवश्य करनी चाहिये।


दक्षिण दिशा - दक्षिण दिशा का स्वामी ग्रह ‘मंगल’ है। मंगल ग्रह ज्योतिषीय दृष्टि से मुख्यतः धैर्य, पराक्रम, साहस, शक्ति, क्रोध, उत्तेजना षड्यंत्र, शत्रु, विवाद, छोटे भाई, अचल संपत्ति, भूमि तथा रक्त इत्यादि का कारक ग्रह माना गया है। वास्तु की दृष्टि से यह दिशा पद, प्रतिष्ठा, पिता के सुख एवं जीवन में स्थायित्व प्रदान करने की मुख्य दिशा मानी गई है। इस दिशा में दोष हो तो जातक को निम्न कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। - अत्यधिक क्रोध आना। - भाइयों से विवाद होना। - शत्रुओं का सक्रिय होना। फोडे-फंुंसी एवं रक्त संबंधी अशुद्धियां होना।



उपाय: दक्षिण दिशा में सदैव ऊंचा व भारी निर्माण करवाना चाहिये। हनुमान जी की पूजा एवं मंगल यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। हर मंगलवार को गरीबों को कुछ मिठाई अवश्य देनी चाहिए।


उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) ईशान कोण का स्वामी ग्रह ‘गुरु’ है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को मुख्यतः धार्मिक कार्यों एवं आध्यात्मिकता का कारक ग्रह माना गया है। यह दिशा ज्ञान एवं धर्म-कर्म का सूचक है। इस दिशा में दोष होने पर अथवा पत्रिका में गुरु ग्रह के पीड़ित होने पर व्यक्ति कभी भी पूजा पाठ ढंग से नहीं करेगा, घर में धन की कमी बनी रहेगी तथा बच्चों के विवाह भी देर से होंगे। साथ ही उदर विकार, मधुमेह तथा पाचन क्रिया से संबंधित रोग भी हो सकते हैं।


उपाय: ईशान कोण को हमेशा साफ सुथरा रखना चाहये। इस दिशा में कभी भी शौचालय का निर्माण नहीं करवाना चाहिये। गुरुओं और ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहये। धार्मिक पुस्तकों का दान करना चाहिये।


दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) इस दिशा का स्वामित्व ‘शुक्र ग्रह’ को प्राप्त है। शुक्र ग्रह को मुख्यतः विवाह प्रेम संबंध, ऐश्वर्य, सौंदर्य, वाहन, आकर्षक व्यक्तित्व, रतिक्रिया एवं कामक्रीड़ा का कारक ग्रह माना गया है। वास्तु की दृष्टि से यह दिशा उत्तम शयन सुख एवं प्रजनन क्रिया की दिशा है। यदि इस दिशा में कोई भी वास्तु दोष है अथवा शुक्र ग्रह पीड़ित है तो पत्नी सुख में बाधा/ वैवाहिक जीवन में कड़वाहट, असफल प्रेम संबंध, वाहन से कष्ट, कामेच्छा का समाप्त होना, मधुमेह/ आंखों के रोग, मूत्र रोग एवं गुप्त रोगों की संभावना बनी रहती है।


उपाय: आग्नेय कोण में कभी भी पानी का टैंक अथवा भूमिगत टैंक का निर्माण नहीं करवाना चाहये। शुक्र यंत्र की विधिवत स्थापना करनी चाहिए। चांदी अथवा स्फटिक के श्रीयंत्र की पूजा करें।


उत्तर पश्चिम दिशा (वायव्य कोण) इस दिशा का स्वामी ग्रह ‘चंद्र’ है। चंद्र ग्रह मन, माता, मस्तिष्क, घरेलू वातावरण, शिक्षा, आवास, निद्रा तथा गुप्त प्रेम संबंधों का कारक ग्रह है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यह दिशा मानसिक विकास, मित्र-शत्रु, अतिथि अथवा रिश्तेदारों से संबंधित है। इस दिशा में दोष होने पर जातक को निम्नलिखित कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। -माता तथा रिश्तेदारों से संबंध ठीक न होना। मानसिक परेशानी, अनिद्रा, तनाव रहना। - काक संबंधी रोग अस्थमा, मासिक चक्र अथवा प्रजनन संबंधी रोगों का बढ़ना।


उपाय: वायव्य कोण को ईशान की अपेक्षा नीचा न रक्खें। चंद्र की रोशनी में बैठकर ‘‘ऊँं श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः’’ मंत्र का जाप करें। माता का आदर करें। शिव की उपासना करें।


दक्षिण-पश्चिम दिशा (र्नैत्य कोण ) दक्षिण, पश्चिम दिशा का स्वामित्व ज्योतिष में ‘राहु-केतु’ ग्रहों को प्राप्त है। ज्योतिषीय दृष्टि से ‘राहु’ को दादा तथा ‘केतु’ को नाना का प्रतीकात्मक ग्रह माना गया है। राहु का संबंध विदेशी भाषा, लोभ, झूठ, षड़यंत्र, दुष्टता। वैधव्य चोरी एवं जुएं तथा विदेश यात्रा से है तथा केतु मुख्यतः अचानक होने वाली घटनाएं, भूत-प्रेत, तंत्र मंत्र, जादू-टोने घमंड इत्यादि का कारक ग्रह है। ज्योतिष में राहु-केतु दोनों छाया ग्रहों को ’पृथकतावादी’ ग्रहों की संज्ञा दी गई है। वास्तु की दृष्टि से इस दिशा को ‘आसुरी दिशा’ अथवा भूत प्रेत की दिशा कहा गया है। इस दिशा में यदि दोष है तो जातक को कई परेशानियांे का सामना करना पड़ सकता है। जैसे- दादा या नाना से संबंध मधुर न रहना। ससुराल पक्ष से परेशानी पत्नी की हानि, नौकरी, अपनो से अलगाव, अहंकार उत्पन्न होना, झूठ बोलना जुए की लत, जादू टोने तथा ऊपरी हवा आदि का असर होना तथा संक्रामक रोगों का होना।


उपाय: चूंकि इस दिशा को ‘यम’ की दिशा भी कहा गया है अतः वास्तु की दृष्टि से इस स्थान को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए। यदि र्नैत्य कोण में दोष रह गया है तो सरस्वती अथवा गणेश जी की यथाशक्ति पूजा करनी चाहिए। राहु-केतु के मंत्रों का जाप करना चाहियें सतनाजा (सात अनाज) तथा जल का दान करने से राहु-केतु ग्रहों की शांति होती है तथा इस दिशा में उत्पन्न दोषों का शमन होता है।

Thursday, September 17, 2020

जैन दर्शन और उसके उद्देश्य एवं ग्रन्थ परिचय

 दर्शन और उसका उद्देश्य  

'कर्मारातीन् जयतीति जिन:' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसने राग द्वेष आदि शत्रुओं को जीत लिया है वह 'जिन' है।


अर्हत, अरहन्त, जिनेन्द्र, वीतराग, परमेष्ठी, आप्त आदि उसी के पर्यायवाची नाम हैं। उनके द्वारा उपदिष्ट दर्शन जैनदर्शन हैं।

आचार का नाम धर्म है और विचार का नाम दर्शन है तथा युक्ति-प्रतियुक्ति रूप हेतु आदि से उस विचार को सुदृढ़ करना न्याय है।

जैन दर्शन का निर्देश है कि आचार का अनुपालन विचारपूर्वक किया जाये। धर्म, दर्शन और न्याय-इन तीनों के सुमेल से ही व्यक्ति के आध्यात्मिक उन्नयन का भव्य प्रासाद खड़ा होता है। *अत: जैन धर्म का जो 'आत्मोदय' के साथ 'सर्वोदय'- सबका कल्याण उद्दिष्ट है।[1] उसका समर्थन करना जैन दर्शन का लक्ष्य हैं जैन धर्म में अपना ही कल्याण नहीं चाहा गया है, अपितु सारे राष्ट्र, राष्ट्र की जनता और विश्व के जनसमूह, यहाँ तक कि प्राणीमात्र के सुख एवं कल्याण की कामना की गई है।[2]

जैन दर्शन के प्रमुख अंग

द्रव्य-मीमांसा

तत्त्व-मीमांसा

पदार्थ-मीमांसा

पंचास्तिकाय-मीमांसा

अनेकान्त-विमर्श

स्याद्वाद विमर्श

सप्तभंगी विमर्श


 

द्रव्य-मीमांसा

मुख्य लेख : द्रव्य मीमांसा -जैन दर्शन

वैशेषिक, भाट्ट और प्रभाकर दर्शनों में द्रव्य और पदार्थ दोनों को स्वीकार कर उनका विवेचन किया गया है। तथा सांख्य दर्शन और बौद्ध दर्शनों में क्रमश: तत्त्व और आर्य सत्यों का कथन किया गया है, वेदान्त दर्शन में केवल ब्रह्म (आत्मतत्व) और चार्वाक दर्शन में भूत तत्त्वों को माना गया है, वहाँ जैन दर्शन में द्रव्य, पदार्थ, तत्त्व, और अस्तिकाय को स्वीकार कर उन सबका पृथक्-पृथक् विस्तृत निरूपण किया गया है।[3]


जो ज्ञेय के रूप में वर्णित है और जिनमें हेय-उपादेय का विभाजन नहीं है पर तत्त्वज्ञान की दृष्टि से जिनका जानना ज़रूरी है तथा गुण और पर्यायों वाले हैं एवं उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य युक्त हैं, वे द्रव्य हैं।

तत्त्व का अर्थ मतलब या प्रयोजन है। जो अपने हित का साधक है वह उपादेय है और जो आत्महित में बाधक है वह हेय है। उपादेय एवं हेय की दृष्टि से जिनका प्रतिपादन के उन्हें तत्त्व कहा गया है।

भाषा के पदों द्वारा जो अभिधेय है वे पदार्थ हैं। उन्हें पदार्थ कहने का एक अभिप्राय यह भी है कि 'अर्थ्यतेऽभिलष्यते मुमुक्षुभिरित्यर्थ:' मुमुक्षुओं के द्वारा उनकी अभिलाषा की जाती है, अत: उन्हें अर्थ या पदार्थ कहा गया है।

अस्तिकाय की परिभाषा करते हुए कहा है कि जो 'अस्ति' और 'काय' दोनों है। 'अस्ति' का अर्थ 'है' है और 'काय' का अर्थ 'बहुप्रदेशी' है अर्थात् जो द्रव्य है' होकर कायवाले- बहुप्रदेशी हैं, वे 'अस्तिकाय' हैं।[4] ऐसे पाँच द्रव्य हैं-

पुद्गल

धर्म

अधर्म

आकाश

जीव

कालद्रव्य एक प्रदेशी होने से अस्तिकाय नहीं है।

तत्त्व मीमांसा

मुख्य लेख : तत्त्व मीमांसा -जैन दर्शन

तत्त्व का अर्थ है प्रयोजन भूत वस्तु। जो अपने मतलब की वस्तु है और जिससे अपना हित अथवा स्वरूप पहचाना जाता है वह तत्त्व है। 'तस्य भाव: तत्त्वम्' अर्थात् वस्तु के भाव (स्वरूप) का नाम तत्त्व है। ऋषियों या शास्त्रों का जितना उपदेश है उसका केन्द्र जीव (आत्मा) रहा है। उपनिषदों में आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और ध्यान पर अधिक बल दिया गया है और इनके माध्यम से आत्मा के साक्षात्कार की बात कही गयी है[5]। जैन दर्शन तो पूरी तरह आध्यात्मिक है। अत: इसमें आत्मा को तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है।[6]


बहिरात्मा,

अन्तरात्मा और

परमात्मा।

मूढ आत्मा को बहिरात्मा, जागृत आत्मा को अन्तरात्मा और अशेष गुणों से सम्पन्न आत्मा को परमात्मा कहा गया है। ये एक ही आत्मा के उन्नयन की विकसित तीन श्रेणियाँ हैं। जैसे एक आरम्भिक अबोध बालक शिक्षक, पुस्तक, पाठशाला आदि की सहायता से सर्वोच्च शिक्षा पाकर सुबोध बन जाता है वैसे ही एक मूढात्मा सत्संगति, सदाचार-अनुपालन, ज्ञानाभ्यास आदि को प्राप्त कर अन्तरात्मा (महात्मा) बन जाता है और वही ज्ञान, ध्यान तप आदि के निरन्तर अभ्यास से कर्म-कलङ्क से मुक्त होकर परमात्मा (अरहन्त व सिद्ध रूप ईश्वर) हो जाता है। इस दिशा में जैन चिन्तकों का चिन्तन, आत्म विद्या की ओर लगाव अपूर्व है।


 

पदार्थ मीमांसा

मुख्य लेख : पदार्थ मीमांसा -जैन दर्शन

उक्त सात तत्त्वों में पुण्य और पाप को सम्मिलित कर देने पर नौ पदार्थ कहे गए हैं।[7]


पंचास्तिकाय मीमांसा

मुख्य लेख : पंचास्तिकाय मीमांसा -जैन दर्शन

जैन दर्शन में उक्त द्रव्य, तत्त्व और पदार्थ के अलावा अस्तिकायों का निरूपण किया गया है। कालद्रव्य को छोड़कर शेष पांचों द्रव्य (पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकश और जीव) अस्तिकाय हैं।[8]


अनेकान्त विमर्श

मुख्य लेख : अनेकान्त विमर्श -जैन दर्शन

'अनेकान्त' जैनदर्शन का उल्लेखनीय सिद्धान्त है। वह इतना व्यापक है कि वह लोक (लोगों) के सभी व्यवहारों में व्याप्त है। उसके बिना किसी का व्यवहार चल नहीं सकता।


स्याद्वाद विमर्श

मुख्य लेख : स्याद्वाद विमर्श -जैन दर्शन

स्याद्वाद उसी प्रकार अनेकान्त का वाचक अथवा व्यवस्थापक है जिस प्रकार ज्ञान उस अनेकान्त का व्यापक अथवा व्यवस्थापक है। जब ज्ञान के द्वारा वह जाना जाता है तो दोनों में ज्ञान-ज्ञेय का संबंध होता है और जब वह स्याद्वाद के द्वारा कहा जाता है तो उनमें वाच्य-वाचक संबंध होता है। ज्ञान का महत्त्व यह है कि वह ज्ञेय को जानकर उन ज्ञेयों की व्यवस्था बनाता है- उन्हें मिश्रित नहीं होने देता है। यह अमुक है, यह अमुक नहीं है इस प्रकार वह ज्ञाता को उस उस ज्ञेय की परिच्छित्ति कराता है। स्याद्वाद का भी वही महत्त्व है। वह वचनरूप होने से वाच्य को कहकर उसके अन्य धर्मों की मौन व्यवस्था करता है। ज्ञान और वचन में अंतर यही है कि ज्ञान एक साथ अनेक ज्ञेयों को जान सकता है पर वचन एक बार में एक ही वाच्य धर्म को कह सकता है, क्योंकि 'सकृदुच्चरित शब्द: एकमेवार्थ गमयति' इस नियम के अनुसार एक बार बोला गया वचन एक ही अर्थ का बोध कराता है।


समन्तभद्र की 'आप्त-मीमांसा', जिसे 'स्याद्वाद-मीमांसा' कहा जा सकता है, ऐसी कृति है, जिसमें एक साथ स्याद्वाद, अनेकान्त और सप्तभंगी तीनों का विशद और विस्तृत विवेचन किया गया है। अकलंकदेव ने उस पर 'अष्टशती' (आप्त मीमांसा- विवृति) और विद्यानन्द ने उसी पर 'अष्टसहस्त्री' (आप्तमीमांसालंकृति) व्याख्या लिखकर जहाँ आप्तमीमांसा की कारिकाओं एवं उनके पद-वाक्यादिकों का विशद व्याख्यान किया है वहाँ इन तीनों का भी अद्वितीय विवेचन किया है।


 

आगम (श्रुत)

शब्द, संकेत, चेष्टा आदि पूर्वक जो ज्ञान होता है वह आगम है। जैसे- 'मेरु आदिक है' शब्दों को सुनने के बाद सुमेरु पर्वत आदि का बोध होता है।[9] शब्द श्रवणादि मतिज्ञान पूर्वक होने से यह ज्ञान (आगम) भी परोक्ष प्रमाण है। इस तरह से स्मृत्यादि पाँचों ज्ञान ज्ञानान्तरापेक्ष हैं। स्मरण में धारणा रूप अनुभव (मति), प्रत्यभिज्ञान में अनुभव तथा स्मरण, तर्क में अनुभव, स्मृति और प्रत्यभिज्ञान, अनुमान में लिंगदर्शन, व्याप्ति स्मरण और आगम में शब्द, संकेतादि अपेक्षित हैं- उनके बिना उनकी उत्पत्ति संभव नहीं है। अतएव ये और इस जाति के अन्य सापेक्ष ज्ञान परोक्ष प्रमाण माने गये हैं।


नय-विमर्श

नय-स्वरूप— अभिनव धर्मभूषण ने[10] न्याय का लक्षण करते हुए कहा है कि 'प्रमाण-नयात्मको न्याय:'- प्रमाण और नय न्याय हैं, क्योंकि इन दोनों के द्वारा पदार्थों का सम्यक् ज्ञान होता है। अपने इस कथन को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने आचार्य गृद्धपिच्छ के तत्त्वार्थसूत्र के, जिसे 'महाशास्त्र' कहा जाता है, उस सूत्र को प्रस्तुत किया है, जिसमें प्रमाण और मय को जीवादि तत्त्वार्थों को जानने का उपाय बताया गया है और वह है- 'प्रमाणनयैरधिगम:[11]'। वस्तुत: जैन न्याय का भव्य प्रासाद इसी महत्त्वपूर्ण सूत्र के आधार पर निर्मित हुआ है।


नय-भेद


उपर्युक्त प्रकार से मूल नय दो हैं[12]-


द्रव्यार्थिक और

पर्यायार्थिक।

इनमें द्रव्यार्थिक तीन प्रकार का हैं[13]-

नैगम,

संग्रह,

व्यवहार। तथा

पर्यायार्थिक नय के चार भेद हैं[14]-

ऋजुसूत्र,

शब्द,

समभिरूढ़ और

एवम्भूत।

नैगम नय जो धर्म और धर्मी में एक को प्रधान और एक को गौण करके प्ररूपण करता है वह नैगम नय है। जैसे जीव का गुण सुख है, ऐसा कहना। इसमें 'सुख' धर्म की प्रधानता और 'जीव' धर्मी की गौणता है अथवा यह सुखी जीव है, ऐसा कहना। इसमें 'जीव' धर्मी की प्रधानता है, क्योंकि वह विशेष्य है और 'सुख' धर्म गौण है, क्योंकि वह विशेषण है। इस नय का अन्य प्रकार से भी लक्षण किया गया है। जो भावी कार्य के संकल्प को बतलाता है वह नैगम नय है।


संग्रह नय जो प्रतिपक्ष की अपेक्षा के साथ 'सन्मात्र' को ग्रहण करता है वह संग्रह नय है। जैसे 'सत्' कहने पर चेतन, अचेतन सभी पदार्थों का संग्रह हो जाता है, किन्तु सर्वथा 'सत्' कहने पर 'चेतन, अचेतन विशेषों का निषेध होने से वह संग्रहाभास है। विधिवाद इस कोटि में समाविष्ट होता है।


व्यवहार नय संग्रहनय से ग्रहण किये 'सत्' में जो नय विधिपूर्वक यथायोग्य भेद करता है वह व्यवहारनय है। जैसे संग्रहनय से गृहीत 'सत्' द्रव्य हे या पर्याप्त है या गुण है। पर मात्र कल्पना से जो भेद करता है वह व्यवहारनयाभास है।


ऋजुसूत्र नय भूत और भविष्यत पर्यायों को गौण कर केवल वर्तमान पर्याय को जो नय ग्रहण करता है वह ऋजुसूत्रनय है। जैसे प्रत्येक वस्तु प्रति समय परिणमनशील है। वस्तु को सर्वथा क्षणिक मानना ऋजुसूत्रनय है, क्योंकि इसमें वस्तु में होने वाली भूत और भविष्यत की पर्यायों तथा उनके आधारभूत अन्वयी द्रव्य का लोप हो जाता है।


शब्द नय


जो काल, कारक और लिङ्ग के भेद से शब्द में कथं चित् अर्थभेद को बतलाता है वह शब्दनय है। जैसे 'नक्तं निशा' दोनों पर्यायावाची हैं, किन्तु दोनों में लिंग भेद होने के कथं चित् अर्थभेद है। 'नक्तं' शब्द नंपुसक लिंग है और 'निशा' शब्द स्त्रीलिंग है। 'शब्दभेदात् ध्रुवोऽर्थभेद:' यह नय कहता है। अर्थभेद को कथं चित् माने बिना शब्दों को सर्वथा नाना बतलाकर अर्थ भेद करना शब्दनयाभास हैं


समभिरूढ़ नय


जो पर्याय भेद पदार्थ का कथंचित् भेद निरूपित करता है वह समभिरूढ़ नय है। जैसे इन्द्र, शक्र, पुरन्दर आदि शब्द पर्याय शब्द होने से उनके अर्थ में कथं चित् भेद बताना। पर्याय भेद माने बिना उनका स्वतंत्र रूप से कथन करना समभिरूढ नयाभास है।[15]'


एवंभूत नय


जो क्रिया भेद से वस्तु के भेद का कथन करता है वह एवंभूत नय हैं जैसे पढ़ाते समय ही पाठक या अध्यापक अथवा पूजा करते समय ही पुजारी कहना। यह नय क्रिया पर निर्भर है। इसका विषय बहुत सूक्ष्म है। क्रिया की अपेक्षा न कर क्रिया वाचक शब्दों का कल्पनिक व्यवहार करना एवंभूतनयाभास है।



 

जैन दर्शन का उद्भव और विकास

उद्भव


आचार्य भूतबली और पुष्पदन्त द्वारा निबद्ध 'षट्खंडागम' में, जो दृष्टिवाद अंग का ही अंश है, 'सिया पज्जत्ता', 'सिया अपज्जता', 'मणुस अपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया', 'अखंखेज्जा* 'जैसे 'सिया' (स्यात्) शब्द और प्रश्नोत्तरी शैली को लिए प्रचुर वाक्य पाए जाते हैं।

'षट्खंडागम' के आधार से रचित आचार्य कुन्दकुन्द के 'पंचास्तिकाय', 'प्रवचनसार' आदि आर्ष ग्रन्थों में भी उनके कुछ और अधिक उद्गमबीज मिलते हैं। 'सिय अत्थिणत्थि उहयं', 'जम्हा' जैसे युक्ति प्रवण वाक्यों एवं शब्द प्रयोगों द्वारा उनमें प्रश्नोत्तर पूर्वक विषयों को दृढ़ किया गया है।

विकास


काल की दृष्टि से उनके विकास को तीन कालखंडों में विभक्त किया जा सकता है और उन कालखंडों के नाम निम्न प्रकार रखे जा सकते हैं :-


आदिकाल अथवा समन्तभद्र-काल (ई. 200 से ई. 650)।

मध्यकाल अथवा अकलंक-काल (ई. 650 से ई. 1050)।

उत्तरमध्ययुग (अन्त्यकाल) अथवा प्रभाचन्द्र-काल (ई. 1050 से 1700)। आगे विस्तार में पढ़ें:- जैन दर्शन का उद्भव और विकास

जैन दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ

आचार्य जिनसेन और गुणभद्र : एक परिचय


ये दोनों ही आचार्य उस पंचस्तूप नामक अन्वय में हुए हैं जो आगे चलकर सेनान्वय का सेनसंघ के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। जिनसेन स्वामी के गुरु वीरसेन ने भी अपना वंश पत्र्चस्तूपान्वय ही लिखा है। परन्तु गुणभद्राचार्य ने सेनान्वय लिखा है। इन्द्रानन्दी ने अपने श्रुतावतार में लिखा है कि जो मुनि पंचस्तूप निवास से आये उनमें से किन्हीं को सेन और किन्हीं को भद्र नाम दिया गया। तथा कोई आचार्य ऐसा भी कहते हैं कि जो गुहाओं से आये उन्हें नन्दी, जो अशोक वन से आये उन्हें देव और जो पंचस्तूप से आये उन्हें सेन नाम दिया गया। श्रुतावतार के उक्त उल्लेख से प्रतीत होता है कि सेनान्त और भद्रान्त नाम वाले मुनियों का समूह ही आगे चलकर सेनान्वय या सेना संघ से प्रसिद्ध हुआ है।

जिनसेनाचार्य सिद्धान्तशास्त्रों के महान् ज्ञाता थे। इन्होंने कषायप्राभृत पर 40 हज़ार श्लोक प्रमाण जयधवल टीका लिखी है। आचार्य वीरसेन स्वामी उस पर 20 हज़ार श्लोक प्रमाण टीका लिख पाये थे और वे दिवंगत हो गये थे। तब उनके शिष्य जिनसेनाचार्य ने 40 हज़ार श्लोक प्रमाण टीका लिखकर उसे पूर्ण किया। आगे विस्तार में पढ़ें:- जैन दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ



 

जैन दर्शन में अध्यात्म

'अध्यात्म' शब्द अधि+आत्म –इन दो शब्दों से बना है, जिसका अर्थ है कि आत्मा को आधार बनाकर चिन्तन या कथन हो, वह अध्यात्म है। यह इसका व्युत्पत्ति अर्थ हे। यह जगत् जैन दर्शन के अनुसार छह द्रव्यों के समुदायात्मक है। वे छह द्रव्य हैं-


जीव,

पुद्गल,

धर्म,

अधर्म,

आकाश और

काल। आगे विस्तार में पढ़ें:- जैन दर्शन में अध्यात्म

जैन तार्किक और उनके न्यायग्रन्थ

बीसवीं शती के जैन तार्किक


बीसवीं शती में भी कतिपय दार्शनिक एवं नैयायिक हुए हैं, जो उल्लेखनीय हैं। इन्होंने प्राचीन आचार्यों द्वारा लिखित दर्शन और न्याय के ग्रन्थों का न केवल अध्ययन-अध्यापन किया, अपितु उनका राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनुवाद एवं सम्पादन भी किया है। साथ में अनुसंधानपूर्ण विस्तृत प्रस्तावनाएँ भी लिखी हैं, जिनमें ग्रन्थ एवं ग्रन्थकार के ऐतिहासिक परिचय के साथ ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषयों का भी तुलनात्मक एवं समीक्षात्मक आकलन किया गया है। कुछ मौलिक ग्रन्थ भी हिन्दी भाषा में लिखे गये हैं। सन्तप्रवर न्यायचार्य पं. गणेशप्रसाद वर्णी न्यायचार्य, पं. माणिकचन्द्र कौन्देय, पं. सुखलाल संघवी, डा. पं. महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य, पं. कैलाश चन्द्र शास्त्री, पं. दलसुख भाइर मालवणिया एवं इस लेख के लेखक डा. पं. दरबारी लाला कोठिया न्यायाचार्य आदि के नाम विशेष उल्लेख योग्य हैं। आगे विस्तार में पढ़ें:- जैन तार्किक और उनके न्यायग्रन्थ



 

त्रिभंगी टीका

आस्रवत्रिभंगी,

बंधत्रिभंगी,

उदयत्रिभंगी और

सत्त्वत्रिभंगी-इन 4 त्रिभंगियों को संकलित कर टीकाकार ने इन पर संस्कृत में टीका की है।

आस्रवत्रिभंगी 63 गाथा प्रमाण है।

इसके रचयिता श्रुतमुनि हैं।

बंधत्रिभंगी 44 गाथा प्रमाण है तथा उसके कर्ता नेमिचन्द शिष्य माधवचन्द्र हैं। आगे विस्तार में पढ़ें:- त्रिभंगी टीका

पंचसंग्रह टीका

मूल पंचसंग्रह नामक यह मूलग्रन्थ प्राकृत भाषा में है। इस पर तीन संस्कृत-टीकाएँ हैं।


श्रीपालसुत डड्ढा विरचित पंचसंग्रह टीका,

आचार्य अमितगति रचित संस्कृत-पंचसंग्रह,

सुमतकीर्तिकृत संस्कृत-पंचसंग्रह।

पहली टीका दिगम्बर प्राकृत पंचसंग्रह का संस्कृत-अनुष्टुपों में परिवर्तित रूप है। इसकी श्लोक संख्या 1243 है। कहीं कहीं कुछ गद्यभाग भी पाया जाता है, जो लगभग 700 श्लोक प्रमाण है। इस तरह यह लगभग 2000 श्लोक प्रमाण है। यह 5 प्रकरणों का संग्रह है। वे 5 प्रकरण निम्न प्रकार हैं-

जीवसमास,

प्रकृतिसमुत्कीर्तन,

कर्मस्तव,

शतक और

सप्ततिका।

इसी तरह अन्य दोनों संस्कृत टीकाओं में भी समान वर्णन है।

विशेष यह है कि आचार्य अमितगति कृत पंचसंग्रह का परिमाण लगभग 2500 श्लोक प्रमाण है। तथा सुमतकीर्ति कृत पंचसंग्रह अति सरल व स्पष्ट है।

इस तरह ये तीनों टीकाएँ संस्कृत में लिखी गई हैं और समान होने पर भी उनमें अपनी अपनी विशेषताएँ पाई जाती हैं।

कर्म साहित्य के विशेषज्ञों को इन टीकाओं का भी अध्ययन करना चाहिए। आगे विस्तार में पढ़ें:- पंचसंग्रह टीका


 

मन्द्रप्रबोधिनी

शौरसेनी प्राकृत भाषा में आचार्य नेमिचन्द्र सि0 चक्रवर्ती द्वारा निबद्ध गोम्मटसार मूलग्रन्थ की संस्कृत भाषा में रची यह एक विशद् और सरल व्याख्या है। इसके रचयिता अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती हैं। यद्यपि यह टीका अपूर्ण है किन्तु कर्मसिद्धान्त को समझने के लिए एक अत्यन्त प्रामाणिक व्याख्या है। केशववर्णी ने इनकी इस टीका का उल्लेख अपनी कन्नडटीका में, जिसका नाम कर्नाटकवृत्ति है, किया है। इससे ज्ञात होता है कि केशववर्णी ने उनकी इस मन्दप्रबोधिनी टीका से लाभ लिया है।

गोम्मटसार आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती द्वारा लिखा गया कर्म और जीव विषयक एक प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण प्राकृत-ग्रन्थ है। इसके दो भाग हैं-

एक जीवकाण्ड और

दूसरा कर्मकाण्ड।

जीवकाण्ड में 734 और कर्मकाण्ड में 972 शौरसेनी-प्राकृत भाषाबद्ध गाथाएं हैं। कर्मकाण्ड पर संस्कृत में 4 टीकाएं लिखी गई हैं। वे हैं-


गोम्मट पंजिका,

मन्दप्रबोधिनी,

कन्नड़ संस्कृत मिश्रित जीवतत्त्वप्रदीपिका,

संस्कृत में ही रचित अन्य नेमिचन्द्र की जीवतत्त्वप्रदीपिका। इन टीकाओं में विषयसाम्य है पर विवेचन की शैली इनकी अलग अलग हैं। भाषा का प्रवाह और सरलता इनमें देखी जा सकती है।

आगे विस्तार में पढ़ें:- मन्द्रप्रबोधिनी


टीका टिप्पणी और संदर्भ

 सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव–समन्तभद्र युक्त्यनु. का. 61

 क्षेमं सर्वप्रजानां प्रभवतु बलवान् धार्मिको भूमिपाल: काले वर्ष प्रदिशतु मघवा व्याधयो यान्तु नाशम्। दुर्भिक्षं चौरमारी क्षणमपि जगतां मा स्म भूज्जीवलोके, जैनेन्द्रं धर्मचक्रं प्रभवतु सततं सर्वसौख्यप्रदायि॥

 त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं नवपदसहितं जीवषट्काय - लेश्या:, पंचान्ये चास्तिकाया व्रत समिति-गति-ज्ञान- चारित्रभेदा:। इत्येतन्मोक्षमूलं त्रिभुवनमहितै: प्रोक्तमर्हदिभरीशै: प्रत्येति श्रद्दधाति स्पृशति च मतिमान् य: स वै शुद्धदृष्टि:॥ - स्तवनसंकलन।

 पंचास्तिकाय, गा. 4-5 द्रव्य सं. गा. 24

 श्रोतव्य:श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभि:। मत्वा च स्ततं ध्येय एते दर्शनहेतव:॥

 कुन्दकुन्द, मोक्ष प्राभृत गा. 4, 5, 6, 7

 जीवा जीवा भावा पुण्णं पावं च आसवं तेसिं। संवर-णिज्जर बंधो मोक्खो य हवंति ते अट्ठ॥–पंचास्ति., गा. 108

 द्रव्य सं. गा. 23, 24, 25

 परी.मु. 3-99, 100, 101

 न्यायदीपिका, पृ. 5, संपादन डॉ. दरबारीलाल कोठिया, 1945

 तत्त्वार्थसूत्र, 1-6

 प्रमयरत्नमाला 6/74, पृ. 206, सं. 1928

 प्रमयरत्नमाला, 6/74

 प्रमयरत्नमाला, पृ. 207

 'तत्र प्रमाणं द्विविधं स्वार्थं परार्थं च। तत्र स्वार्थं प्रमाणं श्रुतवर्ज्यम् श्रुतं पुन: स्वार्थं भवति परार्थं च। - सर्वार्थसिद्धि 1-6, भा. ज्ञा. संस्करण

विक्रमादित्य के 9 रत्न

 अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया पर

महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं है !

जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे ।

राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास करते हैं ...📷

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-

नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-

जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।

इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।

इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-

ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु –

इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट –

विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर –

जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।

इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास –

ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर –

भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि-

कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।

इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-

1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,

2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि

3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि-वररुचि

पढ़ने की प्रेरणादायक कहानी

 : पढ़ना लिखना बुरा नहीं होता है।        *पढ़ते  रहो, बढ़ते रहो*


42 यूनिवर्सिटी में पढ़े और 20 डिग्रियों वाले श्रीकांत जिचकर (Shrikant Jichkar) को देश का सबसे योग्य, सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा शख्स कहा जाता है. उन्होंने हर परीक्षा फर्स्ट डिविजिन में पास की. पहले वो  डॉक्टर बने, फिर आईएएस (IAS Officer) लेकिन महज 4 महीने में ही नौकरी से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ा. फिर विधायक (MLA) और मंत्री (Ministar) भी बने.


: इस युवक का नाम डॉ श्रीकांत जिचकर था. उन्हें भारत का सबसे पढ़ा-लिखा शख्स कहा जाता है. उन्होंने करियर की शुरुआत एमबीबीएस डॉक्टर के रूप में की थी. फिर नागपुर से एमडी की. उन्हें उस वक्त देश का सबसे ज्यादा लिखा-पढ़ा शख्स कहा जाता था. उनके पास 20 से ज्यादा डिग्रियां थीं. पहले वो आईपीएस बने. फिर आईएएस सेलेक्ट हुए. दोनों ही बार उन्होंने इन शानदार नौकरियों को ठुकरा दिया. 14 सितंबर 1954 के दिन जिचकर का जन्म हुआ था. लिम्का बुक ने उन्हें देश का सबसे योग्य व्यक्ति बताया था.


श्रीकांत 1978 में इंडियन सिविल सर्विसेज एग्जाम में बैठे. उनका सेलेक्शन भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस में हुआ. उन्होंने इसे छोड़ दिया. वो फिर इसी एग्जाम में बैठे. अबकी बार उनका चयन एक आईएएस के रूप में हो गया. चार महीने बाद ही उन्होंने इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया. वजह थी चुनाव मैदान में कूदना. 1980 में वो महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में विजयी रहे. 26 साल की उम्र में देश के सबसे युवा विधायक बने.


 यानी इंटरनेशनल लॉ में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. फिर डीबीएम और एमबीए (मास्टर्स इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) किया. बात यहीं तक नहीं रही. श्रीकांत ने पत्रकारिता की भी पढाई की, बेचलर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री हासिल की. फिर संस्कृत में डीलिट (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) हासिल किया. जो किसी भी यूनिवर्सिटी की सबसे उच्च डिग्री होती है.

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 उन्होंने समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास, अंग

उन्होंने समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास, अंग्रेजी साहित्य, दर्शन शास्त्र, राजनीति विज्ञान, प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व और मनोविज्ञान में भी एमए किया था. गौरतलब बात ये भी है कि उन्होंने ये सारी डिग्रियां मेरिट में रहकर हासिल की. पढ़ाई के दौरान उन्हें कई बार गोल्ड मेडल मिले. 1973 से लेकर 1990 तक उन्होंने 42 यूनिवर्सिटी एग्जाम दिए.

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 श्रीकांत यहीं नहीं रुके वो महाराष्ट्र के सबसे �

श्रीकांत यहीं नहीं रुके वो महाराष्ट्र के सबसे ताकवर मंत्री भी बने. उनके पास उस समय 14 विभाग थे. वहां उन्होंने 1982 से 85 तक काम किया.  इसके अलगे साल यानि 1986 में वो महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य बने. यहां पर 1992 तक रहे. 1992 से 1998 के बीच वो राज्यसभा में भी रहे.

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 जब 1999 में डॉ. जिचकर राज्यसभा का चुनाव हार गए तो उन

जब 1999 में डॉ. जिचकर राज्यसभा का चुनाव हार गए तो उन्होंने अपना फोकस यात्राओं पर केंद्रीत किया. वो देश के कई हिस्सों में गए और वहां स्वास्थ्य, शिक्षा और धर्म के बारे में भाषण देते रहे. उन्होंने यूनेस्को में भारत का प्रतिनिधित्व किया. श्रीकांत के पास देश की सबसे बड़ी पर्सनल लाइब्रेरी थी. जिसमें 52000 से ज्यादा किताबें थीं. डॉ. जिचकर का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भारत के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति के तौर पर शुमार हुआ.

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 जिचकर एक अकादमिक, पेंटर, प्रोफेशनल फोटोग्राफर �

जिचकर एक अकादमिक, पेंटर, प्रोफेशनल फोटोग्राफर और स्टेज एक्टर थे. उन्होंने 1992 में एक स्कूल की स्थापना की. अपनी उम्र में बाद में उन्होंने अकेले दम पर महाराष्ट्र में संस्कृत यूनिवर्सिटी स्थापित की और उसके चांसलर बने.

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 इस प्रतिभाशाली शख्स का जल्दी ही देहांत भी हो गय�

इस प्रतिभाशाली शख्स का जल्दी ही देहांत भी हो गया. 02 जून 2004 की रात श्रीकांत कार से अपने दोस्त के फॉर्म से घर के लिए नागपुर निकले. वो खुद कार ड्राइव कर रहे थे. रास्ते में उनकी कार एक बस से टकरा गई. इस हादसे में 49 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. बेशक उनकी उम्र कम थी लेकिन ये काफी मायने वाली रही. उन्होंने कई भूमिकाएं अदा कीं. खूब पढाई की. राजनीतिक के तौर पर भी भरपूर काम किया.

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Friday, August 14, 2020

पंचाग के पाँच अंगों का विस्तृत वर्णन :सरल सुबोध शैली में

 *सरल शैली में पंचांग के पांच अंगों का विस्तृत वर्णन*


✍️©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

निदेशक-

जैन विद्या अनुसंधान केंद्र अविनाश कॉलोनी दमोह म.प्र.


पंचाग के अंग कौन कौन से हैं।

 पञ्चाङ्ग शब्द से स्वयं ज्ञात हो रहा है जिसमें पाँच अंग निहित हों या पाँच हों जिसके वह पञ्चाङ्ग है ।


अब प्रश्न ये उठता है कि वे पाँच अंग कौन कौन से हैं


ज्योतिष शास्त्रों में वे पाँच अंग बताये गए हैं-


तिथि  र्वारं च नक्षत्रं योगः  करणमेव च ।

पञ्चाङ्गस्य फलं श्रुत्वा,कार्याणां सर्वसिद्धयेत् ।।

तिथि, वार(दिवस), नक्षत्र, योग,और करण ये पंचाग के पाँच अंग हैं। जो इन पंचाङ्गों के फल का श्रवण करता है ,जानता है उसके समस्त कार्यों की सर्व सिद्धि होती है ।


तिथि किसे कहते हैं ?


तिथि-पञ्चाङ्ग का प्रमुख और प्रथम अंग तिथि है । जो चंद्रमा की कलाओं पर आधारित होती है । जिससे मास(माह) का निर्माण एवं विभाजन होता है ।

चंद्रमा की एक कला को तिथि कहा जाता है  या चन्द्रमा की एक कला बराबर एक तिथि होती है । सूर्य और चंद्रमा में जब 12 अंश का अंतर होता है तब एक तिथि का निर्माण होता है ।


पक्ष का निर्माण एवं विभाजन


सूर्य और चन्द्र के अंशो के अंतर से ही  मास को विभाजित करने वाले पक्ष का निर्माण होता है।

तिथि एक माह को दो पक्षों में विभाजित करती है । कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष ।


कृष्ण पक्ष


जब सूर्य और चंद्रमा के अंशों में 360 अंश का अंतर होता है तब उससे कृष्ण पक्ष का निर्माण होता है । इस पक्ष में 15 अंश होते हैं अर्थात 15 तिथियां होती हैं । कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं घटती हैं । इस पक्ष की 15 वीं तिथि को अमावश्या कहते हैं । सूर्य ग्रहण भी कृष्ण पक्ष में अमावश्या तिथि को होता है ।


शुक्ल पक्ष-


जब सूर्य और चंद्रमा के अंशों में 180 अंश का अंतर होता है तब उससे शुक्ल पक्ष का निर्माण होता है । इस पक्ष में 15 अंश होते हैं अर्थात 15 तिथियां होती हैं । शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं बढ़ती हैं । इस पक्ष की 15 वीं तिथि को   पूर्णिमा कहते हैं । चन्द्र ग्रहण भी शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि को होता है ।


तिथियों के नाम


1.प्रतिपदा 

2.द्वितीया 

3.तृतीया 

4.चतुर्थी

5.पंचमी

6.षष्ठी 

7.सप्तमी 

8.अष्टमी

9.नवमी

10.दशमी

11.एकादशी

12.द्वादशी

13.त्रयोदशी

14.चतुर्दशी

15.अमावश्या(कृष्ण पक्ष)

15. पूर्णिमा(शुक्ल पक्ष)



वार किसे कहते हैं?

भारतीय ज्योतिष में सूर्योदय से अगले सूर्योदय पर्यन्त काल को वार कहते हैं । 

सूर्योदयात् आरम्भ सूर्योदय पर्यन्तं य:काल:स वारो ज्ञेयः ।

जैन पंचांग में नाक्षत्रमान के हिसाब से वार को रखा गया है ।


वारों की संख्या एवं संज्ञा


 ज्योतिष में वार की संख्या 7 बताई गई है । वारों का क्रम ग्रहों के अनुसार ना होकर उनके स्वामियों के अनुसार है । अन्यथा राहु और केतु ग्रह के भी वार जोडें वारों की संख्या 9 होती । सात वारों का क्रम निम्न है -


रवि: सोमस्तथा भौमौ बुधौ  गीष्पतिरेव च ।

शुक्र:शनैश्चरश्च एव वारा:सप्त प्रकीर्तिताः ।


जिस दिन का स्वामी सूर्य होता है, उसे रविवार या सूर्यवार कहतें । सभी वारो में वारपति के अनुसार ही नामकरण होगा ।


वार संज्ञाएँ

ज्योतिष शास्त्रों में तिथि, नक्षत्र ,करण एवं योगों की तरह वारों को भी विविध संज्ञा से सज्ञापित किया है । जिनसे उनके कार्यों का निर्धारण एवं   शुभ -अशुभ कार्य बोध सहज  ही हो जाता है ।  

वार संज्ञाएँ निम्न हैं-


स्थिरः सूर्यश्चरश्चन्द्रो भौमश्चोग्रो बुध: समः ।

लघुर्जीवो मृदु: शुक्र:शनिस्तीक्ष्ण: समीरित: ।।


रविवार स्थिर  संज्ञक है इसलिए स्थिर कार्य करना चाहिए, सोमवार चरसंज्ञक  है, भौमवार उग्र संज्ञक है, बुधवार सम संज्ञक है , बृहस्पतिवार लघु संज्ञक है,  शुक्रवार मृदु संज्ञक है एवं शनिवार तीक्ष्ण संज्ञक है । अतः संज्ञाओं के अनुसार ही कार्य करें ।


नक्षत्र किसे कहते हैं ?


नक्षत्र -

सूर्य जिस मार्ग में भ्रमण करता है ,उसे क्रांतिवृत्त या मेरुछिन्न- समानान्तरप्रोतवृत्त कहते हैं । क्रांतिवृत्त के दोनों तरफ 180 अंश का कटिबंध प्रदेश होता है, उसे राशिचक्र कहते हैं ।

ज्योतिष के अनुसार  कई ताराओं के समूह को नक्षत्र कहते हैं। आकाश में इन नक्षत्रों का पंक्तिचक्र रहता है जिसे भचक्र या राशिचक्र कहा जाता है ,जो 360 अंश का होता है इसके 13 अंश को तय करने में चंद्रमा को जितना  समय लगता है वह नक्षत्र कहलाता है । अर्थात 13 अंश का एक नक्षत्र होता है ।


नक्षत्रों की संख्या


 जैन ज्योतिष और वैदिक ज्योतिष  में  नक्षत्र की संख्या को लेकर थोड़ा सा मतान्तर है । जैन ज्योतिष शास्त्रों में अभिजित नक्षत्र को मान्यता प्रदान दी गई  जिससे नक्षत्रों की संख्या 28 बताई गई है । जबकि वैदिक ज्योतिष ग्रन्थों में नक्षत्रों की संख्या 27 बताई गई है ।

ज्योतिर्विदों का मत है कि उत्तराषाढ़ की अंतिम 15 घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की 4 घटी के काल प्रमाण 28 वां नक्षत्र अभिजित बनता है । जिसे जैन आगम ग्रंथ धवला जी की पुस्तक 4 में पृष्ठ 318 पर धवलाकर ने  अहोरात्र के 30 मुहूर्तो के प्रकरण में दिवस सम्बन्धी रौद्र से भाग्य पर्यन्त 15 मुहूर्तो में  8वें स्थान पर अभिजित मुहूर्त का वर्णन किया है ।


 नक्षत्रों के नाम

 1.अश्विनी,  2.भरणी,  

3.कृतिका 4.रोहिणी 

5.मृगशिरा , 6.आर्द्रा, 

7.पुनर्वसु, 8.पुष्य,

 9.आश्लेषा,  10.मघा, 

11.पूर्वाफाल्गुनी 12.उत्तराफाल्गुनी, 

13.हस्त, 14.चित्रा, 

15.स्वाति, 16विशाखा,

 17.अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 

19.मूल, 20.पूर्वाषाढ़, 

21.उत्तराषाढ़,( अभिजित),

22.श्रवण, 23.धनिष्ठा, 

24.शतभिषा, 25.पूर्वाभाद्रपद, 

26.उत्तराभाद्रपद, 27रेवती ।


नक्षत्रों की उपादेयता


 नक्षत्रों की उपादेयता एवं उपयोगिता ज्योतिष में महत्वपूर्ण है । नक्षत्रों के आधार से मुहूर्त निर्माण, रोग चिकित्सा, जन्म कुंडली निर्माण,  वर -बधु के गुण मिलान , चोरी गई वस्तु का ज्ञान, जल वृष्टि, मेघ गर्भ, यात्रा आदि अनेक शुभ अशुभ कार्यों का  ज्ञान  एवं विचार  में सहायक होता है ।


 नक्षत्रों की संज्ञाएँ


नक्षत्रों की संज्ञाएं निम्नलिखित हैं-


ध्रुवंचरोग्र मिश्रम् , क्षिप्रं तीक्ष्णमृदुलिंगा: ।

उर्ध्वादि चौरपंचको, एता: नक्षत्रा :संज्ञका: ।


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 योग किसे कहते हैं ?

 योग-

जो सूर्य और चंद्रमा के अंशों के योग से उत्पन्न होता है उसे योग कहते हैं ।


विशेषता


प्राचीन जैन ग्रंथों में मुहूर्तादि के लिए योग को प्रधान अंग माना गया है । पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । 

जैन पंचांग निर्माण विधि में इनकी संख्या 27 बताई गई है । ये शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के होते हैं ।

योग निकालने के लिए दैनिक स्पष्ट सूर्य एवं चंद्र स्पष्ट के योग की कला बनाकर उसमें 800 का भाग देने से लब्धिगत योग होता है । फिर गत और भोग्यकला को 60 से गुणा कर रवि-चंद्र की गति कला योग से भाग देने से गत और भोग्य घटियां आती हैं ।


27 योगों के नाम

1.विष्कुम्भ 

2.प्रीति

3.आयुष्यमान

4.सौभाग्य

5.शोभन

6.अतिगंड

7.सुकर्मा

8.धृति

9.शूल

10.गण्ड 

11.वृद्धि

12.ध्रुव

13.व्याघात

14.हर्षण

15.वज्र

16सिद्धि.

17.व्यतिपात

18.वरियान

19.परिध 

20.शिव

21.सिद्ध

22.साध्य

23.शुभ

24.शुक्ल

25.ब्रह्म

26.ऐंद्र

27.वैधृति


करण किसे कहते हैं ?

तिथि के  भाग को करण कहते हैं । गत तिथि को 2 से गुणा कर 7 का भाग देने से जो शेष रहे उसी के हिसाब से  करण होता है ।



करण की संख्या


जैनाचार्य श्रीधर ने ''ज्योतिर्ज्ञानविधि'' नामक ग्रंथ में कारणों की संख्या 11 बताई है । जो निम्न हैं-



वव-वालव-कौलव तैत्तिलगरजा वणिजविष्टिचर करणा: ।

शकुनि चतुष्पडनागा: किंस्तुघ्न श्चेत्यमी स्थिरा:करणा:।।


ऊपर के 7 करण चर एवं 4 करण स्थिर होते हैं ।

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