Saturday, December 17, 2022

सम्मेद शिखर की प्राचीनता

*सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है:* 
डॉ. आशीष शिक्षाचार्य ,निदेशक
संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्य विद्या अनुसंधान केंद्र दमोह ,अध्यक्ष, संस्कृत विभाग,एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह म. प्र. 

 सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है क्योेंकि जैन धर्म के अनुसार अयोध्या एवं सम्मेदरशिखर ये दोनों भूमियाँ शाश्वत् कही गई हैं। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में एवं निर्वाण सम्मेद शिखर में होने के नियोग का वर्णन प्राप्त होता है इसलिए ये शाश्वत् अनादि निधन भूमियां हैं। हुण्डावसर्पिणी काल दोष के कारण वर्तमान चौवीसी के 20 तीर्थकरों का निर्वाण इस पवित्र भूमि की टांेक (पर्वतश्रृंखला) से हुआ है। यह बात ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी प्राकृत भाषा की निर्वाणि भक्ति में लिखते हैं-

वीसं तु जिणवरिंदा अमरा सुरावंदिदा धुदकिलेसा ।
सम्मेदे गिरि - सिहरे निव्वाणगया णमो तेसिं॥2
स्वस्तिकांका नराधीश, सोपि अनादिकालाट्ठि 
सम्मेदामिध भूधरः । 

 जैन शास्त्रों पुराणों एवं आगम ग्रन्थों की माने तो इस पर्वत की भूमि के नीचे जब से सृष्टि का आरम्भ है तब से स्वस्तिक का चिन्ह स्थित है ।  इसका कण-कण पवित्र है और बाल की नोंक के बराबर भी ऐसा स्थान शेष नहीं जहॉं से मुनियों का कल्याण ना हुआ हो । सम्मेद शिखर पर्वत की प्राचीनता के विषय में विचार करें तो 13वीं शताब्दी में भट्टारक मदनकीर्ति  ने ‘‘शासनचतुस्त्रिंशतिका’’ में सौधर्म इन्द्र देव के द्वारा इस पर्वत की प्रतिष्ठा एवं पूजा का उल्लेख किया है तथा जहॉ से भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण हुआ है उसे शास्त्रों में स्वर्णभद्र कूट कहा जाता है उस जिनालय का निर्माण व जीर्णोद्धार‘‘सम्मेदशिखर माहात्म्य’’ ग्रन्थ के अनुसार जम्बूदीप के भरत क्षेत्र अंगदेश की अन्धपुरी नगरी के राजा प्रभासेन- शांतसेना रानी के द्वारा स्वर्णभद्र कूट की प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है तथा उनके पुत्र भावसेत्र के द्वारा 84 लाख भव्यों के साथ सम्मेद शिखर की वंदना,मुनिदीक्षा धारण व मोक्ष के प्रमाण प्राप्त होते हैं।  16 शताब्दी में सम्राट अकबर ने300 बीघा जमीन श्वेताम्बर जैन साधु के प्रभाव से व 18 वीं शताब्दी में अहमदशाह ने 300 बीघा जमीन सेठ महेतावराय को तीर्थ क्षेत्र हेतु प्रदान की थी । 16-17 शताब्दी में भट्टारक ज्ञानकीर्ति द्वारा प्रणीत ‘‘यशोधर चरित्र‘‘ में तथा जैन पुराण ग्रन्थों एवं जैन साहित्य में सम्म्ेादशिखर की प्राचीनता एवं तप साधना के कई प्रमाण बिखरे पडे हैं और वर्तमान में सभी को ज्ञात है कि यह जैन तीर्थ है भारत सरकार  आजादी के पूर्व से लेकर अद्यतन भारतीय रेल्वे से एवं स्थानीय विभागों से  सर्वे करा ले कि यहां सबसे ज्यादा जैन यात्री दर्शनार्थ आते हैं, जिससे भारत सरकार को कितना रेवेन्यु प्राप्त होता है। अतः जैन तीर्थ सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है, जहां से अनन्तानंत जीवों का कल्याण हुआ है ।। 
*निदेशक,संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्यविद्या अनुसन्धान केंद्र दमोह*

सम्मेद शिखर की प्राचीनता

 *सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है:* 

डॉ. आशीष शिक्षाचार्य ,निदेशक

संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्य विद्या अनुसंधान केंद्र दमोह ,अध्यक्ष, संस्कृत विभाग,एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह म. प्र. 


 सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है क्योेंकि जैन धर्म के अनुसार अयोध्या एवं सम्मेदरशिखर ये दोनों भूमियाँ शाश्वत् कही गई हैं। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में एवं निर्वाण सम्मेद शिखर में होने के नियोग का वर्णन प्राप्त होता है इसलिए ये शाश्वत् अनादि निधन भूमियां हैं। हुण्डावसर्पिणी काल दोष के कारण वर्तमान चौवीसी के 20 तीर्थकरों का निर्वाण इस पवित्र भूमि की टांेक (पर्वतश्रृंखला) से हुआ है। यह बात ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी प्राकृत भाषा की निर्वाणि भक्ति में लिखते हैं-


वीसं तु जिणवरिंदा अमरा सुरावंदिदा धुदकिलेसा ।

सम्मेदे गिरि - सिहरे निव्वाणगया णमो तेसिं॥2

स्वस्तिकांका नराधीश, सोपि अनादिकालाट्ठि 

सम्मेदामिध भूधरः । 


 जैन शास्त्रों पुराणों एवं आगम ग्रन्थों की माने तो इस पर्वत की भूमि के नीचे जब से सृष्टि का आरम्भ है तब से स्वस्तिक का चिन्ह स्थित है ।  इसका कण-कण पवित्र है और बाल की नोंक के बराबर भी ऐसा स्थान शेष नहीं जहॉं से मुनियों का कल्याण ना हुआ हो । सम्मेद शिखर पर्वत की प्राचीनता के विषय में विचार करें तो 13वीं शताब्दी में भट्टारक मदनकीर्ति  ने ‘‘शासनचतुस्त्रिंशतिका’’ में सौधर्म इन्द्र देव के द्वारा इस पर्वत की प्रतिष्ठा एवं पूजा का उल्लेख किया है तथा जहॉ से भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण हुआ है उसे शास्त्रों में स्वर्णभद्र कूट कहा जाता है उस जिनालय का निर्माण व जीर्णोद्धार‘‘सम्मेदशिखर माहात्म्य’’ ग्रन्थ के अनुसार जम्बूदीप के भरत क्षेत्र अंगदेश की अन्धपुरी नगरी के राजा प्रभासेन- शांतसेना रानी के द्वारा स्वर्णभद्र कूट की प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है तथा उनके पुत्र भावसेत्र के द्वारा 84 लाख भव्यों के साथ सम्मेद शिखर की वंदना,मुनिदीक्षा धारण व मोक्ष के प्रमाण प्राप्त होते हैं।  16 शताब्दी में सम्राट अकबर ने300 बीघा जमीन श्वेताम्बर जैन साधु के प्रभाव से व 18 वीं शताब्दी में अहमदशाह ने 300 बीघा जमीन सेठ महेतावराय को तीर्थ क्षेत्र हेतु प्रदान की थी । 16-17 शताब्दी में भट्टारक ज्ञानकीर्ति द्वारा प्रणीत ‘‘यशोधर चरित्र‘‘ में तथा जैन पुराण ग्रन्थों एवं जैन साहित्य में सम्म्ेादशिखर की प्राचीनता एवं तप साधना के कई प्रमाण बिखरे पडे हैं और वर्तमान में सभी को ज्ञात है कि यह जैन तीर्थ है भारत सरकार  आजादी के पूर्व से लेकर अद्यतन भारतीय रेल्वे से एवं स्थानीय विभागों से  सर्वे करा ले कि यहां सबसे ज्यादा जैन यात्री दर्शनार्थ आते हैं, जिससे भारत सरकार को कितना रेवेन्यु प्राप्त होता है। अतः जैन तीर्थ सम्मेद शिखर तीर्थ पर्यटन का नहीं पर्याय बदलने का स्थान है, जहां से अनन्तानंत जीवों का कल्याण हुआ है ।। 

*निदेशक,संस्कृत-प्राकृत तथा प्राच्यविद्या अनुसन्धान केंद्र दमोह*

Wednesday, November 16, 2022

ऋषि, मुनि, सन्यासी में अंतर

 ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर :------


भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?


ऋषि कौन होते हैं


भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं। 


ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है "ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है। 


ऋषि शब्द का अर्थ


ऋषि शब्द "ऋष" मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे। 


ऋषियों के प्रकार


ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि। 


सप्त ऋषि


पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है। 


मुनि किसे कहते हैं


मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं। 


मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि। 


मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।


जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं। 


मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं 


साधु कौन होते हैं 


किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया। 


कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि "साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है। 


साधु के लिए यह भी कहा गया है "आत्मदशा साधे " अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं। 


संन्यासी किसे कहते हैं


सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है। 


सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है। 


हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है


परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे। 


परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है। 


यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 


वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है। 


उपसंहार


ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।

Wednesday, September 21, 2022

राम और रामायण के तथ्य

 💥 #रामायण_के_कुछ_रोचक_तथ्य 🚩

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🔸1. रामायण को महर्षि वाल्मीकि जी ने लिखा था तथा इस महाग्रंथ में 24,000 श्लोक, 500 उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड है।


🔸2. जिस समय दशरथ जी ने पुत्रेष्ठी यज्ञ किया था उस समय दशरथ जी की आयु 60 वर्ष थी।


🔸3. तुलसीरामायण में लिखा है की सीता जी के स्वयंवर में श्री राम ने भगवान शिव का धनुष बाण उठाया व इन्हें तोड़ दिया परंतु इस घटना का वाल्मीकि रामायण में कोई उल्लेख नहीं है।


🔸4. रामचरितमानस के अनुसार परशुरामजी सीता स्वयंवर के मध्य में आए थे परंतु बाल्मीकि रामायण के अनुसार जब प्रभु श्री राम, माता सीता के साथ अयोध्या जा रहे थे उस समय बीच रास्ते में परशुराम जी इन्हें मिले थे।


🔸5. जब भगवान श्री राम वनवास के लिए जा रहे थे तब उनकी आयु 27 वर्ष थी।


🔸6. जब लक्ष्मण जी आए और उन्हें पता चला कि श्री राम को वनवास का आदेश मिला है तब वह बहुत क्रोधित हुए तथा श्री राम के पास जाकर उनसे अपने ही पिता के विरुद्ध युद्ध के लिए बोला परंतु बाद में श्री रामजी के समझाने पर वह शांत हो गए।


🔸7. जब दशरथ जी ने श्री राम को वनवास के लिए कहा, तब वह चाहते थे कि श्री राम जी बहुत सा धन एवं दैनिक उपयोग की चीजें अपने साथ ले जाए परंतु कैकई ने इन सब चीजों के लिए भी मना कर दिया।


🔸8. भरत जी को सपने में ही इनके पिता दशरथ की मृत्यु का अनुमान हो गया था क्योंकि उन्होंने अपने सपने में दशरथ जी को काले कपड़े पहने एवं उदास देखा था।


🔸9. हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में 33 करोड़ देवी-देवता है लेकिन बाल्मीकि रामायण के के अनुसार 33 करोड़ नहीं अपितू 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के देवी देवता है।


🔸10. प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि जब माता सीता का अपहरण रावण के द्वारा हुआ तब जटायु ने उन्हें बचाने का प्रयास किया और अपना बलिदान दिया परंतु राम वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह जटायु नहीं थे अपितु उनके पिता अरुण थे।


🔸11. जिस दिन रावण ने माता सीता का हरण किया तथा उन्हें अशोक वाटिका लेकर आया, उसी रात भगवान ब्रह्मदेव ने इंद्रदेव को एक विशेष प्रकार की खीर सीता जी को देने के लिए कहा, तब इंद्रदेव ने पहले अपनी अलौकिक शक्तियों के द्वारा अशोक वाटिका में उपस्थित सारे राक्षसों को सुला दिया, उसके बाद वह खीर माता सीता को दी।


🔸12. जब भगवान श्री राम, लक्ष्मण जी, माता सीता की खोज में जंगल में गए तब वहां उनकी राह में कंबंध नाम का एक राक्षस आया जो श्री राम व लक्ष्मण के हाथ मारा गया परंतु वास्तव में कंबंध एक श्रापित देवता था और एक श्राप के कारण राक्षस योनी में जन्मा और जब प्रभु श्रीराम ने उसकी उसका मृत शरीर जलाया तब उसकी आत्मा मुक्त हो गई एवं उसने ही उसने ही श्रीराम व लक्ष्मण को सुग्रीव से मित्रता करने का मार्ग सुझाया।


🔸13. एक बार रावण कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने गया और उसने वहां उपस्थित नंदी का मजाक उड़ाया इससे क्रोधित नंदी ने रावण को श्राप दिया कि एक वानर तेरी मृत्यु एवं पतन करण बनेगा।


🔸14. वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब रावण ने कैलाश पर्वत उठाया था तब माता पार्वती ने क्रोधित होकर श्राप दिया था की तेरी मृत्यु का कारण एक स्त्री बनेगी।


🔸15. विद्युतजिन, रावण की बहन शुर्पणखां का पति था तथा यह कालकेय नामक राजा का सेनापति भी था। जब रावण पूरी दुनियाँ को जीतने निकला तब उसने कालकेय से भी युद्ध किया तथा इस युद्ध में विद्युतजिन मारा गया तब क्रोधित शुर्पणखां ने रावण को श्राप दिया की वही एक दिन अपने भाई रावण की मृत्यु का कारण बनेगी।


🔸16. जब राम और रावण के मध्य अंतिम युद्ध लड़ा जा रहा था तब इंद्रदेव ने अपना चमत्कारिक रथ श्रीराम के लिए भेजा था और इस रथ पर बैठ कर ही श्री राम ने रावण का वध किया।


🔸17. एक बार रावण अपने पुष्पक विमान पर कही जा रहा था तब उसने एक सुंदर स्त्री को भगवान विष्णु की तपस्या करते हुए देखा जो श्री हरि विष्णु को पति रूप में पाना चाहती थी। रावण ने उसके बाल पकड़ कर उसे घसीटते हुए अपने साथ चलने को कहा परंतु उस स्त्री ने उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए और रावण को अपने कुल सहित नष्ट हो जाने का श्राप दिया।


🔸18. रावण को अपनी सोने की लंका पर बहुत अहंकार था, परंतु इस लंका पर रावण से पहले उसके भाई कुबेर का राज था। रावण ने लंका को अपने भाई कुबेर से युद्ध करके जीता था।


🔸19. रावण राक्षसों का राजा था तथा उस समय लगभग सभी बालक इससे बहुत ज्यादा डरते थे क्योंकि इसके दस सिर थे परन्तु रावण, शिव का बहुत बड़ा भक्त था तथा बहुत ही बुद्धिमान विद्यार्थी भी था, जिसने सारे वेद का अध्ययन किया।


🔸20. रावण के रथ की ध्वजा पर अंकित वीणा के चिन्ह से यह पता लगता है कि रावण को संगीत थी प्रिय था तथा कई जगह इस बात का उल्लेख है कि रावण वीणा बजाने में भी निपुण था।


🔸21. राजधर्म का निर्वाह करते हुए एक धोबी के कारण श्री राम ने माता सीता की अग्नि परीक्षा ली तथा इसके पश्चात माता सीता को वाल्मीकि आश्रम में छोड़ दिया, बाद में जब पुनः श्री राम ने माता सीता को परीक्षा के लिए कहा तो माता सीता धरती में समा गयी, तब श्री राम व इनके पुत्र कुश, माता सीता को पकड़ने के लिए दौड़े परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस घटना के पश्चात श्री राम को अत्यंत ही ग्लानी हुई की उन्होंने राजधर्म का निर्वाह तो किया लेकिन अपनी प्राणों से भी प्रिय पत्नी को उनके कारण कितने ही दुःख झेलने पडे, इसके कुछ समय पश्चात ही भगवान श्री राम ने सरयू नदी में जल समाधि ले ली एवं बैकुंठ धाम प्रस्थान कर गये।


🔸22. जब सीता हरण के पश्चात रावण को पता चला की श्री राम, लंका की ओर युद्ध के लिए आ रहे है तब इनके भाई विभीषण ने माता सीताजी को लौटाकर राम से संधि करने को कहाँ लेकिन तब रावण बोला की अगर वह साधारण मानव है तब वह मुझे नहीं हरा सकते लेकिन अगर वह वास्तव में ईश्वर है तब उनके हाथो मेरी मृत्यु नहीं अपितु मोक्ष प्राप्ति होगी, अतः में युद्ध अवश्य करूँगा।


🔸23. लक्ष्मण जी 14 सालो तक नहीं सोयें थे तथा इसी कारण इन्हें गुडाकेश भी कहा जाता है। रावण पुत्र मेघनाद को वरदान था की उसकी मृत्यु वही करेगा जो 14 वर्षो तक न सोया हो और इसी कारण मेघनाद, लक्ष्मण के द्वारा मारा गया।


💥 24

      👇👇

🔹1:~मानस में राम शब्द=1443 बार आया है।


🔸2:~मानस में सीता शब्द=147 बार आया है।


🔹3:~मानस में जानकी शब्द= 69 बार आया है।


🔸4:~मानस में बड़भागी शब्द=58 बार आया है।


🔹5:~मानस में कोटि शब्द=125 बार आया है।


🔸6:~मानस में एक बार शब्द= 18 बार आया है।


🔹7:~मानस में मन्दिर शब्द= 35 बार आया है।


🔸8:~मानस में मरम शब्द =40  आर आया है।


🔹9:~मानस में श्लोक संख्या=27 है।


🔸10:~लंका में राम जी =111 दिन रहे।


🔹11:~लंका में सीताजी =435 दिन रही।


🔸12:~मानस में चोपाई संख्या=4608 है।


🔹13:~मानस में दोहा संख्या=1074 है।


🔸14:~मानस में सोरठा=207 है।


🔹15:~मानस में छन्द=86 है।


🔸16:~सुग्रीव में बल था=10000 हाथियों का! 


🔹17:~सीता रानी बनी=33वर्ष की उम्र में।


🔸18:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र=77 वर्ष


🔹19:~पुष्पक विमान की चाल=400 मील/घण्टा


🔸20:~रामादल व् रावण दल का युद्ध=87 दिन चला


🔹21:~राम रावण युद्ध=32 दिन चला।


🔸22:~सेतु निर्माण=5 दिन में हुआ।


🔹23:~नलनील के पिता=विश्वकर्मा


🔸24:~त्रिजटा के पिता=विभीषण


🔹25:~दशरथ की उम्र थी=60000 वर्ष।


🔸26:~सुमन्त की उम्र=9999 वर्ष।


🔹27:~विश्वामित्र राम को ले गए=10 दिन के लिए।


🔸28:~मानस में बैदेही शब्द=51 बार आया है।


🔹29:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था=6 वर्ष की उम्र में।


🔸30:~रावण को जिन्दा किया=सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।



Monday, September 19, 2022

वैराग्य

 #सुंदर_कथा 🌹


एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।


राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।


राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।


विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।


कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं?


संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।


संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो  सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।


सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है।


अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।


ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। 


उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।


शिक्षा: अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है।


उसको (भगवान्) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।


कभी आप बहुत परेशान हो, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो।


आप आँखे बंद कर के विश्वास के साथ पुकारे, सच मानिये 

थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।

Thursday, September 15, 2022

पूजन-अभिषेक एवं द्रव्य की व्याख्या -श्री पद्मपुराण के परिप्रेक्ष्य में

 अष्टद्रव्य से पूजा

भगवान की अष्टद्रव्य से पूजा करते समय चरणों में चंदन लगाना। फूल,फल, दीप, धूप वास्तविक लेना ऐसा विधान है प्रमाण देखिये-

जल से पूजन करने का फल

पसमइ रयं असेसं, जिणपयकमलेसु, दिण्णजलधारा।

भिंगारणालणिग्गय, भवंतभिंगेहि कव्वुरिया।।

प्रशमति रज: अशेषं, जिनपदकमलेषु दत्तजलधारा।

भृंगारनालनिर्गता, भ्रमद्भृंगै: कर्बुरिता।।४७०।।

अर्थ- सबसे पहले जल की धारा देकर भगवान की पूजा करनी चाहिए। वह जल की धारा भृंगार (झारी) की नाल से निकलनी चाहिए तथा वह जल इतना सुगंधित होना चाहिए कि उस पर भ्रमर आ जाएँ और जलधारा के चारों ओर घूमते हुये उन भ्रमरों से वह जल की धारा अनेक रंग की दिखाई देने लगे ऐसी जल की धारा भगवान के चरण कमलों पर पड़नी चाहिए। इस प्रकार जल की धारा से भगवान की पूजा करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अथवा ज्ञानावरण-दर्शनावरण कर्म शांत हो जाते हैं।

चंदन से पूजन करने का फल

चंदणसुअन्धलेओ, जिणवर-चरणेसु जो कुणई भविओ।

लहइ तणू विक्किरियं, सहावसुयंधयं अमलं।।

चन्दनसुगंधलेपं, जिनवरचरणेषु य: करोति भव्य:।

लभते तनुं वैक्रियिवं, स्वभावसुगन्धवं अमलं।।४७१।।

अर्थ – जो भव्य पुरुष भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों पर (जिन प्रतिमा के चरण कमलों पर) सुगंधित चन्दन का लेप करता है उसको स्वर्ग में जाकर अत्यन्त निर्मल और स्वभाव से ही सुगंधित वैक्रियक शरीर प्राप्त होता है। भावार्थ-चन्दन से पूजा करने वाला भव्य जीव स्वर्ग में जाकर उत्तम देव होता है।

अक्षत से पूजन करने का फल

पुण्णाण पुज्जेहि य, अक्खय-पुंजेहि देवपयपुरओ।

लब्भंति णवणिहाणे सुअक्खए चक्कवट्टित्तं।।

पुर्णै: पूजयेच्च अक्षत-पुंजै: देवपद – पुरत:।

लभ्यन्ते नवनिधानानि, सु अक्षयानि चक्रवर्तित्वं।।४७२।।

अर्थ – जो भव्य जीव भगवान जिनेन्द्र देव के सामने पूर्ण अक्षतों के पुंज चढ़ाता है अक्षतों से भगवान की पूजा करता है वह पुरुष चक्रवर्ती का पद पाकर अक्षयरूप नवनिधियों को प्राप्त करता है। चक्रवर्ती को जो निधियां प्राप्त होती हैं उनमें से चाहे जितना सामान निकाला जाये, निकलता ही जाता है, कम नहीं होता।

पुष्प से पूजन करने का फल

अलि-चुंबिएहिं पुज्जइ, जिणपयकमलं च जाइमल्लीहिं।

सो हवइ सुरवरिंदो, रमेई सुरतरुवरवणेहिं।।

अलि-चुम्बितै: पूजयति, जिनपद-कमलं च जातिमल्लिवै:।

स भवति सुरवरेन्द्र:, रमते सुरतरुवरवनेषु।।४७३।।

अर्थ- जो भव्य पुरुष भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की जिन पर भ्रमर घूम रहे हैं ऐसे चमेली, मोगरा आदि उत्तम पुष्पों से पूजा करता है वह स्वर्ग में जाकर अनेक देवों का इन्द्र होता है और वह वहाँ पर चिरकाल तक स्वर्ग में होने वाले कल्पवृक्षों के वनों में (बगीचों में) क्रीड़ा किया करता है।

नैवेद्य से पूजन करने का फल

दहिखीर-सप्पि-संभव-उत्तम-चरुएहिं पुज्जए जो हु।

जिणवरपाय – पओरुह, सो पावइ उत्तमे भोए।।

दधि-क्षीर-सर्पि:-सम्भवोत्तम-चरुवैक: पूजयेत् यो हि।

जिनवर-पादपयोरुहं, स प्राप्नोति उत्तमान् भोगान्।।४७४।।

अर्थ – जो भव्य पुरुष दही, दूध, घी, आदि से बने हुये उत्तम नैवेद्य से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करता है उसे उत्तमोत्तम भोगों की प्राप्ति होती है।

दीपक से पूजन करने का फल

कप्पूर-तेल्ल-पयलिय-मंद-मरुपहयणडियदीवेहिं।

पुज्जइ जिण-पय-पोमं, ससि-सूरविसमतणुं लहई।।

कर्पूर-तेल-प्रज्वलित-मन्द-मरुत्प्रहतनटितदीपै: ।

पूजयति जिन-पद्मं, शशिसूर्यसमतनुं लभते।।४७५।।

अर्थ – जो दीपक, कपूर, घी, तेल आदि से प्रज्वलित हो रहा है और मन्द-मन्द वायु से नाच सा रहा है ऐसे दीपक से जो भव्य पुरुष भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करता है वह पुरुष सूर्य-चन्द्रमा के समान तेजस्वी शरीर को धारण करता है।

धूप से पूजन करने का फल

सिल्लारस-अयरु-मीसिय-णिग्गय धूवेहिं वहल-धूमेहिं।

धूवइ जो जिणचरणेसु लहइ सुहवत्तणं तिज ए।।

सिलारसागुरुमिश्रितनिर्गतधूपै: बहलधूम्रै:।

धूपयेद्य: जिनचरणेसु लभते शुभवर्तनं त्रिजगति।।४७६।।

अर्थ – जिससे बहुत भारी धुंआं निकल रहा है और जो शिलारस (शिलाजीत) अगुरु, चंदन आदि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुयी है ऐसी धूप अग्नि में खेकर भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलो को धूपित करता है वह तीनों लोकों में उत्तम पद को प्राप्त होता है। धूप को अग्नि में खेना चाहिए और उससे निकला हुआ धूंआं दाएं हाथ से भगवान की ओर करना चाहिए ।

फल से पूजन करने का फल

पक्केहिं रसड्ढ-सुमुज्जलेहिं जिणचरणपुरओप्पविएहिं।

णाणाफलेहिं पावइ, पुरिसो हियइच्छयं सुफलं।।

पक्कै: रसाढ्यै: समुज्वलै: जिनवरचरणपुरतउपयुत्तै:।

नानाफलै: प्राप्नोति, पुरुष: हृदयेप्सितं सुफलं।।४७७।।

अर्थ – जो भव्य पुरुष अत्यन्त उज्ज्वल रस से भरपूर ऐसे अनेक प्रकार के पके फलों से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों के सामने समर्पण कर पूजा करता है वह अपने हृदय अनुकुल उत्तम फलों को प्राप्त होता है।

उमास्वामी श्रावकाचार मे श्री उमास्वामी आचार्य कहते हैं-

जिनेन्द्रप्रतिमां भव्य:, स्नापयेत्पंचकामृतै:।

तस्य नश्यति संताप:, शरीरादिसमुद्भव:।।१६१।।

अर्थ – जो भव्य जीव जल, इक्षुरस, दूध, दही, घी, सर्वोषधि आदि से भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा का पंचामृताभिषेक करता हैं उसके शरीर से, मन से और अकस्मात् होने वाले सब तरह के संताप अवश्य नष्ट हो जाते हैं।

श्रीमतां श्रीजिनेन्द्राणां, प्रतिमाग्रे च पुण्यदा:।

ददाति जलधारा य:, तिस्त्रो भृंगारनालत:।।१६२।।

जन्म-मृत्यु-जरा-दु:खं, क्रमात्तस्य क्षयं व्रजेत्।

स्वल्पैरेव भवै: पापरज: शाम्यति निश्चितम्।।१६३।।

अर्थ – जो भव्यजीव प्रातिहार्य आदि अनेक शोभाओं से सुशोभित भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा के सामने भृगार नाल से (झारी से) तीन बार जल की धारा देता है व पुरुष महापुण्यवान समझा जाता है। और उसके जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि के समस्त दु:ख अनुक्रम से नष्ट हो जाते हैं तथा थोड़े ही भवों में उसकी पापरूपी धूलि अवश्य ही शांत हो जाती है।

भावार्थ-भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा के सामने झारी की टोंटी से तीन बार जल की धारा देनी चाहिए। यही जल पूजा कहलाती है। जलधारा झारी सही देनी चाहिए कटोरी आदि से नहीं।

चन्दनाद्यर्चनापुण्यात्, सुगंधि-तनुभाग् भवेत्।

सुगंधीकृतदिग्भागो, जायते च भवे भवे।।१६४।।

अर्थ – चन्दन से भगवान जिनेन्द्र देव की पूजा करने से जो पुण्य होता है उससे यह जीव जन्म-जन्म में अत्यन्त सुगंधित शरीर प्राप्त करता है उस शरीर की सुगंधि से दशों दिशाएँ सुगंधित हो जाती हैं। भावार्थ- भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों के अंगूठे पर अनामिका उंगली से चन्दन लगाना पूजा कहलाती है। सबसे छोटी उंगली के पास की उंगली को अनामिका कहते हैं।

अखण्डतन्दुलै: शुभ्रै:, सुगंधै: शुभशालिजै:।

पूजयन् जिनपादाब्जा-नक्षयां लभते रमाम्।।१६५।।

अर्थ- सपेद सुगंधित और शुभशालि धान्यों से उत्पन्न हुये अखंड तन्दुलों से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करने वाला मोक्षरूपी अक्षय लक्ष्मी को प्राप्त होता है। भावार्थ- भगवान की प्रतिमा के सामने चावलों के पुञ्ज चढ़ाने से अक्षत पूजा कही जाती है। वे चावलों के पुञ्ज अंगूठे को ऊपर कर बंधी हुई मुट्ठी से रखने चाहिए, साथ में मंत्र भी पढ़ना चाहिए। रकेबी से अक्षत नहीं चढ़ाना चाहिए।

पुष्पै: संपूजयन् भव्योऽमरस्त्रीलोचनै: सदा।

पूज्यतेऽमरलोकेशदेवीनिकरमध्यग:।।१६६।।

अर्थ -जो भव्य जीव पुष्पों से भगवान जिनेन्द्र देव की पूजा करता है। वह स्वर्गलोक के इन्द्र की देवियों के मध्य में बैठा हुआ अनेक देवियों के सुंदर नेत्रों के द्वारा सदा पूजा जाता है। भावार्थ वह इन्द्र होता है और अनेक देवांगनाएं उसकी सेवा करती हैं। पुष्प भगवान की प्रतिमा के चरणों पर चढ़ाए जाते हैं। पुष्प दोनों हाथों की अंजलि से चढ़ाना चाहिए। इसी को पुष्प पूजा कहते हैं।

पक्वान्नादिकनैवेद्यै: प्रार्चयत्यनिशं जिनान्।

स भुनक्ति महासौख्यं पचेन्द्रियसमुद्भवम्।।१६७।।

अर्थ- जो भव्य जीव पकाये हुये अनेक प्रकार के नैवेद्य से भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिदिन पूजा करता है वह पांचो इन्द्रियों से उत्पन्न हुये महासुखों का अनुभव करता है। भावार्थ चावलों के भात को अन्न कहते हैं। किसी अच्छे थाल में नैवेद्य को रखकर तथा दोनों हाथों से उस थाल को पकड़कर भगवान के सामने आरती उतारने के समान उस थाल को फिराकर सामने रख देना चाहिए। हाथ या कटोरी से नैवेद्य नहीं चढ़ाना चाहिए।

सुरत्नसर्पि:-कर्पूरभवै – र्दीपैर्जिनेशिनाम्।

द्योतयेद्य: पुमानंघ्रीन् स: स्यात्कांतिकलानिधि:।।१६८।।

अर्थ- जो भव्य जीव रत्न, घी व कपूर के दीपकों से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की आरती उतारता है उस पुरुष की कांति चन्द्रमा के समान निर्मल हो जाती है। भावार्थ दीप पूजा दीपक से ही होती है। रंगे हुए चटक से नहीं। रंगे हुए चटक से भगवान का शरीर दैदीप्यमान नहीं होता। दीपक से आरती उतारी जाती है। इसीलिए परिणामों की विशुद्धि जो आरती से होती है वह रंगे चटक से नहीं हो सकती। दोनों हाथों से दीपक का थाल लेकर दाई ओर से बाई ओर घुमाकर भगवान के सामने बार-बार दैदीप्यमान करने को आरती कहते हैं। इसी को दीप पूजा कहते हैं।

कृष्णागर्वादिजै-र्धूपै-र्धूपयेज्जिनपदयुगम्।

स: सर्वजनतानेत्रवल्लभ: संप्रजायते।।१६९।।

अर्थ –जो भव्य जीव कृष्णगुरु, चन्दन आदि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुई धूप से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करता है अग्नि में खेकर धूप चढ़ाता है। वह पुरुष समस्त लोगों के नेत्रों का प्यारा हो जाता है। भावार्थ धूप को अग्नि में खेकर उसका धूंआ अपने दांये हाथ से भगवान की ओर करना चाहिए इसी को धूप पूजा कहते हैं। धूप थाल में नहीं चढ़ाई जाती है किन्तु अग्नि में ही खेई जाती है।

आम्रनारिंगजंबीरकदल्यादि-तरुद्भवै: ।

फलैर्यजति सर्वज्ञं, लभतेऽपीहितं फलम्।।१७०।।

अर्थ- जो भव्य जीव आम, नारंगी, नींबू, केला, आदि वृक्षों से उत्पन्न होने वाले फलों से भगवान सर्वज्ञदेव की पूजा करता है वह पुरुष अपनी इच्छा के अनुसार फलों को प्राप्त होता है। भावार्थ जिन फलों से इन्द्रिय और मन को संतोष हो ऐसे हरे व सूखे फल चढ़ाना चाहिए। फल देखने में सुन्दर और मनोहर होने चाहिए। गोला या बाकी मिंगी फल नहीं कहलाते किन्तु नैवेद्य कहलाते हैं। इसीलिए गोला के बदले नारियल चढ़ाना चाहिए, बादाम भी फोड़कर नहीं चढ़ाना चाहिए। रकेबी में फल रखकर बड़ी विनय और भक्ति से भगवान के सामने रखने चाहिए। आठो द्रव्यों में फल सर्वोत्कृष्ट द्रव्य है। 

श्री रविषेणाचार्य कहते हैं- अथानन्तर भरत, पिता के समान, प्रजा पर राज्य करने लगा। उसका राज्य समस्त शत्रुओं से रहित तथा समस्त प्रजा को सुख देने वाला था।।१३६।। तेजस्वी भरत अपने मन में असहनीय शोकरूपी शल्य को धारण कर रहा था इसलिए ऐसे व्यवस्थित राज्य में भी उसे क्षणभर के लिए संतोष नही होता था।।१३७।।वह तीनों काल अरनाथ भगवान की वन्दना करता था भोगों से सदा उदास रहता था और समीचीन धर्म का श्रवण करने के लिए मंदिर जाता था। यही इसका नियम था।।१३८।।वहां स्व और पर शास्त्रों के पारगामी तथा अनेक मुनियों का संघ जिनकी निरन्तर सेवा करता था ऐसे द्युति नाम के आचार्य रहते थे।।१३९।। उनके आगे बुद्धिमान भरत ने प्रतिज्ञा की कि मैं राम के दर्शन मात्र से मुनिव्रत धारण करूँगा।। १४०।। तदनन्तर अपनी गंभीर वाणी से मयूर समूह को नृत्य कराते हुये भगवान द्युति भट्टारक इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने वाले भरत से बोले।।१४१।।कि हे भव्य! कमल के समान नेत्रों के धारक राम जब तक आते तबतक तू गृहस्थ धर्म के द्वारा अभ्यास कर ले।।१४२।महात्मा निग्र्रन्थ मुनियों की चेष्टा अत्यन्त कठिन है पर जो अभ्यास के द्वारा परिपक्व होते हैं उन्हें उसका साधन करना सरल हो जाता है।।१४३।।‘‘मैं आगे तप करूंगा” ऐसा कहने वाले अनेक जड़बुद्धि मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं पर तप नहीं कर पाते हैं।।१४४।। ‘‘निग्र्रन्थ मुनियों का तपअमूल्य रत्न के समान है’‘। ऐसा कहना भी अशक्य है फिर उसकी अन्य उपमा तो हो ही क्या सकती है?।।१४५।।गृहस्थों के धर्म को जिनेन्द्र भगवान ने मुनिधर्म का छोटा भाई कहा है सो बोधि को प्रदान करने वाले इस धर्म में भी प्रमादरहित होकर लीन रहना चाहिए।।१४६।। जैसे कोई मनुष्य रत्नद्वीप में गया वहां वह जिस किसी भी रत्न को उठाता है वही उसके लिए अमूल्यता को प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार धर्मचक्र की प्रवृत्ति करने वाले जिनेन्द्र भगवान के शासन में जो कोई इस नियमरूपी द्वीप में आकर जिस किसी नियम को ग्रहण करता है वही उसके लिए अमूल्य हो जाता है।।१४७-१४८।।जो अत्यन्त श्रेष्ठ अहिंसारूपी रत्न को लेकर भक्तिपूर्वक दाम जनेन्द्रदेव की पूजा करता है वह स्वर्ग में परम वृद्धि को प्राप्त होता है।।१४९।।जो सत्यव्रत का धारी होकर मालाओं से भगवान की अर्चा करता है उसके वचनों को सब ग्रहण करते हैं तथा उज्ज्वल कीर्ति से वह समस्त संसार को व्याप्त करता है।।१५०।।जो अदत्तादान अर्थात् चोरी से दूर रहकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा करता है वह रत्नों से परिपूर्ण निधियों का स्वामी होता है।।१५१।। जो जिनेन्द्र भगवान की सेवा करता हुआ परस्त्रियों में प्रेम नहीं करता है वह सबके नेत्रों को हरण करने वाला परम सौभाग्य को प्राप्त होता है।।१५२।। जो परिग्रह की सीमा नियत कर भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान की अर्चा करता है वह अतिशय विस्तृत लाभों को प्राप्त होता है तथा लोग उसकी पूजा करते हैं।।१५३।। आहार-दान के पुण्य से यह जीव भोग से सहित होता है। अर्थात सब प्रकार के भोग इसे प्राप्त होते हैं यदि यह परदेश भी जाता है तो वहां भी उसे सदा सुख ही प्राप्त होता है।।१५४।। अभयदान के पुण्य से यह जीव निर्भय होता है और बहुत भारी संकट में पड़कर भी उसका शरीर उपद्रव से शून्य रहता है।।१५५।। ज्ञानदान से यह जीव विशाल सुखों का पात्र होता है और कलारूपी सागर से निकले हुये अमृत के कुल्ले करता है।।१५६।। जो मनुष्य रात्रि में आहार का त्याग करता है वह सब प्रकार के आरंभ में प्रवृत्त रहने पर भी सुखदायी गति को प्राप्त होता है।।१५७।। जो मनुष्य तीनों काल में जिनेन्द्रभगवान की वन्दना करता है उसके भाव सदा शुद्ध रहते हैं तथा उसका सब पाप नष्ट हो जाता है।।१५८।। जो पृथिवी तथा जल में उत्पन होने वाले सुगंधित फूलों से जिनेन्द्र भगवान की अर्चा करता है वह पुष्पक विमान को पाकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है।।१५९।। जो अतिशय निर्मल भावरूपी फूलों से जिनेन्द्र देव की पूजा करता है वह लोगों के द्वारा पूजनीय तथ ा अत्यन्त सुन्दर होता है।।(१६०)।। जो बुद्धिमान चन्दन तथा कालागुरु आदि से उत्पन्न धूप जिनेन्द्र भगवान के लिए चढ़ाता है वह मनोज्ञ देव होता है।।(१६१)।। जो जिनमंदिर में शुभ भाव से दीपदान करता है वह स्वर्ग में देदीप्यमान शरीर का धारक होता है।।(१६२)।। जो मनुष्य छत्र, चमर, फन्नूस, पताका तथा दर्पण आदि के द्वारा जिनमंदिर को विभूषित करता है वह आश्चर्यकारक लक्ष्मी को प्राप्त होता है।।(१६३)।। जो मनुष्य सुगंधि से दिशाओं को व्याप्त करने वाली गंध से जिनेन्द्र भगवान का लेपन करता है वह सुगंधि से युक्त, स्त्रियों को आनन्द देने वाला प्रिय पुरुष होता है।।(१६४)।। जो मनुष्य सुगंधित जल से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करता है वह जहाँ-जहाँ उत्पन्न होता है वहा अभिषेक को प्राप्त होता है।।१६५।। जो दूध की धारा से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करता है वह दूध के समान धवल विमान में उत्तम कान्ति का धारक होता है।।१६६।। जो दही के कलशों से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करता है वह दही के समान फर्श वाले स्वर्ग में उत्तम देव होता है।।१६७।। जो घी से जिनदेव का अभिषेक करता है वह कांति, द्युति और प्रभाव से युक्त विमान का स्वामी देव होता है।।१६८।। पुराण में सुुना जाता है कि अभिषेक के प्रभाव से अनन्तवीर्य आदि अनेक विद्वज्जन, स्वर्ग की भूमि में अभिषेक को प्राप्त हुये हैं।।१६९।। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जिनमंदिर में रंगावलि आदि का उपहार चढ़ाता है वह उत्तम हृदय का धारक होकर परमविभूति और आरोग्य को प्राप्त होता है।।१७०।। जो जिनमंदिर में गीत, नृत्य तथा वादित्रों से महोत्सव करता है वह स्वर्ग में परम उत्सव को प्राप्त होता है।।१७१।। जो मनुष्य जिनमंदिर बनवाता है उस सुचेता के भोगोत्सव का वर्णन कौन कर सकता है?।।१७२।। जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा बनवाता है वह शीघ्र ही सुर तथा असुरों के उत्तम सुख प्राप्त कर परमपद को प्राप्त होता है।।१७३।। तीनों कालों और तीनों लोकों में व्रत, ज्ञान, तप और दान के द्वारा मनुष्य के जो पुण्यकर्म संचित होते हैं वे भावपूर्वक एक प्रतिमा के बनवाने से उत्पन्न हुये पुण्य की बराबरी नहीं कर सकते।।१७४-१७५।। इस कहे हुये फल को जीव स्वर्ग में प्राप्त कर जब मनुष्य पर्याय में उत्पन्न होते हैं तब चक्रवर्ती आदि का पद पाकर वहां भी उसका उपभोग करते हैं।।१७६।। जो कोई मनुष्य इस विधि से धर्म का सेवन करता है वह संसार-सागर से पार होकर तीन लोक के शिखर पर विराजमान होता है।।१७७।। जो मनुष्य जिनप्रतिमा के दर्शन का चितंवन करता है वह बेला का, जो उद्यम का अभिलाषी होता है वह तेला का, जो जाने का आरंभ करता है वह चौला का, जो जाने लगता है वह पांच उपवास का, जो कुछ दूर पहुंच जाता है बारह उपवास का, जो बीच में पहुंच जाता है वह पन्द्रह उपवास का, जो मंदिर के दर्शन करता है वह मासोपवास का, जो मंदिर के आंगन में प्रवेश करता है वह छहमास के उपवास का, जो द्वार में प्रवेश करता है वह वर्षोपवास का, जो प्रदक्षिणा देता है वह सौ वर्ष के उपवास का, जो जिनेन्द्र देव के मुख का दर्शन करता है वह हजार वर्ष के उपवास का और जो स्वभाव से स्तुति करता है वह अनन्त उपवास के फल को प्राप्त करता है। यथार्थ में जिनभक्ति से बढ़कर उत्तम पुण्य नहीं है ।।१७८-१८२।। आचार्य द्युति कहते हैं कि हे भरत! जिनेन्द्र देव की भक्ति से कर्म क्षय को प्राप्त हो जाते हैं और जिसके कर्म क्षीण हो गये है |

धूपैरालेपनै: पुष्पै-र्मनोज्ञैर्बहुभक्तिभि:।।८९।।

विधाय महतीं पूजां, सन्निविष्ट: पुरोऽवनौ।

सगर्भं वदनं चक्रे पूतै: स्तुत्यक्षरैश्चिरम्।।९०।|

प्रतिमा स्थापित कर उसने भारी सुगंधि से भ्रमरों को आकर्षित करने वाले धूप, चन्दन, पुष्प तथा मनोहर नैवेद्य के द्वारा बड़ी पूजा की और सामने बैठकर चंदन से पूजन करने का फल

चंदणसुअन्धलेओ, जिणवर-चरणेसु जो कुणई भविओ।

लहइ तणू विक्किरियं, सहावसुयंधयं अमलं।।

चन्दनसुगंधलेपं, जिनवरचरणेषु य: करोति भव्य:।

लभते तनुं वैक्रियिवं, स्वभावसुगन्धवं अमलं।।४७१।।

अर्थ – जो भव्य पुरुष भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों पर (जिन प्रतिमा के चरण कमलों पर) सुगंधित चन्दन का लेप करता है उसको स्वर्ग में जाकर अत्यन्त निर्मल और स्वभाव से ही सुगंधित वैक्रियक शरीर प्राप्त होता है। भावार्थ-चन्दन से पूजा करने वाला भव्य जीव स्वर्ग में जाकर उत्तम देव होता है।

अक्षत से पूजन करने का फल

पुण्णाण पुज्जेहि य, अक्खय-पुंजेहि देवपयपुरओ।

लब्भंति णवणिहाणे सुअक्खए चक्कवट्टित्तं।।

पुर्णै: पूजयेच्च अक्षत-पुंजै: देवपद – पुरत:।

लभ्यन्ते नवनिधानानि, सु अक्षयानि चक्रवर्तित्वं।।४७२।।

अर्थ – जो भव्य जीव भगवान जिनेन्द्र देव के सामने पूर्ण अक्षतों के पुंज चढ़ाता है अक्षतों से भगवान की पूजा करता है वह पुरुष चक्रवर्ती का पद पाकर अक्षयरूप नवनिधियों को प्राप्त करता है। चक्रवर्ती को जो निधियां प्राप्त होती हैं उनमें से चाहे जितना सामान निकाला जाये, निकलता ही जाता है, कम नहीं होता।

पुष्प से पूजन करने का फल

अलि-चुंबिएहिं पुज्जइ, जिणपयकमलं च जाइमल्लीहिं।

सो हवइ सुरवरिंदो, रमेई सुरतरुवरवणेहिं।।

अलि-चुम्बितै: पूजयति, जिनपद-कमलं च जातिमल्लिवै:।

स भवति सुरवरेन्द्र:, रमते सुरतरुवरवनेषु।।४७३।।

अर्थ- जो भव्य पुरुष भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की जिन पर भ्रमर घूम रहे हैं ऐसे चमेली, मोगरा आदि उत्तम पुष्पों से पूजा करता है वह स्वर्ग में जाकर अनेक देवों का इन्द्र होता है और वह वहाँ पर चिरकाल तक स्वर्ग में होने वाले कल्पवृक्षों के वनों में (बगीचों में) क्रीड़ा किया करता है।

नैवेद्य से पूजन करने का फल

दहिखीर-सप्पि-संभव-उत्तम-चरुएहिं पुज्जए जो हु।

जिणवरपाय – पओरुह, सो पावइ उत्तमे भोए।।

दधि-क्षीर-सर्पि:-सम्भवोत्तम-चरुवैक: पूजयेत् यो हि।

जिनवर-पादपयोरुहं, स प्राप्नोति उत्तमान् भोगान्।।४७४।।

अर्थ – जो भव्य पुरुष दही, दूध, घी, आदि से बने हुये उत्तम नैवेद्य से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करता है उसे उत्तमोत्तम भोगों की प्राप्ति होती है।

दीपक से पूजन करने का फल

कप्पूर-तेल्ल-पयलिय-मंद-मरुपहयणडियदीवेहिं।

पुज्जइ जिण-पय-पोमं, ससि-सूरविसमतणुं लहई।।

कर्पूर-तेल-प्रज्वलित-मन्द-मरुत्प्रहतनटितदीपै: ।

पूजयति जिन-पद्मं, शशिसूर्यसमतनुं लभते।।४७५।।

अर्थ – जो दीपक, कपूर, घी, तेल आदि से प्रज्वलित हो रहा है और मन्द-मन्द वायु से नाच सा रहा है ऐसे दीपक से जो भव्य पुरुष भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करता है वह पुरुष सूर्य-चन्द्रमा के समान तेजस्वी शरीर को धारण करता है।

धूप से पूजन करने का फल

सिल्लारस-अयरु-मीसिय-णिग्गय धूवेहिं वहल-धूमेहिं।

धूवइ जो जिणचरणेसु लहइ सुहवत्तणं तिज ए।।

सिलारसागुरुमिश्रितनिर्गतधूपै: बहलधूम्रै:।

धूपयेद्य: जिनचरणेसु लभते शुभवर्तनं त्रिजगति।।४७६।।

अर्थ – जिससे बहुत भारी धुंआं निकल रहा है और जो शिलारस (शिलाजीत) अगुरु, चंदन आदि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुयी है ऐसी धूप अग्नि में खेकर भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलो को धूपित करता है वह तीनों लोकों में उत्तम पद को प्राप्त होता है। धूप को अग्नि में खेना चाहिए और उससे निकला हुआ धूंआं दाएं हाथ से भगवान की ओर करना चाहिए ।

फल से पूजन करने का फल

पक्केहिं रसड्ढ-सुमुज्जलेहिं जिणचरणपुरओप्पविएहिं।

णाणाफलेहिं पावइ, पुरिसो हियइच्छयं सुफलं।।

पक्कै: रसाढ्यै: समुज्वलै: जिनवरचरणपुरतउपयुत्तै:।

नानाफलै: प्राप्नोति, पुरुष: हृदयेप्सितं सुफलं।।४७७।।

अर्थ – जो भव्य पुरुष अत्यन्त उज्ज्वल रस से भरपूर ऐसे अनेक प्रकार के पके फलों से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों के सामने समर्पण कर पूजा करता है वह अपने हृदय अनुकुल उत्तम फलों को प्राप्त होता है।

उमास्वामी श्रावकाचार मे श्री उमास्वामी आचार्य कहते हैं-

जिनेन्द्रप्रतिमां भव्य:, स्नापयेत्पंचकामृतै:।

तस्य नश्यति संताप:, शरीरादिसमुद्भव:।।१६१।।

अर्थ – जो भव्य जीव जल, इक्षुरस, दूध, दही, घी, सर्वोषधि आदि से भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा का पंचामृताभिषेक करता हैं उसके शरीर से, मन से और अकस्मात् होने वाले सब तरह के संताप अवश्य नष्ट हो जाते हैं।

श्रीमतां श्रीजिनेन्द्राणां, प्रतिमाग्रे च पुण्यदा:।

ददाति जलधारा य:, तिस्त्रो भृंगारनालत:।।१६२।।

जन्म-मृत्यु-जरा-दु:खं, क्रमात्तस्य क्षयं व्रजेत्।

स्वल्पैरेव भवै: पापरज: शाम्यति निश्चितम्।।१६३।।

अर्थ – जो भव्यजीव प्रातिहार्य आदि अनेक शोभाओं से सुशोभित भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा के सामने भृगार नाल से (झारी से) तीन बार जल की धारा देता है व पुरुष महापुण्यवान समझा जाता है। और उसके जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि के समस्त दु:ख अनुक्रम से नष्ट हो जाते हैं तथा थोड़े ही भवों में उसकी पापरूपी धूलि अवश्य ही शांत हो जाती है।

भावार्थ-भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा के सामने झारी की टोंटी से तीन बार जल की धारा देनी चाहिए। यही जल पूजा कहलाती है। जलधारा झारी सही देनी चाहिए कटोरी आदि से नहीं।

चन्दनाद्यर्चनापुण्यात्, सुगंधि-तनुभाग् भवेत्।

सुगंधीकृतदिग्भागो, जायते च भवे भवे।।१६४।।

अर्थ – चन्दन से भगवान जिनेन्द्र देव की पूजा करने से जो पुण्य होता है उससे यह जीव जन्म-जन्म में अत्यन्त सुगंधित शरीर प्राप्त करता है उस शरीर की सुगंधि से दशों दिशाएँ सुगंधित हो जाती हैं। भावार्थ- भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों के अंगूठे पर अनामिका उंगली से चन्दन लगाना पूजा कहलाती है। सबसे छोटी उंगली के पास की उंगली को अनामिका कहते हैं।

अखण्डतन्दुलै: शुभ्रै:, सुगंधै: शुभशालिजै:।

पूजयन् जिनपादाब्जा-नक्षयां लभते रमाम्।।१६५।।

अर्थ- सपेद सुगंधित और शुभशालि धान्यों से उत्पन्न हुये अखंड तन्दुलों से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करने वाला मोक्षरूपी अक्षय लक्ष्मी को प्राप्त होता है। भावार्थ- भगवान की प्रतिमा के सामने चावलों के पुञ्ज चढ़ाने से अक्षत पूजा कही जाती है। वे चावलों के पुञ्ज अंगूठे को ऊपर कर बंधी हुई मुट्ठी से रखने चाहिए, साथ में मंत्र भी पढ़ना चाहिए। रकेबी से अक्षत नहीं चढ़ाना चाहिए।

पुष्पै: संपूजयन् भव्योऽमरस्त्रीलोचनै: सदा।

पूज्यतेऽमरलोकेशदेवीनिकरमध्यग:।।१६६।।

अर्थ -जो भव्य जीव पुष्पों से भगवान जिनेन्द्र देव की पूजा करता है। वह स्वर्गलोक के इन्द्र की देवियों के मध्य में बैठा हुआ अनेक देवियों के सुंदर नेत्रों के द्वारा सदा पूजा जाता है। भावार्थ वह इन्द्र होता है और अनेक देवांगनाएं उसकी सेवा करती हैं। पुष्प भगवान की प्रतिमा के चरणों पर चढ़ाए जाते हैं। पुष्प दोनों हाथों की अंजलि से चढ़ाना चाहिए। इसी को पुष्प पूजा कहते हैं।

पक्वान्नादिकनैवेद्यै: प्रार्चयत्यनिशं जिनान्।

स भुनक्ति महासौख्यं पचेन्द्रियसमुद्भवम्।।१६७।।

अर्थ- जो भव्य जीव पकाये हुये अनेक प्रकार के नैवेद्य से भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिदिन पूजा करता है वह पांचो इन्द्रियों से उत्पन्न हुये महासुखों का अनुभव करता है। भावार्थ चावलों के भात को अन्न कहते हैं। किसी अच्छे थाल में नैवेद्य को रखकर तथा दोनों हाथों से उस थाल को पकड़कर भगवान के सामने आरती उतारने के समान उस थाल को फिराकर सामने रख देना चाहिए। हाथ या कटोरी से नैवेद्य नहीं चढ़ाना चाहिए।

सुरत्नसर्पि:-कर्पूरभवै – र्दीपैर्जिनेशिनाम्।

द्योतयेद्य: पुमानंघ्रीन् स: स्यात्कांतिकलानिधि:।।१६८।।

अर्थ- जो भव्य जीव रत्न, घी व कपूर के दीपकों से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की आरती उतारता है उस पुरुष की कांति चन्द्रमा के समान निर्मल हो जाती है। भावार्थ दीप पूजा दीपक से ही होती है। रंगे हुए चटक से नहीं। रंगे हुए चटक से भगवान का शरीर दैदीप्यमान नहीं होता। दीपक से आरती उतारी जाती है। इसीलिए परिणामों की विशुद्धि जो आरती से होती है वह रंगे चटक से नहीं हो सकती। दोनों हाथों से दीपक का थाल लेकर दाई ओर से बाई ओर घुमाकर भगवान के सामने बार-बार दैदीप्यमान करने को आरती कहते हैं। इसी को दीप पूजा कहते हैं।

कृष्णागर्वादिजै-र्धूपै-र्धूपयेज्जिनपदयुगम्।

स: सर्वजनतानेत्रवल्लभ: संप्रजायते।।१६९।।

अर्थ –जो भव्य जीव कृष्णगुरु, चन्दन आदि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुई धूप से भगवान जिनेन्द्र देव के चरण कमलों की पूजा करता है अग्नि में खेकर धूप चढ़ाता है। वह पुरुष समस्त लोगों के नेत्रों का प्यारा हो जाता है। भावार्थ धूप को अग्नि में खेकर उसका धूंआ अपने दांये हाथ से भगवान की ओर करना चाहिए इसी को धूप पूजा कहते हैं। धूप थाल में नहीं चढ़ाई जाती है किन्तु अग्नि में ही खेई जाती है।

आम्रनारिंगजंबीरकदल्यादि-तरुद्भवै: ।

फलैर्यजति सर्वज्ञं, लभतेऽपीहितं फलम्।।१७०।।

अर्थ- जो भव्य जीव आम, नारंगी, नींबू, केला, आदि वृक्षों से उत्पन्न होने वाले फलों से भगवान सर्वज्ञदेव की पूजा करता है वह पुरुष अपनी इच्छा के अनुसार फलों को प्राप्त होता है। भावार्थ जिन फलों से इन्द्रिय और मन को संतोष हो ऐसे हरे व सूखे फल चढ़ाना चाहिए। फल देखने में सुन्दर और मनोहर होने चाहिए। गोला या बाकी मिंगी फल नहीं कहलाते किन्तु नैवेद्य कहलाते हैं। इसीलिए गोला के बदले नारियल चढ़ाना चाहिए, बादाम भी फोड़कर नहीं चढ़ाना चाहिए। रकेबी में फल रखकर बड़ी विनय और भक्ति से भगवान के सामने रखने चाहिए। आठो द्रव्यों में फल सर्वोत्कृष्ट द्रव्य है। 

श्री रविषेणाचार्य कहते हैं- अथानन्तर भरत, पिता के समान, प्रजा पर राज्य करने लगा। उसका राज्य समस्त शत्रुओं से रहित तथा समस्त प्रजा को सुख देने वाला था।।१३६।। तेजस्वी भरत अपने मन में असहनीय शोकरूपी शल्य को धारण कर रहा था इसलिए ऐसे व्यवस्थित राज्य में भी उसे क्षणभर के लिए संतोष नही होता था।।१३७।।वह तीनों काल अरनाथ भगवान की वन्दना करता था भोगों से सदा उदास रहता था और समीचीन धर्म का श्रवण करने के लिए मंदिर जाता था। यही इसका नियम था।।१३८।।वहां स्व और पर शास्त्रों के पारगामी तथा अनेक मुनियों का संघ जिनकी निरन्तर सेवा करता था ऐसे द्युति नाम के आचार्य रहते थे।।१३९।। उनके आगे बुद्धिमान भरत ने प्रतिज्ञा की कि मैं राम के दर्शन मात्र से मुनिव्रत धारण करूँगा।। १४०।। तदनन्तर अपनी गंभीर वाणी से मयूर समूह को नृत्य कराते हुये भगवान द्युति भट्टारक इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने वाले भरत से बोले।।१४१।।कि हे भव्य! कमल के समान नेत्रों के धारक राम जब तक आते तबतक तू गृहस्थ धर्म के द्वारा अभ्यास कर ले।।१४२।महात्मा निग्र्रन्थ मुनियों की चेष्टा अत्यन्त कठिन है पर जो अभ्यास के द्वारा परिपक्व होते हैं उन्हें उसका साधन करना सरल हो जाता है।।१४३।।‘‘मैं आगे तप करूंगा” ऐसा कहने वाले अनेक जड़बुद्धि मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं पर तप नहीं कर पाते हैं।।१४४।। ‘‘निग्र्रन्थ मुनियों का तपअमूल्य रत्न के समान है’‘। ऐसा कहना भी अशक्य है फिर उसकी अन्य उपमा तो हो ही क्या सकती है?।।१४५।।गृहस्थों के धर्म को जिनेन्द्र भगवान ने मुनिधर्म का छोटा भाई कहा है सो बोधि को प्रदान करने वाले इस धर्म में भी प्रमादरहित होकर लीन रहना चाहिए।।१४६।। जैसे कोई मनुष्य रत्नद्वीप में गया वहां वह जिस किसी भी रत्न को उठाता है वही उसके लिए अमूल्यता को प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार धर्मचक्र की प्रवृत्ति करने वाले जिनेन्द्र भगवान के शासन में जो कोई इस नियमरूपी द्वीप में आकर जिस किसी नियम को ग्रहण करता है वही उसके लिए अमूल्य हो जाता है।।१४७-१४८।।जो अत्यन्त श्रेष्ठ अहिंसारूपी रत्न को लेकर भक्तिपूर्वक दाम जनेन्द्रदेव की पूजा करता है वह स्वर्ग में परम वृद्धि को प्राप्त होता है।।१४९।।जो सत्यव्रत का धारी होकर मालाओं से भगवान की अर्चा करता है उसके वचनों को सब ग्रहण करते हैं तथा उज्ज्वल कीर्ति से वह समस्त संसार को व्याप्त करता है।।१५०।।जो अदत्तादान अर्थात् चोरी से दूर रहकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा करता है वह रत्नों से परिपूर्ण निधियों का स्वामी होता है।।१५१।। जो जिनेन्द्र भगवान की सेवा करता हुआ परस्त्रियों में प्रेम नहीं करता है वह सबके नेत्रों को हरण करने वाला परम सौभाग्य को प्राप्त होता है।।१५२।। जो परिग्रह की सीमा नियत कर भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान की अर्चा करता है वह अतिशय विस्तृत लाभों को प्राप्त होता है तथा लोग उसकी पूजा करते हैं।।१५३।। आहार-दान के पुण्य से यह जीव भोग से सहित होता है। अर्थात सब प्रकार के भोग इसे प्राप्त होते हैं यदि यह परदेश भी जाता है तो वहां भी उसे सदा सुख ही प्राप्त होता है।।१५४।। अभयदान के पुण्य से यह जीव निर्भय होता है और बहुत भारी संकट में पड़कर भी उसका शरीर उपद्रव से शून्य रहता है।।१५५।। ज्ञानदान से यह जीव विशाल सुखों का पात्र होता है और कलारूपी सागर से निकले हुये अमृत के कुल्ले करता है।।१५६।। जो मनुष्य रात्रि में आहार का त्याग करता है वह सब प्रकार के आरंभ में प्रवृत्त रहने पर भी सुखदायी गति को प्राप्त होता है।।१५७।। जो मनुष्य तीनों काल में जिनेन्द्रभगवान की वन्दना करता है उसके भाव सदा शुद्ध रहते हैं तथा उसका सब पाप नष्ट हो जाता है।।१५८।। जो पृथिवी तथा जल में उत्पन होने वाले सुगंधित फूलों से जिनेन्द्र भगवान की अर्चा करता है वह पुष्पक विमान को पाकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है।।१५९।। जो अतिशय निर्मल भावरूपी फूलों से जिनेन्द्र देव की पूजा करता है वह लोगों के द्वारा पूजनीय तथ ा अत्यन्त सुन्दर होता है।।(१६०)।। जो बुद्धिमान चन्दन तथा कालागुरु आदि से उत्पन्न धूप जिनेन्द्र भगवान के लिए चढ़ाता है वह मनोज्ञ देव होता है।।(१६१)।। जो जिनमंदिर में शुभ भाव से दीपदान करता है वह स्वर्ग में देदीप्यमान शरीर का धारक होता है।।(१६२)।। जो मनुष्य छत्र, चमर, फन्नूस, पताका तथा दर्पण आदि के द्वारा जिनमंदिर को विभूषित करता है वह आश्चर्यकारक लक्ष्मी को प्राप्त होता है।।(१६३)।। जो मनुष्य सुगंधि से दिशाओं को व्याप्त करने वाली गंध से जिनेन्द्र भगवान का लेपन करता है वह सुगंधि से युक्त, स्त्रियों को आनन्द देने वाला प्रिय पुरुष होता है।।(१६४)।। जो मनुष्य सुगंधित जल से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करता है वह जहाँ-जहाँ उत्पन्न होता है वहा अभिषेक को प्राप्त होता है।।१६५।। जो दूध की धारा से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करता है वह दूध के समान धवल विमान में उत्तम कान्ति का धारक होता है।।१६६।। जो दही के कलशों से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करता है वह दही के समान फर्श वाले स्वर्ग में उत्तम देव होता है।।१६७।। जो घी से जिनदेव का अभिषेक करता है वह कांति, द्युति और प्रभाव से युक्त विमान का स्वामी देव होता है।।१६८।। पुराण में सुुना जाता है कि अभिषेक के प्रभाव से अनन्तवीर्य आदि अनेक विद्वज्जन, स्वर्ग की भूमि में अभिषेक को प्राप्त हुये हैं।।१६९।। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जिनमंदिर में रंगावलि आदि का उपहार चढ़ाता है वह उत्तम हृदय का धारक होकर परमविभूति और आरोग्य को प्राप्त होता है।।१७०।। जो जिनमंदिर में गीत, नृत्य तथा वादित्रों से महोत्सव करता है वह स्वर्ग में परम उत्सव को प्राप्त होता है।।१७१।। जो मनुष्य जिनमंदिर बनवाता है उस सुचेता के भोगोत्सव का वर्णन कौन कर सकता है?।।१७२।। जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा बनवाता है वह शीघ्र ही सुर तथा असुरों के उत्तम सुख प्राप्त कर परमपद को प्राप्त होता है।।१७३।। तीनों कालों और तीनों लोकों में व्रत, ज्ञान, तप और दान के द्वारा मनुष्य के जो पुण्यकर्म संचित होते हैं वे भावपूर्वक एक प्रतिमा के बनवाने से उत्पन्न हुये पुण्य की बराबरी नहीं कर सकते।।१७४-१७५।। इस कहे हुये फल को जीव स्वर्ग में प्राप्त कर जब मनुष्य पर्याय में उत्पन्न होते हैं तब चक्रवर्ती आदि का पद पाकर वहां भी उसका उपभोग करते हैं।।१७६।। जो कोई मनुष्य इस विधि से धर्म का सेवन करता है वह संसार-सागर से पार होकर तीन लोक के शिखर पर विराजमान होता है।।१७७।। जो मनुष्य जिनप्रतिमा के दर्शन का चितंवन करता है वह बेला का, जो उद्यम का अभिलाषी होता है वह तेला का, जो जाने का आरंभ करता है वह चौला का, जो जाने लगता है वह पांच उपवास का, जो कुछ दूर पहुंच जाता है बारह उपवास का, जो बीच में पहुंच जाता है वह पन्द्रह उपवास का, जो मंदिर के दर्शन करता है वह मासोपवास का, जो मंदिर के आंगन में प्रवेश करता है वह छहमास के उपवास का, जो द्वार में प्रवेश करता है वह वर्षोपवास का, जो प्रदक्षिणा देता है वह सौ वर्ष के उपवास का, जो जिनेन्द्र देव के मुख का दर्शन करता है वह हजार वर्ष के उपवास का और जो स्वभाव से स्तुति करता है वह अनन्त उपवास के फल को प्राप्त करता है। यथार्थ में जिनभक्ति से बढ़कर उत्तम पुण्य नहीं है ।।१७८-१८२।। आचार्य द्युति कहते हैं कि हे भरत! जिनेन्द्र देव की भक्ति से कर्म क्षय को प्राप्त हो जाते हैं और जिसके कर्म क्षीण हो गये है |

धूपैरालेपनै: पुष्पै-र्मनोज्ञैर्बहुभक्तिभि:।।८९।।

विधाय महतीं पूजां, सन्निविष्ट: पुरोऽवनौ।

सगर्भं वदनं चक्रे पूतै: स्तुत्यक्षरैश्चिरम्।।९०।|

प्रतिमा स्थापित कर उसने भारी सुगंधि से भ्रमरों को आकर्षित करने वाले धूप, चन्दन, पुष्प तथा मनोहर नैवेद्य के द्वारा बड़ी पूजा की और सामने बैठकर चिरकाल तक स्तुति कर पवित्र अक्षरों से अपने मुख को सहित किया।।८९-९०।।

सचित्त पूजा निर्दोष है

-यथा विषकण: प्राप्त: सरसीं नैव दुष्यति।

जिनधर्मोद्यतस्यैवं, हिंसालेशो वृथोद्भव:।।९२।।

प्रासादादि तत: कार्यं, जिनानां भक्तितत्परै:।

माल्याधूपप्रदीपादि, सर्वं च कुशलैर्जनै:।।९३।।

जिस प्रकार विष का एक कण तालाब में पहुंचकर पूरे तालाब को दूषित नहीं कर सकता उसी प्रकार जिनधर्मानुकुल आचरण करने वाले पुरुष से जो थोड़ी हिंसा होती है वह उसे दूषित नहीं कर सकती। उसकी वह अल्प हिंसा व्यर्थ रहती है।।९२।। इसलिए भक्ति मेें तत्पर रहने वाले कुशल मनुष्यों को जिनमंदिर आदि बनवाना चाहिए और माला, धूप, दीप आदि सबकी व्यवस्था करनी चाहिए।।९३।।

सफेद ध्वजा जिनमंदिर पर-

सितकेतुकृतच्छाया:, सहस्राकारतोरणा:।

शृंङ्गेषु पर्वतस्यामी, विराजन्ते जिनालया:।।२७६।।

कारिता हरिषेणेन, सज्जनेन महात्मना।

एतान् वत्स नमस्य, त्वं भव पूतमना: क्षणात्।।२७७।।

किन्तु सफेद पताकाएं जिन पर छाया कर रही हैं तथा जिनमें हजारों प्रकार के तोरण बने हुये हैं ऐसे ये जिनमंदिर पर्वत के शिखरों पर सुशोभित हो रहे हैं।।२७६।। ये सब मंदिर महापुरुष हरिषेण चक्रवर्ती के द्वारा बनवाये हुये हैं। हे वत्स! तू इन्हें नमस्कार कर और क्षणभर में अपने हृदय को पवित्र कर।।२७७।।

अंजना ने भगवान की पूजा की-चिरकाल तक स्तुति कर पवित्र अक्षरों से अपने मुख को सहित किया।।८९-९०।।

सचित्त पूजा निर्दोष है

-यथा विषकण: प्राप्त: सरसीं नैव दुष्यति।

जिनधर्मोद्यतस्यैवं, हिंसालेशो वृथोद्भव:।।९२।।

प्रासादादि तत: कार्यं, जिनानां भक्तितत्परै:।

माल्याधूपप्रदीपादि, सर्वं च कुशलैर्जनै:।।९३।।

जिस प्रकार विष का एक कण तालाब में पहुंचकर पूरे तालाब को दूषित नहीं कर सकता उसी प्रकार जिनधर्मानुकुल आचरण करने वाले पुरुष से जो थोड़ी हिंसा होती है वह उसे दूषित नहीं कर सकती। उसकी वह अल्प हिंसा व्यर्थ रहती है।।९२।। इसलिए भक्ति मेें तत्पर रहने वाले कुशल मनुष्यों को जिनमंदिर आदि बनवाना चाहिए और माला, धूप, दीप आदि सबकी व्यवस्था करनी चाहिए।।९३।।

सफेद ध्वजा जिनमंदिर पर-

सितकेतुकृतच्छाया:, सहस्राकारतोरणा:।

शृंङ्गेषु पर्वतस्यामी, विराजन्ते जिनालया:।।२७६।।

कारिता हरिषेणेन, सज्जनेन महात्मना।

एतान् वत्स नमस्य, त्वं भव पूतमना: क्षणात्।।२७७।।

किन्तु सफेद पताकाएं जिन पर छाया कर रही हैं तथा जिनमें हजारों प्रकार के तोरण बने हुये हैं ऐसे ये जिनमंदिर पर्वत के शिखरों पर सुशोभित हो रहे हैं।।२७६।। ये सब मंदिर महापुरुष हरिषेण चक्रवर्ती के द्वारा बनवाये हुये हैं। हे वत्स! तू इन्हें नमस्कार कर और क्षणभर में अपने हृदय को पवित्र कर।।२७७।।

अंजना ने भगवान की पूजा की-

तस्मात्साधुमिमं देवं समाश्रित्य कृतोचितम्।

मुनिपर्यंज्र्पूतायां गुहायामत्र संक्षयात्।।२८९।।

मुनिसुव्रतनाथस्य विन्यस्य प्रतियातनाम्।

अर्चयन्त्यौ सुखप्राप्त्यै स्वामोदै: कुसुमैरलम्।।२९०।।

सुखप्रसूतिमेतस्य, गर्भस्याध्यायचेतसि।

विस्मृत्य वैरहं दु:खं, समयं विंचिदास्वहे।।२९१।।

इसलिए इस उत्तम देव का यथोचित आश्रय लेकर मुनिराज की पद्मासन से पवित्र इस गुफा में श्री मुनिसुव्रत भगवान की प्रतिमा विराजमान कर सुख-प्राप्ति के लिए अत्यंत सुगंधित पूलों से उसकी पूजा करती हुई हम दोनों कुछ समय तक यहीं रहें। इस गर्भ की सुख से प्रसूति हो जाये चित्त में इसी बात का ध्यान रखें और विरह-संबंधी सब दुख भूल जावें।।२८९-२९१।।

सचित्त पूजा-

माल्यगंधप्रधूपाद्यै:, सचित्तै: कोऽर्चयेज्जिनम्।

सावद्यसंभवं वक्ति य:, स एवं प्रबोध्यते।।१४०।। 

जिनार्चानेकजन्मोत्थं, किल्विषं हंति यत्कृतम्।

सा विंचिद् यजनाचारभवं सावद्यमंगिनाम्।।१४१।।

अर्थ- कोई कोई लोग यह कहते हैं कि पुष्पमाला, धूप, दीप, जल, फल आदि सचित्त पदार्थों से भगवान की पूजा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि सचित्त पदार्थों से पूजा करने में सावद्य जन्य पाप (सचित्त के आरंभ से उत्पन्न हुआ पाप) उत्पन्न होता है। उनके लिए आचार्य समझाते हैं कि भगवान की पूजा करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं फिर क्या उसी पूजा से उसी पूजा में होने वाला आंरभ जनित वा सचित्त जन्य थोड़ा सा पाप नष्ट नहीं होगा ? अवश्य होगा।

इसका भी कारण यह है कि-

प्रेर्यन्ते यत्र वातेन, दन्तिन: पर्वतोपमा:।

तत्राल्पशक्तितेजस्सु, का कथा मशकादिषु।।१४२।।

भक्तं स्यात्प्राणनाशाय, विषं केवलमंगिनाम्।

जीवनाय मरीचादि-सदौषधिविमिश्रतम्।।१४३।।

अर्थ- जिस वायु से पर्वत के समान बड़े-बड़े हाथी उड़ जाते हैं उस वायु के सामने अत्यन्त अल्प शक्ति को धारण करने वाले डांस मच्छर क्या टिक सकते हैं ? कभी नहीं। उसी प्रकार जिस पूजा से जन्म-जन्मान्तर के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं उसी पूजा से क्या उसी पूजा के विधि-विधान में होने वाली बहुत ही थोड़ी हिंसा नष्ट नहीं हो सकती ? अवश्य होती है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। विष भक्षण करने से प्राणियों के प्राण नष्ट हो जाते हैं परन्तु वही विष यदि सोंठ, मिरच, पीपल आदि औषधियों के साथ मिलाकर दिया जाये तो उसी से अनेक रोग नष्ट होकर जीवन अवस्था प्राप्त होती है। इसी प्रकार सावद्य कर्म यदि विषय सेवन के लिए किये जांये तो वे पाप के कारण हैं ही परन्तु भगवान की पूजा के लिए बहुत ही थोड़े सावद्य कर्म पाप के कारण नहीं होते, पुण्य के ही कारण होते हैं। मंदिर बनवाना, पूजा करना, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा करना, रथोत्सव करना आदि जितने पुण्य के कारण हैं उन सबमें थोड़ा बहुत सावद्य अवश्य होता है। परन्तु वह सावद्य दोष पुण्य का ही कारण होता है। इसी प्रकार सचित्त द्रव्य से होने वाली पूजा में होने वाला सावद्य दोष पुण्य का ही कारण होता है। भगवान की पूजा केवल पुण्य उपार्जन करने के लिए, आत्मा का कल्याण करने के लिए और परम्परा से मोक्ष प्राप्त करने के लिए की जाती है, अक्षतों को शेषाक्षत कहते हैं। पूजा करने के बाद शेषाक्षतों को मस्तक पर धारण करना चाहिए।

इसी प्रकार चंदन से पूजा करने के बाद बचे हुये चंदन से तिलक लगाने में कोई दोष नहीं है प्रत्युत गुण ही है।

‘‘पुष्पस्रग्मंजरी व: फलमलघुजिनेन्द्रांघ्रिदिव्याङ्घ्रिपस्था।।२६।।

अर्थात् जिनेन्द्र भगवान के चरण कमलों पर स्थित चढ़ाए गये पुष्प तुम्हें महान फलदायक होवे।

Monday, August 29, 2022

आत्मा के उत्थान का पर्व है :दश लक्षण



जैनधर्म में भाद्र मास के शुक्लपक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक दस दिनों तक मनाया जाने वाला दशलक्षण पर्व विश्व का अद्वितीय आध्यात्मिक पर्व है । इसे पर्युषण पर्व भी कहा जाता है । इस पर्व में जैनधर्मावलम्बियों के द्वारा जिनेन्द्र प्रभु की विशेष अर्चना और भक्ति के साथ-साथ आत्मपरिष्कार के लिए तप, त्याग और संयम की विशेष साधना की जाती है । 

जैनधर्म की मान्यता है कि आत्मा की यात्रा अनादि काल से अनवरत चल रही है । इस यात्रा में आत्मा ने सूक्ष्म जीव जन्तुओं से लेकर पशु - पक्षी आदि विविध रूपों को धारण किया है । इस यात्रा में आत्मा ने अनेक बार मनुष्य जन्म भी प्राप्त किया है । सभी जन्मों में मनुष्य जन्म को श्रेष्ठ माना गया है । इस श्रेष्ठता का कारण न तो मनुष्य की शारीरिक शक्ति, सौन्दर्य एवं बुद्धि है और न ही उसे मिलने वाले विषय भोग और सुख साधन हैं । ये सभी सांसारिक शक्ति और समृद्धि तो देवों में प्रचुरता से हैं । इन सांसारिक सुख साधनों की अधिकता से जो श्रेष्ठता प्राप्त होती है वह नश्वर होती है । इसलिए देवों की श्रेष्ठता भी नश्वर है । मनुष्य जन्म सर्वश्रेष्ठ इसलिए है ,क्योंकि एकमात्र मनुष्य ही है जो शाश्वत और अविनाशी श्रेष्ठता को प्राप्त करने का अधिकारी है । इसका कारण यह है कि आत्मा की अनन्त यात्रा में मनुष्य जन्म एक ऐसे पड़ाव की तरह है जहाँ उसकी चेतना परिष्कृत होती है और स्वयं को नियन्त्रित करने की चरम शक्ति होती है । जब मनुष्य अपनी इन शक्तियों को पहचान कर स्वयं को अनुशासित कर संयम और तप की साधना करता है तो वह अपनी शाश्वत अवस्था के या तो निकट पहुँच जाता है या अपनी शाश्वत अवस्था को प्राप्त कर लेता है । 


सम्यग्दृष्टि आत्मा के द्वारा स्वयं की शाश्वत सम्पदा को प्राप्त करने का पुरुषार्थ सतत चलता रहता है । दशलक्षण पर्व या पर्युषण पर्व उस पुरुषार्थ को और अधिक बढ़ाने का अवसर प्रदान करते हैं । ये पर्व साधना पथ पर होने वाली भटकन को रोककर पुनः लक्ष्य की ओर केन्द्रित कर देते हैं । पर्व शब्द का अर्थ ही है जोड़ना । स्वयं को स्वयं के लक्ष्य से जोड़ना । लक्ष्य प्राप्त होने पर तो जुड़ने या जोड़ने का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है । वस्तुतः देखा जाए तो मुक्त होने की साधना किसी से जुड़कर नहीं हो सकती है । यह साधना तो अनादि से जुड़े हुए विकारों और वासनाओं से अलग होने की साधना है । आत्मा का कषायों और विकारों से जुड़े रहना आत्मा का विभाव है और इन कषायों और विकारों से पृथक् होना स्वभाव है ।


 जैनधर्म का यह उद्घोष है कि "वत्थु सहाओ धम्मो" अर्थात् वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है । इसलिए आत्मा का स्वभाव ही आत्मा का वास्तविक धर्म है । वास्तविक इसलिए है, क्योंकि यह शाश्वत होता है और इसकी अनुभूति स्वाश्रित और स्वाधीन है । स्वभाव का आनन्द किसी साधन पर आश्रित नहीं है । साधनों को भोगने और उनके संग्रह एवं स्वामित्व से जो सुख प्राप्त होता है वह वास्तविक सुख न होकर सुख जैसा प्रतीत होने वाला दुःख ही है । 


आत्मा में स्वाभाविक रूप से विद्यमान शाश्वत गुण ही उसके धर्म हैं । जैन शास्त्रों में उत्तम क्षमा,उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम , उत्तम तप , उत्तम त्याग , उत्तम आकिंचन्य एवं उत्तम ब्रह्मचर्य को आत्मा का धर्म कहा है । इन्हें धर्म इसलिए कहा है, क्योंकि ये आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं । आत्मा में क्षमा आदि की तरह अनन्त स्वाभाविक गुण विद्यमान हैं , परन्तु ये दशधर्म आत्मा के प्रमुख गुण हैं । इन सभी स्वाभाविक गुणों को न तो आत्मा में उत्पन्न किया जा सकता है और न ही इन गुणों को नष्ट किया जा सकता है । मोह, मिथ्यात्व और अज्ञान के कारण इन गुणों पर एक आवरण पड़ जाता है । दशलक्षण पर्व के दश दिनों में इन आवरणों को हटाकर क्षमा आदि शाश्वत गुणों के प्रकटीकरण के लिए तप और संयम की साधना की जाती है । पर्व की साधना का मूल उद्देश्य आत्मा को विभावों या विकारों से हटाकर स्वभाव में केन्द्रित करने की है । 


उत्तम क्षमा,मार्दव,आर्जव एवं शौच गुणों के विभाव या विरोधी क्रोध,मान,माया और लोभ हैं । ये चारों ही विभाव आत्मा के विरोधी हैं,विकार हैं,स्वभाव के प्रकटीकरण में बाधक हैं । ये आत्मा के लिए कष्टकारी हैं इसलिए जैनशास्त्रों में इन्हें कषाय कहा गया है । क्रोध को छोड़कर ही आत्मा में क्षमा धर्म प्रकट हो सकता है । घृणा,बैर और द्वेष आदि विकृत मनोभाव भी क्रोध के ही रूप हैं । मान या अहंकार को छोड़कर आत्मा में मृदुता या कोमलता प्रकट करना ही मार्दव धर्म है । माया या छल कपट का विसर्जन करके आत्मा का सरल होना ही आर्जव धर्म है । लोभ लालच की मलिनता को हटाकर आत्मा को शुचि या पवित्र बनाना ही शौच धर्म है । असत्य वाणी, विचार और व्यवहार को छोड़ना ही सत्यधर्म है ।



इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण प्राप्त करना ही उत्तम संयम धर्म है । संयम के बिना व्रत नियमों की साधना भी संभव नहीं है । संयम के मूल में अहिंसा की पवित्र भावना है । पाँच इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण यदि इन्द्रिय संयम है तो सभी सूक्ष्म और स्थूल प्राणियों की रक्षा करना प्राणि-संयम है । इन्द्रिय संयम और प्राणि-संयम दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं । इन्द्रियजय के बिना हिंसा से नहीं बचा जा सकता है और अहिंसा की पवित्र भावना के बिना इन्द्रियजय भी निरर्थक है । संयम की साधना धीरे-धीरे तप की ओर ले जाती है । 


अपनी इच्छाओं को छोड़कर आत्मोन्मुखी होना उत्तम तप है । तप करने का उद्देश्य यदि सांसारिक सिद्धियां और लौकिक मनोकामनाओं की पूर्ति करना है तो ऐसा अज्ञानतापूर्ण तप व्यर्थ है । तप का मूल उद्देश्य अनादिकाल से कर्मबंधन में बद्ध आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करना है । इसे जैनशास्त्रों में कर्मनिर्जरा कहा है । कर्मनिर्जरा के लिए ही व्रत,उपवास,ध्यान एवं स्वाध्याय आदि तप किए जाते हैं । इन सभी तप क्रियाओं को शरीर की शक्ति और संहनन के अनुसार करना चाहिए । तपस्वी को आकुल-व्याकुल परिणाम छोड़ना चाहिए और सांसारिक कार्यों से रुचि हटाकर आत्मा और परमात्मा के ध्यान में चित्त लगाना चाहिए । तप के लिए भेदविज्ञान का ज्ञान और अभ्यास आवश्यक है । आत्मा और शरीर साथ रहते हुए भी भिन्न- भिन्न स्वभाव वाले द्रव्य हैं । शरीर से मैं भिन्न हूँ । मुझे शरीर से राग नहीं करना चाहिए - यही भावना भेदविज्ञान है ।


आत्मकल्याण के लिए तप के साथ-साथ त्याग धर्म का पालन करना भी अनिवार्य है । गृहस्थों के लिए दान क्रिया ही त्याग धर्म है । आत्मकल्याण के लिए उत्तम पात्रों को आहार,औषधि,शास्त्र आदि विधिपूर्वक दान देना त्यागधर्म है । गृहत्यागी श्रमणों को उत्तम पात्र कहा गया है । मोक्षमार्ग पर चलने वाले अन्य साधक भी पात्र हैं । दान देने वाले दाता में पात्र के प्रति श्रद्धा और विनय होनी चाहिए । दाता को संतोषी और निरभिमानी होना चाहिए । वस्तुतः पर पदार्थों के प्रति राग-द्वेष को छोड़ना ही उत्तम त्यागधर्म है । त्याग धर्म में पर पदार्थों और उनके प्रति राग से आंशिक निवृत्ति होती है । वस्तुओं का दान करने के लिए पहले वस्तुओं को ग्रहण करना पड़ता है ।


 जब साधक समस्त प्रकार के धन सम्पत्ति आदि बाह्य परिग्रह और लोभ, मोह आदि अन्तरंग परिग्रह से मुक्त होने की साधना करता है तब उसकी आत्मा में उत्तम आकिञ्चन्य धर्म प्रकट होता है । आत्म गुणों के अतिरिक्त अन्य सभी पर पदार्थों और उनके रागभाव से शून्य होना ही आकिञ्चन्य धर्म है ।


 समस्त परिग्रह के त्याग से जो रिक्तता या खालीपन आ जाता है वह दुःखद नहीं है । पर पदार्थों से राग समाप्त होने पर आत्मा का उपयोग शुद्ध होकर स्वयं में लीन होकर अक्षय और असीम आनन्द की अनुभूति करने लगता है । यही उत्तम ब्रह्मचर्य है । ब्रह्म का अर्थ आत्मा है और चर्य का अर्थ लीनता या विचरण करना है । स्वयं में स्वयं की लीनता से प्राप्त होने वाला सुख अवर्णनीय और अकल्पनीय है । इसके आगे पांँच इन्द्रियों के द्वारा काम वासना और भोगों से मिलने वाला सुख तुच्छ है ।स्त्री पुरुषों में परस्पर दैहिक सम्बन्धों से उत्पन्न सुख क्षणिक और पापजन्य होने के कारण अब्रह्म है । इसलिए साधक ब्रह्मचारी की दृष्टि में पवित्रता रहती है । ब्रह्मचर्य की साधना के लिए स्त्रियों के प्रति विकार भाव छोड़कर उनके प्रति माता बहिन के समान दृष्टि रखना आवश्यक है । 


क्षमा आदि गुण तब उत्तम अवस्था को प्राप्त होते हैं जब कषायों से रहित होकर इन्हें आत्मा में अन्तरंग से प्रकट किया जाता है । यदि लोभ और स्वार्थ की पूर्ति के लिए कोई क्षमा धारण करता है तो वह मात्र कषाय परिवर्तन करता है । वह अपने क्रोध को लोभ में बदल देता है । कषाय परिवर्तन का नाम धर्म नहीं है । धर्म तो कषाय के उन्मूलन से प्रकट होता है । आत्मपरिणामों में विशुद्धि और क्रियाचरण में पवित्रता से आत्मोत्थान होता है । यही उत्तम क्षमा आदि दशधर्मों के परिपालन का ध्येय है ।

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