Friday, August 14, 2020

पंचाग के पाँच अंगों का विस्तृत वर्णन :सरल सुबोध शैली में

 *सरल शैली में पंचांग के पांच अंगों का विस्तृत वर्णन*


✍️©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

निदेशक-

जैन विद्या अनुसंधान केंद्र अविनाश कॉलोनी दमोह म.प्र.


पंचाग के अंग कौन कौन से हैं।

 पञ्चाङ्ग शब्द से स्वयं ज्ञात हो रहा है जिसमें पाँच अंग निहित हों या पाँच हों जिसके वह पञ्चाङ्ग है ।


अब प्रश्न ये उठता है कि वे पाँच अंग कौन कौन से हैं


ज्योतिष शास्त्रों में वे पाँच अंग बताये गए हैं-


तिथि  र्वारं च नक्षत्रं योगः  करणमेव च ।

पञ्चाङ्गस्य फलं श्रुत्वा,कार्याणां सर्वसिद्धयेत् ।।

तिथि, वार(दिवस), नक्षत्र, योग,और करण ये पंचाग के पाँच अंग हैं। जो इन पंचाङ्गों के फल का श्रवण करता है ,जानता है उसके समस्त कार्यों की सर्व सिद्धि होती है ।


तिथि किसे कहते हैं ?


तिथि-पञ्चाङ्ग का प्रमुख और प्रथम अंग तिथि है । जो चंद्रमा की कलाओं पर आधारित होती है । जिससे मास(माह) का निर्माण एवं विभाजन होता है ।

चंद्रमा की एक कला को तिथि कहा जाता है  या चन्द्रमा की एक कला बराबर एक तिथि होती है । सूर्य और चंद्रमा में जब 12 अंश का अंतर होता है तब एक तिथि का निर्माण होता है ।


पक्ष का निर्माण एवं विभाजन


सूर्य और चन्द्र के अंशो के अंतर से ही  मास को विभाजित करने वाले पक्ष का निर्माण होता है।

तिथि एक माह को दो पक्षों में विभाजित करती है । कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष ।


कृष्ण पक्ष


जब सूर्य और चंद्रमा के अंशों में 360 अंश का अंतर होता है तब उससे कृष्ण पक्ष का निर्माण होता है । इस पक्ष में 15 अंश होते हैं अर्थात 15 तिथियां होती हैं । कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं घटती हैं । इस पक्ष की 15 वीं तिथि को अमावश्या कहते हैं । सूर्य ग्रहण भी कृष्ण पक्ष में अमावश्या तिथि को होता है ।


शुक्ल पक्ष-


जब सूर्य और चंद्रमा के अंशों में 180 अंश का अंतर होता है तब उससे शुक्ल पक्ष का निर्माण होता है । इस पक्ष में 15 अंश होते हैं अर्थात 15 तिथियां होती हैं । शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं बढ़ती हैं । इस पक्ष की 15 वीं तिथि को   पूर्णिमा कहते हैं । चन्द्र ग्रहण भी शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि को होता है ।


तिथियों के नाम


1.प्रतिपदा 

2.द्वितीया 

3.तृतीया 

4.चतुर्थी

5.पंचमी

6.षष्ठी 

7.सप्तमी 

8.अष्टमी

9.नवमी

10.दशमी

11.एकादशी

12.द्वादशी

13.त्रयोदशी

14.चतुर्दशी

15.अमावश्या(कृष्ण पक्ष)

15. पूर्णिमा(शुक्ल पक्ष)



वार किसे कहते हैं?

भारतीय ज्योतिष में सूर्योदय से अगले सूर्योदय पर्यन्त काल को वार कहते हैं । 

सूर्योदयात् आरम्भ सूर्योदय पर्यन्तं य:काल:स वारो ज्ञेयः ।

जैन पंचांग में नाक्षत्रमान के हिसाब से वार को रखा गया है ।


वारों की संख्या एवं संज्ञा


 ज्योतिष में वार की संख्या 7 बताई गई है । वारों का क्रम ग्रहों के अनुसार ना होकर उनके स्वामियों के अनुसार है । अन्यथा राहु और केतु ग्रह के भी वार जोडें वारों की संख्या 9 होती । सात वारों का क्रम निम्न है -


रवि: सोमस्तथा भौमौ बुधौ  गीष्पतिरेव च ।

शुक्र:शनैश्चरश्च एव वारा:सप्त प्रकीर्तिताः ।


जिस दिन का स्वामी सूर्य होता है, उसे रविवार या सूर्यवार कहतें । सभी वारो में वारपति के अनुसार ही नामकरण होगा ।


वार संज्ञाएँ

ज्योतिष शास्त्रों में तिथि, नक्षत्र ,करण एवं योगों की तरह वारों को भी विविध संज्ञा से सज्ञापित किया है । जिनसे उनके कार्यों का निर्धारण एवं   शुभ -अशुभ कार्य बोध सहज  ही हो जाता है ।  

वार संज्ञाएँ निम्न हैं-


स्थिरः सूर्यश्चरश्चन्द्रो भौमश्चोग्रो बुध: समः ।

लघुर्जीवो मृदु: शुक्र:शनिस्तीक्ष्ण: समीरित: ।।


रविवार स्थिर  संज्ञक है इसलिए स्थिर कार्य करना चाहिए, सोमवार चरसंज्ञक  है, भौमवार उग्र संज्ञक है, बुधवार सम संज्ञक है , बृहस्पतिवार लघु संज्ञक है,  शुक्रवार मृदु संज्ञक है एवं शनिवार तीक्ष्ण संज्ञक है । अतः संज्ञाओं के अनुसार ही कार्य करें ।


नक्षत्र किसे कहते हैं ?


नक्षत्र -

सूर्य जिस मार्ग में भ्रमण करता है ,उसे क्रांतिवृत्त या मेरुछिन्न- समानान्तरप्रोतवृत्त कहते हैं । क्रांतिवृत्त के दोनों तरफ 180 अंश का कटिबंध प्रदेश होता है, उसे राशिचक्र कहते हैं ।

ज्योतिष के अनुसार  कई ताराओं के समूह को नक्षत्र कहते हैं। आकाश में इन नक्षत्रों का पंक्तिचक्र रहता है जिसे भचक्र या राशिचक्र कहा जाता है ,जो 360 अंश का होता है इसके 13 अंश को तय करने में चंद्रमा को जितना  समय लगता है वह नक्षत्र कहलाता है । अर्थात 13 अंश का एक नक्षत्र होता है ।


नक्षत्रों की संख्या


 जैन ज्योतिष और वैदिक ज्योतिष  में  नक्षत्र की संख्या को लेकर थोड़ा सा मतान्तर है । जैन ज्योतिष शास्त्रों में अभिजित नक्षत्र को मान्यता प्रदान दी गई  जिससे नक्षत्रों की संख्या 28 बताई गई है । जबकि वैदिक ज्योतिष ग्रन्थों में नक्षत्रों की संख्या 27 बताई गई है ।

ज्योतिर्विदों का मत है कि उत्तराषाढ़ की अंतिम 15 घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की 4 घटी के काल प्रमाण 28 वां नक्षत्र अभिजित बनता है । जिसे जैन आगम ग्रंथ धवला जी की पुस्तक 4 में पृष्ठ 318 पर धवलाकर ने  अहोरात्र के 30 मुहूर्तो के प्रकरण में दिवस सम्बन्धी रौद्र से भाग्य पर्यन्त 15 मुहूर्तो में  8वें स्थान पर अभिजित मुहूर्त का वर्णन किया है ।


 नक्षत्रों के नाम

 1.अश्विनी,  2.भरणी,  

3.कृतिका 4.रोहिणी 

5.मृगशिरा , 6.आर्द्रा, 

7.पुनर्वसु, 8.पुष्य,

 9.आश्लेषा,  10.मघा, 

11.पूर्वाफाल्गुनी 12.उत्तराफाल्गुनी, 

13.हस्त, 14.चित्रा, 

15.स्वाति, 16विशाखा,

 17.अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 

19.मूल, 20.पूर्वाषाढ़, 

21.उत्तराषाढ़,( अभिजित),

22.श्रवण, 23.धनिष्ठा, 

24.शतभिषा, 25.पूर्वाभाद्रपद, 

26.उत्तराभाद्रपद, 27रेवती ।


नक्षत्रों की उपादेयता


 नक्षत्रों की उपादेयता एवं उपयोगिता ज्योतिष में महत्वपूर्ण है । नक्षत्रों के आधार से मुहूर्त निर्माण, रोग चिकित्सा, जन्म कुंडली निर्माण,  वर -बधु के गुण मिलान , चोरी गई वस्तु का ज्ञान, जल वृष्टि, मेघ गर्भ, यात्रा आदि अनेक शुभ अशुभ कार्यों का  ज्ञान  एवं विचार  में सहायक होता है ।


 नक्षत्रों की संज्ञाएँ


नक्षत्रों की संज्ञाएं निम्नलिखित हैं-


ध्रुवंचरोग्र मिश्रम् , क्षिप्रं तीक्ष्णमृदुलिंगा: ।

उर्ध्वादि चौरपंचको, एता: नक्षत्रा :संज्ञका: ।


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 योग किसे कहते हैं ?

 योग-

जो सूर्य और चंद्रमा के अंशों के योग से उत्पन्न होता है उसे योग कहते हैं ।


विशेषता


प्राचीन जैन ग्रंथों में मुहूर्तादि के लिए योग को प्रधान अंग माना गया है । पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । 

जैन पंचांग निर्माण विधि में इनकी संख्या 27 बताई गई है । ये शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के होते हैं ।

योग निकालने के लिए दैनिक स्पष्ट सूर्य एवं चंद्र स्पष्ट के योग की कला बनाकर उसमें 800 का भाग देने से लब्धिगत योग होता है । फिर गत और भोग्यकला को 60 से गुणा कर रवि-चंद्र की गति कला योग से भाग देने से गत और भोग्य घटियां आती हैं ।


27 योगों के नाम

1.विष्कुम्भ 

2.प्रीति

3.आयुष्यमान

4.सौभाग्य

5.शोभन

6.अतिगंड

7.सुकर्मा

8.धृति

9.शूल

10.गण्ड 

11.वृद्धि

12.ध्रुव

13.व्याघात

14.हर्षण

15.वज्र

16सिद्धि.

17.व्यतिपात

18.वरियान

19.परिध 

20.शिव

21.सिद्ध

22.साध्य

23.शुभ

24.शुक्ल

25.ब्रह्म

26.ऐंद्र

27.वैधृति


करण किसे कहते हैं ?

तिथि के  भाग को करण कहते हैं । गत तिथि को 2 से गुणा कर 7 का भाग देने से जो शेष रहे उसी के हिसाब से  करण होता है ।



करण की संख्या


जैनाचार्य श्रीधर ने ''ज्योतिर्ज्ञानविधि'' नामक ग्रंथ में कारणों की संख्या 11 बताई है । जो निम्न हैं-



वव-वालव-कौलव तैत्तिलगरजा वणिजविष्टिचर करणा: ।

शकुनि चतुष्पडनागा: किंस्तुघ्न श्चेत्यमी स्थिरा:करणा:।।


ऊपर के 7 करण चर एवं 4 करण स्थिर होते हैं ।

Tuesday, August 11, 2020

मूल नक्षत्रों का जन्म कितना शुभ कितना अशुभ

 *मूल नक्षत्रों कस जन्म कितना शुभ कितना अशुभ होता*



✍️©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य


मूल नक्षत्र कौन कौन से हैं ।


ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्रों की संख्या 27 है । उनमें से अश्विनी, मघा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूल एवं रेवती नक्षत्र ये 6 नक्षत्र मूल संज्ञक नक्षत्र हैं ।


मूल नक्षत्रों में जन्मी संतान  की शुभता-अशुभता का ज्ञान नक्षत्रों के चरणों के क्रम से होता है । उससे ही फल का ज्ञान होता है ।


*मूल कितने दिन के लगते हैं*


अश्विनी नक्षत्र के मूल 12 दिन, 

  मघा नक्षत्र के मूल - 14 दिन

रेवती नक्षत्र के मूल-   8 दिन

आश्लेषा नक्षत्र के मूल -28 दिन, 

  ज्येष्ठा नक्षत्र के मूल - 28 दिन

  मूल  नक्षत्र के मूल-   28 दिन


मूल का नक्षत्र  एवं चरण  फल


 अश्विनी नक्षत्र का फल

प्रथम चरण -   पिता को कष्ट

द्वितीय चरण-  सुख ऐश्वर्य

तृतीय चरण - श्रेष्ठ पद

चतुर्थ चरण- राज सम्मान


मघा नक्षत्र का फल

प्रथम चरण -   पिता को कष्ट

द्वितीय चरण-  माता को कष्ट

तृतीय चरण -  धन का नाश

चतुर्थ चरण-  शुभ(शान्ति उपरांत)


आश्लेषा नक्षत्र का फल

प्रथम चरण -   शुभ (शान्ति के उपरांत)

द्वितीय चरण-  धन नाश

तृतीय चरण - माता की हानि

चतुर्थ चरण- पिता की हानि


ज्येष्ठा नक्षत्र का फल

प्रथम चरण -   अग्रज को कष्ट

द्वितीय चरण-  अनुज को कष्ट

तृतीय चरण - माता की हानि

चतुर्थ चरण-  स्वयं की हानि


मूल नक्षत्र का फल

प्रथम चरण -   पिता नाशक

द्वितीय चरण-  माता नाशक

तृतीय चरण - धन हानि

चतुर्थ चरण- शांति उपरांत शुभ


रेवती  नक्षत्र का फल

प्रथम चरण -   राज्य सम्मान

द्वितीय चरण-  भाग्य पर

तृतीय चरण - धन सुख की प्राप्ति

चतुर्थ चरण- अनेक कष्ट

Sunday, August 9, 2020

सुभाषितरत्न संदोह नामक नीति शास्त्र का संक्षिप्त परिचय*

 *आचार्य अमित गति एवं  सुभाषितरत्न संदोह नामक नीति शास्त्र का संक्षिप्त परिचय*


✍️© डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

       जिला परामर्शदाता CMCLDP दमोह


आचार्य अमितगति एक समर्थ ग्रंथकार थे । आपका संस्कृत भाषा पर असाधारण अधिकार आपकी  उदबोधन प्रधान रचनाओं की प्रांजल रचना शैली प्रसादगुण युक्त सरल सरस् काव्यकौमुदी रसास्वादन सहज ही  सहृदय को आल्हादित करता  है ।  आप आचार्य माधवसेन जी के शिष्य थे । सभाषित रत्न संदोह की प्रशस्ति  से उसकी रचना  संवत 1050 में मुंजनृपतौ अर्थात राजा मुंज के शासनकाल में हुई थी ।


*सुभाषितरत्न संदोह*


पृथ्वी पर तीन रत्न ही रत्न हैं - जलं अन्नं सुभाषितं । उन्हीं तीन रत्नों में से सुभाषितरत्न सर्व श्रेष्ठ रत्न है । अतः संस्कृत साहित्य में सुभाषितों की प्रचुरता है। 

आचार्य अमितगति की सुभाषित रत्न संदोह नामक कृति ने जैन संस्कृत के सुभाषित रत्न  भांडागार की  श्री  वृद्धि की है ।  यह ग्रन्थ 32 प्रकरणों में विभक्त 922 पद्यों में सृजित 339 पृष्ठों  में  श्री जीवराज जैन ग्रंथमाला सोलापुर से प्रकाशित है ।  यह ग्रंथ उद्बोधन प्रधान है जिसमें मनुष्य को असत्प्रवृत्तियों  को त्यागकर सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रेरणा प्रदान की गई है ।


*सभाषित रत्न संदोह के 32 प्रकरण*


1. सांसारिक विषय विचार- 20 पद्य

2. कोप निषेध    -               20 पद्य

3. मान माया निषेध-           20 पद्य 

4. लोभ निवारण -               20 पद्य

5.इन्द्रीयराग निषेध-             20 पद्य

6.स्त्री गुण-दोष विचार -        20पद्य

7. मिथ्यात्व-सम्यक्त्वविचार -20 पद्य

8.ज्ञान निरूपण-                 30 पद्य 9.चारित्र निरूपण  -           30 पद्य 10.जन्म निरूपण-           26 पद्य 11.जरा निरूपण - 24 पद्य 

12.मरण निरूपण- 20 पद्य

13.अनित्यता निरूपण-24 पद्य 

14. दैव निरूपण- 32 पद्य

15.जठर निरूपण- 20 पद्य

16.जीव संबोधन -24 पद्य

 17. दुर्जन निरूपण -24 पद्य

18. सूजन निरूपण-18पद्य 

19.दान निरूपण -19 पद्य

20.मद्य निषेध-25 पद्य .

21.मांस निषेध- 26 पद्य 

22.मधु निषेध -22 पद्य

 23. काम निषेध- 25 पद्य 

24. वेश्यासंग निषेध- 25पद्य

 25.द्यूत निषेध -20 पद्य

26.आप्त विचार -22पद्य

27.गुरु स्वरूप  -26पद्य

28.धर्म निरूपण- 22पद्य

29.शोक निरूपण-28 पद्य

30.शौच निरूपण-22पद्य

31.श्रावक धर्म कथन-117 पद्य

32.तपश्चरण निरूपण-  36पद्य


*विशेष*

 ग्रन्थकार प्रशस्ति-8 पद्य इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ में 922 पद्य हैं।  जिनमें उपरोक्त 32 प्रकरणों में  सुललित प्रासाद गुण युक्त पद्यों में विविध छन्दों का प्रयोग ,वर्णन शैली कल्पना शक्ति और कवित्व शक्ति आपके संस्कृत भाषा के असाधारण अधिकार को स्वाभाविक प्रकट ही नहीं करती अपितु  विषयानुकूल वर्णन का चित्र पाठक के चित्त पर अंकित भ्य करता है ।

Thursday, July 2, 2020

सामाजिक पतन के सम सामयिक कारण:एक चिंतन

सामाजिक पतन के समसामयिक कारण: एक चिंतन

                         लेखक-डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य
                                  परामर्शदाताCMCLDP-. दमोह
                                  M
ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट सतना

 मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसका विकास समाज में रहकर ही होता है । सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक उन्नति के लिए वह समाज में आपसी  संबंधों को व्यक्ति, परिवार, समूह और समुदाय से अपनी एवं परिवार की मनोसामाजिक, आर्थिक,सामाजिक ,सांस्कृतिक, धार्मिक आदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव व्यवहार के द्वारा मानवीय सम्बन्धों को स्थापित कर उसमें संतुष्टि का अनुभव करता है। यही वास्तविक उन्नति है जो समाज को सामाजिक पतन होने से बचाती है ।


 समाज एक वृक्ष की भांति होता है जिसकी सभी शाखाएं  समान रूप से वृद्धि को प्राप्त होती हैं । समुचित विकास जिसका मूल उद्देश्य होता है परंतु यह तभी सम्भव है जब उस वृक्ष का यथायोग्य ध्यान रखा जाए अन्यथा वह वृक्ष अपनी ही शाखाओं -प्रशाखाओं में उलझकर स्वयं का अस्तित्व समाप्त कर लेता है ।

 आज वर्तमान में हम सभी यही देख रहे हैं कि -हम स्वयं का समुचित विकास तो चाहते हैं परंतु समाज का समुचित विकास नहीं । समाज के समुचित विकास को छोड़कर स्वयं के विकास में संलग्न हो गए हैं । हम वृक्ष की एक शाखा को सिंचित कर रहे हैं उसके जड़ मूल को नहीं। जो हमारे सामाजिक पतन में निमित्त बन रहा है ।

 इस लेख के माध्यम से मैंने अभी तक सामाजिक क्षेत्र में रहकर जो सामाजिक अनुभव प्राप्त किये उन्हें आपके समक्ष प्रत्यर्पित  करने का प्रयास कर रहा हूँ। जिन समसामयिक कारणों से सामाजिक पतन हो रहा है उनको बताने का उपक्रम कर रहा हूँ।

 सामाजिक पतन के कारण
1.स्वयं की श्रेष्ठता
2.वैयक्तिक प्रतिस्पर्धा
3.संघर्ष
4.सामाजिक अनियंत्रण
5.असहयोग
6.बहु-संस्थावाद
7.जातिवाद
8.परिवारवाद
 9.हठ धर्मिता
10.चरित्र हीन संचालकत्व

 1.स्वयं की श्रेष्ठता-आज समाज के पतन का  मुख्य कारण सर्व समुदाय अपने आप को एक दूसरे को श्रेष्ठ प्रमाणित करने में लगा हुआ है ।  ज्ञान, पद, परिवार, जीवन शैली आदि अनेक प्रकार के  अहंकार को जन्म देता है और सामाजिक पतन में प्रबल कारण बनता है ।

 2.  वैयक्तिक प्रतिस्पर्धा- सामाजिक दृष्टि से प्रतिस्पर्धा एक असहयोगी अथवा व्यक्तियों और समूहों, संस्थाओं को एक दूसरे से अलग -थलग करने की सामाजिक प्रकिया है । प्रतिस्पर्था अवैयक्तिक होना चाहिए जो ईष्या में कारण ना बने । सीमित वस्तु और अधिकारों को प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से आगे निकल जाने किस प्रयत्न होता है। जिसमें द्वेष-ईष्या ,प्रतिशोध की भावना उत्पन्न होती हैं।जो समाज का नैतिक पतन कराती है

 3.संघर्ष- स्वयं की श्रेष्ठता, वैयक्तिक स्पर्धा से भी बढ़कर सामाजिक पतन करने का साक्षात कारण एवं समाज की असहयोगी प्रक्रिया का एक चर्म रूप है संघर्ष । इस प्रक्रिया में स्वयं के हित लाभ के लिये सामाजिक दबाव,बल प्रयोग अथवा उत्पीड़न के द्वारा किसी सामाजिक संस्था, समूहों, व्यक्ति के अधिकारों का हनन अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हिंसात्मक प्रयोग डराकर, धमकाकर,  किया जाता है। आज वर्तमान में हम इनसे भली भांति परिचित हैं।

 4.सामाजिक अनियंत्रण-सभ्य समाज का निर्माण सामाजिक संबंधों तथा सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था से होता है ।दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं । सामाजिक अनियंत्रण के कारण आज समाज में व्यक्ति तथा समूह अपनी शक्ति के द्वारा दूसरे पर अधिकार करने के लिए  एक-दूसरे से सतत संघर्ष में संलग्न हैं । व्यक्ति के व्यवहारों को नियंत्रण करने के लिए धार्मिक विश्वासों की अहम भूमिका है । पर धर्म के जानकार उनकी अज्ञानता का लाभ उठाकर अपने कार्यो को करने में लिप्त हैं । वे ही संस्था के नियम बनाते हैं वे ही स्वयं उन्हें तोड़ते हैं । है ना दोहरा चरित्र

 5.असहयोग- अप्रत्यक्ष विरोध का नाम असहयोग है जो अनिश्चय की दशा में रहता है । जब हम किसी व्यक्ति ,समूह,संस्था विशेष को संदेह की दृष्टि से देखने लगे जाते हैं  तब उसके प्रति अप्रत्यक्ष विरोध असहयोग की भावना पैदा होती है । जो समाज के पतन में कारण बनता है ।

 6.बहु-संस्थावाद -आज हर समाज में संस्थावाद का बोल-वाला है। जो अपनी अपनी संस्थाओ के विकास में लगे हैं जिस कारण से वे अन्य संस्थाओं एवं उनके सदस्यों को अपना प्रतिद्वन्दी भी समझ कर उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं। । निजी लाभ के कारण आरोप-प्रत्यारोपों का खेल खेला जाने लगा है । जिस कारण से समाज का पतन होने में यह भी एक कारण उभर कर सामने आया है।

 7.जातिवाद- हम भले ही अपने आपको सभ्य कहने लगे गए हों पर आज भी समाज से जातिवाद का अभिकरण आज भी अस्तित्व में है। मैंने समाज अच्छे से अच्छे धर्मोपदेशकों जो गृह त्याग करके समाज को अपना निर्देशक बतलाते हैं उनके द्वारा ही समाज में ऊंच -नीच का जातिवाद वाला जहर भितर घाती तरीके से फेलाते हुए देखा है । जो सबके सामने मंच,पर माइक पर हमें राग-द्वेष त्याग का उपदेश देते हैं वे ही उसको नहीं छोड़ पाये ।

 8.परिवारवाद-आज समाज के पतन का एक कारण परिवार वाद भी है।  जिस कारण से सामाजिक संस्थाओं ,ट्रस्ट, समितियों में पीढ़ी दर पीढ़ी स्वयं के परिवार के सदस्यों का मनोनयन, सामाजिक दबाव से चयन एवं साम-दाम-दंड भेदन प्रतिचयन एक आप बात और परंपरा सी हो गई है । जिस कारण से समाज में शक्ति का वितरण सामाजिक न्याय के अनुसार नहीं हो पाता है और पारदर्शीता समाप्ति की ओर चली गई है जिससे सामाजिक पतन होना सुनिश्चित है ।

 9.हठ धर्मिता- समाज में स्वयं को स्वंयभू ,संप्रभु ,स्वयं को सर्वोपरि ज्ञानी, गुरु भक्त, प्रभु भक्त मानने वालों की कमी नहीं रही है  और उन्हें मान्यता देने वाले अल्पज्ञानी, भावुक भक्तों की की भी कमी नहीं रही है ।  आयोजनों की सफलता, गुरू के नाम पर स्वयं की उदरपूर्ति उद्देश्यपूर्ति आदि अनेक प्रकल्पों की पूर्णता के कारण उनमें हठधर्मिता का विकास हुआ है । जो समाज एवं स्वयं के लिए घातक सिद्ध होता है । इसी हठ धर्मिता के कारण वे मनमाने तरीके से जनाधार को जनादेश में बदलने में सफल होकर स्वयं के मत की स्थापना, स्वयं की पूजा कराने में सफल हो रहें हैं जो धर्म देश और समाज के पतन का कारण है ।

 10.चरित्रहीन संचालकत्व- छिद्रान्वेषी ,चरित्रहीन, छली कपटी, दोषी लोगों के हाथ में समाज का संचालन समाज के पतन का कारण है । जिन लोगों ने शासन-प्रशासन,सामाजिक संस्थाओं के धन, सामग्री का उपयोग स्वयं के लिए किया ,गबन किया , भ्रस्टाचार किया आज उन लोगों के हाथों में धार्मिकता का दिखावा करते हुए समाज का संचालन करने का भार दिया जाना । उन्हें हर बार अनदेखा करना समाज के पतन का समसामयिक कारण है ।

इसके अतिरिक्त भी कई कारण हैं जो समाज का पतन करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं । पर उपरोक्त कारणों में अंतर्भूत हो गए हैं ।
मैं समाज से कहना चाहता हूं जिनका दोहरा चरित्र और चरित्र है उन्हें संस्था के पदों से स्वयं निवृत्त हो जाना चाहिए या समाज को उनको तत्काल प्रभाव से  संस्थाओं से पृथक कर देना चाहिये जो समाज हित में रहेगा ।

Friday, June 26, 2020

आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का शैक्षणिक दृष्टिकोण

*दिगम्बराचार्य 108 श्री विद्यासागर महामुनिराज जी का शैक्षिक दृष्टिकोण*

✍️ ©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

 उपलक्ष्य  -53 वे दीक्षादिवस पर
 दिनांक 25/06/2020    आषाढ शुक्ल पंचमी

 संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज जी का व्यक्तित्व अपार वारिधि की राशि सम अनंत,विराट, विशाल ,अनुपमेय ,अतुलनीय ,अकथनीय ,गंभीर एवं अवर्णनीय है ,फिर भी केवल आत्म संतुष्टि के लिए उनके व्यापक शैक्षिक दृष्टिकोण को दृष्टि में रखकर उनके व्यक्तित्व एवं व्यापक चिंतन के द्वारा आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं । कहा भी गया है - अचिंत्यो हि महामना प्रभावः

शिक्षा का अर्थ
*शिक्षा की उत्पत्ति संस्कृत की शिक्ष धातु से आ प्रत्यय लगाने से हुई है ,जिसका अर्थ है सीखना और सिखाना ।*

शिक्षा -विद्योपादने = शिर्क्षेजिज्ञासायाम

*शिक्षा नाम अभ्यासः- शिक्षा कस नाम अभ्यास है ।*

 बीसवीं शताब्दी के भारतीय  दिगम्बर शिक्षाचार्य श्री विद्यासागर जी यतिराज जी ने  शिक्षा को सीखने -सीखने की प्रक्रिया माना है,जो मानव जीवन के किसी विशिष्ट स्तर तक सीमित नहीं  रहती अपितु सतत प्रवर्तमान रहती है ।
[
उनका मानना है कि--
*शिक्षा एक ऐसी सामाजिक एवं गतिशील प्रकिया है जो व्यक्ति के जन्मजात गुणों का विकास करके अर्जित अनुभवों एवं सीखने-सिखाते उसके व्यक्तित्व को इतना निखरती है जिससे वह उम्र के अनुसार सामाजिक-आध्यात्मिक वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके और कर्तव्य  एवं आचार-विचार-व्यवहार में कल्याणकारी परिवर्तन हो सके ।*

शिक्षा वह है जो मृत्यु -पर्यंत सहायक बनकर मृत्यु के बाद भी आत्मोत्कर्ष में निमित्त बने ।
कहा भी गया है
*सा विद्या या विमुक्तये -विद्या वह है जो मुक्ति दिलाये ।*

आचार्य श्री ने शिक्षा को सत्यान्वेषण के साथ चरित्र और चारित्र को चरितार्थ करने वाली माना है ।जो व्यक्ति का नैतिक उत्थान कर सके ।

*आचार्य श्री के निम्न शैक्षणिक दृष्टिकोण -*

मानवीय गुणों के विकास का दृष्टिकोण
सामूहिक नैतिक उत्थान का दृष्टिकोण
अंतर्निहित योग्यता के विकास का दृष्टिकोण
सम्यक व्यक्तित्व के उचित विकास का दृष्टिकोण
राष्ट्रीय एकता की भावना का दृष्टिकोण
सार्वजनिक एवं सामाजिक हित का दृष्टिकोण
शिक्षा का धार्मिक दृष्टिकोण
शिक्षा का साहित्यिक दृष्टिकोण आदि

*मानवीय गुणों के विकास का दृष्टिकोण*
मानवीय गुणों के विकास का दृष्टिकोण -  आचार्य श्री की शिक्षा की प्रत्यक्ष विधि से -मानव में मानवीय गुणों- आपसी प्रेम, सद्भावना, सहकारिता,दया आदि गुणों का विकास होता है ।  जिससे घृणा,द्वेष, क्रोध -कुंठा आदि से छुटकारा मिलता है । इसे सफल करने के लिए उन्होंने सागर और जबलपुर में ब्राह्मी-विद्या आश्रम खोला, जीव दया के लिए दयोदय संघ , जीव पालन एवं आत्म निर्भरता के लिए शान्ति धारा आदि के प्रेरित किया ।

 *सामूहिक नैतिक उत्थान का दृष्टिकोण*

सामूहिक नैतिक उत्थान का दृष्टिकोण-आचार्य श्री ने शिक्षा में चरित्र  की अभिन्न भूमिका को स्वीकार किया है । उन्होंने चरित्र और चारित्र को उच्च स्थान प्रदान किया है। जिससे शिक्षार्थी में गुण-दुर्गुण, सज्जन-दुर्जन,विवेक-अविवेक सद वृत्ति-दुरवृत्ति के भेद का ज्ञान होता है। जो सामुदायिक नैतिक पतन से बचाता है । समाज में अपराध वृत्ति पाप वृत्ति को रोकता है । जिसे  सफल करने के लिए आचार्य संघ का जीवंत कृतित्व अहम भूमिका निभा रहा है । मुनि प्रमाण सागर, मुनि सुधा सागर , आर्यिका गुरूमती जी, आर्यिका आदर्शमती  ,प्रभावना मति जी आदि।

 *अंतर्निहित योग्यता के विकास का दृष्टिकोण*
अंतर्निहित योग्यता के विकास का दृष्टिकोण - आचार्य श्री का मानना है कि शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित योग्यताओं, क्षमताओं एवं शक्तियों का विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । जिससे अभ्यर्थी में  अंतर्निहित आत्म निर्णय क्षमता, आत्म शक्ति, आत्मानुशासन, प्रबन्धकीय एवं  प्रशासकीय  क्षमता का विकास किया जा सकता है । इस दृष्टिकोण को दृष्टि में रखते हुए उन्होंने अनुशासन प्रशासकीय सेवा प्रशिक्षण संस्थान दिल्ली -भोपाल में एवं भारत वर्षीय दिगम्बर जैन प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान जबलपुर में खोला ।

 *सम्यक व्यक्तित्व के उचित विकास का दृष्टिकोण*
सम्यक व्यक्तित्व के उचित विकास का दृष्टिकोण- आचार्य श्री का ऐसा मानना है कि शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के शारीरिक ,मानसिक,धार्मिक, नैतिक, आध्यात्मिक ,संवेगात्मक एवं आत्म निर्भर सम्यक व्यक्तित्व का  विकास होता है । अतः उन्होंने भारत के शारीरिक -मानसिक आदि व्यक्तित्वों के विकास को ध्यान में रखते हुए  स्वावलंबीता की भावना से हथकरघा -वस्त्रोद्योग की प्रेरणा प्रदान की जिससे श्रावकों में अहिंसक वस्त्र निर्माण-प्रयोग की भावना को स्थान मिला साथ ही जेल के बन्दियों में जीवन की आशा ने जन्म लिया ।

 *सार्वजनिक  एवं सामाजिक हित का दृष्टिकोण*
 सार्वजनिक  एवं सामाजिक हित का दृष्टिकोण- आचार्य श्री का शिक्षा -दर्शन यह कहता है कि शिक्षा  स्वयं के उद्धार एवं कल्याण के साथ स्वतः परमार्थी होना चाहिए केवल स्वान्तः सुखाय नहीं। शिक्षा स्वयं के हित को केंद्र में रखकर बहुजन हिताय -बहुजन सुखाय ,परोपकार जीव दया, प्राणी रक्षा एवं सेवा भविता युक्त होना चाहिये। जिससे पर के भाग्योदय  का चिंतन स्वयं के भाग्योदय में निमित्त भूत होगा। आपने प्राणियों की सेवा, उनकी स्वास्थ्य रक्षा के लिए सागर मध्यप्रदेश में भाग्योदय तीर्थ जैसा चिकित्सा सेवा संस्थान सामाजिक सार्वजनिक हित के दृष्टिकोण से खोला जो समाज को परोपकार एवं सेवा की शिक्षा प्रदान करता है ।

*राष्ट्रीय एकता की भावना का* दृष्टिकोणआचार्य श्री ने राष्ट्रीय एकता की  शैक्षिक भावना को ध्यान में रखकर भारत को पुरातन अस्तित्व में लाने के लिए "इंडिया नहीं भारत बोलो"  मातृभाषा रक्षा, स्वेदशी अपनाओ, स्व रोजगार, आत्म निर्भर भारत जैसे राष्ट्रीय अभियान चलाया फलस्वरूप भारत के जातिवाद,  राज्यवाद, ,वर्ग वाद में बंटे भारत को राष्ट्रीय  एकता की भावना का संदेश जन-जन तक पहुंचाया । जिसका प्रभाव सुप्रीम कोर्ट पर भी पड़ा और उन्होंने इस याचिका का पर शीघ्र ही संज्ञान में लिया । जिससे देश के जन प्रतिनिधियों, शासकों-प्रशासकों,नीति निर्धारकों को एक पथ आवर पाथेय की शिक्षा प्रदान की ।

*स्वावलंबी शिक्षा का दर्शन-*
आचार्य श्री ये कहते हैं -वतन और वेतन ,
 आचार्य श्री के शिक्षा सम्बन्धी अनुभव-जो सीख देते हैं हमें

शिक्षा सर्वोपयोगी, सर्वांगी,सर्वोदयी,  एवं स्वानुभूति पूर्ण हो ।

 छात्रों को ना खोजकर शिक्षकों को खोजें । जो स्वयं सीखें और अपने उत्तराधिकारी को सिखा सके वही शिक्षक है ।

 भारत में भारतीयता की शिक्षा के दर्शन हों तभी भारत शैक्षिक रूप से स्वतंत्र हो सकता है ।

 हम केवल शरीर से भारतीय ना रहें हम मन से ,संस्कृति और संस्कारों से युक्त विचारों से भी  भारतीय बनें ।

 शिक्षा स्वाबलंबी हो जो आत्म निर्भर बना सके । दास नहीं ।

 शिक्षा वही जो कुशलता और दक्षता  आंतरिक स्वच्छता के साथ  आत्मिक विकास दे ।

 मातृ-भाषा के पल्लवन के बिना शिक्षा अपूर्ण है ।

Monday, June 15, 2020

भारत का नाम किस भरत के नाम पर रखा गया

भारतवर्ष नामकरण - परम्परा एवं प्रमाण
(एक प्रामाणिक आलेख)

डॉ शुद्धात्मप्रकाश जैन
निदेशक, के जे सोमैया जैन अध्ययन केंद्र, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई

भारत हमारा देश है और हम सब भारतवासी हैं. इस भारत के निवासियों को भारतीय कहा जाता है. यद्यपि हमारी भारतभूमि को प्राचीन काल से ही विविध नामों से अभिहित किया जाता रहा है, यथा-इंडिया, हिंदुस्तान हिन्दुस्तां आदि. लेकिन यह नाम हमारे देश को या तो दूसरों के द्वारा दिए गए हैं या एकांगी है, जैसे कि इस देश में प्रवाहित सिंधु नदी को इण्डस कहने के कारण इंडिया नाम दिया गया. इसी प्रकार पुराकाल में - 'स' वर्ण को 'ह'  के रूप में उच्चारित करने के कारण इसे हिन्दु कहा गया और मुस्लिम शासकों ने इसे हिन्दुस्तां कहकर पुकारा.  यह सभी नाम सर्वांगीण ना होने के कारण हमारे देश के गौरव को कम करते रहे.

यही कारण है कि हमारे देश का नाम भारत ही अधिक श्रेष्ठ और गौरवपूर्ण होगा, क्योंकि इसका हमारे प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास से सीधा संबंध है. इसका सविस्तार उत्तर इस आलेख में स्पष्ट किया ही जा रहा है. आज हमारे देश को पूरे विश्व में इंडिया के नाम से जाना जाता है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है.

देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में WP(C) क्रमांक 000 422/ 20202 को स्वीकार करके तदनुसार देश का वास्तविक नाम भारत रखने की अपील की गई है.  इस केस की सुनवाई चल रही है.  यद्यपि इस बारे में कहा गया है कि हमारे देश का पहले से नाम भारत है,  किन्तु अब इस नाम को ही बढ़ावा दिया जाएगा.

तो आइए!  यह जानने का प्रयास करें कि इसका नाम भारतवर्ष ही क्यों होना चाहिए. जैसा कि 'भारत' शब्द से ही यह स्पष्ट होता है कि इसका नाम किसी न किसी भरत के नाम से सुनिश्चित हुआ क्योंकि भरत से संबंधित को ही भारत कहा जाता है.

उपर्युक्त संदर्भ में भारत नामक तीन महापुरुषों के साथ इसका संबंध बताया जाता है जो कि निम्न हैं :
1. ऋषभ पुत्र भरत
2. दशरथ पुत्र भरत एवं
3. दुष्यंत पुत्र भरत.
यद्यपि यह सच है कि उक्त तीनों ही भरत महान पराक्रमी, शूरवीर और महापुरुष के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन यह निर्णय करना आवश्यक है कि किस भरत के नाम से हमारे देश का नाम भारत पड़ा.  इस संदर्भ में डॉक्टर प्रेम सागर जैन का कथन उल्लेखनीय है -"राम के भाई भरत कभी राज सिंहासन पर नहीं बैठे अतः उनके आधार पर इस देश के नामकरण का प्रश्न ही नहीं उठता. कतिपय विद्वानों ने दौष्यन्ति भरत के नाम को मूलाधार स्वीकार किया है. यह स्वाभाविक था. कालिदास के 'शाकुंतलम्' की विश्वविख्याति ने दौष्यन्ति भरत को जनमानस में प्रतिष्ठित कर दिया. उसी को लोग इस देश के 'भारत' नाम का मूलमंत्र मान बैठे."

इस विषय पर गंभीर विचार करने पर और अनेक उद्धरणों को देखने पर स्थिति एकदम साफ हो जाती है कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा है.  भरत चक्रवर्ती ने जम्बूद्वीप के संपूर्ण भरतक्षेत्र (पृथ्वी) को जीतकर उसका स्वामित्व प्राप्त किया, जिसके कारण उस सम्पूर्ण भरतक्षेत्र का एक नाम भारतवर्ष पड़ गया.

यहां ध्यातव्य है कि उस सम्पूर्ण क्षेत्र का एक नाम भरत तो जैनदर्शन के अनुसार अनादि से ही सुनिश्चित रहा है. और यह संयोग ही कहा जाएगा कि प्रथम चक्रवर्ती ऋषभपुत्र का नाम भी भरत था, अतः उस क्षेत्र का नाम भी भरत और उस चक्रवर्ती के नाम भी भरत था. जैसा कि यह स्पष्ट किया जा चुका है कि भरत से संबंधित को भारत कहा जाता है. यह घटना असंख्य वर्षों पूर्व होने के कारण कालक्रम से भारत की सीमा भी संकुचित होती चली गई और आज हम भारत को एक निश्चित भौगोलिक भूभाग के रूप में जानते हैं.

अब यह अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि भारत तो ठीक लेकिन उसके साथ वर्ष क्यों लिखा जाता है. इस संदर्भ में मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि पुराकाल में क्षेत्र के लिए वर्ष शब्द का प्रयोग किया गया है.  जम्बूद्वीप में स्थित छह पर्वतों से विभाजित होने के कारण उसके सात क्षेत्रों को वर्ष कहा गया है.  जैसा कि आचार्य उमास्वामी के द्वारा आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व रचित तत्वार्थसूत्र में इसका प्रयोग इस प्रकार हुआ है -
(1) भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैहैरण्यवतैरावतवर्षा: क्षेत्राणि ।।10।।
(2) तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वता ।।11।।

ये दोनों सूत्र तत्वार्थसूत्र के तृतीय अध्याय के दसवें और ग्यारहवें सूत्र हैं. दसवें सूत्र में जम्बूद्वीप के साथ क्षेत्रों को 'वर्ष' के नाम से कहा गया है, जैसे भरतवर्ष, हेमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष आदि. ग्यारहवें सूत्र में इन क्षेत्रों के विभाजन के आधारभूत छह पर्वतों को 'वर्षधर' कहा गया है.  जैसा कि आपको विदित होगा कि पृथ्वी का एक पर्यायवाची 'क्षिति' भी होने के कारण पर्वतों को क्षितिघर कहा जाता है.  उसी प्रकार यहां उन पर्वतों को वर्षधर कहा गया है. स्पष्ट हो जाता है कि यहां क्षेत्र का नाम वर्ष है.

इस प्रकार उस क्षेत्र को वर्ष तथा उसके भरत से संबंधित होने के कारण भारतवर्ष कहा गया. यह नाम बहुत वर्षों तक चलता रहा. किंतु मध्य-मध्य में परिस्थितिजन्य और भी अनेक नामों का प्रयोग इस देश के लिए हुआ, जैसे आर्यावर्त, आर्यखण्ड,  हिन्दुस्तान आदि. किन्तु जब सन 1949 में भारतीय संविधान का निर्माण हुआ और इसके प्रचलित विभिन्न नामों में से किसी सर्वाधिक उपयुक्त नाम का चयन करना था, तब देश के उपयुक्त नाम के लिए प्रमाण एकत्रित करने का प्रयास किया गया. और उसी क्रम में विविध साक्ष्यों, पुस्तकीय आधारों और शिलालेखों को प्रमाण के रूप में खोजा गया तो उड़ीसा राज्य की
हाथीगुंफा में उल्लिखित सम्राट खारवेल के एक शिलालेख में इसका नाम भारतवर्ष प्राप्त हुआ जो कि ब्राह्मी लिपि और प्राकृतभाषा में होने के कारण वहां 'भरदवस्स' शब्द लिखा था.  उस समय हिंदुस्तान नाम को इसलिए स्वीकार नहीं किया गया] यह नाम हमें मुस्लिम शासकों ने दिया. अतः भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत शब्द का ही प्रयोग कियाा गया है।

हमारे देश के नाम भारत की प्रामाणिकता प्रस्तुत करते हुए आचार्य अकलंक ने तत्वार्थवार्तिक में लिखा है, जिसका हिंदी भाव है --"अभिप्राय यह है कि भरत क्षत्रिय के योग से यह क्षेत्र भरत कहलाया है.  अयोध्या नाम की नगरी में सर्वराजलक्षण से संपन्न भरत नाम के चक्रवर्ती हैं, छह खण्ड के अधिपति हुए हैं, जिन्होंने इसे सर्वप्रथम भोगा है, अतः इस क्षेत्र को भारतवर्ष -- ऐसा कहते हैं.

इसी प्रकार का भाव आचार्य जिनसेन ने महापुराण में अभिव्यक्त किया है "भरत से पूर्व इस देश का नाम भरत के पिता नाभिराय के नाम पर 'नाभिखण्ड' या 'अजनाभवर्ष' कहा जाता था.  पुरुदेवचम्पू में भी इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हुए -- महाकवि अहर्दददास ने लिखा है कि --"उसके नाम से (भरत के नाम से) यह देश भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ --ऐसा इतिहास है. हिमवान  कुलाचल से लेकर लवणसमुद्र तक का यह क्षेत्र चक्रवर्तियों का क्षेत्र कहलाता है.

सूरसागर में भी सूरदास जी ने लिखा है कि-
बहुरो रिषभ बड़े जब भये,
नाभिराज दे वन को गए।
रिषभ राज पर जा सुख पायो,
जस ताको सब जग में छायो।।
रिषभदेव जब वन को गए,
नवसुत नवौ खण्ड नृप भए।
भरत सो भरतखण्ड को राव,
करे सदा ही धर्म अरु न्याव।।

उपर्युक्त हिंदी छंद का अर्थ अति सरल है कि भरत ने भरतखंड के राजा बनकर धर्म और न्याय से प्रजा को सुख प्रदान किया. 
यहां अभी तक कुछ प्रमुख जैन ग्रन्थों के प्रमाण प्रस्तुत किये गये, लेकिन न केवल जैनग्रन्थों में, अपितु हिन्दू ग्रन्थों में भी इस बात के प्रबल प्रमाण उपलब्ध होते हैं, जो इसप्रकार हैं-
 अग्निपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
सर्वप्रथम ‘अग्निपुराण’ का निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है-
जरामृत्युभयं नास्ति धर्माधर्मौ युगादिकम्।
नाधमं मध्यमं तुल्या हिमादेशात्तु नाभितः।।
ऋषभो मरुदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
भरतात् भारतं वर्षं भरतात् सुमतिस्त्वभूत।।
अर्थात् उस हिमवत् प्रदेश में जरा और मृत्यु का भय नहीं था, धर्म और अधर्म भी नहीं थे, सर्वत्र मध्यम भाव- समभाव था। वहां नाभिराजा की पत्नी मरूदेवी से ऋषभ का जन्म हुआ। ऋषभ से भरत हुए। ऋषभ ने भरत को राज्यश्री प्रदान कर संन्यास ले लिया। तब भरत से ही इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ।
श्रीमद्भागवत में भरत से भारत नामकरण का उल्लेख-
इसीप्रकार श्रीमद्भागवत के अनुसार भी ऋषभपुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारत सुनिश्चित हुआ- ‘‘अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।’’  अर्थात् ‘अजनाभवर्ष’ ही आगे चलकर ‘भारतवर्ष’  संज्ञा से अभिहित हुआ। यहां अजनाभ भगवान ऋषभदेव के लिए प्रयुक्त शब्द है, जो भारतदेश पहले ऋषभ के नाम पर था, वही भारतदेश पश्चात् भरत के नाम से कहा जाने लगा। अथवा ‘‘येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीत् येनेदं वर्षं भारतमिति व्यपदिशन्ति।’’  अर्थात् श्रेष्ठ गुणों के आश्रयभूत, महायोगी भरत अपने सौ भाइयों में श्रेष्ठ थे, उन्हीं के नाम पर इस देश को ‘भारतवर्ष’ कहते हैं।
आग्नीध्रसूनोर्नाभेस्तु ऋषभोऽभूत् सुतो द्विजः।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद् वरः।।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्राव्राज्यमास्थितः।
तपस्तेपे   महाभागः   पुलहाश्रमसंश्रयः।।
अर्थात् अग्नीध्र-पुत्र नाभि से ऋषभ उत्पन्न हुए। उनसे भरत का जन्म हुआ, जो अपने सौ भाइयों में अग्रज था। महाभाग्यशाली ऋषभ ने ज्येष्ठ पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर महाप्रवज्या ग्रहण की और ‘पुलह’ आश्रम में तप किया।
 मार्कण्डेयपुराण के अनुसार- 
आग्नीध्रसूनोर्नाभेस्तु ऋषभोऽभूत् सुतो द्विजः।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद् वरः।।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रः महाप्राव्राज्यमास्थितः।
तपस्तेपे महाभागः पुलहाश्रमसंश्रयः।।
हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं भरताय पिता ददौ।
तस्मात्तु भारतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः।।
अर्थात् अग्नीध्र-पुत्र नाभि से ऋषभ उत्पन्न हुए। उनसे भरत का जन्म हुआ, जो अपने सौ भाइयों में अग्रज था। महाभाग्यशाली ऋषभ ने ज्येष्ठ पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर महाप्रव्रज्या ग्रहण की और ‘पुलह’ आश्रम में तप किया। ऋषभ ने भरत को ‘हिमवत’ नामक दक्षिण प्रदेश शासन के लिए दिया था। उस महात्मा ‘भरत’ के नाम से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हुआ।
ब्रह्माण्डपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महाद्युतिम्।
ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्रव्रज्यया स्थितः।।
अर्थात् नाभि ने मरुदेवी से महाद्युतिवान् ‘ऋषभ’ नाम के पुत्र को जन्म दिया। ऋषभदेव ‘पार्थिव श्रेष्ठ’ और ‘सब क्षत्रियों के पूर्वज’ थे। उनके सौ पुत्रों में वीर ‘भरत’ अग्रज थे और ऋषभ ने उनका राज्याभिषेक कर महाप्रव्रज्या ग्रहण की।
स्कन्दपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभेः पुत्रश्च ऋषभः ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीत्र्यते।।
अर्थात् नाभि का पुत्र ऋषभ हुआ, ऋषभ का पुत्र भरत हुआ। उसी भरत के नाम से यह देश ‘भारत’ कहा जाता है।
लिंगपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख--
नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महामतिः।
ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षेत्रसुपूजितम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्याथ ऋषभो भरतं पुत्रवत्सलः।।
ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेन्द्रियमहोरगान्।
सर्वात्मनात्मनि स्थाप्य परमात्मानमीश्वरम्।।
नग्नो जटी निराहारोऽचीवरो ध्वान्तगतो हि सः।
निराशस्त्यक्तसन्देहः शैवमाप परं पदम्।।
महामति नाभि को मरुदेवी नाम की धर्मपत्नी से ‘ऋषभ’ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह ऋषभ नृपतियों में उत्तम था और सम्पूर्ण क्षत्रियों द्वारा सुपूजित था। ऋषभ से भरत की उत्पत्ति हुई, जो अपने सौ भ्राताओं में अग्रजन्मा था। पुत्र-वत्सल ऋषभदेव ने भरत को राज्यपद अभिषिक्त किया और स्वयं ज्ञान-वैराग्य को धारण कर, इन्द्रियरूपी महान् सर्पों को जीत सर्वभाव से ईश्वर परमात्मा को अपनी आत्मा में स्थापित कर तपश्चर्या में लग गये। वे उस समय नग्न थे, जटायुक्त, निराहार, वस्त्ररहित तथा मलिन थे। उन्होंने सब आशाओं का त्याग कर दिया था, सन्देह का परित्याग कर परमशिवपद को प्राप्त कर लिया था।
वायुपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख--
नाभिस्त्वजनयत् पुत्रं मरुदेव्यां महामतिः।
ऋषभं पार्थिवश्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम्।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्याथ भरतं पुत्रं प्रावाज्यमात्थितः।।
अर्थात् नाभि के मरुदेवी से महाद्युतिवान् ‘ऋषभ’ नाम के पुत्र को जन्म दिया। ऋषभदेव ‘पार्थिव श्रेष्ठ’ और ‘सब क्षत्रियों के पूर्वज’ थे। उनके सौ पुत्रों में वीर ‘भरत’ अग्रज थे और ऋषभ ने उनका राज्याभिषेक कर महाप्रव्रज्या ग्रहण की।
नारदपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
आसीत् पुरा मुनिश्रेष्ठः भरतो नाम भूपतिः।
आर्षभो यस्य नाम्नेदं भारतं खण्डमुच्यते।।
स राजा प्राप्तराज्यस्तु पितृपैतामहं क्रमात्।
पालयामास धर्मेण पितृवद्रंजयन् प्रजाः।।
अर्थात् पूर्व समय में मुनियों में श्रेष्ठ भरत नाम के राजा थे। वे ऋषभदेव के पुत्र थे। उन्हीं के नाम से यह देश ‘भारतवर्ष’ कहा जाता है। उस राजा भरत ने राज्य प्राप्त कर अपने पिता-पितामह की तरह से ही धर्मपूर्वक प्रजा का पालन-पोषण किया था।
शिवपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभेः पुत्रश्च ऋषभः ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीत्र्यते।।
तात्पर्य यह है कि नाभि का पुत्र ऋषभ हुआ, ऋषभ का पुत्र भरत हुआ। उसी भरत के नाम से इस देश को ‘भारत’ कहा जाता है।
वराहपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
नाभिर्मरुदेव्यां पुत्रमजनयत् ऋषभनामानं तस्य भरतः
पुत्रश्च तावदग्रजः तस्य भरतस्य पिता ऋषभः।
हेमाद्रेर्दक्षिणं वर्षं महद् भारतं नाम शशास।।
तात्पर्य यह है कि नाभि ने अपनी स्त्री मरूदेवी से ऋषभ नाम के पुत्र को उत्पन्न किया। वह अपने सहोदरों से ज्येष्ठ था, उसके पिता स्वयं ऋषभ थे। उसी भरत ने हिमालय से लेकर दक्षिण पर्यन्त सम्पूर्ण क्षेत्र को शासित किया, इसलिए यह क्षेत्र भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है।

कूर्मपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
हिमाह्वयं तु यद्वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यर्षभोऽभवत्पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः।।
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रः शताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रः भरतं पृथिवीपतिः।।
उपर्युक्त श्लोक में भी इसी प्रकार का अर्थ व्यक्त किया गया है कि नाभि के मरुदेवी से महाद्युतिवान् ‘ऋषभ’ नाम के पुत्र को जन्म दिया। उनके शत पुत्रों में अग्रज भरत राज्याभिषिक्त होकर पृथ्वीपति हुए।
विष्णुपुराण में भरत से भारतवर्ष नाम का उल्लेख-
न ते स्वस्ति युगावस्था क्षेत्रेष्वष्टसु सर्वदा।
हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः।।
तस्यर्षभोऽभवत्पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः।
ऋषभाद्भरतो जज्ञे ज्येष्ठः पुत्रशतस्य सः।।
इस श्लोक में भी उपर्युक्त अर्थानुसार ऋषभपुत्र भरत के नाम से ही भारतदेश के नामकरण की बात कही गई है। तथापि कुछ लोग अज्ञानवश कभी दशरथपुत्र भरत अथवा दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम से भारतदेश के नामकरण की बात करते हैं, जो कि उपर्युक्त उद्धरणों से पूरी तरह खण्डित हो चुका है।

डा. वासुदेवशरण अग्रवाल ने भी एक बार दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर ‘भारत’ के नामकरण की बात लिखी थी, किन्तु बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी भूल को स्वीकार किया और लिखा कि- ‘‘मैंने अपनी ‘‘भारत की मौलिक एकता’’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 22-24 पर दौष्यन्तिक भरत से भारतवर्ष लिखकर भूल की थी। इसकी ओर मेरा ध्यान कुछ मित्रों ने आकर्षित किया। उसे अब सुधार लेना चाहिए।’’
यहां भी ऋषभपुत्र भरत का ही उल्लेख है, किन्तु इतना स्पष्ट होने पर भी कुछ लोग अज्ञानवश कभी दशरथपुत्र भरत अथवा दुष्यंतपुत्र भरत के नाम से भारत देश के नामकरण की बात करते हैं जो कि उपर्युक्त उद्धरण से पूरी तरह खंडित हो चुका है. यह अत्यंत स्पष्ट हो चुका है कि ऋषभपुत्र भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा. जैसाकि हम उपरि-उद्धृत अनेक ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं में देख चुके हैं. अतः यथा शीघ्र हमारे देश को भारतवर्ष नामकरण होना चाहिए क्योंकि यही नाम है जो हमें ब्रिटिश शासकों की दासता भरी यादों से मुक्त करता है और गौरवपूर्ण इतिहास की याद दिलाता है.

Friday, May 1, 2020

राहु ग्रह और उसके नक्षत्र विचरण का फल

सभी ग्रहो के तीन तीन नक्षत्र होते हैं.गोचर में ग्रह जिस नक्षत्र में होता है उस नक्षत्र के अनुसार इनका फल भी परिवर्तित होता है.राहु जब बृहस्पति से केतु के नक्षत्र में होता है तो इस प्रकार से अपना फल देता है

राहु और बृहस्पति नक्षत्र (Rahu and Brahaspati Nakshatra) 
सभी ग्रहों के समान बृहस्पति के भी तीन नक्षत्र हैं पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद.राहु जन्म कुण्डली में अगर इन नक्षत्रों में स्थित होता है और गुरू शुभस्थ स्थान पर होता है तो राहु की दशा काल में आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है.आय के साधनों में वृद्धि होती है.भौतिक सुख प्राप्त होता है.परिवार में आनन्द और खुशियों का आगमन होता है.समाज एवं परिवार में उच्च स्थान प्राप्त होता है.गुरू मंद अथवा कमज़ोर होने पर कार्य में रूकावट का सामना करना होता है.धन की हानि होती है.पराजय का सामना करना होता है.अकारण अपमान सहना पड़ता है.


राहु और शुक्र नक्षत्र (Rahu and Shukra Nakshatra) 
शुक्र राहु का मित्र ग्रह है.शुक्र के साथ राहु शुभ फल देता है.जन्मपत्रिका में शुक्र के नक्षत्र भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा में राहु की स्थिति होने पर राहु अपनी दशा अवधि में शुक्र से सम्बन्धित वस्तुओं का लाभ देता है.भौतिक साधनों में वृद्धि होती है.वाहन सुख प्राप्त होता है.वस्त्राभूषण का लाभ मिलता है.स्त्री सुख प्राप्त होता है.स्त्रियों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त होता है.शुक्र नीच अथवा पीड़ित होने पर इस अवधि में सुख में कमी आती है.स्त्रियों के कारण नुकसान उठाना पड़ता है.इनके कारण अपमान भी सहना होता है.बनते हुए काम बिगड़ जाते हैं.स्वास्थ्य भी मंदा रहता है.


राहु और शनि नक्षत्र (Rahu and Shani Nakshatra)
राहु और शनि दोनों पाप ग्रह हैं.दोनो ग्रहों में मैत्री सम्बन्ध है.जन्मांग में राहु शनि के नक्षत्र पुष्य, अनुराधा अथवा उत्तराभाद्रपद में होता है तो राहु अपनी दशा अवधि में शनि के समान पीड़ा देता है.इस समय व्यक्ति की हड्डियो में कष्ट रहता है.चोट लगने की संभावना रहती है.स्वास्थ्य मंदा रहता है.तामसी भोजन के प्रति आसक्ति बढ़ती है.गृहस्थी में कलहपूर्ण स्थिति रहती है.जीवनसाथी से अनबन के कारण बात तलाक तक पहुंच जाती है.शनि शुभ स्थिति में होने पर परिश्रम का पूर्ण फल प्राप्त होता है.धन सम्बन्धी चिन्ताएं दूर होती है.


राहु और राहु नक्षत्र (Rahu and Rahu Nakshatra) 
आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा ये राहु के नक्षत्र हैं.जन्म कुण्डली में राहु जब स्वनक्षत्री होता है तो अपनी दशा काल में मानसिक एवं शारीरिक कष्ट देता है.दशा काल के दौरान हड्डियो में दर्द रहता है.चोट लगने की संभावना रहती है.कई प्रकार की चिंताओं से मन बेचैन रहता है.जीवनसाथी से दूरियां बढ़ती हैं.परिवार का कोई बुजुर्ग गम्भीर रूप से बीमार होता है जिससे मन दु:खी रहता है.मान सम्मान में कमी आती है एवं अपयश का भागी बनना पड़ता है.


राहु और केतु नक्षत्र (Rahu and Ketu Nakshatra) 
केतु राहु के समान नैसर्गिक पाप ग्रह होता है.जन्मपत्री में केतु मंदा हो और राहु केतु के नक्षत्र अश्विनी, मघा या मूल में है तो इस स्थिति व्यक्ति अविश्वासी होता है.ग्रहों की इस स्थिति में राहु की दशा के समय हड्डी टूटने की संभावना रहती है.सर्प दंश का भय होता है.स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां आती हैं.गृहस्थी मे तनाव रहता है.शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है.आर्थिक क्षति एवं मान सम्मान को आघात पहुंचता है.केतु शुभ स्थिति में होने पर भूमि एवं मकान का स्वामित्व प्राप्त होता है.नये सम्बन्ध बनते हैं.भौतिक सुख मिलता है.कारोबार एवं नौकरी में सफलता मिलती है.


गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...