Friday, April 16, 2021

शुक्रोदय का 12 राशियों पर प्रभाव

 शुक्र का उदय : 18 अप्रैल को शुक्र का मेष राशि में उदय, जानें सभी राशियों पर इसका प्रभाव


18 अप्रैल को रात्रि 11 बजकर 8 मिनट पर शुक्र मेष राशि में उदय होने जा रहे हैं। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार शुक्र के उदय होने के साथ ही शादि- विवाह, गृह प्रवेश आदि सभी मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे। शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी हैं। शुक्र कन्या राशि में नीच के और मीन राशि में उच्च के माने जाते हैं। शुक्र के उदय होने से सभी राशियों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। आइए जानते हैं शुक्र का मेष राशि में उदय से कैसा रहेगा सभी राशियों का हाल...


मेष राशि



धन- लाभ होगा, जिससे आर्थिक पक्ष मजबूत होगा।

पारिवारिक जीवन में मधुरता आएगी।

शादी- विवाह होने के योग बन रहे हैं।

दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ेगा।

शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए ये समय काफी अच्छा रहने वाला है।

वृष राशि


वृष राशि के जातकों के लिए शुक्र का उदय होना शुभ कहा जा सकता है।

धर्म- कर्म के कार्यों में हिस्सा लेंगे।

नया मकान या वाहन का योग भी बन रहा है।

सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।

मिथुन राशि


शुक्र का उदय होने से आर्थिक पक्ष तो मजबूत होगा, लेकिन खर्चों में इजाफा भी हो सकता है, इसलिए सोच- समझकर धन खर्च करें।

शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए समय काफी बेहतरीन है।

प्रेम जीवन में मधुरता आएगी।

कर्क राशि



कार्यक्षेत्र में उच्चाधिकारियों से सहयोग मिलेगा।

व्यापार से जुड़े लोगों के लिए ये समय काफी अच्छा रहने वाला है।

नया व्यापार शुरू करने के लिए समय अच्छा है।

सिंह राशि


सिंह राशि के जातकों को शुक्र के उदय होने से मिला-जुला फल मिलने की उम्मीद है।

परेशानियों से छुटकारा मिलेगा, लेकिन हिम्मत से काम लेने की जरूरत होगी।

धर्म- कर्म के कार्यों में हिस्सा लेंगे।

दान- पुण्य करने का अवसर भी मिलेगा।

नौकरी और व्यापार के लिए समय काफी बेहतरीन है।

परिवार के सदस्यों का सहयोग मिलेगा।

कन्या राशि


स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है।

मान- सम्मान में वृद्दि होगी।

लेन- देन के मामलों में सावधानी बरतें। 

कोर्ट- कचहरी के मामलों से बचने का प्रयास करें।

तुला राशि



तुला राशि के जातकों के लिए शुक्र का उदय होना किसी वरदान से कम नहीं है। 

व्यापारियों के लिए ये समय काफी अच्छा रहने वाला है।

मान- सम्मान में वृद्धि के योग बन रहे हैं।

दांपत्य जीवन खुशियों से भरा रहेगा।

वृश्चिक राशि


वृश्चिक राशि के जातकों को सूर्य के उदय होने से सावधान रहने की आवश्यकता है।

किसी भी कार्य को करने से पहले अच्छी तरह सोच- विचार कर लें।

वाद- विवाद से बचने का प्रयास करें।

शादी विवाह के कार्यों में विलंब हो सकता है।

धनु राशि


शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए ये समय काफी अच्छा रहने वाला है।

स्वास्थ्य संबंधित परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है।

दापंत्य जीवन में प्रेम बढ़ेगा।

मान- सम्मान और पद- प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी।

परिवार के सदस्यों का भरपूर सहयोग मिलेगा।

मकर राशि


कार्यों में सफलता प्राप्त करेंगे।

विवाह होने के योग भी बन रहे हैं।

पारिवारिक जीवन खुशियों से भरा रहेगा।

नया मकान या वाहन ले सकते हैं। 

कुंभ राशि


किए गए कार्यों की सराहना होगी।

धर्म- कर्म के कार्यों में हिस्सा लेने का अवसर मिलेगा।

सामाजिक मान- सम्मान भी बढ़ सकता है।

अपने स्वभाव के चलते कठिन समय को आसानी से नियंत्रित कर पाएंगे।

मीन राशि


मीन राशि के जातकों को शुक्र के उदय होने से मिले- जुल परिणाम मिलेंगे।

स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है।

पारिवारिक जीवन में मधुरता आएगी।

धन- लाभ होने के योग भी बन रहे हैं।

Tuesday, April 6, 2021

किडनी में आवश्यक विचार

 

क्रिएटिनिन(serum creatinine )test : अर्थ, नार्मल स्तर इत्यादि

क्रिएटिनिन क्या है, दरअसल यह उन अपशिष्ट उत्पादों में से एक है जिन्हें शरीर उत्पादित करता है, और जो किडनी द्वारा पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। रक्त में क्रिएटिनिन का स्तर सीरम क्रिएटिनिन परीक्षण (serum creatinine test) नामक जाँच के द्वारा मापा जाता है।

 क्रिएटिनिन एक रासायन है और इसका रासायनिक सूत्र C4H7N3O है, और इसका आणविक वजन 113.12 Daltons है। क्रिएटिनिन सामान्य मांसपेशियों के ऊतकों के टूटने से बनता होता है। एक व्यक्ति के पास जितनी अधिक मांसपेशी होती है, उसका शरीर उतना ही ज्यादा क्रिएटिनिन पैदा करता है। रक्त में क्रिएटिनिन का स्तर एक व्यक्ति की मांसपेशियों की मात्रा और किडनी की कार्यक्षमता दोनों पर ही निर्भर करता है। आम तौर पर क्रिएटिनिन टेस्ट के साथ BUN टेस्ट और यूरिन प्रोटीन टेस्ट भी किया जाता है।

किडनी किस प्रकार बनाती हैं क्रिएटिनिन का संतुलन

किडनी हमारे शरीर में क्रिएटिनिन जैसे अनेक पदार्थों जैसे सोडियम, पोटैशियम और फॉस्फेट का संतुलन बनाकर हमें स्वस्थ रखने में सहायता करती है। रक्त में मांसपेशियों के ऊतकों के टूटने से बनने वाले क्रिएटिनिन (बेकार पदार्थ) को पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकालकर शरीर में इसके स्तर को संतुलित करके रखती है।

किडनी द्वारा क्रिएटिनिन को साफ करने वाले रक्त की मात्रा को क्रिएटिनिन क्लीयरेंस कहा जाता है। किडनी के क्रिएटिनिन को साफ करने की यह प्रक्रिया ग्लोमेरुली नामक छन्नी करती है, इस क्रिया को (glomerular filtration rate, or GFR) के मापक से मापा जाता है। अर्थात एक मिनट में किडनी कितने रक्त को साफ कर रही है। एक स्वस्थ व्यक्ति में क्रिएटिनिन क्लीयरेंस 95 मिलीलीटर / मिनट (महिलाओं में) और पुरुषों के लिए 120 मिलीलीटर/ मिनट है।

इसका मतलब है कि एक स्वस्थ किडनी एक मिनट में 95 से 120 मिली. रक्त को क्रिएटिनिन रहित करती हैं। क्रिएटिनिन क्लीयरेंस की प्रक्रिया को मापने में मरीज का वजन, लंबाई, लिंग, और उम्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस जाँच से जानें रक्त में क्रिएटिनीन का स्तर

सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट (Serum creatinine test)-

KFT या RFT टेस्ट के अंतर्गत आने वाली यह जाँच मुख्य रूप से रक्त में क्रिएटिनिन के निर्माण की पहचान करती है। स्वस्थ कार्यक्षमता वाली किडनी क्रिएटिनिन को रक्त से पूरी तरह छानकर पेशाब के माध्यम से शरीर के बाहर निकाल देती है। रक्त में क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ जाना किडनी की बीमारी का संकेत देता है।

इस जाँच को करने के लिए आपके रक्त का सेंपल लिया जाता है। प्रयोगशाला में उस रक्त की जाँच के बाद 24 घंटे के अंदर आपको रिपोर्ट मिल जाती है। रक्त में क्रिएटिनिन का सामान्य स्तर महिलाओं में 0.5 से 1.1 (mg/dL) और पुरुषों में 0.6 से 1.2 mg/dL होता है। क्रिएटिनिन का स्तर इस सामान्य स्तर से उच्च होने पर किडनी के रोग का संकेत देता है।

अध्ययनों में कहा गया है कि इस टेस्ट को कराने से पहले पका मांस न खाया जाए, क्योंकि पका हुआ मास क्रिएटिनिन के स्तर को बढ़ा देता है। भारत में इस टेस्ट की कीमत 100 रुपए से 200 रुपए तक (प्रयोगशालाओं के हिसाब से) हो सकती है।

क्रिएटिनीन और eGFR में क्या है संबंध

क्रिएटिनिन को रक्त से साफ करना किडनी का काम है, और eGFR किडनी के उस काम की गति का मापक है। बहुत से लोग क्रिएटिनिन और eGFR को दो अलग-अलग जाँच समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। वास्तव में eGFR कोई अलग रक्त परीक्षण नहीं है, बल्कि इसकी गणना एक सूत्र का उपयोग करके की जाती है (इसीलिए इसे eGFR यानि estimated glomerular filtration rate या इ-जीएफआर कहा जाता है)।

यह मरीज के क्रिएटिनिन स्तर, आयु और लिंग पर निर्भर करता है, और इन्हीं के आधार पर अंतिम परिणाम एमएल / मिनट में निकलता है। एक स्वस्थ मनुष्य का eGFR 60 मिलि/मिनट से ज्यादा होता है, यदि आपकी रिपोर्ट में eGFR 60 मिलि/मिनट से कम है तो किडनी विफलता के किसी चरण पर हैं, तत्काल किडनी विशेषज्ञ से संपर्क करें। क्या होते हैं किडनी विफतला के वह चरण जिन्हें eGFR जैसे मापक से बांटा गया है-

CKD के चरणeGFR (मिलि. /मिनट)
चरण-1 (साधारण)90-120 मिलि./मिनट
चरण-2 (हल्का)60-90 मिलि./मिनट
चरण-3 (मध्यम)30-60 मिलि./मिनट
चरण-4 (गंभीर)15-30 मिलि./मिनट
चरण-5 (किडनी विफलता)0-15 मिलि./मिनट

क्रिएटिनिन बढ़ा है तो बीमारी के बारे में ज़्यादा जानने के लिए किडनी का अल्ट्रासाउंड (USG-KUB) और किडनी की बायोप्सी(“renal biopsy”) की ज़रुरत पड सकती है।

क्या हैं क्रिएटिनीन के निम्न स्तर के कारण

 शरीर मेंक्रिएटिनिन का स्तर आपके शरीर के आकार, वजन और मासपेशियों के अनुसार औरों से भिन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, पुरुषों के लिए क्रिएटिनिन की सामान्य सीमा 0.6 से 1.2 मिलीग्राम / डीएल के बीच है, और महिलाओं के लिए सामान्य सीमा 0.5 से 1.1 मिलीग्राम / डीएल के बीच है। यदि शरीर में क्रिएटिनिन का स्तर कम हो जाए तो स्वस्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।

क्या है शरीर में क्रिएटिनिन का स्तर कम होने के कारण-

  • मांसपेशियों की बीमारी, जैसे कि पेशी अपविकास (muscular dystrophy)।
  • लीवर की कोई बीमारी, क्योंकि लीवर की कार्यक्षमता क्रिएटिनिन के उत्पादन पर प्रभाव डालती है, जिससे क्रिएटिनिन के स्तर में कमी भी आ सकती है। लक्षणों में पीलिया, पेट में दर्द और सूजन, और मल का रंग बदलना शामिल रहै।
  • पानी की अधिकता, गर्भावस्था, अधिक पानी का सेवन और कुछ दवाएं के सेवन से भी क्रिएटिनिन के स्तर में कमी आ सकती है।

Thursday, April 1, 2021

मुनि प्रणम्यसागर जी की रचनाएं

 

मुनि श्री प्रणम्य सागर जी द्वारा साहित्य सृजन

अभीक्ष्ण ज्ञान उपयोगी, प्राकृत भाषा मर्मज्ञ परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज चार भाषाओं – हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत और अंग्रेजी का ज्ञान रखते हैं।

इन चार भाषाओं में पूज्य मुनि श्री ने 80 से भी अधिक ग्रंथों, टीका ग्रंथों, काव्यों, पद्यानुवादों, स्तोत्र आदि की रचना की। 

पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की लेखन क्षमता अद्भुत है। उनकी कलम से निरंतर नए-नए ग्रंथों और कृतियों की रचना होती रहती है। ऐसा लगता है ज्ञान का अथाह सागर पूज्य मुनि श्री अपने में समाए हुए हैं। उनके ज्ञान की पराकाष्ठा को देखकर ही — अभीक्ष्ण ज्ञान उपयोगी, वर्तमान में श्रुत केवली, जैन दर्शन के परम ज्ञाता, प्राकृत भाषा मर्मज्ञ, महा योगीराज, ज्ञान के सागर, विद्या के सागर आदि उपाधियों से उन्हें विभूषित किया जाता है।

पूज्य मुनि श्री के साहित्य को अनेक भागों में बांटा गया है –

(1) संस्कृत भाषा में टीका ग्रंथ,

(2) हिंदी में अनुवादित ग्रंथ,

(3) पद्यानुवाद,

(4) प्रवचन ग्रंथ,

(5) संस्कृत भाषा में मौलिक काव्य ग्रंथ,

(6) प्राकृत भाषा में मौलिक काव्य ग्रंथ,

(7) अन्य मौलिक कृतियां,

(8) संकलन,

(9) अंग्रेजी भाषा में पुस्तकें आदि

पूज्य मुनि श्री के द्वारा रचित साहित्य में अनेक तरह की varieties देखने को मिलती हैं। इसमें संस्कृत भाषा में श्री वर्धमान स्तोत्र, स्तुति पथ, श्रायस पथ, अनासक्त महायोगी जैसी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। दूसरी तरफ प्राकृत भाषा में सोलह कारण भावनाओं पर आधारित तित्थयर भावणा, धम्मकहा, गोम्मटेस पंडिमा भत्ति जैसी दुर्लभ और अनोखी कृतियां हैं।

संस्कृत भाषा और उसके व्याकरण का ज्ञान पूज्य मुनि श्री ने स्वयं अभ्यास द्वारा प्राप्त किया और इन भाषाओँ में अभूतपूर्व कुशलता प्राप्त की। प्राचीन और महत्वपूर्ण अनमोल ग्रंथों पर पूज्य मुनि श्री ने इसी अद्भुत लेखन क्षमता का उपयोग करते हुए, संस्कृत टीकाएँ लिखकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। इन ग्रंथों पर एक लंबे समय के बाद इस तरह की संस्कृत टीकाएँ लिखी गई है। 

युवाओं के लिए विशेष रूप से Fact of Fate, खोजो मत पाओ, लक्ष्य, जिंदगी क्या है, बेटा जैसी पुस्तकें पूज्य मुनि श्री ने लिखी हैं। योग के ऊपर अर्हम ध्यान योग पुस्तक पाठकों को आकर्षित करती है।

इसके अतिरिक्त अन्तर्गूंज (भजन एवं हाइकू) और लहर पर लहर (कविता संग्रह) अपने आप में बहुत interesting और अनुपम रचनाएं हैं।  सभी ग्रंथों और रचनाओं की भाषा बहुत सरल है, शैली बहुत रोचक और स्पष्ट है।

इस साहित्य में अनेकों उदाहरणों के माध्यम से विषय को समझाया गया है, साथ ही जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं और मन में उठने वाली जिज्ञासा और प्रश्नों का solution और जवाब भी हमें इन ग्रंथों और रचनाओं में मिलता है। कुछ रचनाएं छोटी होने के बावजूद भी जैसे “गागर में सागर” को समाए हैं। अनेक प्राचीन ग्रंथों के प्रवचन ग्रंथों में, कठिन समझे जाने वाले विषय को इतना easy बना दिया गया है कि पाठक आश्चर्य से भर जाते हैं।

नए-नए ग्रंथ और टिकाओं की रचना कर जैन आगम को विकसित करने और उसे विविधताओं से भरने में पूज्य मुनि श्री का अमूल्य योगदान है और यह योगदान निरंतर जारी है।

नीचे दी गई list में अनेक ग्रन्थों और कृतियों का pdf download  किया जा सकता है और ग्रन्थ के नाम पर click  करके open होने वाले नये पेज पर ही उस कृति को पढ़ा जा सकता है और book cover का image भी देखा जा सकता है—-

मुनि प्राणम्यसागर परिचय

 


previous arrow
next arrow

पूज्यास्पद मुनिश्री १०८ प्रणम्य सागर जी महाराज
Welcome to website of Pranamya Sagar Ji Maharaj

परिचय

मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज
पूर्व नाम : ब्र. सर्वेश जी
पिता-माता : श्री वीरेन्द्र कुमार जी जैन एवं श्रीमती सरिता देवी जैन
जन्म : 13.09.1975, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
जन्म स्थान : भोगांव, जिला मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)
वर्तमान में : सिरसागंज, फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा : बीएससी (अंग्रेजी माध्यम)
भाई : सचिन जैन
बहिन : सपना जैन
गृह त्याग : 09.08.1994
क्षुल्लक दीक्षा : 09.08.1997, नेमावर
एलक दीक्षा : 05.01.1998, नेमावर
मुनि दीक्षा : 11.02.1998, माघ सुदी 15, बुधवार, मुक्तागिरीजी
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

पूज्यास्पद मुनिश्री १०८ प्रणम्य सागर जी महाराज श्रमण साधुओं की वंदनीय परम्परा में महनीय स्थान के अधिकारी पुण्य पुरुष हैं| आपके महान परिचय को लेखनी से लिख पाना अत्यंत दुर्द्धर है| पहाड़ को काटकर सुरंग निकाली जा सकती है, धरती को चीर कर पानी निकाला जा सकता है, आसमां को फाड़कर धरती पर भागीरथी को धरती पर लाया जा सकता है लेकिन आपके जैसे गुरु की महिमा का वर्णन संभव नही|

आप एक नहीं अनेक गुणों के धारी हैं, आप एक नहीं अनेक सलाह व सुराह के दर्शायक हैं, चतुर्थ काल सम आपकी चर्या है, आप वात्सल्य के सागर हैं, आपके मुख पर मंद मधुर मुस्कान प्रतिपल रहती है, आपकी मृदु वाणी जनकल्याणी है| यह आपकी वाणी का ही जादू है कि प्रवचनसार जैसे महान ग्रन्थ पर आपके प्रवचनों का ध्याय पारस, जिनवाणी एवं यूट्यूब जैसे चैनलों के माध्यम से विश्व भर में सुने गये|

आपके तपोनिष्ठ जीवन का एकमात्र ध्येय सम्यक ज्ञान के साथ एकान्त श्रुतोपासना है| श्रुतोपासना की निरंतरता के क्रम में आपके द्वारा महान ग्रंथो की रचना हुई है| यह आपकी लेखनी का ही जादू है कि प्राकृत भाषा जो कि हमारे आगम की भाषा है जिसे आज लोग भूल गए थे इसे भी “पाइय-सिक्खा” पुस्तक श्रृंखला की रचना से इतना सरल बना दिया कि जन जन में प्राकृत सीखने की लहर उठ गयी है आपके द्वारा रचित “पाइय-सिक्खा” पुस्तक इतनी सरल हैं जिसे आज 5 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक के वृद्ध, युवा महिलाएं एवं बच्चे पढ़ रहें हैं|

प्राकृत पाठशालाएं

आपके आशीर्वाद से विभिन्न स्थानों पर अपनी संस्कृति एवं भाषा के संरक्षण हेतु प्राकृत की पाठशालाएं सुचारू रूप से चल रहीं हैं| आज प्राकृत ऑनलाइन पाठशालाओं के माध्यम से भी लोग घर बैठे ही लोग “पाइय-सिक्खा” की पुस्तकों से प्राकृत का ज्ञान अर्जित कर रहें हैं| आपने जहाँ एक और प्राकृत से परिचय कराया है वहीँ दूसरी ओर अर्हं ध्यान के माध्यम से हमारी प्राचीन सभ्यता को जीवित किया है| अर्हं ध्यान आज सभी के लिए वरदान सिद्ध हुआ है| जनसाधारण को अर्हं ध्यान के मध्यं से असाध्य रोगों से मुक्ति मिल रही है| आजकी युवा पीढ़ी को सुदृढ़ बनाने के लिए Life Management, Fact of Fate, लक्ष्य, जिन्दगी क्या है जैसी पुस्तकों को लिखकर बच्चो एवं युवाओं को एक सकारात्मक दिशा दी है|

अकलंक शरणालय छात्रावास

बच्चो को संस्कारों से सज्जित, नवीन एवं सकारात्मक दिशा प्राप्त हो इस हेतु आपकी पावन प्रेरणा एवं मंगल आशीर्वाद से रेवाड़ी में “अकलंक शरणालय छात्रावास” की स्थापना हुई है| यहाँ बच्चे उच्च सिक्षा के साथ धर्म की शिक्षा भी ग्रहण कर रहें हैं| 

कृतियाँ

आपने चाहे प्राकृत हो संस्कृत हो अथवा अंग्रेजी सभी भाषाओं में अनुपम एवं अद्वितीय कृतियों की रचना की है| प्रतिक्रमण ग्रंथत्रयी, दार्शनिक प्रतिक्रमण, तिथ्यर भावणा, बरसाणु पेक्खा (कादम्बनी टीका), स्तुति पथ, प्रश्नोत्तर रत्नमालिका, अर्चना पथ, पाइए सिक्खा, अनासक्त महायोगी, श्री वर्धमान स्त्रोत, अर्न्तगूंज बेटा, नयी छहढाला, जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, मनोविज्ञान, लोक विज्ञान, Fact of Fate, Talk for Learners आदि 80 से भी अधिक कृतियों की रचना की है|

भक्तों के निवेदन पर आपके द्वारा रचित सम्पूर्ण साहित्य को इस वेबसाईट पर संकलित करने एवं संयोजित करने का प्रयास किया जा रहा है| आगामी समय में मुनि श्री द्वारा रचित सम्पूर्ण साहित्य, भजन एवम् विडिओ आपको इस वेबसाईट पर उपलब्ध रहेंगे|                 

Sunday, March 21, 2021

जन्म राशि के अनुसार तिलक का प्रयोग

 राशि के हिसाब से तिलक लगाने से राशि का स्वामी ग्रह प्रबल होता है और व्यक्ति को बहुत से लाभ मिलते हैंं. इससे व्यक्ति के शरीर में बहुत तेजी से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वो पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी भी काम को करता है ।

जब भी आप पूजा-पाठ के दौरान माथे पर तिलक लगाते होंगे तो आपको अंदर से एक सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता होगा. दरअसल धार्मिक दृष्टि से माथे के बीच का स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. मान्यता है कि इस जगह पर आज्ञाचक्र होता है, जिसे ऊर्जा का केंद्र माना जाता है. तिलक लगाने से ये चक्र उद्दीप्त होता है. जिसकी वजह से व्यक्ति का मन शांत और एकाग्र होता है. इसके अलावा मस्तक के बीच के स्थान को त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है क्योंकि यही स्थान शरीर की तीन नाड़ियों के मिलन का भी केंद्र होता है.


माथे पर तिलक लगाने से व्यक्ति में तेज की वृद्धि होती है और वो स्वयं को ऊर्जावान महसूस करता है. धार्मिक रूप से हम सब रोली, हल्दी, चंदन, भस्म, कुमकुम आदि का तिलक लगाते हैं. लेकिन ज्योतिष विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तिलक अपनी राशि के अनुसार लगाया जाए तो ये कहीं ज्यादा प्रभावी होता है. इसे लगाने से राशि का स्वामी ग्रह प्रबल होता है और व्यक्ति को बहुत से लाभ मिलते हैंं. इससे व्यक्ति के शरीर में बहुत तेजी से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वो पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी भी काम को करता है. इससे उसकी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की के योग का निर्माण होता है. यहां जानिए राशि के हिसाब से कौन सा तिलक लगाना चाहिए.



मेष : इस राशि वालों को हमेशा लाल कुमकुम या रोली का तिलक लगाना चाहिए क्योंकि मेष का स्वामी मंगल होता है. मंगल का रंग लाल माना गया है.


वृष : ये शुक्र के स्वामित्व वाली राशि है. ऐसे लोगों को मस्तक पर सफेद चंदन लगाना चाहिए. अगर सफेद चंदन न हो तो दही से मस्तक पर तिलक लगा सकते हैं.


मिथुन : मिथुन राशि वालों के लिए अष्टगंध का तिलक लगाना बहुत शुभ माना गया है. अष्टगंध आठ गंधद्रव्यों का संग्रह होता है. ये दो तरह का होता है शैव और वैष्णव. गृहस्थ लोगों को शैव अष्टगंध का प्रयोग करना चाहिए.


कर्क : इस राशि का स्वामी चंद्रमा है. चंद्रमा का रंग सफेद होता है. ऐसे लोगों को सफेद रंग का चंदन मस्तक पर लगाना चाहिए.


सिंह : सिंह राशि वालों का स्वामी सूर्य है. ऐसे लोगां को लाल रंग के कुमकुम या रोली का तिलक लगाना चाहिए.


कन्या : इस राशि का स्वामी भी बुध है. ऐसे लोगों को भी अष्टगंध का तिलक लगाने से काफी लाभ होता है.


तुला : शुक्र ग्रह तुला राशि का स्वामी होता है. इस राशि के जातक भी सफेद चंदन या दही का तिलक लगाएं.


वृश्चिक : मंगल ग्रह के स्वामित्व वाली इस राशि के जातकों को लाल रंग का तिलक मस्तक पर लगाना चाहिए.


धनु : धनु राशि के स्वामी गुरू बृहस्पति हैं. ऐसे लोगों को पीला चंदन या हल्दी को मस्तक पर लगाना चाहिए.


मकर : मकर राशि के स्वामी शनिदेव हैं. इन लोगों को काली भस्म या काला काजल मस्तक पर लगाना चाहिए.


कुंभ : इस राशि के लोगों को भी काली भस्म या काजल ही माथे पर लगाना चाहिए क्योंकि कुंभ राशि के स्वामी भी शनिदेव हैं.


मीन : ये राशि बृहस्पति के स्वामित्व वाली राशि है. ऐसे लोगों को पीला चंदन, केसर या हल्दी का तिलक लगाना चाहिए.

Saturday, March 13, 2021

मंत्रों के प्रयोग

 *मुख्य मंत्रों के  9 भेद*


(1)  *स्तम्भण मंत्र* 

(2)  *मोहन मंत्र*

(3)  *उच्चाटन मंत्र*

(4)  *वश्याकर्षण मंत्र*

(5)  *जृम्भण मंत्र*

(6)  *विद्वेषण मंत्र*

(7)  *मारण मंत्र*

(8)  *शांति मंत्र*

(9)  *पौष्टिक मंत्र*


1 *स्तम्भन* - *जिन मंत्र ध्वनियों के द्वारा सर्प , व्याघ्र, सिंह, आदि ,भूत, प्रेत , पिशाच, आदि दैविक बाधाओं को , शत्रु सेना के आक्रमण को जहां के तहां निष्क्रिय कर स्तम्भित (कील) देना मंत्र का फल है।*


(2) *मोहन* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा किसी को भी मोहित कर दिया जाये वह मोहन मंत्र है।*


(3) *उच्चाटन* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा किसी के मन को अस्थिर, उल्लास रहित एवं विक्षिप्त, निरुत्साहित, स्थानभ्रष्ट हो जाये वह उच्चाटन मंत्र है।*


(4) *वश्याकर्षण*- *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा इच्छित वस्तु या व्यक्ति वश में हो जाये, किसी का विपरीत मन भी बदल जाये वह वश्याकर्षणमंत्र है।*


(5) *जृम्भण मंत्र* - *जिन  मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा शत्रु , भूत ,प्रेत, व्यंतर, भी भयभीत हो वह मंत्र जृम्भण मंत्र है।*


(6) *विद्वेषण मंत्र* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा कुटुम्ब, जाति, देश, समाज, राष्ट्रादि में कलह वैमनस्य हो जाये वह विद्वेषण मंत्र है।*


(7) *मारण मंत्र* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा शत्रु, प्रतिकूल व्यक्तियों के प्राणों का वियोग हो वह मारण मंत्र है।*


(8) *शांति मंत्र* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा भंयकर व्याधि, व्यंतर, भूत-पिशाचों की पीडा, क्रूर ग्रह - जंगम स्थावर, विष बाधा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्षादि, ईतियों और चोर आदि का भय शांत हो वह शान्तिमंत्र है।*


(9) *पौष्टिक मंत्र*- *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा सुख समाग्रियों की प्राप्ति, सन्तान आदि की प्राप्ति हो वह मंत्र पौष्टिक मंत्र है।*


** *वश्य, आकर्षण , उच्चाटन मंत्र में हूं का प्रयोग किया जाता है।*


** *स्तम्भण , विद्वेषण ,मोहन मंत्र में नम: का प्रयोग किया जाता है।*


** *पौष्टिक मंत्र के लिए वषट् का प्रयोग किया जाता है।*


** *मारण मंत्र में फट् का प्रयोग किया जाता है।*


** *मंत्र के अन्त में स्वाहा शब्द पाप नाशक ,मंगलकारक, तथा आत्मा की आंतरिक शांति को उद्बुद्ध करने वाला बतलाया है।**



Monday, March 1, 2021

आर्त ध्यान का विश्लेषण

 *आर्त ध्यान*


पीड़ा से उत्पन्न हुए ध्यान को आर्तध्यान कहते हैं। इसके चार भेद हैं-विष, वंटक, शत्रु आदि अप्रिय पदार्थों का संयोग हो जाने पर ‘वे कैसे दूर हों’ इस प्रकार चिन्ता करना प्रथम अनिष्ट-संयोगज आर्तध्यान है। अपने इष्ट-पुत्र, स्त्री और धनादिक के वियोग हो जाने पर उसकी प्राप्ति के लिए निरन्तर चिन्ता करना द्वितीय इष्टवियोगज आर्तध्यान है। वेदना के होने पर उसे दूर करने के लिए सतत चिन्ता करना तीसरा वेदनाजन्य आर्तध्यान है। आगामी काल में विषयों की प्राप्ति के लिए निरन्तर चिन्ता करना चौथा निदानज आर्तध्यान है। यह आर्तध्यान छठे गुणस्थान तक हो सकता है। छठे में निदान नाम का आर्तध्यान नहीं हो सकता है।


ये ध्यान दुर्ध्यान में आता है । जो नरक का मार्ग दिखाता है ।


आर्त ध्यान - चार प्रकार का होता है ।


1. अनिष्ट का संयोग -2 .इष्ट का वियोग ,3.वेदना 4.निदान ।


           *अनिष्ट संयोग*

स्वयं की अपेक्षा, आशा, इच्छा , आवश्यकता, मनसा के अनुरूप वस्तु, व्यक्ति,पदार्थ, आदि की प्राप्ति ना होंना अपितु अनेच्छिक ही मन मारकर मजबूरी में कार्य करना कराना आदि का उपस्थित होना, उसका चिंतन करना अनिष्ट संयोग नामक आर्त ध्यान है ।

*इष्ट वियोगज*

अपने प्राणों से प्रिय -मित्र, बन्धु,परिजन,पति, स्त्री,पुत्र, धन, भवन-वाहन, सत्ता, उत्तराधिकार आदि जिसे जीवन में सबसे अधिक महत्व दिया हो प्रिय माना हो उनके वियोग हो जाने पर उनका बार-बार चिंतन करना 

इष्ट वियोगज नामक आर्त ध्यान है । 


*वेदना जन्य*

शारीरिक-मानसिक-वाचनिक वेदना के उत्पन्न होने पर उससे निजात पाने के उपाय का चिंतन करना वेदना जन्य आर्त ध्यान है ।


       *निदानज*

इस जन्म की अवस्थाओं में जो प्राप्त नहीं हुआ उसे अगली अवस्था में प्राप्ति का चिंतन एवं इस भव में अप्राप्त इच्छाओं, वैभव, सुख, अभिलाषाओं,  की प्राप्ति की कामना आगामी काल ,भव, जन्म में करना कि ये मुझे प्राप्त हो, ये वस्तु मेरे पास होना चाहिए आदि अनेक चिंतन करना निदानज आर्त ध्यान है ।


सर्व प्रकार के धर्म एक ध्यान में अंतर्भूत हैं

द्रव्यसंग्रह टीका/47

*दुविहं पि मोक्खहेउं ज्झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा। तम्हा पयत्तचित्ता जूयं झाणं समब्भसह।47।*

=मुनिध्यान के करने से जो नियम से निश्चय व व्यवहार दोनों प्रकार के मोक्षमार्ग को पाता है, इस कारण तुम चित्त को एकाग्र करके उस ध्यान का अभ्यास करो।( तत्त्वानुशासन/33 )


अतः ज्ञानी जीव को आर्त ध्यान का परित्याग करना चाहिए । यह सीधा नरक तक ले जाता है ।


डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य 

कला एवं मानविकी संकायाध्यक्ष(डीन)

विभागाध्यक्ष संस्कृत विभाग 

एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्यप्रदेश

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...