Monday, May 24, 2021

गुरुकुल शिक्षा प्रणाली और आधुनिक शिक्षा प्रणाली एक चिंतन

 *आर्यावर्त भारत वर्ष से* 

*गुरुकुल कैसे खत्म हो गये*


आपको पहले ये बता दें कि 

हमारे सनातन संस्कृति परम्परा के 

गुरुकुल में 

क्या क्या पढ़ाई होती थी ! 


आर्यावर्त के गुरुकुल के बाद 

ऋषिकुल में क्या पढ़ाई होती थी 

यह जान लेना आवश्यक है । 


इस शिक्षा को लेकर अपने विचारों में 

परिवर्तन लायें और 

कृपया

प्रचलित भ्रान्तियों को दूर करें !


*वैज्ञानिक विद्यायें* 


०१ अग्नि विद्या (Metallurgy)

०२ वायु विद्या (Flight) 

०३ जल विद्या (Navigation) 

०४ अन्तरिक्ष विद्या (Space Science) 

०५ पृथ्वी विद्या (Environment)

०६ सूर्य विद्या (Solar Study) 

०७ चन्द्र व लोक विद्या (Lunar Study) 

०८ मेघ विद्या (Weather Forecast) 

०९ पदार्थ विद्युत विद्या (Battery) 

१० सौर ऊर्जा विद्या (Solar Energy) 

११ दिन रात्रि विद्या 

१२ सृष्टि विद्या (Space Research) 

१३ खगोल विद्या (Astronomy) 

१४ भूगोल विद्या (Geography) 

१५ काल विद्या (Time) 

१६ भूगर्भ विद्या (Geology Mining) 

१७ रत्न व धातु विद्या (Gems & Metals)

१८ आकर्षण विद्या (Gravity) 

१९ प्रकाश विद्या (Solar Energy) 

२० तार विद्या (Communication) 

२१ विमान विद्या (Plane)

२२ जलयान विद्या (Water Vessels) 

२३ अग्नेय अस्त्र विद्या (Arms & Ammunition)

२४ जीव जन्तु विज्ञान विद्या (Zoology Botany) 

२५ यज्ञ विद्या (Material Sic)


ये तो बातें हुई 

*वैज्ञानिक विद्याओं* की । 


अब बात करते हैं 

*व्यावसायिक और तकनीकी* *विद्या* की !


२६ वाणिज्य (Commerce)

२७ कृषि (Agriculture)

२८ पशुपालन (Animal Husbandry) 

२९ पक्षीपालन (Bird Keeping) 

३० पशु प्रशिक्षण (Animal Training) 

३१ यान यन्त्रकार (Mechanics) 

३२ रथकार (Vehicle Designing) 

३३ रतनकार (Gems) 

३४ सुवर्णकार (Jewellery Designing)

३५ वस्त्रकार (Textile) 

३६ कुम्भकार (Pottery) 

३७ लोहकार (Metallurgy)

३८ तक्षक

३९ रङ्ग साज (Dying) 

४० खटवाकर 

४१ रज्जुकर (Logistics)

४२ वास्तुकार (Architect)

४३ पाक विद्या (Cooking)

४४ सारथ्य (Driving)

४५ नदी प्रबन्धक (Water Management)

४६ सुचिकार (Data Entry)

४७ गोशाला प्रबन्धक (Animal Husbandry)

४८ उद्यान पाल (Horticulture)

४९ वन पाल (Horticulture)

५० नापित (Paramedical)


यह सभी विद्यायें 

*गुरुकुल में* सिखाई जाती थीं 


पर समय के साथ गुरुकुल लुप्त हुए तो 

यह सभी विद्यायें भी लुप्त होती गयी ! 


आज मैकाले पद्धति से 

हमारे देश के युवाओं का भविष्य नष्ट हो रहा है


तब ऐसे समय में गुरुकुल के 

पुनः उद्धार की आवश्यकता है।


भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गये ? 


कॉन्वेण्ट स्कूलों ने किया बर्बाद । 


1858 में 

Indian Education Act 

बनाया गया। 


इसकी ड्राफ्टिंग ‘लोर्ड मैकाले’ ने की थी। 


लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के 

शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, 


उसके पहले भी कई अङ्गरेजों ने 

भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में 

अपनी रिपोर्ट दी थी। 


अङ्गरेजों का एक अधिकारी था 

*G.W. Luther* और 

दूसरा था 

*Thomas Munro* ! 


*लूथर और मुनरो* 

दोनों ने अलग अलग इलाकों का 

अलग-अलग समय सर्वे किया था। 


*LUTHER* 

जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, 

उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और 


*MUNARO* 

जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, 

उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है ।


मैकाले का स्पष्ट कहना था कि 

भारत को हमेशा-हमेशा के लिए 

अगर गुलाम बनाना है तो 


इसकी 

“देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” 

को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और 


उसकी जगह 

“अँग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” 

लानी होगी और 

तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी 

लेकिन दिमाग से अङ्ग्रेज पैदा होंगे और 

जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो 

हमारे हित में काम करेंगे । 


मैकाले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है - 


“कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले 

पूरी तरह जोत दिया जाता है 

वैसे ही इसे जोतना होगा और 

अँग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।” 


इस लिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को 

गैरकानूनी घोषित किया । 


जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो 

उनको मिलने वाली सहायता 

जो समाज की तरफ से होती थी 

वो गैरकानूनी हो गयी ।


फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और 

इस प्रकार से

इस देश के गुरुकुलों को 

घूम घूम कर ख़त्म कर दिया | 


उनमें आग लगा दी, 

उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को 

उसने मारा- पीटा, 

जेल में डाला। 


1850 तक इस देश में ’

7 लाख 32 हजार’ गुरुकुल हुआ करते थे 

और उस समय इस देश में गाँव थे ’

7 लाख 50 हजार’ । 

मतलब हर गाँव में औसतन 

एक गुरुकुल ।

और 

ये जो गुरुकुल होते थे 

वो सब के सब आज की भाषा में 

‘Higher Learning Institute’ 

हुआ करते थे । 


उन सबमें 18 विषय पढाया जाता था और 

ये गुरुकुल समाज के लोग मिलकर चलाते थे 

न कि राजा, महाराजा ।


गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। 


इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और 

फिर अँग्रेजी शिक्षा को 

कानूनी घोषित किया गया और 


कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया । 

उस समय इसे 

*‘फ्री स्कूल’* कहा जाता था 


इसी कानून के तहत भारत में 

*कलकत्ता यूनिवर्सिटी* 

बनाई गयी, 

*बम्बई यूनिवर्सिटी* बनाई गयी, 

*मद्रास यूनिवर्सिटी* बनाई गयी, 


ये तीनों ब्रिटिश गुलामी ज़माने के यूनिवर्सिटी 

आज भी देश में हैं !


मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी 

बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, 

उसमें वो लिखता है कि: 


“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे 

जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन 

दिमाग से अङ्ग्रेज होंगे और 


इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा । 

इनको अपने संस्कृति के बारे में 

कुछ पता नहीं होगा, 


इनको अपने परम्पराओं के बारे में 

कुछ पता नहीं होगा, 

इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, 


जब ऐसे बच्चे होंगे 

इस देश में तो 

अङ्ग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से 

अङ्ग्रेजियत नहीं जाएगी।” 


उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई 

इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है 

और उस एक्ट की महिमा देखिये कि 

हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है । 


अँग्रेजी में बोलते हैं तो

दूसरों पर रोब पड़ेगा । 

हम तो खुद में हीन हो गए हैं 


जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, 

दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा। 


लोगों का तर्क है कि 

अँग्रेजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है । 


दुनिया में 204 देश हैं और 

अँग्रेजी भाषा सिर्फ 

11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, 

फिर ये कैसे अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है ॽ  


शब्दों के मामले में भी 

अँग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। 

इन अङ्गरेजों की जो बाइबिल है 

वो भी अँग्रेजी में नहीं थी और 

ईसा मसीह अँग्रेजी नहीं बोलते थे। 

ईशा मसीह की भाषा और 

बाइबिल की भाषा 

अरमेक थी। 


अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो 

हमारे बङ्गला भाषा से मिलती जुलती थी । 

समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। 


*संयुक्त राष्ट्र संघ* 

जो अमेरिका में है 

वहाँ की भाषा अँग्रेजी नहीं है, 

वहाॅ का सारा काम फ्रेन्च में होता है। 


जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है 

उसका कभी भला नहीं होता 


और यही मैकाले की रणनीति थी ! 

जिसमें लगभग वो विजय पा चुके हैं


क्योंकि आज के हमारे युवा 

भारतीय बच्चों को

भारतीयता कम 

यूरोप की ज्यादा जानकारी है 


हमारे भारतीय बच्चे

विदेशी मुद्राओं 

और 

विदेशी वस्तुओं के प्रयोग के कारण 

हमारी भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति को 

ढकोसला समझते हैं 

लेकिन पाश्चात्य देशों की नकल करते हैं ।  


सनातन धर्म की प्रमुखता और विशेषता को 

न जानते हुए भी 

वामपन्थियों का समर्थन करते हैं।


सभी वैदिक भारतीय सनातनियों से 

एक चुभता सवाल 


हम सभी भारतीयों को 

*सनातन वैदिक धर्म* की जानकारी होनी चाहिये । 


क्योंकि 

वैदिक साहित्य सनातन धर्म ही 

हमें *राष्ट्र धर्म* सिखाती है, 


*राष्ट्र धर्म* ही हमें

सामूहिक परिवार में रहना ,

भारतीयता ,

देशभक्ति और सामाजिकता सिखाती है, 


*राष्ट्र धर्म* ही हमें 

माता - पिता, और  गुरु 

के प्रति कर्तव्य 

और 

राष्ट्र के प्रति प्राण न्योछावर करने की 

प्रेरणा देती है। 


वैदिक सनातन परम्परा एक 

आध्यात्मिक विज्ञान है, 


जिस विज्ञान को हम सभी आज जानते हैं 

उससे हमारा बहुत ही समृद्ध  विज्ञान ही 

अध्यात्म है ।


*जयतु गुरुकुलम् , जयतु भारतम् ...*

*स्वदेशी शिक्षा अभियान...*

Friday, May 14, 2021

वैदिक धर्म की महत्वपूर्ण जानकारी

 #हिंदुओं #जानो #अपने #धर्म और #संस्कृति के #बारे #मे


*पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -*

*1. युधिष्ठिर    2. भीम    3. अर्जुन*

*4. नकुल।      5. सहदेव*


*( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )*


*यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन*

*की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।*


*वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..*

*कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -*

*1. दुर्योधन      2. दुःशासन   3. दुःसह*

*4. दुःशल        5. जलसंघ    6. सम*

*7. सह            8. विंद         9. अनुविंद*

*10. दुर्धर्ष       11. सुबाहु।   12. दुषप्रधर्षण*

*13. दुर्मर्षण।   14. दुर्मुख     15. दुष्कर्ण*

*16. विकर्ण     17. शल       18. सत्वान*

*19. सुलोचन   20. चित्र       21. उपचित्र*

*22. चित्राक्ष     23. चारुचित्र 24. शरासन*

*25. दुर्मद।       26. दुर्विगाह  27. विवित्सु*

*28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ*

*31. नन्द।        32. उपनन्द   33. चित्रबाण*

*34. चित्रवर्मा    35. सुवर्मा    36. दुर्विमोचन*

*37. अयोबाहु   38. महाबाहु  39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग  42. भीमबल*

*43. बालाकि    44. बलवर्धन 45. उग्रायुध*

*46. सुषेण       47. कुण्डधर  48. महोदर*

*49. चित्रायुध   50. निषंगी     51. पाशी*

*52. वृन्दारक   53. दृढ़वर्मा   54. दृढ़क्षत्र*

*55. सोमकीर्ति  56. अनूदर    57. दढ़संघ 58. जरासंघ   59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक*

*61. उग्रश्रवा   62. उग्रसेन     63. सेनानी*

*64. दुष्पराजय        65. अपराजित* 

*66. कुण्डशायी        67. विशालाक्ष*

*68. दुराधर   69. दृढ़हस्त    70. सुहस्त*

*71. वातवेग  72. सुवर्च    73. आदित्यकेतु*

*74. बह्वाशी   75. नागदत्त 76. उग्रशायी*

*77. कवचि    78. क्रथन। 79. कुण्डी* 

*80. भीमविक्र 81. धनुर्धर  82. वीरबाहु*

*83. अलोलुप  84. अभय  85. दृढ़कर्मा*

*86. दृढ़रथाश्रय    87. अनाधृष्य*

*88. कुण्डभेदी।     89. विरवि*

*90. चित्रकुण्डल    91. प्रधम*

*92. अमाप्रमाथि    93. दीर्घरोमा*

*94. सुवीर्यवान     95. दीर्घबाहु*

*96. सुजात।         97. कनकध्वज*

*98. कुण्डाशी        99. विरज*

*100. युयुत्सु*


*( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,*

*जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )*


*"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-*


*ॐ . किसको किसने सुनाई?*

*उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।* 


*ॐ . कब सुनाई?*

*उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।*


*ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?*

*उ.- रविवार के दिन।*


*ॐ. कोनसी तिथि को?*

*उ.- एकादशी* 


*ॐ. कहा सुनाई?*

*उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।*


*ॐ. कितनी देर में सुनाई?*

*उ.- लगभग 45 मिनट में*


*ॐ. क्यू सुनाई?*

*उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।*


*ॐ. कितने अध्याय है?*

*उ.- कुल 18 अध्याय*


*ॐ. कितने श्लोक है?*

*उ.- 700 श्लोक*


*ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?*

*उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।* 


*ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा* 

*और किन किन लोगो ने सुना?*

*उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने*


*ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?*

*उ.- भगवान सूर्यदेव को*


*ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?*

*उ.- उपनिषदों में*


*ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?*

*उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।*


*ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?*

*उ.- गीतोपनिषद*


*ॐ. गीता का सार क्या है?*

*उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना*


*ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?*

*उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574*

*अर्जुन ने- 85* 

*धृतराष्ट्र ने- 1*

*संजय ने- 40.*


*अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद*


*अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।*


*33 करोड नहीँ  33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू*

*धर्म मेँ।*


*कोटि = प्रकार।* 

*देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,*


*कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।*


*हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...*


*कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-*


*12 प्रकार हैँ*

*आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,*

*शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,*

*सविता, तवास्था, और विष्णु...!*


*8 प्रकार हे :-*

*वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।*


*11 प्रकार है :-* 

*रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,*

*अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,*

*रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।*


*एवँ*

*दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।*


*कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी* 


*अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है*

*तो इस जानकारी को अधिक से अधिक*

*लोगो तक पहुचाएं। ।*


*🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏*


*१ हिन्दु हाेने के नाते जानना ज़रूरी है*


*THIS IS VERY GOOD INFORMATION FOR ALL OF US ... जय श्रीकृष्ण ...*


*अब आपकी बारी है कि इस जानकारी*

 *को आगे बढ़ाएँ ......*


*अपनी भारत की संस्कृति* 

*को पहचाने.*

*ज्यादा से ज्यादा*

*लोगो तक पहुचाये.* 

*खासकर अपने बच्चो को बताए* 

*क्योकि ये बात उन्हें कोई नहीं* *बताएगा...*


*📜😇  दो पक्ष-*


*कृष्ण पक्ष ,* 

*शुक्ल पक्ष !*


*📜😇  तीन ऋण -*


*देव ऋण ,* 

*पितृ ऋण ,* 

*ऋषि ऋण !*


*📜😇   चार युग -*


*सतयुग ,* 

*त्रेतायुग ,*

*द्वापरयुग ,* 

*कलियुग !*


*📜😇  चार धाम -*


*द्वारिका ,* 

*बद्रीनाथ ,*

*जगन्नाथ पुरी ,* 

*रामेश्वरम धाम !*


*📜😇   चारपीठ -*


*शारदा पीठ ( द्वारिका )*

*ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )* 

*गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,* 

*शृंगेरीपीठ !*


*📜😇 चार वेद-*


*ऋग्वेद ,* 

*अथर्वेद ,* 

*यजुर्वेद ,* 

*सामवेद !*


*📜😇  चार आश्रम -*


*ब्रह्मचर्य ,* 

*गृहस्थ ,* 

*वानप्रस्थ ,* 

*संन्यास !*


*📜😇 चार अंतःकरण -*


*मन ,* 

*बुद्धि ,* 

*चित्त ,* 

*अहंकार !*


*📜😇  पञ्च गव्य -*


*गाय का घी ,* 

*दूध ,* 

*दही ,*

*गोमूत्र ,* 

*गोबर !*


*📜😇  पञ्च देव -*


*गणेश ,* 

*विष्णु ,* 

*शिव ,* 

*देवी ,*

*सूर्य !*


*📜😇 पंच तत्त्व -*


*पृथ्वी ,*

*जल ,* 

*अग्नि ,* 

*वायु ,* 

*आकाश !*


*📜😇  छह दर्शन -*


*वैशेषिक ,* 

*न्याय ,* 

*सांख्य ,*

*योग ,* 

*पूर्व मिसांसा ,* 

*दक्षिण मिसांसा !*


*📜😇  सप्त ऋषि -*


*विश्वामित्र ,*

*जमदाग्नि ,*

*भरद्वाज ,* 

*गौतम ,* 

*अत्री ,* 

*वशिष्ठ और कश्यप!* 


*📜😇  सप्त पुरी -*


*अयोध्या पुरी ,*

*मथुरा पुरी ,* 

*माया पुरी ( हरिद्वार ) ,* 

*काशी ,*

*कांची* 

*( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,* 

*अवंतिका और* 

*द्वारिका पुरी !*


*📜😊  आठ योग -* 


*यम ,* 

*नियम ,* 

*आसन ,*

*प्राणायाम ,* 

*प्रत्याहार ,* 

*धारणा ,* 

*ध्यान एवं* 

*समाधि !*


*📜😇 आठ लक्ष्मी -*


*आग्घ ,* 

*विद्या ,* 

*सौभाग्य ,*

*अमृत ,* 

*काम ,* 

*सत्य ,* 

*भोग ,एवं* 

*योग लक्ष्मी !*


*📜😇 नव दुर्गा --*


*शैल पुत्री ,* 

*ब्रह्मचारिणी ,*

*चंद्रघंटा ,* 

*कुष्मांडा ,* 

*स्कंदमाता ,* 

*कात्यायिनी ,*

*कालरात्रि ,* 

*महागौरी एवं* 

*सिद्धिदात्री !*


*📜😇   दस दिशाएं -*


*पूर्व ,* 

*पश्चिम ,* 

*उत्तर ,* 

*दक्षिण ,*

*ईशान ,* 

*नैऋत्य ,* 

*वायव्य ,* 

*अग्नि* 

*आकाश एवं* 

*पाताल !*


*📜😇  मुख्य ११ अवतार -*


 *मत्स्य ,* 

*कच्छप ,* 

*वराह ,*

*नरसिंह ,* 

*वामन ,* 

*परशुराम ,*

*श्री राम ,* 

*कृष्ण ,* 

*बलराम ,* 

*बुद्ध ,* 

*एवं कल्कि !*


*📜😇 बारह मास -* 


*चैत्र ,* 

*वैशाख ,* 

*ज्येष्ठ ,*

*अषाढ ,* 

*श्रावण ,* 

*भाद्रपद ,* 

*अश्विन ,* 

*कार्तिक ,*

*मार्गशीर्ष ,* 

*पौष ,* 

*माघ ,* 

*फागुन !*


*📜😇  बारह राशी -* 


*मेष ,* 

*वृषभ ,* 

*मिथुन ,*

*कर्क ,* 

*सिंह ,* 

*कन्या ,* 

*तुला ,* 

*वृश्चिक ,* 

*धनु ,* 

*मकर ,* 

*कुंभ ,*

*मीन!*


*📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग -* 


*सोमनाथ ,*

*मल्लिकार्जुन ,*

*महाकाल ,* 

*ओमकारेश्वर ,* 

*बैजनाथ ,* 

*रामेश्वरम ,*

*विश्वनाथ ,* 

*त्र्यंबकेश्वर ,* 

*केदारनाथ ,* 

*घुष्नेश्वर ,*

*भीमाशंकर ,*

*नागेश्वर !*


*📜😇 पंद्रह तिथियाँ -*


*प्रतिपदा ,*

*द्वितीय ,*

*तृतीय ,*

*चतुर्थी ,* 

*पंचमी ,* 

*षष्ठी ,* 

*सप्तमी ,* 

*अष्टमी ,* 

*नवमी ,*

*दशमी ,* 

*एकादशी ,* 

*द्वादशी ,* 

*त्रयोदशी ,* 

*चतुर्दशी ,* 

*पूर्णिमा ,* 

*अमावास्या !*


*📜😇 स्मृतियां -* 


*मनु ,* 

*विष्णु ,* 

*अत्री ,* 

*हारीत ,*

*याज्ञवल्क्य ,*

*उशना ,* 

*अंगीरा ,* 

*यम ,* 

*आपस्तम्ब ,* 

*सर्वत ,*

*कात्यायन ,* 

*ब्रहस्पति ,* 

*पराशर ,* 

*व्यास ,* 

*शांख्य ,*

*लिखित ,* 

*दक्ष ,* 

*शातातप ,* 

*वशिष्ठ !*


हिन्दू धर्म की 10 महत्वपूर्ण बातें ........


१...10 ध्वनियां :  1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग


२,,,,10 कर्तव्य:- 1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार। आओ जानते हैं इन सभी को विस्तार से।


३,,,,10 दिशाएं : दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं।


४....10 दिग्पाल : 10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।


५.….10 देवीय आत्मा : 1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर।


६.....10 देवीय वस्तुएं : 1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और संजीवनी बूटी।


७....10 पवित्र पेय : 1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस


८....10 महाविद्या : 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।


९....10 उत्सव : नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि।


१०...10 बाल पुस्तकें : 1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।


११....10 पूजा : गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा।


१२...10 धार्मिक स्थल : 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं।


१३..10 पूजा के फूल : आंकड़ा, गेंदा, पारिजात, चंपा, कमल, गुलाब, चमेली, गुड़हल, कनेर, और रजनीगंधा।


१४...10 धार्मिक सुगंध : गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली।


१५...10 यम-नियम :1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान।


१६...10 सिद्धांत : 

1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है, 

3.पुनर्जन्म होता है, 

4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है, 5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है, 6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है, 

7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है, 

8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है, 9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है, 

10.दान ही पुण्य है।


*इस पोस्ट को अधिकाधिक शेयर करें जिससे सबको हमारी संस्कृति का ज्ञान हो।*


Thursday, May 6, 2021

तीनों लोकों में स्थित अकृत्रिम जिन मंदिर चैत्यालय

 *तीनलोक के संपूर्ण अकृत्रिम चैत्यालय*

*१० भवनवासी संबंधी अकृत्रिम चैत्यालय*

👉असुरकुमार~देवों के भवनों में ६४ लाख चैत्यालय हैं।

👉नागकुमार~देवों के भवनों में ८४ लाख चैत्यालय हैं।

👉सुपर्णकुमार~देवों के भवनों में ७२ लाख चैत्यालय हैं।

👉द्वीपकुमार~देवों के भवनों में ७६ लाख चैत्यालय हैं।

👉दिक्कुमार~देवों के भवनों में ‌७६ लाख चैत्यालय हैं।

👉उदधिकुमार~देवों के भवनों में ७६ लाख चैत्यालय हैं।

👉स्तनिकुमार~देवों के भवनों में ७६ लाख चैत्यालय हैं।

👉विद्युतकुमार देवों के भवनोंमें ७६ लाख चैत्यालय हैं।

👉अग्निकुमार~देवों के भवनों में ७६ लाख‌ चैत्यालय हैं।

👉वायुकुमार~देवों के भवनों में ९६ लाख चैत्यालय हैं।

👉भवनवासी देवों संबंधी अकृत्रिम चैत्यालय की सम्पूर्ण संख्या ७ करोड़ ७२ लाख है।

👉व्यंतर देवों संबंधी सम्पूर्ण अकृत्रिम चैत्यालय असंख्यात हैं।

👉इस प्रकार उर्ध्व लोक के अकृत्रिम चैत्यालय‌‌ की संख्या ८४ ९७,०२३(चौरासी लाख सत्तानवें हजार तेईस) है।

👉मध्यलोक संबंधी सम्पूर्ण अकृत्रिम चैत्यालय की संख्या ४५८ है।

👉अधोलोक संबंधी संपूर्ण अकृत्रिम चैत्यालय की संख्या ७ करोड़ ७२ लाख है।

👉इस प्रकार ८४,९७,०२३+४५८+७,७२०००००=८ करोड़ ५६ लाख ९७ हजार ४८१ तीन लोकों के अकृत्रिम चैत्यालय‌‌ हैं।

👉इन तीनों लोकों के अकृत्रिम चैत्यालय‌‌ और उनमें विराजमान समस्त जिन~प्रतिमाओं को मेरा मन वचन काम से त्रिकाल में त्रिबार नमोस्तु 

महानायक चंद्रगुप्त मौर्य

 महाप्रतापी चंद्रगुप्त मौर्य "महान सम्राट" की भारतीय अवधारणा का साक्षात उदाहरण थे। अहर्निश जनकल्याण को समर्पित, अनुशासित, करूणावत्सल, उदार, योग्य प्रशासक, महान सेनानायक थे। वे जैन धर्म के अनुयायी थे। ईसापूर्व चौथी शती में जब ग्रीक आक्रमणों से भयभीत, छोटे छोटे टुकड़ों में बंटे देश को जोड़ कर चंद्रगुप्त मौर्य ने महान रणनीतिकार व कूटनीतिज्ञ, सर्वश्रेष्ठ महामंत्री व देशभक्त गुरू चाणक्य के आशीर्वाद, कृपा और सहायता से अखंड भारत की कल्पना को साकार किया। वह भारत का महानतम साम्राज्य था । उसके पौत्र अशोक ने उसमें केवल कलिंग और जोड़ा। यह भ्रम देशी व वामंपथी इतिहासकारों द्वारा फैलाया गया है कि भारतवर्ष को राजनीतिक एकता का पाठ अंग्रेजों ने पढ़ाया। यह गलत है। 

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जब चंद्रगुप्त मौर्य अपनी प्रांतीय उपराजधानी उज्जैन में ठहरे थे, तब जैनाचार्य भद्रबाहु श्रुतकेवली विशाल संघ सहित वहां पधारे। चंद्रगुप्त को उन्ही दिनों 16 स्वप्न दिखे। उनका फल भद्रबाहुस्वामी ने दुखद बताया और आचार्य भद्रबाहु ने निमित्त ज्ञान से जान लिया कि उत्तर भारत में 12 वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ने वाला है। महाराजाधिराज चंद्रगुप्त को वैराग्य हो गया। अपना मुकुट पुत्र बिंदुसार के सिर पर रख कर उन्होंने जिनदीक्षा ले ली, और आचार्य भद्रबाहु स्वामी के साथ वे दक्षिण में श्रवणबेलगोल चले गये, जहां मुनि भद्रबाहु स्वामी ने संल्लेखना ली। एकमात्र शिष्य चंद्रगुप्त जिनका दीक्षा पश्चात् नाम मुनिप्रभाचंद्र था, को छोड़ शेष को दक्षिण में पांड्य प्रदेश की ओर भेज दिया। अपने आपको महान सौभाग्यशाली व धन्य समझ इन्होंने गुरु की वैयावृत्ति आदि करते हुए संल्लेखना सहित समाधि करायी। चंद्रगुप्त मौर्य अंतिम मुकुटधारी सम्राट थे जिन्होंने जिनदीक्षा ली। श्रवणबेलगोल के चंद्रगिरि नामक पर्वत अथवा चिकबैट्ट पर आज भी भद्रबाहु गुफा स्थित है जहां भद्रबाहुस्वामी और मुनि श्री प्रभाचंद ने समाधि प्राप्त की और उनके चरण चिन्ह अंकित हैं।

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इतिहास की पुस्तकें इस बारे में मौन हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य  कठिनता से प्राप्त पाये साम्राज्य को छोड़ 50 वर्ष की उम्र में कहां चले गए थे। चंद्रगिरि पर्वत अथवा चिकबैट्ट पर स्थित 7वीं- 8वीं शती के पाश्र्वनाथ मंदिर अथवा चंद्रगुप्तबसदि के गर्भगृह द्वार के दोंनो ओर जालीदार पाषाण फलकों पर शिल्पांकिंत भद्रबाहुस्वामी और चंद्रगुप्त मौर्य की जीवन कथा से तथा इसी  पर्वत पर प्राप्त 7वीं शताब्दी के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती है। इस अभिलेख के अनुसार ’जो जैनधर्म भद्रबाहु और चन्द्रगुप्त मुनीन्द्र के तेज से भारी समृद्धि को प्राप्त हुआ था, उसके किंचित् क्षीण हो जाने पर शान्तिसेन मुनि ने उसे पुनः स्थापित किया। इन मुनियों ने बेलगोल पर्वत पर अन्न आदि का त्याग कर पुर्नजन्म को जीत लिया।’

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भद्रबाहुसचन्द्रगुप्तमुनीचन्द्रयुगमदिनोप्पेवल्।

भद्रमागिद धम्र्ममन्दु वलिक्केवन्दिनिसल्कलो।।

विद्रुमाधर शान्तिसेन-मुनीशनाक्किएवेल्गोल

अद्रिमेलशनादि विट्ट पुनर्भवक्केरे आगि...।।

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यह इतिहास की वह गुमी हुई कड़ी है जो चंद्रगुप्त मौर्य के अंतिम दिनों के बारे में बताती है। अनेक विद्वान अब इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। समय है कि देश इस तथ्य को जाने समझे। जैनशास्त्र स्पष्ट संकेत दे रहे थे कि चंद्रगुप्त मौर्य जैनमुनि हो गये थे। किंतु जैसा कि इतिहासवेत्ता राईस डेविड्स का कथन सटीक हैै कि ”चूंकि चन्द्रगुप्त जैन धर्मानुयायी हो गया था इसी कारण जैनेतरों द्वारा वह अगली दस शताब्दियों तक इतिहास में उपेक्षित ही बना रहा (बुद्धिस्ट इण्डिया, पृ 164)। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज का साक्ष्य भी पुष्ट करता है कि चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्मपालक थे। अजीब बात है कि अशोक का बौद्धधर्म को अपनाना और धम्मविजय, इतिहास में अनेक तरह से लिखी गई पर भारत के लिखित इतिहास के प्रथम महान सम्राट उनके पितामह चंद्रगुप्त मौर्य का अल्पायु में मोह माया छोड़ जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करने के बारे में इतिहास मौन रहा। विद्वान थाॅमस ने लिखा है - चंद्रगुप्त जैन थे (जर्नल आफ दि रियल सीरीज, लेख 8, जैन धर्म और अशोक का पूर्व धर्म)। प्रसिद्ध इतिहासकार विसेंट स्मिथ ने माना है कि लेविस राईस के द्वारा खोजे गये श्रवणबेलगोल के शिलालेखों को अविश्वसनीय मानना जैनों को समस्त परंपरा और उल्लेखों को अविश्वसनीय मानना है। मैं मानता हूं कि चंद्रगुप्त सिंहासन का त्याग कर जैनमुनि हो गये थे, मानने की परंपरा सत्य है (भारत का प्राचीन इतिहास, तृतीय संस्करण पृ. 146)


Friday, April 23, 2021

णमो उवज्झायाणं के जप से शक्ति का सृजन करिए

 *णमो उवज्झायाणं की जाप का अनुष्ठान का प्रभाव*


मंत्र शास्त्रों के अनुसार  बीजाक्षरों का प्रभाव 


 ✍️ ©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष ,संस्कृत विभाग एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्य प्रदेश 


मैं केवल अभी णमो उवज्झायाणं मंत्र का बीजाक्षरी प्रभाव को लिख रहा हूँ । जो कि अभी बहुत कार गार है । 

कोरोना काल में इसका आराधन सकारात्मकता भर देगा । जो हमारी धमनियों मांशपेशियों एवं मस्तिष्क को एकाग्र कर चित्त में स्थिरता प्रदान करेगा । हर बीमारी का उपचार भगवान महावीर स्वामी ने वचनं ओषधि बताया है। अतः सभी को धैर्य के वचनों से ,सकारात्मक ऊर्जा रूप वचनों से,सम्बल के वचनों से अभिसिंचित करें ।किसी का मनोबल ना गिरने दें यही उपचार जीवनरक्षक ,जीवन दायक है । साथ ही इस मंत्र का जाप करें । चाहे तो आप सम्पूर्ण णमोकार मंत्र की जाप करें । मैंने तो केवल णमोकार के एक अंश का बीजाक्षर सहित प्रभाव एवं फल को बताया है ।

इसको पूर्ण स्वासोच्छवास के साथ अभ्यास में लाएं

नमो शब्द पर स्वांस ऊपर को लें थोड़ा रुकें एवं उवज्झायाणं पर छोड़ें।

पुनः ऐसा करें ।जितनी बार कर सकें उतनी बार करें ।



ण= शांति सूचक, शक्ति का केंद्र

म= लौकिक अलौकिक सिद्धि दायक

ओ=कार्य साधक , निर्जरा कारक

उ =विशेष शक्ति प्रदायक ,

व= विपत्ति रोधक, रोग शामक एवं रोग हर्ता

ज=आधि व्याधि 

 झा= सर्व व्याधि नाशक ,शक्ति संचयक 

य=  शांति प्रदायक

अ =शक्ति द्योतक 

ण= शांति सूचक, शक्ति स्फोटक 

म =सिद्धिदायक


सभी लोग आराधना अवश्य करें ।

एक मंत्र जो आपको बीमारी से बचा सकता है

 *णमो उवज्झायाणं की जाप का अनुष्ठान का प्रभाव*


मंत्र शास्त्रों के अनुसार  बीजाक्षरों का प्रभाव 


 ✍️ ©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष ,संस्कृत विभाग एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्य प्रदेश 


मैं केवल अभी णमो उवज्झायाणं मंत्र का बीजाक्षरी प्रभाव को लिख रहा हूँ । जो कि अभी बहुत कार गार है । 

कोरोना काल में इसका आराधन सकारात्मकता भर देगा । जो हमारी धमनियों मांशपेशियों एवं मस्तिष्क को एकाग्र कर चित्त में स्थिरता प्रदान करेगा । हर बीमारी का उपचार भगवान महावीर स्वामी ने वचनं ओषधि बताया है। अतः सभी को धैर्य के वचनों से ,सकारात्मक ऊर्जा रूप वचनों से,सम्बल के वचनों से अभिसिंचित करें ।किसी का मनोबल ना गिरने दें यही उपचार जीवनरक्षक ,जीवन दायक है । साथ ही इस मंत्र का जाप करें । चाहे तो आप सम्पूर्ण णमोकार मंत्र की जाप करें । मैंने तो केवल णमोकार के एक अंश का बीजाक्षर सहित प्रभाव एवं फल को बताया है ।



ण= शांति सूचक, शक्ति का केंद्र

म= लौकिक अलौकिक सिद्धि दायक

ओ=कार्य साधक , निर्जरा कारक

उ =विशेष शक्ति प्रदायक ,

व= विपत्ति रोधक, रोग शामक एवं रोग हर्ता

ज=आधि व्याधि 

 झा= सर्व व्याधि नाशक ,शक्ति संचयक 

य=  शांति प्रदायक

अ =शक्ति द्योतक 

ण= शांति सूचक, शक्ति स्फोटक 

म =सिद्धिदायक


सभी लोग आराधना अवश्य करें ।

ताँबे का वायरस पर वैज्ञानिक, आयुर्वेदिक एवं ज्योतिषीय प्रभाव

 ताँबे का आयुर्वेदिक एवं ज्योतिषी प्रभाव


आयुर्वेद में ऐसी मान्यता है कि तांबे के बर्तन का पानी तीन दोषों वात, कफ और पित्त को संतुलित रखकर आपके पेट और गले से जुड़ीं बीमारियों को काफी हद तक ठीक करने में मदद करता है। आपको रोजाना सुबह खाली पेट तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना चाहिए। 


*पुराने समय में लोग ताँबे के सिक्कों को नदी में डालने की सलाह देते थे  जिससे नदी का प्रदूषण समाप्त हो जाता था ।*

*जब भारत में बहुत वर्षों पहले महामारी फ्लू के रुप में आई थी तब लोगों ने ताम्र के पात्रों का प्रयोग किया और महामारी को हराया भी क्योंकि तांबा ही ऐसी धातु है जो सबसे ज्यादा एंटी ऑक्सीडेंट है जिस पर किसी भी विषाणु का प्रभाव नहीं पड़ता ।अब यही बात ब्रिटेन के वैज्ञानिक की-बिल भी अपनी रिसर्च में  कह रहे हैं कि covid-19 ही नहीं अपितु उसके परिवार के अन्य विषाणु भी यदि ताँबे के संपर्क में आते हैं तो उनका प्रभाव ताँबे के संयोग से नष्ट हो जाता  है*।

*कोरोना वायरस के अलग-अलग सतहों पर जिंदा रहने के समय को लेकर दुनियाभर में लगातार शोध चल रहे हैं. शोधकर्ताओं ने पिछले महीने दावा किया था कि न्‍यू नोवल कोरोना वायरस (Coronavirus) कांच,* प्‍लास्टिक और स्‍टील पर कुछ दिन तक जिंदा रह सकते है. वहीं, तांबे (Copper) की सतह पर कुछ ही घंटों में खत्‍म हो जाता है. ये बात ब्रिटेन में माइक्रोबायोलॉजी (Microbiology) के रिसर्चर कीविल (Keevil) को कुछ ठीक नहीं लगी. वह ये सोच रहे थे कि कोरोना वायरस तांबे की सतह पर कई घंटे तक कैसे जिंदा रह सकता है*

कीविल दो दशक से ज्‍यादा समय से तांबे के एंटी-माइक्रोबियल (Antimicrobial) प्रभावों का अध्‍ययन कर रहे हैं. उन्‍होंने अपनी प्रयोगशाला में मिडिल ईस्‍ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (MERS) और स्‍वाइन फ्लू (H1N1) के वायरस पर तांबे के असर का परीक्षण किया है. हर बार तांबे के संपर्क में आने के कुछ ही मिनटों में वायरस खत्‍म हो गया. वह कहते हैं कि तांबे के संपर्क में आने के कुछ ही मिनट में वायरस की धज्जियां उड गईं.*



*तांबे की सतह बिना साफ किए भी खत्‍म करती है वायरस

कीविल ने 2015 में COVID-19 वायरस के परिवार के ही कोरोना वायरस 229E पर ध्‍यान दिया. ये वायरस संक्रमित व्‍यक्ति में जुकाम और निमोनिया की शिकायत होती है. कीविल ने जब इस कोरोना वायरस का तांबे की सतह से संपर्क कराया तो यह भी मिनटों में खत्‍म हो गया, जबकि ये स्‍टेनलेस स्‍टील और कांच पर 5 दिन तक जिंदा रहा.*

आइए, जानते हैं इसके फायदे- 

डाइजेशन सिस्टम को मजबूत करता है

तांबा पेट, लिवर और किडनी सभी को डिटॉक्स करता है। इसमें ऐसे गुण मौजूद होते हैं जो पेट को नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टिरिया को मार देते हैं, जिस वजह से पेट में कभी भी अल्सर और इंफ्केशन नहीं होता। 


 


अर्थराइटिस और जोड़ों के दर्द से दे राहत

तांबे में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रॉपर्टीज़ दर्द से राहत दिलाती है, इसलिए  अर्थराइटिस और जोड़ों के दर्द से परेशान लोगों को जरूर पीना चाहिए। इसके साथ ही तांबा हड्डियों और रोग प्रतिरोध प्रतिरोधक क्षमता  को भी स्ट्रॉंग बनाता है। 


तांबे में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स चेहरे की फाइन लाइन्स और झाइयों को खत्म करता है। साथ ही फाइन लाइन्स को बढ़ाने वाले सबसे बड़े कारण यानी फ्री रेडिकल्स से बचाकर स्किन पर एक सुरक्षा लेयर बनाता है, जिस वजह से आप लंबे समय तक जवां रहते हैं। 


वजन कम करने में कारगर 

अगर आपको जल्दी वजन कम करना है, तो तांबे के बर्तन का पानी पिएं। इससे आपके डाइजेस्टिव सिस्टम को बेहतर कर बुरे फैट को शरीर से बाहर निकालता है। 


 


दिमाग को तेज करने में मददगार 

मस्तिष्क को उत्तेजित कर उसे सक्रिय बनाए रखने में तांबे का पानी बहुत सहायक होता है। इसके प्रयोग से स्मरणशक्ति मजबूत होती है और दिमाग तेज होता है।


 

ऐसे करें इसका इस्तेमाल 

आयुर्वेद ही नहीं, विज्ञान ने भी तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना लाभकारी बताया है। इस पानी का पूरी तरह से लाभ तभी मिलता है, जब तांबे के बरतन में कम से कम 8 घंटे तक पानी रखा जाए। इसलिए लोग रात को तांबे के बर्तन में पानी भरकर सोते हैं, जिससे सुबह उठकर सबसे पहले इस पानी का सेवन कर सकें।



तांबे का ज्योतिषीय प्रभाव


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों की दृष्टि सहित ये ग्रह किसके साथ बैठे हैं, उसका आपके जीवन पर खास प्रभाव पड़ता है। इन्हीं के प्रभावों को बढ़ाने या कम करने की दृष्टि से तमाम तरह के रत्नों को धारण करने के लिए कहा जाता है। वहीं एक खास बात और है कि केवल रत्न ही नहीं बल्कि विभिन्न धातुएं भी सबको खास प्रभावित करती हैं।



 किसी भी धातु पर उस ग्रह का प्रभाव होता है जो उस धातु से जुड़ा माना गया है। जैसे सोना बृहस्पति तो चांदी आपके चंद्र को प्रभाव देती है, वहीं लोहा शनि को...


इसकी के चलते आज हम आपको तांबे का आपके जीवन में असर बताने जा रहे हैं। हिंदूधर्म की मान्यताओं के अनुसार सोना और तांबा शुद्ध धातु माने गए हैं। तांबा एक ऐसी धातु है जिसे ज्योतिष और विज्ञान दोनों में मान्यता है। ऐसे में माना जाता है कि तांबा धारण करने से या इस्तेमाल करने से कई बीमारियों से बचा रहता है।


जानकारों के अनुसार तांबा एक ऐसी धातु है जो पानी से लेकर हर चीज में मौजूद कीटाणुओं को खत्म कर देता है। इसीलिए ज्योतिष में नौ ग्रहों के बारे में बताया गया है, साथ ही हर ग्रह के लिए किसी एक धातु को विशेष मान्यता दी गई है।


वहीं तांबे को सूर्य व मंगल दोनों से जुड़ा माना जाता है। ऐसे में इसकी अंगूठी कई लिहाज से लाभदायक मानी जाती है। इसके साथ ही तांबा वास्तु के अनुसार भी फायदेमंद माना जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य और त्वचा के लिए भी तांबा खास है। जानकारों के अनुसार नाखून और त्वचा से जुड़ी बीमारियों को ठीक और स्वस्थ्य करने में तांबा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।


तांबे और सूर्य का ज्योतिष अनुसार एक जोड़ बताया गया है, तांबे की अंगूठी से समाज में प्रभाव बढ़ता है। जिसमें ज्योतिष मानते हैं कि इससे घर-परिवार में मान-सम्मान बढ़ता है। इसके अलावा तांबे का प्रभाव आपके मंगल पर भी पड़ता है।


हिंदूधर्म में तांबे को सभी धातुओं में सबसे अधिक शुद्ध माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार तांबे की बनी अंगूठी के अनेकों स्वास्थ्य लाभ होते हैं क्योंकि तांबे को सूर्य व मंगल दोनों की धातु माना गया है। तांबे की अंगूठी पहनने से व्यक्ति को धार्मिक लाभ के साथ अनेकों स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं.


ये है खास फायदे...

खून की सफाई : तांबे की अंगूठी पहनने से माना जाता है कि रक्त का प्रवाह सुचारु रूप से चलता है। इससे खून से प्रदूषित तत्व भी दूर होते हैं जिससे हृदय रोगों की संभावना कम हो जाती है।


मानसिक तनाव में कमी : 


वहीं ये भी माना जाता हे कि तांबे की अंगूठी या तांबे का छल्ला पहनने से मानसिक और शारीरिक तनाव में कमी आती है। इससे गुस्से को नियंत्रण में रखने में भी सहायता मिलती है।


त्वचा रोगों से मुक्ति : त्वचा आदि से संबंधित रोग होने पर तांबे की बनी अंगूठी या छल्ला पहनने से त्वचा के रोगों में बहुत तीव्रता से आराम मिलता है।


शरीर का तापमान : 


तांबे के आभूषणों को पहनने के संबंध में कहा जाता है कि इससे शरीर का तापमान नियंत्रण में बना रहता है और साथ ही इससे शरीर में ऊर्जा का उत्पादन जरूरत के अनुसार होता रहता है।


प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत : 


यह भी कहा जाता है कि तांबे के गहने जैसे अंगूठी, छल्ले या नथुनी आदि पहनने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली भी मजबूत बनी रहती है। प्रतिरक्षा प्रणाली के मजबूत होने से एलर्जी आदि समस्याओं के सुरक्षा हो जाती है।


कॉपर की कमी दूर करें : जानकारों का यह भी कहना है कि शरीर में कॉपर की समस्या आदि होने पर तांबे की अंगूठी पहनने से शरीर में कॉपर की समस्या दूर हो जाती है। तांबे की अंगूठी या फिर तांबे या कड़ा पहनने से इसके गुण त्वचा के द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है औऱ शरीर में कॉपर की कमी आसानी से पूरी हो जाती है।


हड्डियों का दर्द कम: 


जानकारों की माने तोकॉपर का कड़ा या ब्रेसलेट पहनने से शरीर के जोड़ों और गठिया से जुड़े हर तरह के दर्द से आराम मिलता है। इसके अलावा तांबा आर्थराइटिस के मरीजों के लिए भी बहुत लाभकारी होता है।


आजकल घुटने का दर्द उम्र देखकर नहीं होता है कम उम्र से ही बच्चे इस दर्द से जूझ रहे है, तो ऐसे में कॉपर ब्रेसलेट पहनने से आपको राहत मिल सकती है।


स्वस्थ हृदय : 


यह भी कहा जाता है कि यदि आप अपने हृदय को हमेशा स्वस्थ रखना चाहते हैं और हृदय से जुड़ी बिमारियों से दूर रहना चाहते हैं, तो कॉपर ब्रेसलेट को हमेशा अपने हाथों में पहने रखें।


हीमोग्लोबिन वृद्धि में सहायक: जानकारों का तो यहां तक कहना है कि तांबे के अनेक फायदे है, कॉपर अन्य मेटल के टॉक्सिक इफ़ेक्ट को कम करता है और हीमोग्लोबिन बनाने वाले एंजाइम को बढ़ाने में हेल्प करता है।


कॉपर में एंटी-ऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में होती है इसके अलावा इसके आभूषण धारण करने से आपकी बढती उम्र का असर भी कम होता है। कॉपर को पहनने से एक अलग लुक नजर आता है।


तांबे की अंगूठी के रहस्य!...

तांबे की अंगूठी रिंग फिंगर यानी की सूर्य की उंगली में पहनना चाहिए इसे शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस उंगली में तांबा धारण करने से सूर्य से जुड़े हुए सभी दोष खत्म हो जाते हैं। इसके साथ ही किसी व्यक्ति की पर यदि मंगल की क्रूर दशा हो, तो उसके लिए तांबा लाभकारी है इससे मंगल के प्रभाव समाप्त हो जाते हैं।


तांबा लगातार त्वचा के संपर्क में बना रहता है जिसके कारण त्वचा में चमक आती है। आयुर्वेद के अनुसार तांबे के बर्तनों का उपयोग हमारे इम्यून सिस्टम को ठीक करता है। इसी तरह तांबे की अंगूठी भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है। तांबे की अंगूठी से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है। शरीर में आई सूजन को तांबे अंगूठी कम कर सकती है।


सूर्य से जुड़ी समस्या : ज्योतिष के जानकारों के अनुसार यदि जातक की कुंडली में सूर्य दोष हो तो व्यक्ति कठिन मेहनत के बाद भी उसका पर्याप्त लाभ नहीं पाता है।


हर काम में उसे बेवजह की अड़चनों का सामना करना पड़ता है और बार-बार सामजिक सम्मान में कमी के हालात पैदा होते हैं। तांबे की अंगूठी पहने से व्यक्ति के सूर्य दोष दूर होते हैं।


इसलिए अगर कमजोर सूर्य के कारण जीवन में परेशानियां आप कम नहीं कर पा रहे तो ऐसे में यह अंगूठी पहनें। बहुत जल्द आपको इसका असर दिखेगा, आपको मान-सम्मान और प्रसिद्धि मिलेगी।


गुस्से का उपाय : 


ज्यादातर लोग जो अधिक गुस्से का शिकार होते हैं या जो शॉर्ट टेंपर्ड होते हैं उन्हें मोती पहनने की सलाह दी जाती है। लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि तांबे की अंगूठी भी गुस्सा कंट्रोल करने में उतना ही कारगर है, क्योंकि इसका संबंध मंगल से भी है।


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह शांत प्रकृति का है और गर्मी दूर करता है। इसलिए व्यक्ति के मानसिक स्थिति को संतुलित कर गुस्सा शांत करता है।


वास्तु दोषों से मुक्ति : 


वास्तु के जानकारों की माने तो आप इसके प्रभाव से वास्तु दोषों को दूर कर मुक्त हो सकते हैं। शुद्धक होने के कारण आप अगर इसे किसी भी रूप में शरीर पर धारण करते हैं तो आप जहां भी जाते हैं ये उस स्थान को वास्तु दोषों के प्रभाव से मुक्त करता है।


तांबे के औषधीय गुण: माना जाता है कि तांबा शरीर को संक्रमण से सुरक्षित रखता है। यह रक्त शुद्ध करता है, इससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। इसके अलावा पेट की बीमारियों, डायरिया और पीलिया में भी यह विशेष लाभकारी माना गया है।


रक्तचाप और सूजन : 


कहा जाता है कि तांबे को आप किसी भी प्रकार से पहनें यह त्वचा के द्वारा शरीर में अवशोषित होता है और खून में इसकी कमी की आपूर्ति करता है।

शरीर में रक्त का बहाव नियंत्रित करने के कारण यह इसके उच्च और निम्न दाब को भी संतुलन में रखता है। इस प्रकार हाई ब्लड प्रेशर या लो ब्लड प्रेशर की परेशानियों को भी दूर करता है। यह शरीर में सूजन को भी दूर करता है।


ऐसे पड़ता है तांबे का शरीर और ग्रहों पर असर...

जानकारों के अनुसार तांबा हमारे शरीर को कई प्रकार से प्रभावित करता है। ये केवल वास्तु दोषों या आपकी कुंडली के प्रभावों में अंतर लाता है, बल्कि यह तो सीधे तौर से आपके शरीर पर भी अपना असर छोड़ता है।


- ताम्बे के प्रयोग से शरीर शुद्ध होता है।


- इसके साथ ही साथ शरीर से सारा विष बाहर निकल जाता है।


- यह मंगल को मजबूत करके रक्त को ठीक करता है।


- साथ ही यह सूर्य को मजबूत करके उत्साह में वृद्धि कर देता है।


- यह पाचन तंत्र को काफी अच्छा कर देता है।


- पेट की समस्याओं से निजात दिलाता है।


ऐसे करें तांबे का प्रयोग?


- तांबे का छल्ला अनामिका अंगुली में धारण करें।


- इससे सूर्य और चन्द्रमा दोनों मजबूत होते हैं, साथ ही मंगल भी प्रभावित होते हैं। साथ ही आत्मविश्वास, साहस और स्वास्थ्य अच्छा होने के अलावा रक्त संबंधी समस्याओं में भी लाभ देता है।


- तांबे को कमर में भी पहन सकते हैं, इससे नाभि और हार्मोन्स की समस्या में सुधार होता है।


- तांबे का सिक्का गले में धारण करने से दुर्घटनाओं से बचाव होता है।


- तांबे के पात्र का पानी पीने से शरीर विषमुक्त होता है, - पेट सम्बन्धी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।


तांबे के प्रयोग में ये रखें सावधानियां...


- तांबे जितना शुद्ध हो उतना ही अच्छा होगा।


- तांबे के साथ सोना मिश्रित करके पहनना और भी अच्छा होता है।


- अगर तांबे के बर्तन प्रयोग करते हैं, तो नियमित उनकी सफाई करते रहें।


- जिन लोगो को क्रोध की समस्या है, उन्हें सोच समझकर तांबे पहनना चाहिए।


- मेष, सिंह और धनु राशि के लिए तांबे हमेशा शुभ माना जाता है।


- वृष, कन्या और मकर राशि के लिए तांबे बहुत अनुकूल नहीं माना जाता।


- जबकि बाकी राशियों के लिए तांबे साधारण माना


कोरोना वायरस के अलग-अलग सतहों पर जिंदा रहने के समय को लेकर दुनियाभर में लगातार शोध चल रहे हैं. शोधकर्ताओं ने पिछले महीने दावा किया था कि न्‍यू नोवल कोरोना वायरस (Coronavirus) कांच, प्‍लास्टिक और स्‍टील पर कुछ दिन तक जिंदा रह सकते है. वहीं, तांबे (Copper) की सतह पर कुछ ही घंटों में खत्‍म हो जाता है. ये बात ब्रिटेन में माइक्रोबायोलॉजी (Microbiology) के रिसर्चर कीविल (Keevil) को कुछ ठीक नहीं लगी. वह ये सोच रहे थे कि कोरोना वायरस तांबे की सतह पर कई घंटे तक कैसे जिंदा रह सकता है.

कीविल दो दशक से ज्‍यादा समय से तांबे के एंटी-माइक्रोबियल (Antimicrobial) प्रभावों का अध्‍ययन कर रहे हैं. उन्‍होंने अपनी प्रयोगशाला में मिडिल ईस्‍ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (MERS) और स्‍वाइन फ्लू (H1N1) के वायरस पर तांबे के असर का परीक्षण किया है. हर बार तांबे के संपर्क में आने के कुछ ही मिनटों में वायरस खत्‍म हो गया. वह कहते हैं कि तांबे के संपर्क में आने के कुछ ही मिनट में वायरस की धज्जियां उड गईं.



तांबे की सतह बिना साफ किए भी खत्‍म करती है वायरस

कीविल ने 2015 में COVID-19 वायरस के परिवार के ही कोरोना वायरस 229E पर ध्‍यान दिया. ये वायरस संक्रमित व्‍यक्ति में जुकाम और निमोनिया की शिकायत होती है. कीविल ने जब इस कोरोना वायरस का तांबे की सतह से संपर्क कराया तो यह भी मिनटों में खत्‍म हो गया, जबकि ये स्‍टेनलेस स्‍टील और कांच पर 5 दिन तक जिंदा रहा.

उनके मुताबिक, ये दुर्भाग्‍य ही है कि हमने साफ दिखने के कारण साार्वजनिक और सबसे ज्‍यादा टच की जाने वाली जगह पर स्‍टेनलेस स्‍टील को ही तव्‍वजो दी. लेकिन, यहां सवाल ये है कि निश्चित तौर पर स्‍टील बाकी धातुओं के मुकाबले साफ दिखता है, लेकिन हम उसे कितनी बार स्‍वच्‍छ करते हैं. ऐसे में ये संक्रमण फैला सकता है. वहीं, तांबे की सतह को बार-बार साफ करने की जरूरत नहीं होती है. ये बिना साफ किए भी अपने संपर्क में आने वाले वायरस या बैक्टिरिया को खत्‍म कर देता है.

'तांबे से प्राचीन काल के इलाज पर आधुनिक मुहर है शोध'

मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना में माइक्रोबायोलॉजी और इम्‍यूनोलॉली के प्रोफेसर माइकल जी. श्मिट कहते हैं कि कीविल का काम तांबे के जरिये प्राचीन काल के इलाज पर आधुनिक शोध की मुहर है. वह कहते हैं कि लोग जर्म्‍स या वायरस को जानने से बहुत ही तांबे की कई बीमारियों के इलाज करने की क्षमता को पहचान गए थे. वह कहते हैं कि तांबा मानव को प्रकृति का वरदान है.

वह बताते हैं कि कीविल की टीम ने न्‍यूयॉर्क शहर के ग्रैंड सेंट्रल टर्मिनल की पुरानी रेलिंग का परीक्षण किया था. इस रेलिंग का कॉपर आज भी उसी तरह काम कर रहा है, जैसे 100 साल पहले करता था. तांबे का एंटी-माइक्रोबियल प्रभाव कभी खत्‍म नहीं होता है. तांबे के बारे में प्राचीन काल के लोग जो कुछ जानते थे, आज के वैज्ञानिक और संस्‍थाएं सिर्फ उनकी पुष्टि कर रहे हैं. पर्यावरण संरक्षण एजेंसी ने 400 कॉपर सरफेस को एंटी-माइक्रोबियल सतह के तौर पर रजिस्‍टर किया है.

शोध: 58 फीसदी लोगों को नहीं हुआ अस्‍पताल में


प्रोफेसर माइकल का कहना है कि सोने (Gold) और चांदी (Silver) जैसी भारी धातुएं एंटी-बैक्टिरियल होती हैं, लेकिन तांबा वायरस को भी खत्‍म कर सकता है. कीविल बताते हैं कि वायरस या बैक्टिरिया तांबे की सतह पर आने के कुछ ही मिनट में खत्‍म हो जाते हैं. ये ठीक वैसा ही है जैसे कोई बाहरी चीज नजर आते ही मिसाइल उस पर हमला कर दे और कुछ ही देर में उसे नष्‍ट कर दे. डॉ. माइकल ने शोध किया कि तांबे को अस्‍पताल (Hospitals) में उस जगह लगाने से संक्रमण पर क्‍या असर होगा, जिसे लोग बार-बार छूते हों.


मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना में माइक्रोबायोलॉजी और इम्‍यूनोलॉली के प्रोफेसर माइकल जी. श्मिट ने अस्‍पतालों में बार-बार छुई जाने वाली जगहों पर कॉपर का इस्‍तेमाल कर संक्रमण पर असर का शोध किया.

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (CDC) के मुताबिक हर संक्रमित के इलाज पर करीब 50 हजार डॉलर खर्च होता है. डॉ. माइकल के शोध को रक्षा विभाग (DOD) ने स्‍पॉन्‍सर किया. डॉ. माइकल ने 3 अस्‍पतालों की स्‍टेयर्स की रेलिंग के साथ ही ट्रे टेबल्‍स और कुर्सियों के हैंडल्‍स पर तांबे की परत का इस्‍तेमाल किया. करीब 43 महीने चले शोध में पता चला कि रुटीन इंफेक्‍शन प्रोटोकॉल का पालन करने वाले अस्‍पतालों के मुकाबले इन तीनों अस्‍पतालों में लोगों को संक्रमण 58 फीसदी कम हुआ.

सार्वजनिक जगहों पर तांबे के इस्‍तेमाल से इंफेक्‍शन का खतरा कम

जीका वायरस आने के बाद रक्षा विभाग का ध्‍यान उस पर चला गया तो डॉ. माइकल का शोध रुक गया. इसके बाद डॉ. माइकल ने एक मैन्‍युफैक्‍चरर के साथ काम करना शुरू किया, जो अस्‍पतालों के लिए बेड बनाता था. उन्‍होंने दो साल के अध्‍ययन के बाद अपनी रिपोर्ट जारी की. इसमें बताया गया कि जिन बेड में कॉपर की रेलिंग का इस्‍तेमाल किया गया था, उन पर मरीजों को संक्रमण के खतरे की दर 9 फीसदी रही, जबकि प्‍लास्टिक की रेलिंग वालों को इसका जोखिम 90 फीसदी रहा.

एक अन्‍य अध्‍ययन से पता चला कि अगर आप किसी अस्‍पताल में या सार्वजनिक जगह पर तांबे का ज्‍यादा से ज्‍यादा इस्‍तेमाल करते हैं तो वहां संक्रमण फैलने की आशंका बहुत कम हो जाती है क्‍योंकि ये हर समय अपने काम में लगी रहती है. ऐसा नहीं है कि तांबे की सतह का इस्‍तेमाल करने के बाद आपको सफाई की जरूरत नहीं है, लेकिन आने वहां कुछ ऐसा लगा दिया है जो हर वक्‍त वायरस और बैक्टिरिया को खत्‍म कर रहा है. डॉ. माइकल और कीविल कहते हैं कि इन तमाम शोध के बाद भी कोविड-19 से बचाव के लिए लोगों को बार-बार साबुन से अपने हाथ धोते रहना है.

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...