Sunday, August 28, 2022

हवन की वैज्ञानिकता

 *हवन का महत्व*

फ्रांसके ट्रेले नामक वैज्ञानिकने हवनपर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यत:

आमकी लकड़ीपर किया जाता है ।

जब आमकी लकड़ी जलती है तो फार्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओंको मारती है तथा वातावरणको शुद्ध करती है। इस रिसर्चके बाद ही वैज्ञानिकोंको इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।

गुड़को जलानेपर भी यह गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गई अपनी रिसर्चमें पाया कि यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाए अथवा हवन के धुंए से शरीरका संपर्क हो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फैलानेवाले रोगाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवनकी महत्ताको देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की कि क्या वाकई में हवनसे वातावरण शुद्ध होता है और जीवाणुओंका नाश होता है? उन्होंने ग्रंथोंमें वर्णित हवन सामग्री जुटाई और इसे जलानेपर पाया कि ये विषाणुओंका नाश करती हैं और फिर उन्होंने विभिन्न प्रकारके धुंए पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी एक किलो जलाने पर हवामें मौजूद विषाणुं बहुत कम नहीं हुए। पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डालकर जलाई गई तो एक घंटेके भीतर ही कक्षमें मौजूद नैगेटिव बैक्टीरिया का स्तर 94 प्रतिशत तक कम हो गया। यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्षकी हवामें मौजूद जीवाणु

ओंका परीक्षण किया और पाया कि कक्षके दरवाजे खोले जाने और सारा धुंआ निकलने के 24 घंटे बाद भी बैक्टीरियाका स्तर सामान्यसे 96 प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करनेपर ज्ञात हुआ कि इस एक बार हुएका असर एक एक माह तक रहा और उस कक्षकी वायुमें विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्यसे बहुत कम था यह रिपोर्ट एथ्नोफार्मोकोलॉजी के शोधपत्रमें दिसंबर 2007 में छप चुकी है रिपोर्ट में लिखा गया की हवन सामग्रीके द्वारा न केवल मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलोंको नुकसान पहुंचानेवाले बैक्टीरियाका  भी नाश होता है जिससे फसलोंमें रसायनिक खादोंका प्रयोग कम हो सकता है।

Saturday, August 27, 2022

ज्ञान केंद्रित संस्कृत भाषा का वैभव

 *ज्ञान केंद्रित संस्कृत भाषा का वैभव*


संस्कृत के विकास से भारत के विश्वगुरु बनने का स्वप्न तो साकार होगा ही, दुनिया भी शांति के साथ समग्र विकास के पथ पर अग्रसर होगी।                                


  ज्ञान केंद्रित संस्कृत भाषा के विषय मेंकुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  ‘मन की बात’ कार्यक्रम में संस्कृत भाषा के वैभव और उसके पुनः उभरते वैश्विक परिदृश्य पर बात की थी। भारतवर्ष के प्राचीन ज्ञान-साम्राज्य का वैभव, जो संस्कृत के विलुप्त होते जाने से अक्षुण्ण न रह सका, वस्तुतः संस्कृत की ही महिमा है। संसार की आंखों में भारतीय संस्कृति के लिए वर्तमान में भी जो सम्मान शेष है, उसके मूल में भी कहीं न कहीं संस्कृत ही है, जिसने हमारी भारतीय विद्वता का सार्वभौमिक परिचय कराया।


संस्कृत अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, ज्यामिति, खगोलशास्त्र, भौतिकी, रासायनिकी, आयुर्वेद, दर्शनशास्त्र आदि सभी Mother की जननी है। अतः संस्कृत का पुनरुत्थान जरूरी है। प्रधानमंत्री ने संस्कृत का सूरज चढ़ने की बात कही है, तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह संस्कृत का पुनरुत्थान करने के लिए समुचित प्रबंध करे। संस्कृत दुनिया के लिए भारत का सर्वश्रेष्ठ उपहार होगा।


मानव जाति की सबसे बड़ी पहचान और सबसे बड़ी उपलब्धि है भाषा। भाषा न होती, तो हम अन्य प्राणियों से केवल अपनी आकृति में ही भिन्न होते। लेकिन भाषा ने हमें पृथ्वी के सभी जीवों से सर्वथा भिन्न और सर्वथा विशिष्ट बना दिया है। भाषा के विकास के साथ मानव सर्वगुण-संपन्न बनता चला गया। भाषा के साथ ही मानव सभ्यताएं बनती चली गईं।


भाषा और भूगोल का एक गहरा संबंध है। भाषा वास्तव में पारिस्थितिकी का 'उत्पाद' है। मिट्टी और जलवायु से बनती है कोई भाषा। यही कारण है कि भाषा भूगोल के अनुसार बदलती है। धर्म, जाति, पंथ अथवा समूहों से उसका मौलिक संबंध नहीं है। संस्कृति का भाषा से अटूट संबंध है और भाषा का संस्कृति से एक गहरा सरोकार है। भाषा के माध्यम से ही कोई संस्कृति अपने यश को समय की तरंगों पर बहाती है।


संस्कृत से प्रभावशाली कोई भाषा संसार में नहीं हुई। मानव सभ्यताओं के इतिहास में ज्ञान-विज्ञान और दर्शनशास्त्रों से भरे ग्रंथों और उत्कृष्टतम साहित्य का जितना सृजन संस्कृत भाषा ने किया है, उतना आज तक किसी भी अन्य भाषा के लिए संभव नहीं हुआ है। पर विडंबना यह है कि संस्कृत आज विलुप्तप्राय हो चुकी है, और जिस भारतीय सभ्यता-संस्कृति को उसने हजारों वर्षों से संभाल कर रखा है, वही उससे पीछा छुड़ाने का प्रयास कर रही है। लेकिन संस्कृति का वैभव इतना विराट है कि आज भी दुनिया की कोई भाषा उसके सामानांतर खड़ी नहीं हो पाई।


संस्कृत भाषा के रचनात्मक वैभव से भिज्ञ लोग इस प्राचीनतम भाषा को स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। यूरोप में संस्कृत इसलिए पढ़ाई जा रही है कि इसके स्पंदन से विद्यार्थियों का मष्तिष्क अधिक प्रखर और रचनात्मक होता है। थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया में संस्कृत को उत्कृष्ट रचनाधर्मिता के लिए आवश्यक मानते हैं। संस्कृत शब्दों के उच्चारण से तंत्रिका तंत्र झंकृत होता है, जिससे मष्तिष्क की सक्रियता और सृजनशीलता में वृद्धि होती है। अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह ने कहा था कि वह दूरदर्शन पर संस्कृत के समाचार अवश्य सुनते थे, क्योंकि इससे उन्हें एक अलग प्रकार की आनंदपूर्ण अनुभूति होती थी, जबकि उन्हें उसका अर्थ समझ में नहीं आता था। संस्कृत का विकास करने वाली और संस्कृत से सुसंस्कृत होने वाली संस्कृति आज के युग में भी विश्व शांति और सामजिक विकास का जागरण करती है। इतिहास साक्षी है कि प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक भारत ने कभी किसी अन्य देश की भूमि पर आक्रमण नहीं किया।


आज के युग में जो भाषाएं सर्वाधिक पुष्पित-पल्लवित हो रही हैं, वे आर्थिकी-केंद्रित हैं, जिनकी बाजार पर पकड़ है। अंग्रेजी इसका ज्वलंत उदाहरण है। संस्कृत ज्ञान-केंद्रित भाषा है, इसलिए वह पिछड़ गई। अगर संस्कृत को पुनर्स्थापित करना है, तो उसका आर्थिकी के साथ अनुबंध बनाना होगा। संस्कृत के विकास से भारत के विश्वगुरु बनने का स्वप्न तो साकार होगा ही, दुनिया भी शांति के साथ समग्र विकास के पथ पर अग्रसर होगी।

Wednesday, August 17, 2022

दमोह जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

 दमोह जिले के अपराजेय जैन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी   


डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, 

एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह  निदेशक-संस्कृत प्राकृत तथा प्राच्यविद्या अनुसन्धान केंद्र दमोह    

’9826443973

                                

 *नमःस्वाधीन कर्त्तारं,भेत्तारं परतन्त्रताम् ।* *स्वाधीनसंग्रामयोद्धान्,सेनानिभ्यः नमो नमः।।*     

भारत देश की स्वतंत्रता का मुख्य बीज 1857 की क्रान्ति से माना जा सकता है । आजादी के इस महायज्ञ में देश की शांति , धर्म एवं संस्कृति का सम्मान , पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए देश के शहीदों ने अपने प्राणों की आहूति देते समय अनेकों गोलियाँ , जेल यात्राएं,फांसी, डण्डे , क्षुधा , तृषा , पारिवारिक वियोग , पारिवारिक विघटन आदि अनेकांे यातनाओं- मानसिक प्रताड़नाओें एवं समस्याओं का सामना किया ।

भारत के संविधान निर्माण और आजाद हिन्द फौज में भारत के जैन समाज ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है जिसमें विशेष रूप से मध्यप्रदेश , उत्तर प्रदेश ,राजस्थान, छत्तीसगढ़,उत्तरांचल के जैन स्वतन्त्रता के दीवाने सेनानियों ने  एवं जैन पत्रकारों,साहित्यकारों , कवियों , जैन मंदिरों की समितियों के पदाधिकारियों ने अपना प्रत्यक्ष एवं परोक्षरूप में पूर्ण चेतना के साथ सहयोग किया ।  अनेकों जैन परिवारों नें इस स्वतन्त्रता के समर को अपने धन एवं परोपकार की भावना से प्रेरित होकर आर्थिक सहयोग प्रदान कर जेल गए परिवारों का भरण - पोषण शिक्षा एवं सुरक्षा प्रदान की । 

 9 मई 1857 से 15 अगस्त 1947 तक - सम्पूर्ण देश  से लगभग  7 लाख 72 हजार 780 लोगों ने सक्रिय भूमिका स्वतन्त्रता संग्राम में निभायी थी  उनमें  जैन समाज  के  सेनानियों ने अपनी सक्रियता से  रही है      

 इस आलेख में मैं केवल दमोह जिले के जैन स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों के स्वतन्त्रता संग्राम को दिए गए अवदान को प्रमुखता से उद्धृत कर रहा हूं। जिन्हें एकत्रित करने में प्रथमतः स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों  तथा समाज के वरिष्ठजनों से संपर्क तथा कुछ शासकीय दस्तावेज,संग्राम में जैन नामक पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत व एकत्रित किए गए नाम हैं                         


 दमोह जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम निम्न हैं   

1.अमर शहीद सिंघई प्रेमचंद जैन,                                

 2.अमर शहीद चौधरी भैयालाल,                       

3.श्री कपूरचन्दचौधरी,        

4 .श्री कामता प्रसाद शास्त्री,

5.श्री कुंदनलाल जैन,            

6 .श्री गुलाबचंद सिंघई,         

7.श्री गोकुलचंद सिंघई,       

8.श्री चिन्तामन जैन सगरा,       

09 श्री डालचंद जैन,               

10 श्री पूरन चंद जैन,          

11.श्री प्रेमचंद कापड़िया,         

12.श्री बाबूराम जैन पथरिया,     

13.श्री बाबूलाल जैन पथरिया,  

14.श्री बाबूलाल पलन्दी ,    

15.श्री रघवर प्रसाद मोदी, 

16. श्री रघवर प्रसाद जुझार

17.सिंघई रतन चंद जैन,    

18.श्री राजाराम बजाज, 

19.श्रीरामचरण जैन,     

20 .सवाई सिंघई रूपचन्द जैन पटेरा,                             

21.नगर सेठ श्री लालचंद जैन, 

22.श्री लीलाधर सराफ,         

23.श्री शंकरलाल जैन उर्फ ज्ञानचंद जैन,                      

24.श्री शिवप्रसाद सिंघई,     

25.श्रीसाबूलाल जैन,             

26.श्री खेमचंद जी बजाज  

27.श्री नन्दनलाल सराफ 

28 राजाराम उर्फ राजेन्द्र जैन पथरिया



आप सभी ने दमोह जिले का नाम स्वतंत्रता संग्राम में अपना तन-मन-धन एवं सर्वस्व समर्पित करके स्वर्णाक्षरों से अंकित किया है  ।।                                         


 

1.अमर शहीद सिंघई प्रेमचन्द्र जैन - 

आप दमोह जिले के सेमरा बुजुर्ग में सिंघई सुखलाल एवं माता सिरदार बहु के घर जन्मे भारत माता के निर्भीक , साहसी , कर्मठ , समर्पित माल थे । आपकी शिक्षा महाराजा प्रताप हाई स्कूल से हुई । सन् 1933 में आपने दमोह पधारे महात्मा गांधी के भाषण को सुनकर झण्डा सत्याग्रह ,  जंगल सत्याग्रह ,नमक सत्याग्रह, विदेशी बहिष्कार ,स्वदेशी अपनाओ जैसे महाभियानों में अपना तन-मन-धन एवं सर्वस्व समर्पण किया । इन गतिविधियों को देख श्री रणछोड़शंकर धगट आपको गांधी आश्रम मेरठ ले गए । वहाँ 3 वर्षों तक रहे वहां से 1937 में लौटकर सिंघई गोकुलचंद , श्री रघुवर प्रसाद मोदी, श्री बाबुलाल पलंदी व प्रेमशंकर घगट के  साथ आप कांग्रेस के कर्मठ कार्यकर्ता बने । 

सन् 1939-40 के मध्य में द्वितीय विश्व युद्ध की स्थिति थी , उसके लिए ब्रिटिश सरकार सैनिकों की भर्ती अभियान चल रही थी । जिसमें ब्रिटिश सरकार अपना हित चाहती थी, दमोह के टाउन हाल में सागर के डिप्टी कमिश्नर फारुख दमोह आये उन्होंने 6000 श्रोताओं की जनसभा को सेना भर्ती हेतु सम्बोधित किया ।  सिंघई प्रेमचन्द्र जैन  भाषण के मध्य कमिश्नर के भाषण का बहिष्कार किया फलस्वरूप उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया , जनता ने इसका विरोध किया उन्हें छोड़कर सिंघई प्रेमचन्द्र जी का भाषण कराया गया । जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सेना भर्ती को निजी लाभ के उद्देश्य मुख्य कारण से जनता को अवगत कराया । जिससे उनके मनसूबों पर पानी फिर गया ।

14 जनवरी 1941 में हटा में सत्याग्रह किया ब्रिटिश शामन विरोधी भाषण के कारण उन्हें गिरफ्तार कर 4 माह कारावास की सजा दी गई । आपको सागर जेल से नागपुर जेल स्थानांतरित किया गया । नागपुर जेल में भाग्यवशात डिप्टी फारुख नागपुर जेल का स्थानांतरित हुए और उन्होंने दमोह के अपमान का का बदला , प्रेमचंद जी की सजा पूरी होने पर उन्हें प्रीति - भोज पर मृत्यु परोसकर लिया और उन्हें नागपुर से दमोह ट्रेन में व्यवस्थित बैठाया और दमोह आते - आते उनका स्वास्थ्य खराब होता गया और अन्ततः वह 9 मई 1941 को भारत माता की गोद में प्राणोत्सर्ग करके सदा - सदा   के लिए समा गए । 

2.श्री प्रेमचन्द्र उस्ताद - 

 आप बाहुवली व्यायाम शाला के शक्तिशाली पहलवान होने के कारण दमोह में उस्ताद नाम से विख्यात हुए । यद्यपि आप जबलपुर निवासी थे लेकिन आपके पिता श्री पन्नालाल जी जैन ने सन् 1904 में अपने बालक प्रेमचन्द का विवाह श्री सुखलाल चौधरी की पुत्री से किया और भाग्यवश आपने दमोह को अपना निवास रखा । आप पहलवानी के साथ बन्दूक व अन्य शस्त्रों को चलाने में ही नहीं अपितु उनके संग्रह में रूचिवान थे।  

 सन् 1923 में झण्डा सत्याग्रह के अवसर पर जबलपुर विक्टोरिया टाउन हाल की गुम्बज पर झण्डारोहण किया । फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार उन्हें गोली से मारने में विफल रही , उन्हें गिरफतार किया गया और 1वर्ष  6 माह का सी  ग्रेड का कठिन कारावास हुआ और वहां वे खड़े-खड़े पांच सेर गेहूं पीसने की सजा पाकर प्रसन्न रहे और अपने शरीर को और व्यवस्थित किया। 

आपकी राष्ट्र भावना के कारण दमोह में जैन सेवादल बना , जिसमें आप लाठी लेजिम , तलवार , भाला व अन्य आत्मरक्षा के शस्त्रों को चलाने का प्रशिक्षण देते थे । सन् 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस में केप्टिन ट्रेनिंग में 21 दिनों तक 110 स्वयं सेवकों को लेकर त्रिपुरी में रहे । 

सन् 1942 के बम्बई कांग्रेस अधिवेशन से  ‘करो या मरो’ की प्रेरणा लेकर साथ ही साइक्लोस्टाइल मशीनें , तार काटने तथा पटरी उखाड़ने वाले औजार व पिस्तौले वेश बदलकर- बदलकर दमोह लेकर आए ,उनका उपयोग किया नमक आंदोलन में भाग लिया। अन्ततः  भारत माता की सेवा करते हुए 26 नव. 1980 को अपना निधन हो गया ।

3.श्री प्रेमचन्द्र कापड़िया - 

श्री प्रेमचंद कापड़िया का जन्म 1923 में श्री फूलचन्द जैन कापड़िया के यहाँ हुआ । आपके परिवार में कपड़े का व्यापार होने से आप लोग कापड़िया नाम से विख्यात थे । आप स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी रघुवर प्रसाद मोदी के विचारों से प्रभावित रहते थे । आप 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस में स्वयंसेवक के रूप में 21 दिन प्रशिक्षण प्राप्त किया । 

आप 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आन्दोलन में बम्बई गये थे । वहां आपने आजादी के लिए हो रहे विरोध  एवं क्रियाकलापों को देखकर प्रेरणा ली । अपने साथ वहां से विशेष जानकारी एवं सामग्री लेकर बीना मार्ग से  जबलपुर -दमोह आये , खूफिया पुलिस ने आपको जबलपुर के छोटे फुहारा पर बुलेटिन सहित गिरफ्तार कर लिए गये शेष सामग्री अपने ससुराल में छिपा दी । स्वयं जेल चले गए ।

 15- फरवरी 1943 को आप जेल से मुक्त हुए और आजाद हिन्द फौज में रहकर फौजी  का अभ्यास किया  और शांति सेना का गठन कर आन्दोलन संचालित किया। 

 4.श्री बाबूराम जैन पथरिया 

श्री बाबूराम जैन पिता बिहारी लाल जैन का जन्म 1918 में पथरिया , जिला- दमोह ( म.प्र . ) में हुआ। आप रसगुल्ला बेचते थे । आपने जंगल सत्याग्रह व 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में बढ़ - चढ़कर भागीदारी की और 2 माह 8 दिन का कारावास भोगा । साथ ही आपके भाई राजाराम उर्फ राजेन्द्र कुमार को 2 वर्ष 4माह का कारावास हुआ । 

5.श्रीबाबूलाल  जैन पथरिया 

 सन् 1896 में बाबूलाल जी का जन्म  पिता गिरधारी लाल जी के यहां हुआ । आपका विवाह कंछेदीलाल मास्टर  की बेटी तुलसी से हुआ और आप पथरिया ही रहने लगे थे ।  आपके वंशज सिंघई वंशीधर भी  मैहर रियासत  कोषाध्यक्ष रहे है । 


 आपने नमक आन्दोलन एवं 1930 के जंगल सत्याग्रह में 1 दिन की जेल के साथ 40/ - रुपये का जुर्माना हुआ । सन्1942 में मण्डल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में 14 अगस्त 1942 को भाषण देने के कारण सागर जेल भेजा गया साथ ही आपके ज्येष्ठ पुत्र पदमचंद्र को पर्चे बांटने के अपराध में पकड़ा गया । आपको सागर से नागपुर जेल भेजा गया । जहां पर सेठ गोविन्दास विनोबा भावे बृजलाल वियाणी , कुमारप्पा आदि से भेंट हुई , पुनः सागर जेल आए। 

4 जनवरी 1943 को सश्रम कारावास की सजा दी गई । कारावास मुक्त हुए और 1945 में ध्वज फहराते हुए फिर 15 दिन तक हिरासत में रखा गया । आजादी के बाद ग्राम पंचायत एवं जनपद पंचायत के पदों पर आसीन रहे । 16 मार्च 1983 को धार्मिक मरण को प्राप्त किया । 

6 श्री बाबूलाल पलंदी दमोह- श्री नाथूराम पलंदी के पुत्र श्री बाबूलाल पलंदी का जन्म 4 फरवरी 1920 को हुआ । आपने 12 वर्ष की उम्र में 1932 में जंगल सत्याग्रह में सहभागिता की  और अपने विद्यालय में ध्वज फहराने के कारण न्यायाधीश जगन्नाथ प्रसाद ने अदालत  समाप्ति तक की सजा दी । आपको इस कारण शासकीय विद्यालय से निकाला गया । 

केशरचंद पलंदी  आपके भाई थे । आपका विवाह बैनी बाई से हुआ । आपके  दाम्पत्य जीवन   में 6 पुत्रों  एवं 3 पुत्रियों  से परिपूर्ण था । आप श्री रघुवर प्रसाद मोदी जी से अत्यन्त ही प्रभावित थे। 1939 में त्रिपुरी काग्रेस में स्वयं सेवक के रूप में जुडकर 1941 में ब्रिटिश सरकार विरोधी सन्देशों को जन - जन तक पहुंचाने के अपराध में गिरफ्तार हुए । 13 अगस्त 1942 के आंदोलन में गिरफ्तार होने पर आपको सागर जेल फिर नागपुर जेल भेजा गया । 4 जून 1943 को रिहा हुए । 1941 से 1956 एवं  1969-1977 तक आप जिला कांग्रेस कमेटी के महामन्त्रीे अध्यक्ष  पद को संभाला  तथा कमला नेहरू कालेज के सचिव व स्वतंत्रता संग्राम सैनिक संघ दमोह के उपाध्यक्ष रहे । जैन प्रगतिशील परिषद एवं आदर्श  शिक्षा समिति के संस्थपक रहे  । आप  शिक्षा, राजनीति एवं समाजकार्य में अग्रणी रहे। सतत् सेवाप्रेमी पलंदी का  25 मार्च 1985 को देहावसान हुआ ।

7.अमर शहीद चौधरी भैयालाल -

 आप का जन्म बिहारी लाल जैन के घर सन् 1886 में दमोह मध्यप्रदेश में हुआ  आप बचपन से ही अपने नेतृत्व कौशल,संगठन कौशल और वाणी वव्यवहार और वे-वाक् राय के कारण सबके हृदय को मोह लेते थे । इन्हीं गुणों के कारण में दमोह कांग्रेस में सन् 1920-21 में अग्रणी रहे । 1908 के बंग- भंग से आप राजनीति में सक्रिय रहे फलस्वरूप आपने लोकमान्य  बाल गंगाधर तिलक को दमोह आमन्त्रित किया , ब्रिटिश सरकार ने सभा पर पाबन्दी लगा दी थी फिर भी आपने श्री दि ० जैन अतिशय क्षेत्र  कुण्डलपुर मेें सभा करायी ।

 प्रथम विश्व युद्ध की सैन्य भर्ती का विरोध किया , फलस्वरूप राजद्रोह का मुकदमा चला , ब्रिटिश सरकार मुकदमा हार गयी, रतौना में खुलने वाले बूचडखाने का विरोध ,विदेशी कपड़ों का बहिष्कार , अनशन आदि किया ।

सन् 1922 कलकत्ता कांग्रेस की बैठक से लौटते समय मिर्जापुर के आस - पास अंग्रेज सैनिकों के विवाद में गोली का शिकार हुए । 

8. श्री कपूरचन्द जैन चौधरी -

आपका परिचय चौ  धरी भैयालाल जी के भतीजे के रूप में प्राप्त होता है । आपके पिता का नाम श्री दरवारीलाल चौधरी था । आपका जन्म 16 अक्टू 0 1916 को दमोह में हुआ । परिवार में स्वयं के चाचा चौधरी भैया लाल जी- के देशप्रेम की कहानियां एवं भारत माता के प्रति समर्पण को सुनकर श्री कपूरचन्द जैन चौधरी में देश प्रेम का जज्वा देखने को मिलता था । आपने भी विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया ।

सन 1942 के आन्दोलन की आमसभा में गांधी चौक पर 14 अगस्त 1942 को भाषण देते हुए गिरफ्तार किया गया और जबलपुर जेल पहुंचा दिया गया वहां आपको नाना साहब गोखले , श्री के . देशमुख राजेन्द्र मालपाणी , छक्कीलालगुप्ता , जनरल आवारी जैसे नेताओं के दर्शन मिले । आपने 2 वर्ष 6 माह का कारावास की सजा भोग भारत माता की सेवा की ।

9 पं . कामता प्रसाद शास्त्री - जैनविद्वानों की परम्परा के संवर्द्धक , दमोह में पूर्णतः शराब बन्दी के सूत्रधार , राष्ट्रीय विचार धारा के पोषक, धर्मात्मा श्री कामता प्रसाद शास्त्री का जन्म श्री मूलचन्द्र जैन के यहां 1 जनवरी 1915 ई को हुआ । आपने कटनी बोर्डिंग एवं स्याद्वाद महाविद्यालय बनारस से अध्ययन किया । स्व. गणेश प्रसाद वर्णी संस्कृत विद्यालय मोरा जी सागर सेवाएं प्रदान की और 1942 के आन्दोलन में सहभागिता के कारण आपने अपनी सेवाएं समाप्त कर दीं । 

 आपके प्रयासों से सन् 1926 में दमोह का नाम विश्व पटल पर पूर्णतः ‘‘शराब बन्दी’’ के लिए प्रसिद्ध हुआ । शास्त्री जी ने शराबबंदी आंदोलन किया , दुकानें बंद करायी , नमक सत्याग्रह व जंगल सत्याग्रह किया . पुलिस द्वारा पकड़े गए ।

सन् 1932-33 में आप बनारस रहे और कान्तिकारी मन्मथनाथ गुरु से बम फेंकना , तैरना , पिस्तौल चलाना आत्मरक्षा एवं देश की सुरक्षा के लिए धर्मात्मा के अन्दर शस्त्र और शास्त्र का मणिकांचन संयोग घटित हुआ। आप कुछ दिन दिल्ली भी रहे । वहां से वापिस आकर आप को पिण्डरई में जंगल कटवाने, जैसी नगर में कोतवाली जलाने के प्रयास में 4 सितम्बर 1992 को गिरफ्तार कर लिया गया और सागर जेल में रहे वहां की दीवारों पर भारत माता के चित्र , तिरंगा के चित्र एवं देश भक्ति कविताएं सन्देशों को लिखते रहे । आपको जबलपुर जेल भेज दिया गया । । आप जेल से आने के बाद भी देश हितेषी आन्दोलनों में  सहभागिता दर्ज करते रहे 

10 श्री कुन्दल जैन- 

दमोह का नाम स्वतन्त्रता संग्राम में आगे करने वाले कुन्दन लाल जी जैन का जन्म सिंघई छोटेलाल जी के यहाँ हुआ । आपने 1930 से अपनी सक्रियता  स्वतन्त्रता संग्राम में दिखाई और 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में जबलपुर में सहभागिता की परिणामतः आपको 3 वर्ष 7 माह का कारावास मिला और 65 ति वर्ष की आयु में आपका स्वर्गवास हो गया ।

11.श्री रघुवरप्रसाद मोदी -

श्री रघुवरप्रसाद मोदीजी महान व्यक्तित्व के धनी , स्वतन्त्रता संग्राम के सशक्त हस्ताक्षर , दमोह नगर की पहचान , सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षणिक संस्थाओं के संस्थापक खोजाखेडी ग्राम के  गल्ला व्यापारी श्री गोरेलाल जी की धर्मपत्नि सुखरानी के इकलौते पुत्र के रूप में आपका जन्म सन् 1894 ई में हुआ ।

1919 में मैट्रिक उत्तीर्णता के समय भारत में रौलट एक्ट एवं जलियावाला हत्याकाण्ड  की घोर निन्दा हो रही थी साथ ही इस घटना को लेकर सभी अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए आतुर थे । मोदी जी भी स्कूल की पढ़ाई त्याग आजादी की लड़ाई में कूद गये साथ ही आपके साथी प्रेमशंकर घगट , सिंघई गोकलचन्द्र वकील , दमोदरराव,श्री देवकीनन्दन श्रीवास्तव लक्ष्मीशंकर घगट आदि अनेक लोगों ने आपका साथ कन्धे से कंधा मिलाकर दिया ।

 1930 में खादी का कार्य आरंभ किया अंग्रेजों द्वारा आपकी दुकान जला दी गई विरोध करने पर गिरफ्तार कर लिया गया , जंगल कानून तोड़ने की योजना बनायी उसमें गिरफ्तारी दी , जंगल सत्याग्रह में साथ दिया , टाउन हाल में तिरंगा झण्डा फहराने के अभियोग  में गिरफ्तारी के साथ पिटाई खाई , गांधी चौक खून से लतपथ हो गया , कपड़े रक्त रंजित हो गये यह घटना 1942 की है , उन्हें सैन्य जूतों से निर्ममता से पीटा गया । बर्वरता से मारा गया तब भी रघुवरमोदी के मुंह में भारतमाता की जय का उद्घोष निकलता रहा । जनता भड़क उठी और प्रशासन ने उन्हें मुक्त कर दिया । स्वस्थ होने पर उन्हें गिरफ्तार  किया और 6 माह की जेल 500/ - रुपये जुर्माना लगाया आप की नेतृत्व क्षमता एवं सहनशीलता से सम्पूर्ण दमोह प्रभावित था ।

 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और दमोह की जनता ने सन् 1952 - 1957 तक आपको विधायक पद पर  आसीन किया । आपने दमोह में शासकीय महाविद्यालय , राष्ट्रीय जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , कमलानेहरू महिला विद्यालय , जैनऔेषधालय अनेक संस्थाओं की स्थापना की । 1957 में कलेक्टर के द्वारा कम्युनिष्ट देह घोषित होने पर पुनः गिरफ्तार हुए । इस प्रकार देश और समाज की सेवा करते हुए 17 दिस . 1976 में आपने नश्वर देह त्यागी । 


  12. सिंघई रघुवर प्रसाद जुझार

गुमनाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  सिंघई रघुवर प्रसाद जुझार वाले जिला अस्पताल दमोह के प्रथम दान दाता निर्माता रहे हैं। उनके सेवा भावी कार्यों को याद दिलाता एक शिलालेख जिला अस्पताल के प्रवेश द्वार की साइड में आज भी लगा हुआ है। जिसमें अंग्रेजी में प्रेजेंटेड बाय श्री रघुवर प्रसाद मालगुजार, दरबारी, ऑनरेविल मजिस्ट्रेट, चेयरमैन डिस्टिक काउंसिल आदि के उल्लेख के साथ डिप्टी कमिश्नर खान बहादुर द्वारा उद्घाटन किया जाना दर्ज है।


  उल्लेखनीय है कि वर्ष 1920 के दशक में फैली महामारी के बाद दमोह डिस्टिक काउंसिल के तत्कालीन चेयरमैन श्री सिंघई रघुवर प्रसाद ने 1922- 23 में जिला अस्पताल के नए भवन का निर्माण कराया था। 1931-32 में दमोह के जिले का दर्जा खत्म कर दिए जाने पर उन्होंने अपने सभी पदों से इस्तीफा देते हुए सुरक्षा के लिए प्राप्त बंदूक को वापस करने से इंकार कर दिया था। वही गांधीजी के बजाए भगत सिंह से प्रभावित होकर अंग्रेजों का खुला विरोध शुरू कर दिया था। अपने माल गुजारी क्षेत्र जुझार तथा आसपास के गांवों में लगान वसूली बन्द करा दी थी। बसूली को आने वाले अंग्रेज अफसरों कर्मचारियों को वह बन्दूक की नोक पर भगा देते थे। जिस बजह से अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी बन्दूक को भी जब्त कर उनके रूतवे को कम करने की कोशिश की थी। लेकिन इसके बाद वह किसानों से लगान वसूली को आने वाले अंग्रेज अफसर तहसीलदार आदि के गांव पहुंचने पर ग्रामीणों से पकड़वाकर पेड़ से बंधवाकर कोड़ों से पिटवाते थे। जिसके बाद लगान वसूली करने के लिए जुझार तथा आसपास के क्षेत्र में जाने से अंग्रेज डरने लगे थे वही आसपास के क्षेत्र में भी लोगों ने लगान देना बंद कर दिया था।


महाराजा छत्रसाल के वंशजों के दरबारी होने की वजह से स्थानीय राजाओं से भी उनकी नहीं बनती थी। यही वजह रही की 10 जुलाई 1941 को हिंडोरिया मे राजा लक्ष्मण सिंह के तिलक समारोह के मौके पर अंग्रेजों के इशारे पर भोजन में जहर मिला कर श्री रघुवर प्रसाद को खिला दिया गया। बाद में इलाज के लिए दमोह भेजने के बजाय घोड़े की पीठ पर बांधकर उनको जुझार भेज दिया गया। जिससे उनकी असमय मौत हो गई थी। उस समय उनके इकलौते पुत्र सिंघई रतनचंद मात्र 4 वर्ष के थे। उनकी भी जान को खतरा होने से सिंघई जी की बेवा इंद्राणी बहू अपने बेटे को लेकर सब को छोड़कर मायके  जाने को मजबूर हो गई। देश की आजादी के बाद जब वह वापिस जुझार लौटी तो सब कुछ छिन चुका था। नावालिगी में दर्ज एक बगीचा जिसमें पुरानी हवेली व कुआ आदि था वही शेष बचा था।


इधर रघुवर प्रसाद की जहर देकर हत्या कराने में सफल रहे अंग्रेजों की दहशत के चलते सिंघई रघुवर प्रसाद का नाम लेने वाला भी कोई नहीं बचा था। यही वजह रही कि देश की आजादी के बाद अंग्रेजों के खिलाफ उनकी बगावत व जहर देकर हत्या के हालात गुमनामी के अंधेरे में खोकर रह गए। उनको और उनके योगदान को दस्तावेजों में भी कोई जगह नहीं मिल सकी। लेकिन शिलालेखों में उनका योगदान आज भी जीवित है। सिंघई रघुवर प्रसाद की दबंगई के संस्मरण को पुराने लोग आज भी याद करते हैं। अनेक वर्षों तक दमोह डिस्टिक काउंसिल के चेयरमैन रहे स्वर्गीय रघुवर प्रसाद सिंघई के अंग्रेजांे के खिलाफ दुस्साहस और जिला अस्पताल निर्माण में योगदान को ध्यान में रखकर 2 अक्टूबर 2014 को जिला अस्पताल के नवनिर्मित प्रवेश द्वार गेट का नामकरण सांसद श्री प्रहलाद पटेल की पहल पर श्री रघुवर प्रसाद के नाम पर किया गया था। और इसका लोकार्पण तत्कालीन कैबिनेट मंत्री जयंत मलैया ने किया था। वर्तमान में जब आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है ऐसे में भी यदि ऐसे गुमनाम शहीदों का स्मरण करके उनके बारे में जानकारी जुटाकर उन्हें याद नहीं किया जाता तो यह विडंबना ही होगी ।

13. गुलाबचन्द सिंघई 

 आपका जन्म सिंघई राजाराम के यहाँ सन् 1923 में दमोह मप्र में हुआ । आपने माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और विद्यार्थी जीवन से ही आप समाज और राष्ट्रª हित में सक्रिय रहते थे। सन् 1942 के भारत छोडो आन्दोलन में अपनी भूमिका के कारण जबलपुर और सागर में 9 माह 10 दिन का कारावास तथा 50  - रुपये का अर्थदण्ड भारत माता के प्रसाद स्वरूप स्वीकार किया था । 

14. श्री गोकुलचन्द्र सिंघई 

गोकुल चन्द सिंघई एक ऐसा नाम जो वकालत के क्षेत्र में पारंगत , कुशाग्र बुद्धि हाजिरजबाब और देश प्रेम में लाजबाब थे । आप पर अमरशहीद भैयालाल जी का अत्यंत प्रभाव था । आपने उन्हीं के सान्निध्य में खादी आश्रम , गौरक्षा , शराबबंदी जैसे कार्यों को सक्रियता के साथ किया । आप आत्मरक्षा और राष्ट्र रक्षा के लिए शौक से अखाड़े चलाते थे । फलस्वरूप आपने दमोह के समस्त अखाड़ों को संगठित कर एक संगठन बनाया और दशहरा महोत्सव प्रारंभ कराया । 

सन् 1916 में अंग्रेज पुलिस कप्तान ने दमोह जेल के सामने से बैलगाड़ियों के निकलने पर प्रतिबन्ध लगाया । जिसके लिए सिंघई जी ने आम सभाएँ की और विरोध किया । फलस्वरूप पुलिसकप्तान ने आपको मारने एक अपराधी को रिहा किया पर वह प्रयास विफल रहा । अंततः बैलगाडियां निकलने लगी । 

सन् 1931 में आपको ब्रिटिश विरोधी नीतियों के विरोध में गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेजा गया और 1933 में 58 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो गया ।

 15.श्री चिन्तामन जैन 

श्री चिन्तामन जैन , पुत्र- श्री दशरथ लाल जैन का जन्म दमोह ( म 0 प्र 0 ) जिले के पटेरा के निकट बमनपुरा ग्राम में 1913 में हुआ । आपकी रुचि देश - सेवा एवं सामाजिक कार्यों में बचपन से ही रही , अतः आप घूम - घूमकर देश को स्वतंत्र कराने की भावना लोगों में जागृत करते रहे । सोलह वर्ष की उम्र में ही आप भारतीय अधिनियम की धारा 379 आई ० पी ० सी ० के अन्तर्गत दिनांक 4-9-1930 से 3-1-1931 तक केन्द्रीय जेल जबलपुर में रहे । इन्द्राणी बाई से आपका विवाह हुआ था ।  जेल से छूटने के बाद आपका जीवन जबेरा जनपद के ग्राम  कठई सगरा में  सिंघई गुलाबचन्द एवं उनके पुत्र सिंघई रतनचन्द आदि के साथ राष्ट्र हितैषी कार्य करते-करते आपने अन्तिम सांस ली । 



 16. श्री डाल चन्द जैन

 आपका जन्म सन् 1915 में श्री नन्दीलाल जैन दमोह के यहां हुआ । राष्ट्रीय भावना के प्रभाव से 15 वर्ष की आयु में जीवन पर्यन्त देश की स्वतन्त्रता के कृत संकल्पित थे।  आप रघुवर प्रसाद मोदी की सभाओं झण्डा लेकर राष्ट्रीय गान गाया करते थे। आप 1949 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में सपत्नीक रहे । आपने दमोह की रोड पर एक माह लगातार परेड की जिसे देखकर लोग देशप्रेम की प्रेरणा लिया करते थे । 

1940 में दिल्ल्ी चलो आन्दोलन,1942 का करो या मरो आन्दोलन में सहभागिता दर्ज की । 19 अगस्त 1942 को सभा के मध्य से आपको गिरफ्तार किया गया और 24. जुलाई 1966 को आपका निधन हो गया । 

17. श्री पूरनचन्द जैन- 

पूरनचंद जी का जन्म श्री हजारीलाल जी के यहाँ सन 1916 में हुआ । 23 वर्ष की उम्र में त्रिपुरी कांग्रेस में अनेक युवकों के साथ स्वयंसेवक बनकर स्वतन्त्रता संग्राम में अपना अवदान दिया । आपको 4 सितम्बर 1942 को गिरफ्तार करके 7 माह 14दिन के कारावास के लिए सागर जेल भेजा गया । रिहा होकर कांग्रेस का कार्य करते रहे । 

18.सिंघई रतनचन्द जैन 

आपका जन्म गुलाबचन्द्र सिघई के यहाँ सन् 1918 में हुआ। आपको राष्ट्रीय भावना के संस्कार ा अपने पिताजी से मिले थे । पिता जी की मालगुजारी बांदकपुर एवं बनवार में भी । आपका राजनैतिक जीवन 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन से प्रारंभ हुआ । आपको 11 अगस्त 1942 को गिरफ्तार किया गया और दमोह से सागर जेल और सागर से नागपुर जेल भेज दिया । 10 माह 20 दिन का कारावास अमरावती में मासूम अली जेलर के कुशासन में अनेक यातनाएं सहन करके काटा । 

19. श्री राजाराम उर्फ राजेन्द्र कुमार जैन - 

श्री राजाराम अपने भाई श्री बाबूराम जी के साथ झोली  में चना जोर गरम बोलकर  चना बेचते थे । आपका जन्म 1906 में पथरियादमोह  में हुआ ।

  1942 के आन्दोलन में आप अपने छोटे भाई के साथ पकडे गए और 2 वर्ष 4 माह का कारावास , मिला । सन् 1973 में आपका निधन हो गया ।

20. राजाराम बजाज  -

 श्री लोकमन बजाज के चतुर्थ पुत्र श्री राजाराम बजाज का जन्म सन 1900 में हुआ। आपको युवावस्था से ही राष्ट्रप्रेम था जो कि आपके पड़ोसी गोकुलचंद वकील की प्रेरणा एवं सहयोग से पनपा था।   । आपने चौधरी भैयालाल के चरखा प्रचार आन्दोलन को सम्भाला साथ ही 15000/ - नुकसान भी उठाया । 

आपने युवावस्था से ही राष्ट्र हित की प्रभात फेरियां , गौरक्षा आन्दोलन , विदेशीमाल एवं का शराब की दुकानों का बहिष्कार, विदेशी शिक्षा बहिष्कार आन्दोलनों में सक्रिय रहें  और आपने व्यायाम शौकीन होने के कारण देश रक्षा के हितार्थ  दमोेह के मुहल्लों एवं ग्रामीण अंचल में बाहुबली व्यायाम शालाएँ खुलवाई तथा जिसका मुख्य केन्द्र जैन धर्मशाला के आंगन में अपने खर्च  पर बाहुबली व्यायाम शाला बनवाई । जिसमें प्रेमचंद उस्ताद का सहयोग भी आपको प्राप्त हुआ 

 1930 के आंदोलन में 4 माह की सजा 80 रु अर्थदण्ड, 1942 के आंदोलन में अपने भतीजे रूप - चंदबजाज को 9 माह 15 दिन के लिए जेल भेजा  और आप  स्वयं भूमिगत रहकर लीलाधर सर्राफ के सहयोग से  जेल गए परिवारों की सहायता करते रहे ।  आप 30 वर्षों तक श्री दि - जैन सिद्धक्षेत्र अलपुर कमेटी अध्यक्ष रहे । 

21.श्री रूपचंद बजाज -

जैन धर्म के प्रगाढ. श्रद्धानी एवं समाज में प्रतिष्ठित श्रीदुलीचंद्र जी के यहां सन् 1912 में श्री रूपचंद बजाज का जन्म हुआ । आपको स्वतन्त्रता संग्राम में आगे आने की प्रेरणा स्वयं के चाचा श्री राजाराम बजाज से मिली।  बाहुवली व्यायाम शाला में आत्मरक्षा के हुनर सीखे और शरीर को बलशाली बनाया 

1942 में सागर जेलर ने कहा कि-  बलशाली बना था । आज हमारी जेल में सबसे बजनदार केंदी आया है ।

 आपने खादी का प्रचार , विदेशी वस्तुओं एवं शिक्षा का बहिष्कार,शराबबंदी आन्दोलनों में भागीदारी की । 1930 में आप त्रिपुरी कांग्रेस से जुड़े 21दिन वहां रुके । 

 17 अगस्त 1942 को गांधी चौक से गिरफ्तार हुए सागर जेल से नागपुर जेल पुनः सागर जेल 16.03.1943 को  3 माह के कठार कारावास के लिए अमरावती जेल भेजा गया वहां मासूम अली क्रुर निर्दयी जेलर की अमानवीय यातनाऐ सहन की।  जून -43 में आप रिहा हुए । वहां से मुक्तागिरि जैन सिद्धक्षेत्र के दर्शन कर दमोह वापिस आए और समाज कार्य और शैक्षणिक गतिविधियों में संलग्न रहे 7जनवरी1988 को  धर्म ध्यान पूर्वक आपका निधन हो गया । 

22. श्री रामचरण जैन दमोह-

 श्री रामचरण जैन  का जन्म दमोह के नन्हेंलाल जी के यहां सन् 1923 में हुआ । 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में आपने भाग लिया । जेल यात्रा की तथा पराधीनता की कठोर यातनायें सहीं । शासन ने सम्मान पत्र प्रदान कर आपको सम्मानित किया है ।

23. सवाई सिंघई रूपचंद जैन -

 अपनी निस्पृहता , उदारता , सरलता व स्वाभिमान के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात पटेरा , जिला - दमोह ( म 0 प्र 0 ) के सवाई सिंघई रूपचंद जैन , पुत्र - श्री रतनचंद जैन का जन्म 1917 में हुआ । ओरछा सेवा संघ , देशी राज प्रजा परिषद् आदि से जुड़े रहे रूपचंद जी ने जबलपुर के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया था । 1942 के आन्दोलन में पुलिस काफी प्रयत्न के बाद भी गिरफ्तार नहीं कर सकी । भूमिगत रहकर श्री जैन ने स्वतंत्रता की अलख जगाई । अपनी निस्पृह वृत्ति के कारण सरकार से मिलने वाली तमाम सुविधाओं को उन्होंने तिलाञ्जलि दे दी । सिंघई जी ने श्री दि ० जैन सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर के विकास में महनीय योगदान दिया था । पटेरा को विकासखण्ड बनवाने तथा हाईस्कूल , बैंक आदि की स्थापना में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी । 1994 में आपका निधन हो गया ।

24. नगर सेठ श्री लालचंद  जैन-

 राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने वाले ‘पहले देश- फिर समाज’ के सिद्धांत को अपनाने वाले थे । श्री लालचंद जैन ऐसे ही व्यक्तित्व थे । वे जहाँ राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल गये , वहीं उन्होंने जैन संस्थाओं को भी भरपूर दान दिया । शुभ्र खादी का कुर्ता , बंद गले का कोट और ऊँची पट्टी की खादी की टोपी लगाये सेठ लालचंद जी प्रायःदमोह की हर सामाजिक सभा में सभापति बने दिखायी देते थे । जब जनता कांग्रेस की सभाओं में आने से भी डरती थी और मजाक उड़ाती थी । तब भी सेठ साहब तखत पर बैठे भाषण देते रहते थे । आपका जन्म दमोह ( म ० प्र ० ) के सुप्रसिद्ध सेठ घराने में पिता श्री नाथूराम जी के यहाँ हुआ था । धार्मिक , सामाजिक एवं राजनीतिक सभी क्षेत्रों में आप निपुण थे और सिद्धान्त के पक्के थे । सरकार के खिलाफ महात्मा गांधी ने जब असहयोग आन्दोलन चलाया , तब उसमें आपका विशेष योगदान रहा , तभी आप जेल भी गये । बाद में आप जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने । आपके पूर्वजों ने श्री कुण्डलपुर जी , श्री नैनागिरि जी एवं दमोह में मन्दिरों का निर्माण कराकर पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ गजरथ भी चलवाये थे । सेठ लालचंद जी धार्मिक अनुष्ठानों में नियम से भाग लेते थे । श्री सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर के अध्यक्ष पद पर 15 वर्षों तक रहकर आपने क्षेत्र की सेवा की

 । आपके सहयोग से दमोह जिला में कई संस्थायें चल रही हैं । आपने श्री वर्णी दि ० जैन पाठशाला को 60 एकड़ भूमि देकर उसके सञ्चालन में लाखों रुपयों का दान दिया था । पूज्य श्री वर्णी जी महाराज ,  जिन्होंने आजादी  के लिए अपनी चादर भी दे दी थी ,के दमोह पदार्पण के समय आपने उनके उपदेशों से प्रभावित होकर उस समय एक मुस्त 50 हजार रुपये का दान दिया था । आपकी धर्मपत्नी भी उदार एवं दानशीला थीं । श्री सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर की 20 एकड़ जमीन , जो फतेपुर के बगीचे के नाम से जानी जाती है , को आपने ही दान में दिया था । उस बगीचे से क्षेत्र को है आज भी हजारों रुपयों की वार्षिक आमदनी है ।

 25. श्री लीलाधर सराफ -

व्यायाम के शौक ने जिन्हें आजादी का दीवाना बना दिया , ऐसे श्री लीलाधर सराफ , पुत्र श्री मल्थूराम सराफ का जन्म दमोह ( म 0 प्र 0 ) में 1895 में हुआ । आपने जैन और अजैन सभी को श्री बाहुबली व्यायाम शाला का सदस्य बनाया । यहाँ तक कि श्री गजाधर प्रसाद मास्टर को प्रेरणा देकर लाठी , लेजिम , तलवार , भाला , पटा , बनेटी और मलखम्म के खेल  सीखने के लिए श्री हनुमान व्यायाम शाला  अमरावती भिजवाया और लौटने पर बाहुबली व्यायाम शाला के सभी सदस्यों और अपनी लड़की सहित बहुत - सी से लड़कियों को लेजिम आदि की ट्रेनिंग दिलवायी । 

1942 के आन्दोलन में आपने बाहुबली व्यायाम शाला के सदस्यों को झौंक दिया । बहुत से पकड़े थे गये और बहुत से छिपकर बुलेटिन छापने का काम इनके निवासस्थान पर करते रहे । परन्तु पुलिस को इसकी अंत तक भनक भी न हुई । दमोह में होने वाले अनेक क्रांतिकारी कार्यों का सञ्चालन आपके निवासस्थान से ही होता था । आपका कार्य पुलिस से मिलकर रहना और यह पता लगाना था कि आज किसके पकड़े जाने की आशा है व कहाँ तलाशी होने वाली है । जो सेनानी जेल चले जाते , उनके घरों की खान - पान सहायता की जिम्मेदारी श्री प्रेमचंद उस्ताद  के साथ श्री लीलधर सराफ और श्री राजाराम बजाज की ही रहती थी । क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण म 0 प्र 0 शासन ने आपको स्वतंत्रता सैनानी का ताम्रपत्रादि प्रदान कर सम्मानित किया था । 2-8-80 को आपका निधन हो गया ।

26.श्री शंकरलाल जैन- 

दमोह ( म 0 प्र 0 ) के श्री शंकरलाल जैन का जन्म 1921 में हुआ । आपके पिता का नाम श्री भैयालाल था । आपने प्राथमिक तक शिक्षा ग्रहण की । त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में स्वयंसेवक के रूप में तथा 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में आपने भाग लिया एवं अर्थदण्ड पाया ।

27. श्री शिवप्रसाद सिंघई -

 दमोह के प्रसिद्ध सिंघई परिवार का राष्ट्रीय आन्दोलन में अग्रगण्य स्थान है । इस परिवार के श्री सिंघई गोकुलचंद वकील , सिं ० गुलाबचंद , सिं ० शिवप्रसाद , सिं ० रतनचंद जी जेल गये । सिं ० गुलाबचंद के पुत्र सिंघई शिवप्रसाद का का जन्म 29-5-1921 को हुआ । आप माध्यमिक शाला में अध्ययनरत थे कि दमोह में महात्मा गांधी का आगमन हुआ । छात्र शिवप्रसाद भाषण सुनने चला गया । फिर क्या था - हेडमास्टर ने बेतों से पीटा और स्कूल से बाहर निकाल दिया और यहीं समापन हो गया सिंघई जी की शिक्षा का । 

आप नमक सत्याग्रह के अवसर पर वानर सेना में शामिल रहे । कांग्रेस कार्यालय में सचिव पद पर भी आपने कार्य किया । 1942 में आपके छोटे भाई सिंघई रतनचंद को पकड़ा गया तो आप भूमिगत हो गये । घर की तलाशी ली गई , जब ये न मिले तो इनके पिता सिं ० गुलाबचंद जी को पुलिस पकड़कर ले गई । दिनांक 1-10-1942 को शिवप्रसाद जी पकड़ लिये गये । बदले में पिता गुलाबचन्द जी को छोड़ दिया गया । शिवप्रसाद जी को 5 माह , 5 दिन की सजा दी गई और सागर जेल में रखा गया । सजा पिूरी होने पर दि ० 16-3-1943 को छोड़ दिया गया ।


 28. साबूलाल कामरेड-  जन्म पथरिया , जिला- दमोह ( म ० प्र ० ) में दिनांक 14-9-1922 को श्री अनन्तराम जी के यहाँ हुआ । 1939 में आप दमोह जिला कांग्रेस कार्यालय में कार्य करने लगे , जिसमें डुंडी पीटने से लेकर दफ्तर का पूरा कार्य आपने संभाला । 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में तीन हफ्ते स्वयंसेवक बनकर रहे । साथ ही जैन सेवादल से जुड़ गये तथा सामाजिक कार्यों में भी भाग लेने लगे एवं श्री साबूलाल कामरेड़ हँसमुख स्वभावी श्री साबूलाल जैन कामरेड़ दि 0 11 अगस्त , 1942 को आप जुलूस का नेतृत्व करते हुए पकड़े गये , मुकदमा चला तथा 50/  - जुर्माना की सजा हुई । पुत्र को छुड़ाने के लिए अनन्तराम जी ने बंजी ( घोड़ा आदि पर सामान बांध कर गांव - गांव बेचने का काम ) करने का घोड़ा बेच डाला , परन्तु गांधी चौक की आम सभा का डिक्टेटर बनकर भाषण देते हुए आप फिर पकड़ लिये गये तथा सागर जेल में 7 माह नजरबन्द रहे , बाद मुकदमा चला तथा तीन माह की सजा दी गई ।

29.श्री साबूलाल जैन-  स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण शिक्षक पद से निलम्बित किये गये , दमोह ( म 0 प्र 0 ) के श्री साबूलाल जैन , पुत्र - श्री सुखलाल जैन का जन्म 1906 में हुआ । अल्पवय में ही आप 1921 से स्वतंत्रता संग्राम में जबलपुर में सक्रिय हो गये । विदेशी वस्त्र बहिष्कार तथा 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में आपने भाग लिया । आपने अध्यापन और प्रशिक्षण प्राप्त किया और शिक्षक बन गये । शिक्षण कार्य करते हुए भी जेल क्रांतिकारियों को सामग्री पहुँचाते रहे और प्रचार साहित्य का वितरण किया । राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण शिक्षक पद से आपको निलम्बित कर दिया गया था ।

30 श्री प्रेमचंद विद्यार्थी -श्रीमान प्रेम चंद जी जैन विद्यार्थी का जन्म ग्राम कुआं खेड़ा जिला दमोह 15 जनवरी 1936 को श्री कार्य लाल जी जैन के यहां होगा आपने अपने जीवन में शिक्षा को महत्व देते हुए महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में काव्य पत्रकारिता एवं भाषण तथा स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित साहित्य को प्रकाशित करके सहयोग किया और इसी सहयोग के कारण ब्रिटिश सरकार ने आपको गिरफ्तार करने की कई बार कोशिश की लेकिन आप भूमिगत रहे और चुप करके आपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों का भरण पोषण और उनके भोजन पानी और सुरक्षा की व्यवस्था करते रहे ब्रिटिश सरकार आप को गिरफ्तार नहीं कर पाई और आपका देहांत 2021 में हुआ

उपरोक्त सेनायियों के अतिक्ति भी अनेक गुमनाम सेनानी रहे हैं जिन्हांेेने इन सबका किसी ना किसी रूप में अपना सहयोग किया होगा उनकी खोज करना अत्यन्त आवश्यक है । हमें इनके त्याग बलिदान,समर्पण से बहुत कुछ सीखना चाहिए । 

Tuesday, June 21, 2022

गांधी परिवार पर शोध

 गांधी परिवार पर एक शोध 


स्टेडियम :


 1. इंदिरा गांधी खेल परिसर, दिल्ली

 2. इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, नई दिल्ली

 3. जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली

 4. राजीव गांधी स्पोर्ट्स स्टेडियम, बवाना

 5. राजीव गांधी राष्ट्रीय फुटबॉल अकादमी, हरियाणा

 6. राजीव गांधी एसी स्टेडियम, विशाखापत्तनम

 7. राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम, पांडिचेरी

 8. राजीव गांधी स्टेडियम, नाहरगुन, ईटानगर

 9. राजीव गांधी बैडमिंटन इंडोर स्टेडियम, कोचीन

 10. राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम, कदवंतरा, एर्नाकुलम

 11. राजीव गांधी खेल परिसर, सिंघू

 12. राजीव गांधी मेमोरियल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, गुवाहाटी

 13. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम, हैदराबाद

 14. राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम, कोचीन

 15. इंदिरा गांधी स्टेडियम, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश

 16. इंदिरा गांधी स्टेडियम, ऊना, हिमाचल प्रदेश

 17. इंदिरा प्रियदर्शनी स्टेडियम, विशाखापत्तनम

 18. इंदिरा गांधी स्टेडियम, देवगढ़, राजस्थान

 19. गांधी स्टेडियम, बोलंगीर, उड़ीसा

 20. जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, कोयंबटूर

 21. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, देहरादून

 22. जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, चेन्नई

 23. नेहरू स्टेडियम (क्रिकेट), पुणे

                                                      हवाई अड्डे / बंदरगाह:

 1. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, शमशाबाद, हैदराबाद, तेलंगाना

 2. राजीव गांधी कंटेनर टर्मिनल, कोचीन

 3. इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, नई दिल्ली

 4. इंदिरा गांधी डॉक, मुंबई

 5. जवाहरलाल नेहरू नवीन शेवा पोर्ट ट्रस्ट, मुंबई

 विश्वविद्यालय / शिक्षा संस्थान:

 1. राजीव गांधी भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग

 2. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एरोनॉटिक्स, रांची, झारखंड

 3. राजीव गांधी तकनीकी विश्वविद्यालय, गांधी नगर, भोपाल, म.प्र।

 4. राजीव गांधी स्कूल ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉ, खड़गपुर, कोलकाता

 5. राजीव गांधी विमानन अकादमी, सिकंदराबाद

 6. राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, पटियाला, पंजाब

 7. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान, तमिलनाडु युवा मामले और खेल मंत्रालय

 बजटीय आवंटन 2008-09 - 1.50 करोड़

 बजटीय आवंटन 2009-10 - 3.00 करोड़

 8. राजीव गांधी विमानन अकादमी, बेगमपेट, हैदराबाद, ए.पी.

 9. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, कोट्टायम, केरल

 10. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी, चंद्रपुर, महाराष्ट्र

 11. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, ऐरोली, नवी मुंबई, महाराष्ट्र

 12. राजीव गांधी विश्वविद्यालय, ईटानगर, अरुणाचल प्रदेश

 13. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, चोल नगर, बैंगलोर, कर्नाटक

 14. राजीव गांधी प्राउडियोगी विश्व विद्यालय, गांधी नगर, भोपाल, म.प्र।

 15. राजीव गांधी D.e.d.  कॉलेज, लातूर, महाराष्ट्र

 16. राजीव गांधी कॉलेज, शाहपुरा, भोपाल

 17. राजीव गांधी फाउंडेशन, राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली

 18. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी, रायबरेली, यू.पी.

 19. राजीव गांधी होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, भोपाल, म.प्र।

 20. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट स्टडीज, पूर्वी गोदावरी जिला, ए.पी.

 21. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, ठाकुर, कर्नाटक

 22. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेस, पांडिचेरी, तमिलनाडु

 23. राजीव गांधी आईटी और जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय विद्यापीठ

 24. राजीव गांधी हाई स्कूल, मुंबई, महाराष्ट्र

 25. राजीव गांधी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, सतना, म.प्र।

 26. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, श्रीपेरंबुदूर, तमिलनाडु

 27. राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी केंद्र, नागपुर विश्वविद्यालय के आर.टी.एम.

 28. राजीव गांधी सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी, तिरुवनंतपुरम, केरल

 29. राजीव गांधी महाविद्यालय, मध्य प्रदेश

 30. राजीव गांधी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, इलाहाबाद, यू.पी.

 31. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, बैंगलोर, कर्नाटक

 32. राजीव गांधी सरकार।  पीजी आयुर्वेदिक कॉलेज, पपरोला, हिमाचल प्रदेश

 33. राजीव गांधी कॉलेज, सतना, म.प्र।

 34. राजीव गांधी अकादमी फॉर एविएशन टेक्नोलॉजी, तिरुवनंतपुरम, HB GB HDD gv gv c dc fc केरल

 35. राजीव गांधी मध्य विद्यालय, महाराष्ट्र

 36. राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली

 37. राजीव गांधी सेंटर फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप

 38. राजीव गांधी औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र, गांधीनगर

 39. राजीव गांधी ज्ञान प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश

 40. राजीव गांधी दूरस्थ शिक्षा संस्थान, कोयम्बटूर, तमिलनाडु

 41. राजीव गांधी सेंटर फॉर एक्वाकल्चर, तमिलनाडु

 42. राजीव गांधी विश्वविद्यालय (अरुणाचल विश्वविद्यालय), ए.पी.

 43. राजीव गांधी स्पोर्ट्स मेडिसिन सेंटर (RGSMC), केरल

 44. राजीव गांधी विज्ञान केंद्र, मॉरिटस

 45. राजीव गांधी कला मंदिर, पोंडा, गोवा

 46. ​​राजीव गांधी विद्यालय, मुलुंड, मुंबई

 47. राजीव गांधी मेमोरियल पॉलिटेक्निक, बैंगलोर, कर्नाटक

 48. राजीव गांधी मेमोरियल सर्कल दूरसंचार प्रशिक्षण केंद्र (भारत), चेन्नई

 49. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी, कासगोड, केरल

 50. राजीव गांधी मेमोरियल कॉलेज ऑफ एरोनॉटिक्स, जयपुर

 51. राजीव गांधी मेमोरियल फर्स्ट ग्रेड कॉलेज, शिमोगा

 52. राजीव गांधी मेमोरियल कॉलेज ऑफ एजुकेशन, जम्मू और कश्मीर

 53. राजीव गांधी साउथ कैंपस, बरकछा, वाराणसी

 54. राजीव गांधी मेमोरियल टीचर ट्रेनिंग कॉलेज, झारखंड

 55. राजीव गांधी डिग्री कॉलेज, राजमुंदरी, ए.पी.

 56. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), नई दिल्ली

 57. इंदिरा गांधी विकास और अनुसंधान संस्थान, मुंबई, महाराष्ट्र

 58. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून

 59. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय अकादेमी, फुर्सतगंज एयरफील्ड, रायबरेली, उत्तर प्रदेश

 60. इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान संस्थान, मुंबई

 61. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, उड़ीसा

 62. इंदिरा गांधी बी.एड.  कॉलेज, मैंगलोर

 63. श्रीमती।  इंदिरा गांधी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, नांदेड़, महाराष्ट्र

 64. इंदिरा गांधी बालिका निकेतन बी.एड.  कॉलेज, झुंझुनू, राजस्थान

 65. इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

 66. श्रीमती।  इंदिरा गांधी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, नवी मुंबई, महाराष्ट्र

 67. श्रीमती।  इंदिरा गांधी कोलज, तिरुचिरापल्ली

 68. इंदिरा गांधी इंजीनियरिंग कॉलेज, सागर, मध्य प्रदेश

 69. इंदिरा गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, कश्मीरी गेट, दिल्ली

 70. इंदिरा गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, सारंग, जिला।  धेनकनाल, उड़ीसा

 71. इंदिरा गांधी एयरोनॉटिक्स संस्थान, पुणे, महाराष्ट्र

 72. इंदिरा गांधी इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर, नई दिल्ली

 73. इंदिरा गांधी शारीरिक शिक्षा और खेल विज्ञान संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

 74. इंदिरा गांधी हाई स्कूल, हिमाचल

 75. इंदिरा कला संघ विश्व विद्यालय, छत्तीसगढ़

 76. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला

 77. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुकटपल्ली, आंध्र प्रदेश

 78. नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग, उत्तरकाशी

 79. पंडित जवाहरलाल नेहरू व्यावसायिक प्रबंधन संस्थान, विक्रम विश्वविद्यालय

 80. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

 81. जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, बैंगलोर

 82. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुकटपल्ली, एपी

 83. जवाहरलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज औरंगाबाद, महाराष्ट्र में

 84. जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस साइंटिफिक रिसर्च, एक डीम्ड यूनिवर्सिटी, जक्कुर, पी.ओ.  बैंगलोर

 85. जवाहरलाल नेहरू सामाजिक अध्ययन संस्थान, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ (पुणे, महाराष्ट्र) से संबद्ध

 86. जवाहरलाल नेहरू कॉलेज ऑफ एरोनॉटिक्स एंड एप्लाइड साइंसेज, कोयंबटूर, (ईएसडी 1968)

 87. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान, कतरास, धनकवड़ी, पुणे, महाराष्ट्र

 88. कमल किशोर कदम, जवाहरलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज औरंगाबाद, महाराष्ट्र

 89. जवाहरलाल नेहरू शिक्षा और तकनीकी अनुसंधान संस्थान, नांदेड़, महाराष्ट्र

 90. जवाहरलाल नेहरू कॉलेज, अलीगढ़

 91. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हैदराबाद

 92. जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर

 93. जवाहरलाल नेहरू बी.एड.  कॉलेज, कोटा, राजस्थान

 94. जवाहरलाल नेहरू पी.जी.  कॉलेज, भोपाल

 95. जवाहरलाल नेहरू सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज, सुंदरनगर, जिला मंडी, एच.पी.

 96. जवाहरलाल नेहरू पब्लिक स्कूल, कोलार रोड, भोपाल

 97. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, काकीनाडा, ए.पी.

 98. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान, इब्राहिमपट्टी, आंध्र प्रदेश

 99. जवाहर नवोदय विद्यालय


 2015-16 तक पूरे भारत में 598 जेएनवी


 696. जवाहर नवोदय विद्यालय

 697. इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च, कल्पक्कम

 698. इंदिरा गाँधी विश्वविद्यालय हरियाणा 


पुरस्कार: 


 1. राजीव गांधी अवार्ड फॉर आउटस्टैंडिंग अचीवमेंट

 2. राजीव गांधी शिरोमणि पुरस्कार

 3. राजीव गांधी श्रमिक पुरस्कार, दिल्ली श्रम कल्याण बोर्ड

 4. राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार

 5. राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार

 6. राजीव गांधी वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार

 7. ज्ञान विज्ञान पर मूल पुस्तक लेखन के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार योजना

 8. राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार

 9. राजीव गांधी राष्ट्रीय गुणवत्ता पुरस्कार, 1991 में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा स्थापित

 10. स्वच्छ गांधी, पर्यावरण और वन मंत्रालय, सरकार के लिए राजीव गांधी पर्यावरण पुरस्कार।  भारत की

 11. राजीव गांधी ट्रैवलिंग स्कॉलरशिप

 12. राजीव गांधी (यूके) फाउंडेशन छात्रवृत्ति

 13. राजीव गांधी फिल्म अवार्ड्स (मुंबई)

 14. राजीव गांधी खेलरत्न पुरस्कार

 15. राजीव गांधी पेरिस प्रशस्ति, कर्नाटक

 16. राजीवगांधी व्यावसायिक उत्कृष्टता पुरस्कार

 17. राजीव गांधी उत्कृष्टता पुरस्कार

 18. इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार

 19. राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार

 20. इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी पुरस्कार

 21. इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार, पर्यावरण और वन मंत्रालय

 22. इंदिरा गांधी मेमोरियल नेशनल अवार्ड फॉरबीस्ट एनवायर्नमेंटल एंड इकोलॉजिकल

 23. इंदिरा गांधी पीरवरन पुरशकर

 24. इंदिरा गांधी एनएसएस अवार्ड

 25. राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार

 26. इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार योजना

 27. सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार

 28. इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार द टाउन राजभाषा के लिए

 29. इंदिरा गांधी पुरस्कार ”शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए

 30. विज्ञान कार्यान्वयन को लोकप्रिय बनाने के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार

 31. इंदिरा गांधी शिरोमणि पुरस्कार

 32. इंदिरा गांधी एनएसएस पुरस्कार / राष्ट्रीय युवा

 33. इंदिरा गांधी पीरवरन पुशर पुरस्कार - खोज n सही

 34. इंदिरा गांधी N.S.S पुरस्कार

 35. सामाजिक सेवा के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार, एमपी सरकार।

 36. पोस्ट ग्रेजुएट इंदिरा गांधी छात्रवृत्ति योजना

 37. इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार योजना

 38. इंदिरा गांधी राजभाषा शील्ड योजना

 39. इंदिरा गांधी वन्यजीव संरक्षण चिड़ियाघर के विजन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी।

 40. जवाहरलाल नेहरू को हर साल कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों को दी जाने वाली 15 लाख रुपये की अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए पुरस्कार दिया जाता है, जिसमें 1988 में फिलिस्तीन लिबरेशन फ्रंट के यासर अराफात और 1965 में यू थान्ट शामिल हैं।

 41. सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, रु। का नकद पुरस्कार।  उपरोक्त फिल्म की मान्यता में, श्याम बेनेगल को दिसम्बर 89 में दिया गया 20,000।

 42. जवाहरलाल नेहरू बालकल्याण सरकार द्वारा प्रत्येक 10 जोड़े को 10,000 रुपये का पुरस्कार।  महाराष्ट्र का (TOI-28-4-89)।

 43. शैक्षणिक उपलब्धि के लिए जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड, नई दिल्ली

 44. ऊर्जा के लिए जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी अनुसंधान पुरस्कार

 45. इंटरनेशनल अंडरस्टैंडिंग के लिए जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार

 46. ​​नेहरू बाल समिति बहादुरी पुरस्कार

 47. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडल

 48. जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार “1998-99 से, विज्ञान के लोकप्रियकरण के लिए संगठनों (अधिमानतः गैर सरकारी संगठनों) को दिया जाना।

 49. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय विज्ञान प्रतियोगिता

 50. डीएनए के विकास की अनुसंधान परियोजना के लिए जवाहरलाल नेहरू छात्र पुरस्कार

 

 छात्रवृत्ति / फैलोशिप: 


 1. विकलांग छात्रों के लिए राजीव गांधी छात्रवृत्ति योजना

 2. एससी / एसटी उम्मीदवारों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय

 3. एसटी उम्मीदवारों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना

 4. राजीव गांधी फैलोशिप, इग्नू

 5. राजीव गांधी विज्ञान प्रतिभा अनुसंधान अध्येता

 6. राजीव गांधी फैलोशिप, जनजातीय मामलों का मंत्रालय

 7. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा दी गई राजीव गांधी राष्ट्रीय फैलोशिप योजना

 8. राजीव गांधी फेलोशिप को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के साथ मिलकर राष्ट्रमंडल शिक्षण द्वारा प्रायोजित किया गया

 9. राजीव गांधी विज्ञान प्रतिभा अनुसंधान फैलोशिप जवाहरलाल नेहरू सेंटर द्वारा उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान (नवोदित वैज्ञानिकों को बढ़ावा देने के लिए) विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग और राजीव गांधी फाउंडेशन के साथ मिलकर किया गया।

 10. हैबिटेट सेक्टर में राजीव गांधी हुडको फैलोशिप

 11. इंदिरा गांधी मेमोरियल फैलोशिप की जाँच

 12. फुलब्राइट स्कॉलरशिप का नाम अब फुलब्राइट- जवाहरलाल नेहरू स्कॉलरशिप रखा गया है

 13. कैम्ब्रिज नेहरू छात्रवृत्ति, संख्या में 10, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन में अनुसंधान के लिए, 3 वर्षों के लिए पीएचडी के लिए अग्रणी, जिसमें शुल्क, रखरखाव भत्ता, ब्रिटेन की यात्रा और वापस शामिल हैं।

 14. स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए जवाहरलाल नेहरू फैलोशिप की योजना, सरकार।  भारत की।

 15. नेहरू शताब्दी (ब्रिटिश) फैलोशिप / पुरस्कार

 

 राष्ट्रीय उद्यान / अभयारण्य / संग्रहालय :


 1. राजीव गांधी (नागरहोल) वन्यजीव अभयारण्य, कर्नाटक

 2. राजीव गांधी वन्यजीव अभयारण्य, आंध्र प्रदेश

 3. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उद्यान, तमिलनाडु

 4. इंदिरा गांधी प्राणि उद्यान, नई दिल्ली

 5. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिमी घाट पर अनामलाई हिल्स

 6. इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान, विशाखापत्तनम

 7. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संघालय (IGRMS)

 8. इंदिरा गांधी वन्यजीव अभयारण्य, पोलाची

 9. राजीव गांधी स्वास्थ्य संग्रहालय

 10. राजीव गांधी प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय

 11. इंदिरा गांधी मेमोरियल संग्रहालय, नई दिल्ली

 12. राज्य सरकार द्वारा औरंगाबाद, महाराष्ट्र में जवाहरलाल नेहरू संग्रहालय खोला गया।

 13. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल गैलरी, लंदन

 14. जवाहरलाल नेहरू तारामंडल, वर्ली, मुंबई।

 15. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी बच्चों के लिए

                                             

अस्पताल / चिकित्सा संस्थान :


 1. राजीव गांधी स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, बैंगलोर, कर्नाटक

 2. राजीव गांधी कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र, दिल्ली

 3. राजीव गांधी होम फॉर हैंडीकैप्ड, पांडिचेरी

 4. श्री राजीव गांधी कॉलेज ऑफ डेंटल ... साइंस एंड हॉस्पिटल, बैंगलोर, कर्नाटक

 5. राजीव गांधी सेंटर फॉर बायो टेक्नोलॉजी, तिरुवंतपुरम, केरल

 6. राजीव गांधी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, बैंगलोर, कर्नाटक

 7. राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, रायचूर

 8. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चेस्ट डिजीज, बैंगलोर, कर्नाटक

 9. राजीव गांधी पैरामेडिकल कॉलेज, जोधपुर

 10. राजीव गांधी मेडिकल कॉलेज, ठाणे, मुंबई

 11. राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी, कर्नाटक

 12. राजीव गांधी अस्पताल, गोवा

 13. राजीव गांधी मिशन ऑन कम्युनिटी हेल्थ, मध्य प्रदेश

 14. राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, दिल्ली

 15. राजीव गांधी होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज, चिनार पार्क, भोपाल, म.प्र

 16. उत्तर पूर्वी इंदिरा गांधी क्षेत्रीय स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान संस्थान, शिलांग, मेघालय

 17. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला

 18. इंदिरा गांधी बाल स्वास्थ्य संस्थान, बैंगलोर

 19. इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, शेखपुरा, पटना

 20. इंदिरा गांधी बाल चिकित्सालय, अफगानिस्तान

 21. इंदिरा गांधी बाल स्वास्थ्य अस्पताल, धर्माराम कॉलेज, बैंगलोर

 22. इंदिरा गांधी बाल संस्थान, बैंगलोर

 23. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, शिमला

 24. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंस, केरल

 25. इंदिरा गांधी मेमोरियल आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, भुवनेश्वर

 26. इंदिरा गांधी गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नागपुर

 27. इंदिरा गांधी आई हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, कोलकाता

 28. इंदिरा गांधी अस्पताल, शिमला

 29. इंदिरा गांधी महिला एवं बाल अस्पताल, भोपला

 30. इंदिरा गांधी गैस राहत अस्पताल, भोपाल

 31. कमला नेहरू अस्पताल, शिमला

 32. चाचा नेहरू बाल चिकत्सालय

 33. जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (JIPMER), पुदुचेरी

 34. जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल और अनुसंधान केंद्र, भोपाल

 35. रायपुर में जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज।

 36. नेहरू होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नई दिल्ली

 37. नेहरू विज्ञान केंद्र, मुंबई

 38. जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल और अनुसंधान केंद्र, भोपाल

 39. पंडित जवाहरलाल नेहरू होम्योपैथिक चिकित्सा विज्ञान संस्थान, महाराष्ट्र

 40. इंदिरा गांधी अस्पताल द्वारका, दिल्ली

 

 संस्थान / अध्यक्ष / त्यौहार :


 1. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान।  (RGNIYD), युवा और खेल मंत्रालय

 2. राजीव गांधी नेशनल ग्राउंड वाटर ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, फरीदाबाद, हरियाणा

 3. आदिवासी क्षेत्रों में राजीव गांधी खाद्य सुरक्षा मिशन

 4. राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान

 5. राजीव गांधी शिक्षा मिशन, छत्तीसगढ़

 6. राजीव चेयर एंडोमेंट की स्थापना 1998 में साउथ एशियन इकोनॉमिक्स का चेयर बनाने के लिए की गई

 7. राजीव गांधी परियोजना - जमीनी स्तर तक शिक्षा को व्यापक उपग्रह संपर्क प्रदान करने के लिए एक पायलट

 8. राजीव गांधी ग्रामीण आवास निगम लिमिटेड (कर्नाटक उद्यम सरकार)

 9. राजीव गांधी सूचना और प्रौद्योगिकी आयोग

 10. राजीव गांधी शांति और निरस्त्रीकरण के लिए अध्यक्ष

 11. राजीव गांधी संगीत समारोह

 12. राजीव गांधी मेमोरियल लेक्चर

 13. राजीव गांधी अक्षय उर्जा दिवस

 14. राजीव गांधी एजुकेशन फाउंडेशन, केरल

 15. राजीव गांधी पंचायती राज सम्मेलन

 16. राजीव गांधी मेमोरियल एजुकेशनल एंड चैरिटेबल सोसाइटी, कासगोड, केरल

 17. राजीव गांधी मेमोरियल ट्रॉफी इकनिका स्पर्धा, प्रेरणा फाउंडेशन, कारी रोड

 18. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, जनपथ, नई दिल्ली

 19. इंदिरा गांधी पंचायती राज और ग्रामीण विकास संस्थान, जयपुर, राजस्थान

 20. इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (IGCAR), कल्पक्कम

 21. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड रिसर्च, मुंबई

 22. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी (IGIC), पटना

 23. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

 24. इंदिरा गांधी नेशनल फाउंडेशन, तिरुवनंतपुरम, केरल

 25. इंदिरा गांधी महिला सहकारी सौत गिरानी लिमिटेड, महाराष्ट्र

 26. इंदिरा गांधी संरक्षण निगरानी केंद्र, पर्यावरण और वन मंत्रालय

 27. सिंगल गर्ल चाइल्ड के लिए पोस्ट-ग्रेजुएट इंदिरा गांधी छात्रवृत्ति

 28. जवाहर शतकरी सहकारी सखार लिमिटेड

 29. नेहरू युवा केंद्र संगठन

 30. जवाहरलाल नेहरू शताब्दी समारोह

 31. जवाहरलाल नेहरू की स्मृति में विभिन्न संप्रदायों के डाक टिकट और एक रुपये के सिक्के।

 32. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल ट्रस्ट (U.K.) छात्रवृत्ति

 33. जवाहरलाल नेहरू कस्टम हाउस न्हावा शेवा, महाराष्ट्र

 34. जवाहरलाल नेहरू केंद्र के लिए।  उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान, बैंगलोर

 35. जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र, भारत का दूतावास, मास्को

 36. किशोरियों के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू उद्योग केंद्र, पुणे, महाराष्ट्र

 37. पंडित जवाहरलाल नेहरू कृषि और अनुसंधान संस्थान, पांडिचेरी

 


 सड़कों / भवन / स्थानों: 


 1. राजीव चौक, दिल्ली

 2. राजीव गांधी भवन, सफदरजंग, नई दिल्ली

 3. राजीव गांधी हस्तशिल्प भवन, नई दिल्ली

 4. राजीव गांधी पार्क, कालकाजी, दिल्ली

 5. इंदिरा चौक, नई दिल्ली

 6. नेहरू तारामंडल, नई दिल्ली

 7. नेहरू युवा केंद्र, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली

 8. नेहरू नगर, नई दिल्ली

 9. नेहरू प्लेस, नई दिल्ली

 10. नेहरू पार्क, नई दिल्ली नेहरू हाउस, बीएसजेड मार्ग, नई दिल्ली

 11. जवाहरलाल नेहरू सरकार हाउस नई दिल्ली

 12. राजीव गांधी अक्षय ऊर्जा पार्क, गुड़गांव, हरियाणा

 13. राजीव गांधी चौक, अंधेरी, मुंबई

 14. इंदिरा गांधी रोड, मुंबई

 15. इंदिरा गांधी नगर, वडाला, मुंबई

 16. इंदिरा गांधी खेल परिसर, मुलुंड, मुंबई

 17. नेहरू नगर, कुर्ला, मुंबई

 18. मुंबई के ठाणे में जवाहरलाल नेहरू उद्यान

 19. राजीव गांधी मेमोरियल हॉल, चेन्नई

 20. जवाहरलाल नेहरू रोड, वाडापलानी, चेन्नई, तमिलनाडु

 21. राजीव गांधी सलाई (राजीव गांधी के नाम पर पुरानी महाबलीपुरम सड़क)

 22. राजीव गांधी शिक्षा शहर, हरियाणा

 23. पर्वत राजीव, हिमालय की एक चोटी

 24. राजीव गांधी आईटी हैबिटेट, गोवा

 25. राजीव गांधी नगर, चेन्नई

 26. राजीव गांधी पार्क, विजयवाड़ा

 27. तमिलनाडु के कोयम्बटूर में राजीव गांधी नगर

 28. राजीव गांधी नगर, त्रिची, तमिलनाडु

 29. राजीव गांधी आईटी पार्क, हिंजेवाड़ी, पुणे

 30. राजीव गांधी पंचायत भव, पालनपुर बनासकांठा

 31. राजीव गांधी चंडीगढ़ प्रौद्योगिकी पार्क, चंडीगढ़

 32. राजीव गांधी स्मृति वन, झारखंड

 33. राजीव गांधी की प्रतिमा, पणजी, गोवा

 34. राजीव गांधी रोड, चित्तूर

 35. श्रीपेरंबुदूर में राजीव गांधी स्मारक

 36. इंदिरा गांधी मेमोरियल लाइब्रेरी, हैदराबाद विश्वविद्यालय

 37. इंदिरा गांधी म्यूजिकल फाउंटेन, बैंगलोर

 38. इंदिरा गांधी तारामंडल, लखनऊ

 39. इंदिरा गांधी भारतीय संस्कृति केंद्र (IGCIC), भारतीय उच्चायोग, मौरिटस

 40. इंदिरा गांधी प्राणि उद्यान, भारत के पूर्वी घाट

 41. इंदिरा गांधी नहर, रामनगर, जैसलमेर

 42. इंदिरा गांधी औद्योगिक परिसर, रानीपेट, वेल्लोर जिला

 43. इंदिरा गांधी पार्क, ईटानगर

 44. इंदिरा गांधी स्क्वीयर, पांडिचेरी

 45. इंदिरा गांधी रोड, विलिंगडन द्वीप, कोचीन

 46. ​​इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप गार्डन, कश्मीर

 47. इंदिरा गांधी सागर बांध, नागपुर

 48. इंदिरा गांधी पुल, रामेश्वर, तमिलनाडु

 49. इंदिरा गांधी अस्पताल, भिवंडी निजामपुर नगर निगम

 50. इंदिरा गांधी स्मारक सांस्कृतिक परिसर, यूपी सरकार।

 51. इंदिरा गांधी खेल स्टेडियम, रोहड़ू जिला, शिमला

 52. इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान, भोपाल

 53. इंदिरा गांधी नगर, राजस्थान

 54. इंदिरा नगर, लखनऊ

 55. सड़कें कई शहरों में जवाहरलाल नेहरू के नाम पर हैं उदा।  जयपुर, नागपुर, विले पार्ले, घाटकोपर, मुलुंड आदि में।

 56. नेहरू नगर, गाजियाबाद

 57. जवाहरलाल नेहरू गार्डन, अमरनाथ

 58. जवाहरलाल नेहरू गार्डन, पन्हाला

 59. जवाहरलाल नेहरू बाजार, जम्मू।

 60. जम्मू श्रीनगर राजमार्ग पर जवाहरलाल नेहरू सुरंग

 61. नेहरू चौक, उल्हास नगर, महाराष्ट्र।

 62. मांडवी, पणजी, गोवा में नेहरू पुल

 63. नेहरू नगर गाजियाबाद

 64. जवाहरलाल नेहरू रोड, धर्मताल, कोलकाता

 65. नेहरू रोड, गुवाहाटी

 66. जवाहर नगर, जयपुर

 67. नेहरू विहार कॉलोनी, कल्याणपुर, लखनऊ

 68. नेहरू नगर, पटना

 69. जवाहरलाल नेहरू स्ट्रीट, पांडिचेरी

 70. नेहरू बाज़ार, मदनपल्ली, तिरुपति

 71. नेहरू चौक, बिलासपुर।  एमपी

 72. नेहरू स्ट्रीट, पोनमालिपट्टी, तिरुचिरापल्ली

 73. नेहरू नगर, एस.एम.  रोड, अहमदाबाद

 74. नेहरू प्राणि उद्यान, हैदराबाद

 75. राजीव गांधी प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर), पुणे

 76. राजीव गांधी इन्फोटेक पार्क, हिंजेवाड़ी, पुणे।

 77. नेहरू नगर, नासिक पुणे।  सड़क।  और बहुत सारे।


 इसके अतिरिक्त, नेहरू-इंदिरा-राजीव के नाम पर 100+ राज्य और केंद्र सरकार की योजनाएं 

 

टिप्पणियों में अनुरोधों के आधार पर, हमारे पास संजय गांधी के नाम की चीजों की सूची है।

 संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, मुंबई।

 संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल, नई दिल्ली।

 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ।

 संजय गांधी पशु देखभाल केंद्र, नई दिल्ली।

 संजय गांधी संस्थान यदि ट्रामा और आर्थोपेडिक्स (SGITO), बैंगलोर।

 संजय गांधी अस्पताल, जयनगर, बैंगलोर।

 संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल, रीवा, मप्र।

 पर्यावरण और पारिस्थितिकी में संजय गांधी पुरस्कार

 संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेयरी टेक्नोलॉजी, पटना।

 संजय गांधी जैविक उद्यान, पटना।

 संजय गांधी पॉलिटेक्निक कॉलेज, बेल्लारी

 संजय गांधी पॉलिटेक्निक कॉलेज, जगदीश पुर, अमेठी

 संजय गांधी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, बैंगलोर।

 संजय गांधी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, बैंगलोर।

 संजय गांधी मेमोरियल कॉलेज, रांची।

 संजय गांधी महिला कॉलेज, गया

 संजय गांधी सरकार।  स्वायत्त पीजी कॉलेज, सीधी, मप्र।

 संजय गांधी कॉलेज, शिमला।

 संजय गांधी कॉलेज ऑफ नर्सिंग, सुल्तानपुर, दिल्ली।

 संजय गांधी कॉलेज और अनुसंधान केंद्र, विदिशा, मप्र।

 संजय गांधी बीएड कॉलेज, विदिशा, मप्र।

 संजय गांधी सर्वोदय साइंस कॉलेज, जबलपुर।

 संजय गांधी इंटर कॉलेज, सारण, बिहार।

 संजय गांधी कॉलेज ऑफ लॉ, जयपुर।

 संजय गांधी मेमोरियल गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कॉलेज, हैदराबाद।

 संजय गांधी पीजी कॉलेज, सुरपुर, मेरठ, यूपी।

 संजय गांधी स्टेडियम, पटना।

 संजय गांधी स्टेडियम, नरसिंहगढ़, म.प्र।

 संजय गांधी मार्केट, जालंधर।

 संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर, दिल्ली

Wednesday, June 8, 2022

ऋषि मुनि आदि की वैदिक व्याख्या

 #ऋषि_महर्षि_मुनि_साधु_और_संत_में_क्या_अंतर_है 


भारत में प्राचीन समय से ही ऋषि-मुनियों का विशेष महत्व रहा है क्योंकि ये समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे। ऋषि -मुनि अपने ज्ञान और तप के बल पर समाज कल्याण का कार्य करते थे और लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाते थे। आज भी तीर्थ स्थल, जंगल और पहाड़ों में कई साधु-संत देखने को मिल जाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि साधु, संत, ऋषि, महर्षि आदि यह सब अलग-अलग होते हैं। क्योंकि ज्यादातर लोग इनका अर्थ एक ही समझते हैं। आइए आज हम आपको बताते हैं कि ऋषि, महर्षि, मुनि, साधु और संत में क्या अंतर है और उनके बारे में क्या मान्यताएं हैं…


#ऋषि

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा का शब्द है। वैदिक ऋचाओं के रचयिताओं को ही ऋषि का दर्जा प्राप्त है। ऋषि को सैकड़ों सालों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है। वैदिक कालिन में सभी ऋषि गृहस्थ आश्रम से आते थे। ऋषि पर किसी तरह का क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या आदि की कोई रोकटोक नहीं है और ना ही किसी भी तरह का संयम का उल्लेख मिलता है। ऋषि अपने योग के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त हो जाते थे और अपने सभी शिष्यों को आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ-साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम थे। हमारे पुराणों में सप्त ऋषि का उल्लेख मिलता है, जो केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु हैं।


#महर्षि

ज्ञान और तप की उच्चतम सीमा पर पहुंचने वाले व्यक्ति को महर्षि कहा जाता है। इनसे ऊपर केवल ब्रह्मर्षि माने जाते हैं। हर सभी में तीन प्रकार के चक्षु होते हैं। वह ज्ञान चक्षु, दिव्य चक्षु और परम चक्षु हैं। जिसका ज्ञान चक्षु जाग्रत हो जाता है, उसे ऋषि कहते हैं। जिसका दिव्य चक्षु जाग्रत होता है उसे महर्षि कहते हैं और जिसका परम चक्षु जाग्रत हो जाता है उसे ब्रह्मर्षि कहते हैं। अंतिम महर्षि दयानंद सरस्वती हुए थे, जिन्होंने मूल मंत्रों को समझा और उनकी व्याख्या की। इसके बाद आज तक कोई व्यक्ति #महर्षि नहीं हुआ। महर्षि मोह-माया से विरक्त होते हैं और परामात्मा को समर्पित हो जाते हैं।


#साधु

साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि साधना कोई भी कर सकता है। प्राचीन समय में कई व्यक्ति समाज से हटकर या समाज में रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उससे विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि साधना से व्यक्ति सीधा, सरल और सकारात्मक सोच रखने वाला हो जाता है। साथ ही वह लोगों की मदद करने के लिए हमेशा आगे रहता है। साथु का संस्कृत में अर्थ है सज्जन व्यक्ति और इसका एक उत्तम अर्थ यह भी है 6 विकार यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर का त्याग कर देता है। जो इन सबका त्याग कर देता है और साधु की उपाधि दी जाती है।


#संत

संत शब्द संस्कृत के एक शब्द शांत से बिगड़ कर और संतुलन से बना है। संत उस व्यक्ति को कहते हैं, जो सत्य का आचरण करता है और आत्मज्ञानी होता है। जैसे- संत #कबीरदास, संत #तुलसीदास, संत #रविदास। ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं। बहुत से साधु, महात्मा संत नहीं बन सकते क्योंकि घर-परिवार को त्यागकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए चले जाते हैं, इसका अर्थ है कि वह अति पर जी रहे हैं। जो व्यक्ति संसार और अध्यात्म के बीच संतुलन बना लेता है, उसे संत कहते हैं। #संत के अंदर सहजता शांत स्वभाव में ही बसती है। संत होना गुण भी है और योग्यता भी।


#मुनि

मुनि शब्द का अर्थ होता है मौन अर्थात शांति यानि जो मुनि होते हैं, वह बहुत कम बोलते हैं। मुनि मौन रखने की शपथ लेते हैं और वेदों और ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो ऋषि साधना प्राप्त करते थे और मौन रहते थे उनको मुनि का दर्जा प्राप्त होता था। कुछ ऐसे ऋषियों को मुनि का दर्जा प्राप्त था, जो ईश्वर का जप करते थे और #नारायण का ध्यान करते थे, जैसे कि नारद मुनि। #मुनि मंत्रों को जपते हैं और अपने ज्ञान से एक व्यापर भंडार की उत्पत्ति करते हैं। मुनि शास्त्रों की रचना करते हैं और समाज के कल्याण के लिए रास्ता दिखाते हैं। मौन साधना के साथ-साथ जो व्यक्ति एक बार भोजन करता हो और 28 गुणों से युक्त हो, वह व्यक्ति ही मुनि कहलाता था।



Tuesday, May 17, 2022

मांसाहार और वैदिक ग्रंथ विमर्श

 🌹 *वैदिक शास्त्रों में शाकाहार!*

🌹 *महाभारत में राजा वसु की कथा*


प्रायः लोग मांस भोजन के लिए शास्त्रों का अपने अनुसार विकृत अर्थ लगाते हैं। विशेषकर भारत में वामपन्थियों का उद्देश्य है कि भारत में गो पूजा परम्परा नष्ट करने के लिए गोमांस भोजन की परम्परा दिखायी जाय। उनको केवल ३ शब्द अलग अलग स्थानों से खोज कर जोड़ देना है-गो, मांस, भोजन। विभिन्न प्रसंगों में इनके क्या अर्थ हैं, उनसे इनको कोई मतलब नहीं है। ये ३ शब्द मिलते ही उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया।

१. यज्ञ में पशुबलि-

(१) मांसाहार के लिए मिथ्या अर्थ-यज्ञ में उपरिचर वसु ने पशु बलि का समर्थन किया था जिस पर ऋषियों ने उनको शाप दिया था।

महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३३७-

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात्॥१३॥

छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा।

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः॥१४॥

ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थविदिनम्।

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद दिवः पत॥१५॥

अद्यप्रभृति ते याजन्नाकाशे विहता गतिः।

अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्वा प्रवेक्ष्यसि॥१६॥

यहां अज का अर्थ बीजी पुरुष कहा गया है, जिसकी यज्ञ द्वारा उपासना होती है।

(२) रन्तिदेव पर दैनिक गोहत्या का आक्षेप-महाभारत, द्रोण पर्व, अध्याय ६७-

सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत्।

आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः॥१४॥

= जो भी अतिथि संकृति पुत्र रन्तिदेव के यहाँ रात में आता था, उसे २१,००० गौ छू कर दान करते थे।

कोई भी २१,००० गौ एक बार क्या, जीवन भर में नहीं खा सकता है। यहां गो शब्द सम्पत्ति की माप भी है। मुद्राओं के नाम बदलते रहे हैं। उनका स्थायी नाम था-गो, धेनु। किसी को एक लाख गाय दी जायेगी तो वह उनको रख नहीं पायेगा, न देख भाल कर सकता है। यहाँ गो बड़ी मुद्रा (स्वर्ण), धेनु छोटी मुद्रा (रजत), निष्क सबसे छोटी मुद्रा है। निष्क से पंजाबी में निक्का, या धातु नाम निकेल हुआ है। निष्क मिलना अच्छा है, अतः नीक का अर्थ अच्छा है।

अन्नं वै गौः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/८/३ आदि)

इन्द्र मूर्ति १० धेनु में खरीदने का उल्लेख है-

क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः। (ऋक, ४/२४/१०)

२१००० गो या स्वर्ण मुद्रा देने के बाद उनको अच्छा भोजन कराते थे-

तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्ट मणिकुण्डलाः।

सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा॥

वहाँ कुण्डल, मणि पहने रसोइये पुकार पुकार कर कहते थे-आप लोग खूब दाल भात खाइये। आज का भोजन पहले जैसा नहीँ है, उससे अच्छा है।

यही वर्णन शान्ति पर्व (६७/१२७-१२८) में भी है।

अनुशासन पर्व (११५/६३-६७) में बहुत से राजाओं की सूची है जिन्होंने तथा कई अन्य महान् राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था। इनमें रन्तिदेव का भी नाम है-

श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च।

रैवते रन्तिदेवेन वसुना, सृञ्जयेन च॥६३॥

एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च।

दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा॥६४॥

विरूपश्वेन निमिना जनकेन च धीमता।

ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह॥६५॥

इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च।

अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना॥६६॥

हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च।

एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम॥६७॥

श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव , वसु, सृञ्जय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्व, निमि, बुद्धिमान जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत-इन सबने तथा अन्य राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था।

(३) भगवान् राम आदि कई राजाओं का ऊपर उल्लेख है कि उन लोगों ने जीवन में कभी मांस नहीं खाया।

(४) वामपन्थी झूठ-उत्तर रामचरित में एक प्रसंग है कि वसिष्ट दशरथ से मिलने आये तो उनको वत्सतरी दी गयी। वत्सतरी के बाद मडमड ध्वनि हुई। इसका अर्थ किया गया कि २ वर्ष की गाय दी गयी जिसे देखते ही वसिष्ठ ने उसे खाना आरम्भ कर दिया जिसकी हड्डियों के टूटने से मडमड शब्द हुआ। उसके बाद दशरथ ने कहा कि मधुपर्क हो गया अब प्रसंग पर चर्चा करें। यहां स्पष्टतः वत्सतरी का अर्थ मधुपर्क है जो सभी अतिथियों को दिया जाता है। अतिथि यात्रा में थके होने से उनको मीठा तथा जल की कमी होने से जल देते हैं। छोटे बच्चों को भी पेट खराब होने पर नमक-चीनी का घोल देते हैं। खाली पेट में मधुपर्क जाने पर हलका शब्द होता है। कभी कभी जोर की डकार भी होती है। गाय को खाना बाघ या मगरमच्छ के लिये भी सम्भव नहीं है। उसके पैर मे मनुष्य की हड्डी भले ही टूट जाय, मनुष्य उसे मुंह में नहीं ले सकता।

इसी प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक वोल्गा से गंगा में लिखा है कि ऋषि लोग घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। यह श्वेताश्वतर उपनिषद् के नाम का मूर्खतापूर्ण अनुवाद है। अश्व = घोड़ा, उसका श्वेत भाग = हड्डी, तर = सूप। वास्तव में इस उपनिषद् में घोड़े की चर्चा ही नहीं है। यहां सूर्य या वरुण को अश्व कहा है, उससे बड़े ब्रह्म की व्याख्या होने से यह श्वेताश्वतर है।

२. शमिता-

यज्ञ में पशु का आलभन करते हैं-उसका पीठ, कन्धा आदि छूते है। इसे शमिता कहते हैं, अर्थात् शान्त करने वाला। शान्त करने के लिए हत्या नहीँ की जाती है। पर इसका अर्थ किया जाता है कि पशु का कन्धा आदि छू कर देखते हैं कि कहाँ से उसका मांस काटना अच्छा होगा। आजकल भी घुड़सवारी सिखाई जाती है कि घोड़े पर चढ़ने के पहले उसकी गर्दन तथा कन्धा थपथपाना चाहिए। इससे वह प्रसन्न हो कर अच्छी तरह दौड़ता है। बच्चों की भी प्रशंसा के लिए उनकी पीठ थपथपाते हैं, यद्यपि वे भाषा भी समझ सकते हैं। यही आलभन है। शिष्य भी पहले गुरु को जा कर नमस्कार करता है तो गुरु उसके कन्धे पर हाथ रख कर आलभन करते हैं। यदि आलभन द्वारा उसकी हत्या करेंगे तो शिक्षा कौन लेगा? गुरु को भी फांसी होगी। हर अवसर पर यदि कोई पैर छूकर नमस्कार करे तो उसकी पीठ पर ही हाथ रख कर ही आशीर्वाद दिया जाता है।

शमितार उपेतन यज्ञं देवेभिरिन्वितम्। पाशात् पशुं प्र मुञ्चत बन्धाद् यज्ञपतिं परि। (तैत्तिरीय सं, ३/१/४/१०)

प्राजापत्या वै पशवः तेषां रुद्रो अधिपतिः यत् एताभ्यां उपाकरोति, ताभ्यां एव एनं प्रतिप्रोच्या आलभत आत्मनो अनाव्रस्काय द्वाभ्यां उपाकरोति

 द्विपाद् यजमानः प्रतिष्ठित्या उपाकृत्य पञ्च जुहोति। पाङ्क्ताः पशवः पशून् एव अवरुन्धे, मृत्यवे वा एष नीयते यत् पसुः तं यत् अन्वारभेत प्रमायुको यजमानः स्यात् नाना प्राणो यजमानस्य पशूनेत्याह व्यावृत्यै॥१॥ यत् पशुः मायुं अकृत इति जुहोति शान्त्यै शमितार उपेनेत्याह यथा यजुः एव एतत् वपायां वा आह्नियमाणायां अग्नेः मेधो अपक्रामति त्वां उ ते दधिरे हव्यवाहमिति वपामपि जुहोति अग्नेः एव मेधं अवरुन्धे अथो शृतत्वाय पुरस्तात् स्वाहा कृतयो वा अन्ये देवा उपरिष्टात् स्वाहा कृतयो अन्ये स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा इति अभितो वपां जुहोति॥२॥  (तैत्तिरीय सं, ३/१/५/१-२)

इसका आशय है कि प्रजापति से पशु हुए, उनका स्वामी रुद्र है (पशुपति)। उनको २ मन्त्रों से तैयार करता है जिससे उनको क्षति नहीं पहुंचे। यजमान के २ पाद (रंगाचारी कश्यप के अनुसार चेतना के २ स्तर) हैं, जो उसके आधार हैं। उसके बाद वह ५ पशुओं का प्रयोग करता है। पशु को कष्ट नहीं होना चाहिए। उनकी शान्ति के लिए मन्त्र पढ़ता है। इसकी त्रुटिपूर्ण नकल कुरान में है, पशु को मारते समय मन्त्र पढ़ते हैं। यहां, ५ प्रकार के पशुओं के कई अर्थ हैं, जिनकी व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों में है।

देव, पिता, माता आदि को शमिता कहा गया है। स्पष्टतः उनका उद्देश्य अपने सन्तान का पालन है, हत्या नहीं-

दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। ... उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ,,, अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वं अध्रिगो। अध्रिगुश्च अपापश्च उभौ देवानां शमितारौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)

इसी प्रकार उपनयन, विवाह आदि में सन्तान माता-पिता से अलग होती है, तो माता-पिता को कष्ट की शान्ति करायी जाती है, सन्तान को आश्वासन देते हैं कि दैव सहायक होगा। पहले माता को सान्त्वना दी जाती है, जिसे लोकभाषा में इमली घोटाना कहते हैं।

शक्ति का प्रयोग या खर्च होना आंशिक मृत्यु है। यदि पशु नहीं रहेगा तो प्रयोग किसका होगा-

मृत्युः तत् अभवत् धाता शमिता उग्रः विशां पतिः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/६)

अथर्व सं (१०/९) शतौदना गौ के विषय में है। गौ यज्ञ या निर्माण स्वरूप है-(१) निर्माण स्थान (शरीर, वेदी), (२) गति या क्रिया (गम् = गति), (३) स्रोत तथा निर्मित पदार्थ। गौ पशु भी मूल यज्ञ कृषि का साधन है तथा उसका दुग्ध भोजन है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता है अतः गौ पशु तथा यज्ञ दोनों अवध्य हैं (यजुर्वेद प्रथ सूक्त में अघ्न्या)। १०० ओदन (पकाया चावल, भात) के कई अर्थ हैं-(१) १०० प्रकार की निर्माण सामग्री , (२) शरीर में हृदय से निकली १०० नाड़ियां (कठोपनिषद्, २/३/१६), (३) या लोकों के निर्माण के प्रत्येक स्तर पर आनन्द के १०० भाग में १ भाग का उपयोग जिससे मनुष्य लोक से आरम्भ कर उच्च लोकों में आनन्द १००-१०० गुणा बढ़ता जाता है (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/८)

हिरण्य ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥७॥

घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति। पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीः दिवं प्रेहि शतौदने॥११॥ (अथर्व, १०/९)

कुछ वनस्पति शान्त करती हैं, उनको भी शमिता कहा है-

वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन। (ऋक्, १०/११/८, अथर्व, ५/१२/१२, वाज. यजु, २९/३५, मैत्रायणी सं, ४/१३/३, काण्व सं, १६/२०, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/३/४) = गार्हपत्य अग्नि (वनस्पतिः) दक्षिणाग्नि (शमिता) और आहवनीय अग्नि (देवः अग्निः) मिष्ट और घृत के साथ (मधुना घृतेन) हवि का आस्वादन करावे (हव्यं स्वदन्तु)।

शान्तिपूर्वक २ हाथों से निर्माण करना भी शमिता है-

सोमस्य या शमितरा सुहस्ता (ऋक्, ५/४३/४)

निर्माण के क्रम अश्वत्थ हैं (ऊर्ध्व मूल अश्वत्थ-गीता, १५/१), शमी वृक्ष से भी शान्ति मिलती है, अतः शमी नाम है। पत्नी में दोनों गुण होते हैं अतः कहा है कि शमी और अश्वत्थ पर चढ़ो-शमीमश्वत्थमारूढ (अथर्व, ६/११/१)

व्यवसाय या यज्ञ भी शमी है जिससे कर्ता सूर्य जैसा तेजस्वी होता है-

विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाधतः (ऋक्, १/११०/४)

शमी से यज्ञ करने पर शान्ति होती है-

शमीभिर्यज्ञमाशत (ऋक्, १/२०/२)

इच्छाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया (ऋक्, १/८३/४, अथर्व, २०/२५/४)

यज्ञ के लिए बिना बाधा लगातार क्रिया चाहिये, जिसे अध्रिगु कहा है (निरुक्त, ५/११) = मन्त्र, अग्नि, इन्द्र आदि। बाधा  दूर करना शमिध्वम् है-

अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। (मैत्रायणी सं, ४/१३/४, काण्व सं, १६/२१, ऐतरेय ब्रा, २/७/११, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/६/४)

बुद्धि के आवरण या कर्म बन्धन भी शमी द्वारा काटे जाते हैं (गीता, १५/२)-

धिया नहुषि अस्य बोधताम् (ऋक्, १०/९२/१२)-यहां बुद्धि प्रेरित करने वाला नहुष (तन्त्र का कुण्डलिनी?) कहा है।

जीवन यज्ञ पत्नी के साथ शान्ति पूर्वक (शंयु) रहने से होता है-

शंयुना पत्नी संयाजान् (वाज यजु, १९/२९)

अथा नः शं योरपो दधात (ऋक्, १०/१५/४, वाज यजु, १९/५५, मैत्रायणी सं, ४/१०/६, काण्व सं, २१/१४)

तच्छं योरावृणीमहे। गातुं यज्ञाय यज्ञपतये। (ऋक् खिल, १०/१९१/१५, तैत्तिरीय सं, २/६/१०/३, मैत्रायणी सं, ४/ १३/१०, शतपथ ब्रा, १/९/१/२७, तैत्तिरीय ब्रा, ३/५/११/१, तैत्तिरीय आरण्यक, १/९/७) = शंयु के निकट प्रार्थना करते हैं कि यज्ञ का देवों के प्रति गमन हो (गातु यज्ञाय) और यजमान का देवों के प्रति गमन हो (गातुं यज्ञ पतये)। यही गीता (३/१०) में कहा है कि देव (आन्तरिक और बाह्य प्राण) और मनुष्य यज्ञ द्वारा परस्पर की उन्नति करते हैं।

शंयु को बृहस्पति का पुत्र कहा है, अर्थात् बुद्धि के अभ्यास से शान्ति होती है।

३. यज्ञ, पशु, मेध-

(१) ब्रह्म, कर्म, यज्ञ-(गीता, ८/१-४)-ब्रह्म सब कुछ है।

जो गति है, वह कर्म है।

चक्रीय कर्म में आवश्यक उत्पादन यज्ञ है।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविध्यष्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ (गीता ३/१०)

एवं प्रवर्तितं चक्रं ... (गीता ३/१६)

यज्ञ चक्र (गीता, ३/१४-१६)

अक्षर-ब्रह्म-कर्म-यज्ञ-पर्जन्य-अन्न-भूत-(भूत के अक्षर रूप से पुनः आरम्भ।

(२) निर्माण, उत्पाद-निर्माण के लिए २ प्रकार का मिश्रण होता ह-

अग्नि या अन्नाद - भोक्ता

सोम = आकाश में बिखरा पदार्थ, भुक्त, अन्न।

पाक ४ प्रकार से है-१. अग्नि + अग्नि, २, अग्नि + सोम (क) पूरा सोम इन्धन कि तरह जलता है। (ख) अग्नि ही सोम की तरह फैल जाता है। ३. सोम + सोम-जैसे गैस + गैस, वायु + जल (मेघ), जल + ठोस। २ प्रकार का मिश्रण वेद में वराह (जल स्थल का पशु) या मेघ कहा गया है।

(३) पशुमेध-१. पशु-कोई भी दृश्य पदार्थ (पश्य = देखना)। प्रजापति द्वारा दृश्य जगत् में जो कुछ भी निर्माण हुआ वह पशु है। यह ५ प्रकार के हैं-१’ पुरुष (मनुष्य, जो पुर या किसी रचना में रहे), २. अश्व (घोड़ा, चलाने वाली ऊर्जा), ३. गौ (निर्माण क्रिया, गति, स्थान), ४. अवि (भेड़ा, अग्र गति), ५. अज (बकरा, अजन्मा, सनातन निर्माण चक्र)।

(अग्निः) एतान् पञ्च पशून् अपश्यत्। पुरुषं अश्वं गां, अविं, अजं-यद् अपश्यत्, तस्मात् एते पशवः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/२/१/२) 

देवा यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥१५॥

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥८॥ (पुरुष सूक्त)

 मेध-चेतन तत्त्व पुरुष २ प्रकार से निर्माण करता है-

२. मेध (विचार, योजना) यह क्रिया करने की शक्ति मेधा = बुद्धि है।

मेधृ मेधा-हिंसनयोः संगमे च (पाणिनीय धातु पाठ, १/६११)-कई विचारों को आत्मसात् (हिंसा) कर योजना (योग, संगम) होती है।

३. तप-कर्म, श्रम।

यत् सप्तान्नानि मेधया तपसा अजनयत् पिता। इति मेधया हि तपसा अजनयत् पिता। (शतपथ ब्राह्मण, १४/४/३/१, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/५/१) 

यहां निर्माण करने वाला चेतन तत्त्व पुरुष या पिता है। निर्माण का स्थान माता है (मा माने, माप करना, माता)।

यो नः पिता यो जनिता विधाता। (ऋक्, १०/८२/३, वाज. यजु, १७/२७, काण्व सं, १८/१, तैत्तिरीय सं, ४/६/२/१)

निर्माण के लिये प्रयुक्त बुद्धि मेधा है, उसके लिए किसी वस्तु का प्रयोग मेध है। जिन वस्तुओं का प्रयोग निर्माण के लिए हो सकता है, वे मेध्य या ग्राम्य पशु हैं। जो उपलब्ध या उपयोगी नहीं हैं वे आरण्य पशु हैं।

विश्वरूपं वै पशूनां रूपम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ५/४/६) 

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥६॥ (पुरुष सूक्त)

सप्त ग्राम्याः पशवः सप्तारण्याः (शतपथ ब्राह्मण, ३/८/४/१६, ९/५/२/८)

अस्मै वै लोकाय ग्राम्याः पशवः आलभ्यन्ते। अमुष्मा आरण्याः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/३/१)

४. अन्न, मद्य, मांस-

(१) जो प्राणियों द्वारा खाया जाय वह अन्न है (अद् भोजने)-

अद्यते अत्ति च भूतानि। तस्मात् अन्नं तदुच्यते। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/२)

अद्भ्यो वा अन्नं जायते (तैत्तिरीय आरण्यक, ८/२) = जल (या उसके जैसे फैले पदार्थ) से अन्न होता है।

अन्न पशु है (केवल देखता है, कर नहीं शकता)-अन्नमु वै पशवः (जैमिनीय उपनिषद्, ३/१४१)

(२). मद-पदार्थों का सत्त्व (सत्) अन्न है। यह आनन्द देता है। 

रसो वै मदः (जैमिनीय उपनिषद्, १/२१५, २१६, ३/२८, १५९, २२२, २९५)

दृश्य रूप ऋक् है, उसका प्रभाव साम या रस है-

यो वा ऋचि मदो यः सामन् रसो वै सः (माध्य. शतपथ, ४/३/२५)

जो भी स्वादिष्ट है तथा ऊर्जा देता है वह मद है-

मदन्तीभिः प्रोक्षति। तेज एवास्मिन् दधाति। (तैत्तिरीय आरण्यक, ५/४/१)

मदिन्तम इति स्वादिष्ट इत्येवैतदाह। (माध्य. शतपथ, ३/८/३/२५)

(३) मांस-उत्तम अन्न जो आकाश की तरह फैला विराट् (पृथ्वी पर उत्पन्न) है-

नभो मांसानि (तैत्तिरीय सं. ७/५/२५/१) मांसानि विराट् (छन्दः) जैमिनीय उपनिषद् (२/५८)

एतदु ह वै परममन्नाद्यं यन्मांसम् (माध्य. शतपथ, ११/७/१/३)

(४) मद्य, मांस, काम का निषेध-न मांसं समश्नीयात्। न स्त्रियं उपेयात्। यन्मांसं अश्नीयात्, यत् स्त्रियं उपेयात्, निर्वीर्यः स्यात्। न एनं अग्निं उपनमेत्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/९/७-८)

शरीर या फल दोनों का कोमल भाग मांस है। पशु शरीर के कोमल भाग को मांस इसलिए कहते हैं कि यह कहता है कि मैं उसे (सः) खाऊंगा, जो मुझे (मां) खाता है-

मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम्। 

एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनु स्मृति, ५/५५)

बकरे का मांस अधिक खाने वाले प्रायः उसके जैसी दाढ़ी भी रखते हैं।

मद्य, मांस, मैथुन मनुष्य की प्रवृत्ति है। उसे पूरी तरह बन्द नहीं किया जा सकता है। किन्तु कल्याण तथा उन्नति के लिए उसे सीमित और नियन्त्रित करना चाहिए।

न मांस भक्षणे दोषः न मद्ये न च मैथुने। 

प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥ (मनुस्मृति, ५/५६)

मनु स्मृति (५/३९-४१) के अनुसार केवल यज्ञ के लिए पशु बलि दी जा सकती है। यहां यज्ञ का अर्थ उपयोगी निर्माण है, अनावश्यक बलि नहीं होती है। बलि का अर्थ हत्या नहीं, उसकी  ऊर्जा या श्राम् का उपयोग है। मरने पर बेकार हो जायेगा।

(५) बाइबिल, कुरान में निषेध-

Genesis-(1/29) And God said, Behold, I have given you every herb bearing seed, which [is] upon the face of all the earth, and every tree, in the which [is] the fruit of a tree yielding seed; to you it shall be for meat.

Koran (2/61) And when you said, Musa , we will no longer confine ourselves to a single food: So, pray for us to your Lord that He may bring forth for us of what the earth grows — of its vegetable, its cucumbers, its wheat, its lentils and its onions. He said, do you want to take what is inferior in exchange for what is better? 

Koran (2/174) also prohibits eating of-Khinjar = which is seen. But it is taken only as swine.

एक प्रकार से यहां वही कहा है जो वेद या स्मृति में लिखा है। बाइबिल (जेनेसिस, १/२९) या कुरान (२/६१) में कहा है कि पृथ्वी से जो निकले वही खाना चाहिये। इसका अर्थ है कि कृषि उत्पाद ही खाना चाहिये। जैन लोग इसका विशेष अर्थ करते हैं कि केवल सतह से ऊपर का अन्न खाना चाहिए, आलू आदि नीचे की जड़ नहीं। जड़ से पुनः उत्पत्ति होती है, अतः उत्पादन स्रोत नहीं बन्द करना है, या उसके साथ सूक्ष्म जीव रहते हैं जिनकी हिंसा नहीं करनी है। अपने लोभ के कारण बाइबिल, कुरान में इसी का विपरीत अर्थ किया जाता है कि पृथ्वी के ऊपर जो कुछ है वह खाया जा सकता है। मनुस्मृति में पूर्ण निषेध मना किया है, क्योंकि सभी मानते नहीं है। कुरान में पूर्ण निषेध के कारण सदा मांस मैथुन की योजना बनाते रहते हैं।  

६. मेध यज्ञ-

(१) अश्वमेध- किसी जीव से अश्रु की तरह पिण्ड से तेज निकलता है, अतः उस तेज को अश्रु या परोक्ष में अश्व कहते हैं। जैसे पशु अश्व गाड़ी खींचता है, उसी प्रकार किसी भी कार्य के लिये ऊर्जा को अश्व कहते हैं। इंजन की शक्ति की माप भी अश्वशक्ति कहते हैं।

प्रजापतेरक्ष्यश्वयत्। तत्पराततत्ततोऽश्वः समभवद्, यदश्वयत् तत् अश्वस्य अश्वत्वम्। (शतपथ ब्राह्मण, १३/३/१/१)

वारुणो वा अश्वः। (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/२/१८) सौर्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९) अश्वो मनुष्यान् (अवहत्)- (शतपथ ब्राह्मण, १०/६/४/१)

प्राचीन साहित्य में कई रथों में हजारों अश्व लगाने का वर्णन है, जो भौतिक रूप में किसी गाड़ी में लगाना असम्भव है। ऋक् (८/४६/२९) में ६०,००० अश्वों के रथ का वर्णन है। महाभारत, वन पर्व (४२/२-७) में इन्द्र के रथ में १०,००० अश्व का उल्लेख है। महाभारत, आदि पर्व (२२४/१०-१५) के अनुसार अर्जुन के दिव्य रथ में दिव्य गान्धर्व अश्व थे जिनसे तेज प्रकाश निकलता था। महाभारत, द्रोण पर्व (१७५/१३) के अनुसार घटोत्कच के रथ में सैकड़ों घोड़े थे तथा वह आकाश में चल सकता था।

आकाश में ऊर्जा का स्रोत सूर्य ही अश्व है। सूर्य का स्रोत वरुण (आकाशगंगा का विरल अप्) भी अश्व कहा है।

पृथ्वी पर वायु अश्व है जो मेघ को चलाता है, तूफान लाता है या समुद्र की पाल-नौका को चलने की शक्ति देता है। पूर्व एशिया के जापान-कोरिया को भद्राश्व कहते थे (भारत से ९० अंश पूर्व), क्योंकि वहां समुद्री वायु की गति कम होती है (आधुनिक भूगोल में-horse latitude)

किसी देश में परिवहन और सञ्चार अश्व है। राजा का कर्तव्य है इनकी बाधा दूर करना, जिसे अश्वमेध कहते हैं। नाटकीय रूप से घोड़ा पूरे देश में घूमता रहता है, जिसके पीछे राजा सेना ले कर चलते हैं। बिना खाये पिये घोड़ा नहीं घूम सकता है, न उसको पता है कि अगले देश में जाने का मार्ग क्या है। उसके पीछे राजा भी सेना ले कर नहीं चल सकता, लाखों की सेना एक साथ नहीं चल सकती है। उनको रोकने के लिए अन्य देश का राजा चेक गेट पर नहीं बैठा रहेगा।

मनुष्य शरीर में नाड़ी तथा नस में प्राण का सञ्चार अश्व है। इसको पुनः सशक्त करना अश्वमेध है जिसे वाजीकरण (वाजि = अश्व) या काया-कल्प भी कहते हैं। दशरथ की पुत्र प्राप्ति यज्ञ को भी रामायण में अश्व (हय) मेध कहा है। दशरथ और उनकी रानियों की पुत्र जन्म देने की आयु बीत चुकी थी। पुत्र जन्म के लिए उनमें प्राण का सञ्चार आवश्यक था। यहां घोड़ा छोड़ने का अर्थ है प्राण प्रवाह मुक्त करना।

वीर्यं वा अश्वः (शतपथ ब्राह्मण २/१/४/२३) 

प्राणापानौ वा एतौ देवानाम्। यदर्काश्वमेधौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/९/२१/३) 

सुतार्थी वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम् (रामायण, बालकाण्ड, ८/२)

तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम (बालकाण्ड, ८/८)

(२) नरमेध-ब्रह्म पुराण, गौतमी माहात्म्य, अध्याय ३४ में सूर्य वंश के राजा हरिश्चन्द्र (प्रायः ७,३०० ईपू) की कथा है जिनको वरुण ने ऐसे पुत्र होने का वरदान दिया था जिसके कर्म और गुणों की ख्याति तीनों लोकों में फैलेगी। जैसे ही उनके पुत्र रोहित का जन्म हुआ, वरुण ने उसकी बलि की मांग की। हरिश्चन्द्र उसे कई बार टालते गये-दांत नहीं निकला है, यज्ञोपवीत नहीं हुआ या शिक्षा नहीं हुई, आदि। वरुण ने क्रुद्ध हो कर उनको जलोदर होने का शाप दिया। तब रोहित भाग गया और एक व्यक्ति शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लाया। किन्तु वरुण उनकी पूजा से प्रसन्न हो गये और कहा कि बलि की आवश्यकता नहीं है।

यही कथा भागवत पुराण (९/७), ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय ३१, ऋक् सूक्त (१/२४) में है जिसमें शुनःशेप के मन्त्र हैं।

इसका एक अर्थ है कि मिथ्या आचरण से अप्वा (जलोदर-Ascites) होता है (अथर्व, ३/२/५, ऋक्, १०/१०३/१२)। इसकी ओषधि रोहित (Tecomella undulata) नाम की वनस्पति है (चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, १३/४५-८४)। किन्तु मुख्य अर्थ है कि यदि रोहित को मार कर बलि दी जाती, तो वरुण के वरदान का कोई अर्थ नहीं था कि पुत्र तीनों लोकों में विख्यात होगा। यहां बलि का अर्थ है अपनी पूरी शक्ति शिक्षा तथा देश की उन्नति में लगा देना।

इसी प्रकार अब्राहम की कथा बाइबिल और कुरान में है। अब्राहम ईराक के उर नगर में रहते थे। उनको भी गुणी पुत्र होने का वरदान मिला था। पर जन्म होते ही पुत्र इस्माइल की बलि मांगने लगे। मार कर बलि देने पर वह गुणी कैसे होता? अपने या पुत्र के बदले मुस्लिम लोग भेड़ (अरब में) या बकरे की बलि देते हैं। शुनःशेप सूक्त (ऋक्, १/२४) में भी कहा है कि राजा वरुण ने उरु नगर बनाया था। ईराक में इसके अवशेष प्रायः ८,००० वर्ष पुराने अनुमानित हैं। 

उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)। 

अतः नरमेध का अर्थ है किसी उद्देश्य या देश के लिए जीवन लगाना। हत्या से कोई लाभ नहीं होना है। इसके लिए माता-पिता भी सन्तान को शान्त कर कर्मठ होने का आशीर्वाद देते हैं, जिसे शमिता कहते हैं।

दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ... अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। अध्रिगुश्चापापश्च उभौ शमितारौ॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)

(३) गोमेध-एक अर्थ में सभी यज्ञ गो हैं। इसके मेध का अर्थ है, इसके उत्पाद का उपभोग। शतोदना गौ के मेध का आध्यात्मिक अर्थ है हृदय से निकली १०० नाड़ियों का मार्ग छोड़ कर १०१वी नाड़ी से जा कर मोक्ष प्राप्त करना। 

शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। 

तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति, विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥ (कठोपनिषद्, २/३/१६)

हिरण्यं ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥ (अथर्व, १०/९/७)

आधिभौतिक रूप में गोमेध का अर्थ है गो रूपी पृथ्वी (स्थल, जल, वायु और जीव मण्डल इसके ४ स्तन हैं) या उसके अंश अप्ने देश का पालन करना।

अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)

इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)

इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/२/१७) 

धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)

(४) सर्वमेध यज्ञ-सभी यज्ञों में समन्वय का भाव सर्वहुत या गीता का ब्रह्म यज्ञ है। ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। अतः यज्ञ स्थान, हवि, हवन, उत्पाद, कर्ता आदि सभी कुछ ब्रह्म है। ब्रह्म का ही ब्रह्म में हवन हो रहा है। कर्ता, कर्म आदि सभी एक हैं, अतः इसे सुकृत कहा है। बाइबिल में इसका अनुवाद है कि हर सृष्टि के बाद भगवान् ने कहा कि बहुत अच्छा बना है। उनको किसी से अपने काम का प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं थी।

असत् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सत् अजायत। तदा आत्मानं स्वयं अकुरुत। तस्मात् तत् सुकृतं उच्यत, इति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१) 

तत् सर्वेषु भूतेषु आत्मानं हुत्वा, भूतानि चात्मनि, सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यम् पर्यैत्, तथैव एतद् यजमानः सर्वमेधे सर्वान् मेधान् हुत्वा सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यं पर्येति (शतपथ ब्राह्मण, १३/७/१/१)

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतं।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना। (गीता, ४/२४)

Friday, May 6, 2022

शारिरीक तंत्र और कुंडलिनी

 💥  #शारीरिक_तंत्र_विज्ञान 🚩🚩


🔸हमारे शरीर में नौ द्वार हैं, दो आँख, दो कान, दो नाभि छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये आठवाँ गुद्दा द्वार और नौवाँ मूत्र द्वार । 


🔸सात द्वार देवताओं के ठहरने का स्थान है। इसपर रहने वाले समस्त  देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं।


🔸अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में; पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में; वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।


🔸चैतन्य आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीतिपूर्वक रहते हैं सबके काम बंटे हुये हैं सब अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं। 


🔸नौ द्वार अर्थात नौ चक्र प्रकृति के है। तीन द्वार अधोमुखी तथा छह ऊर्ध्वमुखी हैं । भौतिक मृत्यु के समय हमारे कर्मों के फल के अनुसार ,किसी एक द्वार से हमारे प्राण निकलते हैं। 


🔸दशम द्वार जिसे शून्य चक्र भी कहते हैं; परमात्मा का स्थान है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं ।


🔸मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी द्वार से होकर निकले और ऊर्ध्वगामी गति प्राप्त करे।


🔸योगशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्ता का मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है।


🔸हमारे शरीर मे कुल 114 चक्र में से 7 मुख्य चक्र, 21 मध्यम चक्र और 86 सूक्ष्म चक्र है। इनमें से दो चक्र हमारे  शरीर से बाहर रहते हैं। 


🔸मुख्य 7 चक्र में से एक सहस्रार चक्र शरीर से बाहर होता हैं।मध्यम 21चक्र आंखें, नाक, कान,कन्धा, हाथ,

घुटना ,पैर आदि में होते है। 


🔸शरीर मे 108 चक्र कार्यशील रहते हैं बाकी चार निष्क्रिय रहते है कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो इन चार में शक्ति का संचार हो उठता है। 


आठ चक्र अष्ट प्रकृति के प्रतीक है जैसे ;-


1  पृथ्वी


2   जल 


3   अग्नि


4    वायु 


5    आकाश 


6      मन


7     बुद्धि


 8  अहंकार का प्रतीक है।


🔸आज्ञाचक्र में ऊर्जा के तीन स्तर है ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना या त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश की ऊर्जा। 


🔸पहला तीन गुणों का प्रतीक है दूसरा उच्चतर शक्ति का प्रतीक है और तीसरी जो तीनो गुणों से परे जाती है। उन्हें विभिन्न नाम से जाना जाता है।  


🔸मेरुदण्ड पोला है । उससे अस्थि खण्डों के बीच में होता हुआ एक छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है । इसी के भीतर अदृश्य रूप से सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान है ।


🔸ओर इसी में पाँच मुख्य चक्र हैं परन्तु छठे आज्ञा चक्र का स्थान मेरुदण्ड में नहीं आता। यह दोनों भवों के बीच होता है। यह मन का प्रतीक माना जाता। 


🔸बुद्धि का प्रतीक ललाट चक्र माथे के बीच स्थित होता है। ललाट पूरे माथे को कहा जाता ओर यह पीनियल ग्रन्थि और तन्त्रिका तन्त्र को नियन्त्रित करता है। 


🔸अहंकार का प्रतीक रोहिणी चक्र बिंदु चक्र के भीतर छुपा होता नवम द्वार जहाँ पर शून्य चक्र तक पहुंचने का सरलतम मार्ग हैं ।


🔸बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ। 


🔸उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं असाधारण कह सकते ।


🔸संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है ओर इसे सृष्टि का मूल माना गया है।


🔸तंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है।शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है।


🔸जहाँ से सभी पदार्थों का प्रकटीकरण और  जिसमें सभी का लय हो जाता हैआकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि सभी उसी की निष्पत्तियाँ है।


🔸ललाट चक्र और बिन्दु चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट नहीं होती है बल्कि आज्ञाचक्र में ही छिपी रहती है । इसीलिए आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणी कहते हैं। 


🔸आठवा चक्र तक प्रकृतिलय ही हैं। नवम द्वार ,बिन्दु चक्र आत्मा  का स्थान हैं । इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव एवं शक्ति का नाम देते हैं।


🔸यह सृजन से पहले की अवस्था हैं,अर्थात ब्रह्मा की ऊर्जा। शक्ति से मिलकर शिव आत्माराम हो जाते हैं अर्थात इड़ा और पिंगला का मिलन और सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश।


🔸दो चक्र हमारे शरीर से बाहर रहते हैं। सहस्रार चक्र हैं,जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं,तथा दूसरा हैं ,निर्वाण चक्र।


🔸सहस्रार चक्र ,आत्मा का प्रतीक भौतिक शरीर से साढे 3 इंच ऊपर हजार पंखुड़ियों का कमल है ,और अद्वैत, निर्गुण,निराकार ब्रह्म: का आसन हैं । यह वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है।


🔸सहस्रार चक्र  6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है। ऊपर से देखने पर इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देती है।


🔸इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं। 


🔸इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं। जो असीम आनन्द का केन्द्र होता है। इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है।


🔸इस चक्र में अ से क्ष तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है। 


🔸यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण,स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है। यह आत्मा का उच्चतम स्थान है।


🔸सहस्रार का सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से सीधा नहीं है। पर फिर भी सूक्ष्म शरीर पाँच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ वाले सभी सातों चक्रों को श्रृंखला में बाँधे हुए है।


🔸सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह जुड़े हैं । 


🔸शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।


🔸वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं । इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं। उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों । 


🔸इसलिए हजारों का उद्बोधक 'सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है।


🔸यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं ।


🔸सहस्रार चक्र के भीतर विद्यमान है निर्वाण चक्र जिसके भीतर निर्गुण, निराकार ब्रह्म: विराजमान है। 


🔸निर्वाण का सही अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है।


🔸सैद्धांतिक तौर पर निर्वाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो "न आ रहा है भाव, और न जा रहा है विभाव और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, 


🔸सामान्य मृत्यु में केवल हमारा स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। शेष छः शरीर बचे रहते हैं जिनसे जीवात्मा अपनी वासनानुसार अगला जन्म प्राप्त करती है ।


🔸किंतु महामृत्यु में सभी छः शरीर नष्ट हो जाते हैं फ़िर पुनरागमन संभव नहीं होता। इसे ही मोक्ष,निर्वाण,कैवल्य कहा जाता है।


🔸मृत्यु के समय तक जिसका सहत्रार खुल गया फिर मोक्ष मिल जाती है | स्थिरता, और शांति भी इसके अर्थ हैं। निर्वाण की प्राप्ति की तुलना अविद्या के अंत से की जाती है। 


🔸जिससे उस मन:स्थिति की चेतना जागृत होती है जो जीवन चक्र से मुक्ति दिलाती है। एक स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति निर्वाण को मानसिक चेतना की तरह अनुभव करता है। 


🔸संसार मूलत: तृष्णा और अज्ञानता की उपज है। व्यक्ति बिना मृत्यु के भी निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है। ओर जब मृत्यु होती है, तो उस मृत्यु को मोक्ष कहते हैं।


🔸क्योंकि वह जीवन-मरण से छूट जाता है और उसका फिर से जन्म नहीं होता । पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था।


🔸भगवान् ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भीक्षा माँगी । बलि तैयार हो गये । तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया।


🔸हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है । चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान्-अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई लोक-लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है ।


🔸और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं!



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