Sunday, March 21, 2021

जन्म राशि के अनुसार तिलक का प्रयोग

 राशि के हिसाब से तिलक लगाने से राशि का स्वामी ग्रह प्रबल होता है और व्यक्ति को बहुत से लाभ मिलते हैंं. इससे व्यक्ति के शरीर में बहुत तेजी से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वो पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी भी काम को करता है ।

जब भी आप पूजा-पाठ के दौरान माथे पर तिलक लगाते होंगे तो आपको अंदर से एक सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता होगा. दरअसल धार्मिक दृष्टि से माथे के बीच का स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. मान्यता है कि इस जगह पर आज्ञाचक्र होता है, जिसे ऊर्जा का केंद्र माना जाता है. तिलक लगाने से ये चक्र उद्दीप्त होता है. जिसकी वजह से व्यक्ति का मन शांत और एकाग्र होता है. इसके अलावा मस्तक के बीच के स्थान को त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है क्योंकि यही स्थान शरीर की तीन नाड़ियों के मिलन का भी केंद्र होता है.


माथे पर तिलक लगाने से व्यक्ति में तेज की वृद्धि होती है और वो स्वयं को ऊर्जावान महसूस करता है. धार्मिक रूप से हम सब रोली, हल्दी, चंदन, भस्म, कुमकुम आदि का तिलक लगाते हैं. लेकिन ज्योतिष विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तिलक अपनी राशि के अनुसार लगाया जाए तो ये कहीं ज्यादा प्रभावी होता है. इसे लगाने से राशि का स्वामी ग्रह प्रबल होता है और व्यक्ति को बहुत से लाभ मिलते हैंं. इससे व्यक्ति के शरीर में बहुत तेजी से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वो पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी भी काम को करता है. इससे उसकी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की के योग का निर्माण होता है. यहां जानिए राशि के हिसाब से कौन सा तिलक लगाना चाहिए.



मेष : इस राशि वालों को हमेशा लाल कुमकुम या रोली का तिलक लगाना चाहिए क्योंकि मेष का स्वामी मंगल होता है. मंगल का रंग लाल माना गया है.


वृष : ये शुक्र के स्वामित्व वाली राशि है. ऐसे लोगों को मस्तक पर सफेद चंदन लगाना चाहिए. अगर सफेद चंदन न हो तो दही से मस्तक पर तिलक लगा सकते हैं.


मिथुन : मिथुन राशि वालों के लिए अष्टगंध का तिलक लगाना बहुत शुभ माना गया है. अष्टगंध आठ गंधद्रव्यों का संग्रह होता है. ये दो तरह का होता है शैव और वैष्णव. गृहस्थ लोगों को शैव अष्टगंध का प्रयोग करना चाहिए.


कर्क : इस राशि का स्वामी चंद्रमा है. चंद्रमा का रंग सफेद होता है. ऐसे लोगों को सफेद रंग का चंदन मस्तक पर लगाना चाहिए.


सिंह : सिंह राशि वालों का स्वामी सूर्य है. ऐसे लोगां को लाल रंग के कुमकुम या रोली का तिलक लगाना चाहिए.


कन्या : इस राशि का स्वामी भी बुध है. ऐसे लोगों को भी अष्टगंध का तिलक लगाने से काफी लाभ होता है.


तुला : शुक्र ग्रह तुला राशि का स्वामी होता है. इस राशि के जातक भी सफेद चंदन या दही का तिलक लगाएं.


वृश्चिक : मंगल ग्रह के स्वामित्व वाली इस राशि के जातकों को लाल रंग का तिलक मस्तक पर लगाना चाहिए.


धनु : धनु राशि के स्वामी गुरू बृहस्पति हैं. ऐसे लोगों को पीला चंदन या हल्दी को मस्तक पर लगाना चाहिए.


मकर : मकर राशि के स्वामी शनिदेव हैं. इन लोगों को काली भस्म या काला काजल मस्तक पर लगाना चाहिए.


कुंभ : इस राशि के लोगों को भी काली भस्म या काजल ही माथे पर लगाना चाहिए क्योंकि कुंभ राशि के स्वामी भी शनिदेव हैं.


मीन : ये राशि बृहस्पति के स्वामित्व वाली राशि है. ऐसे लोगों को पीला चंदन, केसर या हल्दी का तिलक लगाना चाहिए.

Saturday, March 13, 2021

मंत्रों के प्रयोग

 *मुख्य मंत्रों के  9 भेद*


(1)  *स्तम्भण मंत्र* 

(2)  *मोहन मंत्र*

(3)  *उच्चाटन मंत्र*

(4)  *वश्याकर्षण मंत्र*

(5)  *जृम्भण मंत्र*

(6)  *विद्वेषण मंत्र*

(7)  *मारण मंत्र*

(8)  *शांति मंत्र*

(9)  *पौष्टिक मंत्र*


1 *स्तम्भन* - *जिन मंत्र ध्वनियों के द्वारा सर्प , व्याघ्र, सिंह, आदि ,भूत, प्रेत , पिशाच, आदि दैविक बाधाओं को , शत्रु सेना के आक्रमण को जहां के तहां निष्क्रिय कर स्तम्भित (कील) देना मंत्र का फल है।*


(2) *मोहन* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा किसी को भी मोहित कर दिया जाये वह मोहन मंत्र है।*


(3) *उच्चाटन* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा किसी के मन को अस्थिर, उल्लास रहित एवं विक्षिप्त, निरुत्साहित, स्थानभ्रष्ट हो जाये वह उच्चाटन मंत्र है।*


(4) *वश्याकर्षण*- *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा इच्छित वस्तु या व्यक्ति वश में हो जाये, किसी का विपरीत मन भी बदल जाये वह वश्याकर्षणमंत्र है।*


(5) *जृम्भण मंत्र* - *जिन  मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा शत्रु , भूत ,प्रेत, व्यंतर, भी भयभीत हो वह मंत्र जृम्भण मंत्र है।*


(6) *विद्वेषण मंत्र* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा कुटुम्ब, जाति, देश, समाज, राष्ट्रादि में कलह वैमनस्य हो जाये वह विद्वेषण मंत्र है।*


(7) *मारण मंत्र* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा शत्रु, प्रतिकूल व्यक्तियों के प्राणों का वियोग हो वह मारण मंत्र है।*


(8) *शांति मंत्र* - *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा भंयकर व्याधि, व्यंतर, भूत-पिशाचों की पीडा, क्रूर ग्रह - जंगम स्थावर, विष बाधा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्षादि, ईतियों और चोर आदि का भय शांत हो वह शान्तिमंत्र है।*


(9) *पौष्टिक मंत्र*- *जिन मंत्रों की ध्वनियों के द्वारा सुख समाग्रियों की प्राप्ति, सन्तान आदि की प्राप्ति हो वह मंत्र पौष्टिक मंत्र है।*


** *वश्य, आकर्षण , उच्चाटन मंत्र में हूं का प्रयोग किया जाता है।*


** *स्तम्भण , विद्वेषण ,मोहन मंत्र में नम: का प्रयोग किया जाता है।*


** *पौष्टिक मंत्र के लिए वषट् का प्रयोग किया जाता है।*


** *मारण मंत्र में फट् का प्रयोग किया जाता है।*


** *मंत्र के अन्त में स्वाहा शब्द पाप नाशक ,मंगलकारक, तथा आत्मा की आंतरिक शांति को उद्बुद्ध करने वाला बतलाया है।**



Monday, March 1, 2021

आर्त ध्यान का विश्लेषण

 *आर्त ध्यान*


पीड़ा से उत्पन्न हुए ध्यान को आर्तध्यान कहते हैं। इसके चार भेद हैं-विष, वंटक, शत्रु आदि अप्रिय पदार्थों का संयोग हो जाने पर ‘वे कैसे दूर हों’ इस प्रकार चिन्ता करना प्रथम अनिष्ट-संयोगज आर्तध्यान है। अपने इष्ट-पुत्र, स्त्री और धनादिक के वियोग हो जाने पर उसकी प्राप्ति के लिए निरन्तर चिन्ता करना द्वितीय इष्टवियोगज आर्तध्यान है। वेदना के होने पर उसे दूर करने के लिए सतत चिन्ता करना तीसरा वेदनाजन्य आर्तध्यान है। आगामी काल में विषयों की प्राप्ति के लिए निरन्तर चिन्ता करना चौथा निदानज आर्तध्यान है। यह आर्तध्यान छठे गुणस्थान तक हो सकता है। छठे में निदान नाम का आर्तध्यान नहीं हो सकता है।


ये ध्यान दुर्ध्यान में आता है । जो नरक का मार्ग दिखाता है ।


आर्त ध्यान - चार प्रकार का होता है ।


1. अनिष्ट का संयोग -2 .इष्ट का वियोग ,3.वेदना 4.निदान ।


           *अनिष्ट संयोग*

स्वयं की अपेक्षा, आशा, इच्छा , आवश्यकता, मनसा के अनुरूप वस्तु, व्यक्ति,पदार्थ, आदि की प्राप्ति ना होंना अपितु अनेच्छिक ही मन मारकर मजबूरी में कार्य करना कराना आदि का उपस्थित होना, उसका चिंतन करना अनिष्ट संयोग नामक आर्त ध्यान है ।

*इष्ट वियोगज*

अपने प्राणों से प्रिय -मित्र, बन्धु,परिजन,पति, स्त्री,पुत्र, धन, भवन-वाहन, सत्ता, उत्तराधिकार आदि जिसे जीवन में सबसे अधिक महत्व दिया हो प्रिय माना हो उनके वियोग हो जाने पर उनका बार-बार चिंतन करना 

इष्ट वियोगज नामक आर्त ध्यान है । 


*वेदना जन्य*

शारीरिक-मानसिक-वाचनिक वेदना के उत्पन्न होने पर उससे निजात पाने के उपाय का चिंतन करना वेदना जन्य आर्त ध्यान है ।


       *निदानज*

इस जन्म की अवस्थाओं में जो प्राप्त नहीं हुआ उसे अगली अवस्था में प्राप्ति का चिंतन एवं इस भव में अप्राप्त इच्छाओं, वैभव, सुख, अभिलाषाओं,  की प्राप्ति की कामना आगामी काल ,भव, जन्म में करना कि ये मुझे प्राप्त हो, ये वस्तु मेरे पास होना चाहिए आदि अनेक चिंतन करना निदानज आर्त ध्यान है ।


सर्व प्रकार के धर्म एक ध्यान में अंतर्भूत हैं

द्रव्यसंग्रह टीका/47

*दुविहं पि मोक्खहेउं ज्झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा। तम्हा पयत्तचित्ता जूयं झाणं समब्भसह।47।*

=मुनिध्यान के करने से जो नियम से निश्चय व व्यवहार दोनों प्रकार के मोक्षमार्ग को पाता है, इस कारण तुम चित्त को एकाग्र करके उस ध्यान का अभ्यास करो।( तत्त्वानुशासन/33 )


अतः ज्ञानी जीव को आर्त ध्यान का परित्याग करना चाहिए । यह सीधा नरक तक ले जाता है ।


डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य 

कला एवं मानविकी संकायाध्यक्ष(डीन)

विभागाध्यक्ष संस्कृत विभाग 

एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्यप्रदेश

Monday, February 22, 2021

हवन का वैज्ञानिक महत्व

 भारतीय संस्कृति में अग्रिहोत्र कर्म प्रतिदिन करने की बौद्धिक काल से परम्परा रही है। यज्ञ, हवन के बिना कोई भी कार्य पूर्ण न मानने के पीछे इसमें निहित लाभ ही रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की, जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यत: आम की लकड़ी से किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो खतरनाक जीवाणुओं को मारकर वातावरण को शुद्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसके बनने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी यह गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गई अपनी रिसर्च में ये पाया कि यदि आधा घंटा हवन में बैठा जाए अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टायफाइड जैसे खतरनाक रोग फैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर रिसर्च की। उन्होंने ग्रंथों में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलने पर पाया कि यह विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी शोध किया और देखा कि सिर्फ एक किलो आम की लकड़ी जलने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलाई गई, एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद जीवाणुओं का स्तर 14 प्रतिशत कम हो गया।

यही नहीं, उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजूद जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाजे खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था।  बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों, फसलों को नुक्सान पहुंचाने वाले जीवाणुओं का नाश होता है जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

क्या हो हवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी): समिधा के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है परन्तु अन्य समिधाएं भी विभिन्न कार्यों के लिए प्रयुक्त होती हैं। सूर्य की सीमा मदार की, चंद्रमा की पलाश की, मंगल की खैर की, बुध की चिड़चिड़ा की,  बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गलूर की, शनि की शमी की, राहू की दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है। मदार की समिधा रोग का नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) का काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।

हव्य (आहुति देने योग्य द्रवों) के प्रकार: प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वातावरण रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हल्कापन, धूल, धुआं, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है इसलिए कई बार वायुमंडल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियां प्रयुक्त की जाती हैं जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।

होम द्रव्य: होम द्रव्य अथवा हवन सामग्री वह जल सकने वाला पदार्थ है जिसे यज्ञ (हवन/होम) की अग्रि में मंत्रों के साथ डाला जाता है।

सुगंधित: केसर, अगर, तगर, चंदन, इलायची, जायफल, जावित्री, छड़ीला, कपूर, कचरी, बालछड़, पानड़ी आदि।

पुष्टिकारक: घृत, गुग्गल, सूखे फल, जौ, तिल, चावल, शहद, नारियल आदि।

मिष्ट: शक्कर, छुहारा, दाख आदि।

रोग नाशक: गिलोय, जायफल, सोमवल्ली, ब्राह्मी, तुलसी, अगर तगर तिल, इंद्र जौ, आंवला, मालकांगनी, हरताल, तेजपत्र, प्रियंगु केसर, सफेद चंदन, जटामांसी आदि। उपरोक्त चारों प्रकार की वस्तुएं हवन में प्रयोग होनी चाहिएं।


अन्न के हवन में मेघ-मालाएं अधिक अन्न उपजाने वाली वर्षा करती हैं। सुगंधित द्रव्यों से विचार शुद्ध होते हैं। मिष्ट पदार्थ स्वास्थ्य को पुष्ट एवं शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं इसलिए चारों प्रकार के पदार्थों को समान महत्व देना चाहिए। यदि अन्य वस्तुएं उपलब्ध न हों तो जो मिले उसी से या केवल तिल, जौ, चावल से भी काम चल सकता है।

Saturday, January 16, 2021

राम, अयोध्या और जैन धर्म का अनादि सम्बन्ध

 *श्री राम ,अयोध्या और जैन धर्म का अनादि सम्बन्ध: एक चिंतन*


*डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य*

*संकायाध्यक्ष- कला एवं मानविकी संकाय*

*विभागाध्यक्ष-संस्कृत विभाग, एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्य प्रदेश*

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*नमः इक्ष्वाकुवंशाय, सूर्यवंशाय जन्मने ।*

*मर्यादारूप रामाय, विश्वज्ञानात्मने नमः ।।*

भगवान वृषभ देव के इक्ष्वाकु वंश के लिए नमस्कार हो , सूर्यवंश में उत्पन्न मर्यादा रूप राम  और  उनके वैश्विक ज्ञान के लिए  नमस्कार हो ।



राम शब्द नहीं हैं ,राम एक व्यक्तित्व हैं पर समझने के लिए राम शब्द की व्याख्या शास्त्रों में इस प्रकार प्राप्त होती है - राम शब्द संस्कृत की *रम् धातु और  घञ् प्रत्यय  के संयोग से निष्पन्न होता है ।रम् धातु का अर्थ रमण -निवास -विहार करने में होता है । वे प्राणी मात्र के हृदय में रमण निवास करते हैं ।


 रमते कणे-कणे  इति रामः ।

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 जैन धर्म में राम की व्याख्या 


रमन्ते योगिनः यस्मिन् स: रामः ।


जिनमें योगी जन रमते हैं । वह राम हैं । वे केवल सीता  के ही राम नहीं , वे केवल दशरथ के ही राम नहीं , वे केवल अयोध्या के ही राम नहीं हैं ,वे केवल  पारिवारिक सम्बन्धों में बंधे राम   नहीं हैं वे तो प्रत्येक आत्मा में रमने वाले राम हैं ।  यह व्यापक अर्थ  जैन धर्म के राम है ।


राम का व्यक्तित्व  जैन पुराण के अनुसार 

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जैन बाल्मीकि रविषेणाचार्य विरचित पदमपुराण  नामक ग्रन्थ में श्री राम को आठवां बलभद्र , उसी जन्म से निर्वाण पद प्राप्त करने वाले तदभव मोक्षगामी जीव  स्वीकार किया गया है । जिसमें श्री राम के सम्पूर्ण चरित्र को  मर्यादा , श्रेष्ठ पुत्र-पिता-पिता -राजा  एवं ज्ञान, वैराग्य तथा अध्यात्म का प्रतीक माना है । 


जैन बीजाक्षर विज्ञान के अनुसार राम शब्द का अर्थ -र +अ+म=  राम

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र=

 अग्निबीज है, जो शुभाशुभ कर्मों को जलाकर समाप्त कर  स्वर्ग-नरक-पशुगति के फल का अभाव करने में सक्षम हैं, वे राम हैं ।


अ-= सूर्य बीज ,भानु बीज है । जो मोहरूपी अंधकार को दूर कर अनश्वर शांति देने में सक्षम हैं , वे राम हैं ।


म= चंदबीज है, जो अमृत से परिपूर्ण अखंड चैतन्य आत्मा के ममत्व भावना को दूर करने में मर्यादा संयम में बांधने की क्षमता रखते हैं , वे राम हैं  ।

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अयोध्या  के नाम - अवध, कौशल  अपरजिता, साकेत  आदि नाम शब्दकोशों से प्राप्त होते हैं । नामों की सार्थकता 


1.अयोध्या शब्द का सर्वोपरि अर्थ ये है कि -जहाँ युद्ध ना हुए हों , दूसरा अर्थ है जिसे युद्ध में हराया ना जा सके अथवा जिससे कोई युद्ध की इच्छा न रखता हो । 


2.अपराजिता-जो अपराजेय हो वह है अयोध्या ।


3.अवध- जहाँ प्राणी मात्र का वध ना हुआ हो। अहिंसक अयोध्या ।

4.  कौशल- जो धर्म ,शांति, जीव रक्षा, न्याय ,असि-मसि-कृषि-विद्या-वणिज्य, शिल्प एवं अन्य विद्याओं में कुशल हो वह है अयोध्या ।


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*जैन धर्म का सनातन सम्बन्ध अयोध्या से -*

जैन धर्म  के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों के जन्म स्थली जैन शास्त्रों में  सनातन नियम के रूप में उल्लेख प्राप्त होने से इसे शाश्वत (अविनाशीक) भूमि कहा जाता हैं ।

जैन मानता के अनुसार काल चक्र को 6 काल संज्ञाओं में विभाजित किया गया है । जब कई कल्प व्यतीत हो जाते हैं तब हुडावसर्पिणी काल आता है । जिसमें सब यथावत रहता है पर कुछ विसंगतियां रहती हैं , उसी कारण से वर्तमान के 24 तीर्थंकरों में केवल 5 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में हुआ । 

जिसमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान वृषभदेव का जन्म 14 वे मनु (कुलकर) के नाभिराय के यहां हुआ , इनके अतिरिक्त 

श्री अजितनाथ, श्री अभिनन्दननाथ, श्री सुमतिनाथ और  श्री अनन्तनाथ भगवान का जन्म  भी अयोधया में हुआ । 

जैन शास्त्रों में जहाँ तीर्थंकर का जन्म होता है वहां गर्भ के 6 माह पूर्व से जन्म तक कुल 15 माह तक कुबेर इन्द्र    द्वारा प्रहर क्रम से रत्नों की वर्षा करता है । इसलिए उस भूमि को हिरण्य- गर्भा,रत्न -गर्भा, स्वर्ण -गर्भा आदि नामों से भी उल्लेखित किया गया है ।

जैन धर्म ग्रंथों में श्री सम्मेदशिखर एवं अयोध्या को शाश्वत भूमि के रूप में स्वीकार किया गया है ।

यह शाश्वत भूमि है -जिसका विनाश कल्पकाल के  अंत में भी नहीं होता है ।केवल दोनों के ध्रुव परिवर्तित होते हैं । इन भूमियों के नीचे शाश्वत स्वस्तिक स्थित है । इसलिए भी इन्हें शाश्वत कहा जाता है । 

भगवान राम का जन्म अयोध्या में और कुंडलपुर के बड़े बाबा के रूप में विश्व विख्यात  प्रथम तीर्थंकर का जन्म ,कुल  आदि में समानता की कड़ी को जोड़कर रखती है । 

भगवान वृषभ देव के पुत्र भरत चक्रवर्ती एवं श्री राम के अनुज भरत के नाम पर भारत का नामोल्लेख यह भी इस कड़ी को मजबूत करता है ।


द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजित नाथ के समय में  श्री राम के पूर्वज  महाराज सगर चक्रवती उनके पुत्र एवं भगीरथ -   गंगावतरण  आदि की कथा वर्णित है ।

उपरोक्त साक्ष्य जैन धर्म और राम को बेजोड़ बनाते हैं ।

Friday, January 1, 2021

बेल पत्र ,अनाज,पुप्ष और शंकर का सम्बंध

 🔱 ॐ नमः शिवाय 🔥

 

बिल्व_वृक्ष_विशेष_पंचपत्रबिल्व_दर्शनम् l


🌿1. बिल्व वृक्ष के पत्ते शंकर जी का आहार माने गए हैं, इसलिए भक्त लोग बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर चढ़ाते हैं। शिव की पूजा के लिए बिल्व-पत्र बहुत ज़रूरी माना जाता है। शिव-भक्तों का विश्वास है कि पत्तों के त्रिनेत्रस्वरूप् तीनों पर्णक शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं।भगवान शंकर को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं।

🌿2. अगर किसी की बिल्व वृक्ष के नीचे मृत्यु हो जाए तो उसको मोक्ष मिल जाता है l

🌿3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है ।

🌿4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है ।

🌿5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

🌿6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।

🌿7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

🌿8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

🌿9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।

🌿10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है ।

🌿11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

🌿कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । 

बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं।


🌿 शिवजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य बात :-🌿

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से क्या फल मिलता है । किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन

मिलता है कि भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है।


🌿 शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है ? 🌿

1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाताहै।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।


🌿 शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सा रस(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है ? 🌿

1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है।

3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है।

5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है।


🌿 शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है-? 🌿

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती

है।

6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।

10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।

11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।


यदि जीवन में समस्याएं हैं, तो उनका समाधान भी है, समाधान बस आप समर्पित भाव से शिवजी की भक्ति करके शिवजी को प्रसन्न कीजिए , शिवजी के आशीर्वाद से आपकी समस्याओ का समाधान भी हो जायेगा l


आप सभी शिव भक्तों से निवेदन है,आप जहां 

पर भी हैं, वहीं से देवों के देव महादेव को साक्षात अपने समक्ष मानते हुए नमन अवश्य कर लें l


     

       🌿 ॐ  🌿

  

Tuesday, December 22, 2020

वास्तु शास्त्र एवं दिशाओं के प्रभाव

 वास्तु शास्त्र’ मुख्यतः दिशाओं पर आधारित सैद्धांतिक विज्ञान है। अतः दिशाओं से संबंधित कौन-कौन से दोष हमारे घर एवं व्यवसायिक संस्थान में मौजूद हैं, यह जानकर तथा दिशाओं से संबंधित ग्रहों को मजबूत करके हम आज के भौतिकतावादी युग में तनाव एवं परेशानियों को दूर कर सकते हैं। इतना ही नहीं वरन् वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष के नियमों के आधार पर दिशाओं एवं ज्योतिषीय ग्रहों में समन्वय स्थापित करके हम धन, संपदा, सुख, शांति, ऐश्वर्य संपदा। सभी कुछ प्राप्त कर सकते हैं।


ज्योतिष एवं वास्तु दोनों ही शास्त्रों में चार मुख्य दिशाओं एवं चार उपदिशाओं अर्थात कुल आठ दिशाओं को मान्यता प्राप्त है। ये आठ दिशायें तथा उनसे संबंधित ग्रह एवं देवता इस प्रकार हैं- दिशा अधिपति ग्रह देवता 1. पूर्व सूर्य इंद्र 2. पश्चिम शनि वरुण 3. उत्तर बुध कुबेर 4. दक्षिण मंगल यम 5. उत्तर-पूर्व गुरु शिव 6. उत्तर पश्चिम चंद्र वायु देवता 7. दक्षिण पूर्व शुक्र अग्नि देवता 8.दक्षिण पश्चिम राहु-केतु नैति उ. पू. पू. द.पूउ. प. प. द.प उ. द. (गुरु) (सूर्य) (शुक्र) (बुध) (मंगल) (चंद्र) (शनि) (राहु-केतु) गायत्री मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। पश्चिम दिशा: इस दिशा का स्वामी ग्रह शनि है। शनि ग्रह को मुख्यतः आयु, रोग, कठोर वाणी, सेवक, कर्मचारी इत्यादि का कारक ग्रह माना जाता है।



पश्चिम दिशाः सफलता, संपन्नता एवं उज्जवल भविष्य की नियामक दिशा है। इस दिशा में दोष होने पर वायु विकार कुष्ठ रोग, पैरों में दर्द एवं जीवन में प्रसिद्धि एवं सफलता की कमी बनी रहती है।

उपाय: पश्चिम दिशा के भूखंड या पश्चिमी भाग में गड्ढा, दरार या नीचा स्थान नहीं होना चाहिये। शनि यंत्र की उपासना करें। मांस मदिरा का सेवन न करें। भैरो की उपासना करें। 

उत्तर दिशा: ज्योतिष के अनुसार उत्तर दिशा का पूर्ण स्वामित्व ‘बुध ग्रह’ को प्राप्त है। बुध ग्रह ज्योतिषीय दृष्टि से, ज्योतिष, शिल्प, कानून हास्य-विनोद एवं वित्त व्यवस्था से संबंधित ग्रह पूर्व दिशा - ज्योतिष के अनुसार पूर्व दिशा का आधिपत्य सूर्य ग्रह को प्राप्त है। सूर्य आत्मा, आरोग्य, स्वभाव, राज्य प्रतिष्ठा, प्रभाव, यश, सौभाग्य तथा पिता का कारक ग्रह माना गया है। वास्तु एवं ज्योतिषीय दोनों ही दृष्टियों से पूर्व दिशा अच्छे स्वास्थ्य, धन, वृद्धि एवं सुख समृद्धि की दिशा मानी गई है। यदि पूर्व दिशा में दोष है अर्थात् पूर्व दिशा में कहीं भी खुला स्थान नहीं है तो घर में मुख्यतः (पितृ दोष) की संभावना होती है। जिसके फलसवरूप किसी भी कार्य में सफलता न मिलना पिता एवं बाॅस से संबंध खराब होना। घर के मुखिया का स्वास्थ्य खराब रहना तथा सरकारी नौकरी में परेशानी होती है। साथ ही सिर दर्द, नेत्र रोग, क्षय रोग, अस्थि रोग, हृदय रोग, दांत एवं जीभ के रोग मस्तिष्क एवं बुद्धि की दुर्बलता जैसी भयानक बीमारियों का सामना भी करना पड़ सकता है।


उपाय: भवन निर्माण करते समय पूर्व दिशा का कुछ हिस्सा खुला छोड़ देना चाहिए एवं पूर्व दिशा के भूखंड को थोड़ा नीचा रखना चाहिये। है। वास्तु शास्त्र के अनुसार सभी प्रकार की भौतिक सुख समृद्धि एवं भोग विलास की प्राप्ति उत्तर दिशा के शुभ होने पर ही प्राप्त की जा सकती है। इस दिशा में दोष हो अथवा बुध ग्रह कुपित हो तो घर में हमेशा नीरवता का वातावरण रहेगा, व्यवसाय मंे हानि, आर्थिक तंगी, वाणी दोष, विद्या प्राप्ति में बाधा/ त्वचा रोग एवं मतिभ्रम होने का भय रहता है। दोष दूर करने के उपाय: उत्तर दिशा को अधिक ऊंचा न रखें। उत्तर दिशा में थोड़ा खाली स्थान अवश्य रखें। बुध यंत्र की स्थापना करनी चाहिये। कुबेर, दुर्गा जी अपना गणेश जी की पूजा अवश्य करनी चाहिये।


दक्षिण दिशा - दक्षिण दिशा का स्वामी ग्रह ‘मंगल’ है। मंगल ग्रह ज्योतिषीय दृष्टि से मुख्यतः धैर्य, पराक्रम, साहस, शक्ति, क्रोध, उत्तेजना षड्यंत्र, शत्रु, विवाद, छोटे भाई, अचल संपत्ति, भूमि तथा रक्त इत्यादि का कारक ग्रह माना गया है। वास्तु की दृष्टि से यह दिशा पद, प्रतिष्ठा, पिता के सुख एवं जीवन में स्थायित्व प्रदान करने की मुख्य दिशा मानी गई है। इस दिशा में दोष हो तो जातक को निम्न कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। - अत्यधिक क्रोध आना। - भाइयों से विवाद होना। - शत्रुओं का सक्रिय होना। फोडे-फंुंसी एवं रक्त संबंधी अशुद्धियां होना।



उपाय: दक्षिण दिशा में सदैव ऊंचा व भारी निर्माण करवाना चाहिये। हनुमान जी की पूजा एवं मंगल यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। हर मंगलवार को गरीबों को कुछ मिठाई अवश्य देनी चाहिए।


उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) ईशान कोण का स्वामी ग्रह ‘गुरु’ है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को मुख्यतः धार्मिक कार्यों एवं आध्यात्मिकता का कारक ग्रह माना गया है। यह दिशा ज्ञान एवं धर्म-कर्म का सूचक है। इस दिशा में दोष होने पर अथवा पत्रिका में गुरु ग्रह के पीड़ित होने पर व्यक्ति कभी भी पूजा पाठ ढंग से नहीं करेगा, घर में धन की कमी बनी रहेगी तथा बच्चों के विवाह भी देर से होंगे। साथ ही उदर विकार, मधुमेह तथा पाचन क्रिया से संबंधित रोग भी हो सकते हैं।


उपाय: ईशान कोण को हमेशा साफ सुथरा रखना चाहये। इस दिशा में कभी भी शौचालय का निर्माण नहीं करवाना चाहिये। गुरुओं और ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहये। धार्मिक पुस्तकों का दान करना चाहिये।


दक्षिण-पूर्व दिशा (आग्नेय कोण) इस दिशा का स्वामित्व ‘शुक्र ग्रह’ को प्राप्त है। शुक्र ग्रह को मुख्यतः विवाह प्रेम संबंध, ऐश्वर्य, सौंदर्य, वाहन, आकर्षक व्यक्तित्व, रतिक्रिया एवं कामक्रीड़ा का कारक ग्रह माना गया है। वास्तु की दृष्टि से यह दिशा उत्तम शयन सुख एवं प्रजनन क्रिया की दिशा है। यदि इस दिशा में कोई भी वास्तु दोष है अथवा शुक्र ग्रह पीड़ित है तो पत्नी सुख में बाधा/ वैवाहिक जीवन में कड़वाहट, असफल प्रेम संबंध, वाहन से कष्ट, कामेच्छा का समाप्त होना, मधुमेह/ आंखों के रोग, मूत्र रोग एवं गुप्त रोगों की संभावना बनी रहती है।


उपाय: आग्नेय कोण में कभी भी पानी का टैंक अथवा भूमिगत टैंक का निर्माण नहीं करवाना चाहये। शुक्र यंत्र की विधिवत स्थापना करनी चाहिए। चांदी अथवा स्फटिक के श्रीयंत्र की पूजा करें।


उत्तर पश्चिम दिशा (वायव्य कोण) इस दिशा का स्वामी ग्रह ‘चंद्र’ है। चंद्र ग्रह मन, माता, मस्तिष्क, घरेलू वातावरण, शिक्षा, आवास, निद्रा तथा गुप्त प्रेम संबंधों का कारक ग्रह है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यह दिशा मानसिक विकास, मित्र-शत्रु, अतिथि अथवा रिश्तेदारों से संबंधित है। इस दिशा में दोष होने पर जातक को निम्नलिखित कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। -माता तथा रिश्तेदारों से संबंध ठीक न होना। मानसिक परेशानी, अनिद्रा, तनाव रहना। - काक संबंधी रोग अस्थमा, मासिक चक्र अथवा प्रजनन संबंधी रोगों का बढ़ना।


उपाय: वायव्य कोण को ईशान की अपेक्षा नीचा न रक्खें। चंद्र की रोशनी में बैठकर ‘‘ऊँं श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः’’ मंत्र का जाप करें। माता का आदर करें। शिव की उपासना करें।


दक्षिण-पश्चिम दिशा (र्नैत्य कोण ) दक्षिण, पश्चिम दिशा का स्वामित्व ज्योतिष में ‘राहु-केतु’ ग्रहों को प्राप्त है। ज्योतिषीय दृष्टि से ‘राहु’ को दादा तथा ‘केतु’ को नाना का प्रतीकात्मक ग्रह माना गया है। राहु का संबंध विदेशी भाषा, लोभ, झूठ, षड़यंत्र, दुष्टता। वैधव्य चोरी एवं जुएं तथा विदेश यात्रा से है तथा केतु मुख्यतः अचानक होने वाली घटनाएं, भूत-प्रेत, तंत्र मंत्र, जादू-टोने घमंड इत्यादि का कारक ग्रह है। ज्योतिष में राहु-केतु दोनों छाया ग्रहों को ’पृथकतावादी’ ग्रहों की संज्ञा दी गई है। वास्तु की दृष्टि से इस दिशा को ‘आसुरी दिशा’ अथवा भूत प्रेत की दिशा कहा गया है। इस दिशा में यदि दोष है तो जातक को कई परेशानियांे का सामना करना पड़ सकता है। जैसे- दादा या नाना से संबंध मधुर न रहना। ससुराल पक्ष से परेशानी पत्नी की हानि, नौकरी, अपनो से अलगाव, अहंकार उत्पन्न होना, झूठ बोलना जुए की लत, जादू टोने तथा ऊपरी हवा आदि का असर होना तथा संक्रामक रोगों का होना।


उपाय: चूंकि इस दिशा को ‘यम’ की दिशा भी कहा गया है अतः वास्तु की दृष्टि से इस स्थान को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए। यदि र्नैत्य कोण में दोष रह गया है तो सरस्वती अथवा गणेश जी की यथाशक्ति पूजा करनी चाहिए। राहु-केतु के मंत्रों का जाप करना चाहियें सतनाजा (सात अनाज) तथा जल का दान करने से राहु-केतु ग्रहों की शांति होती है तथा इस दिशा में उत्पन्न दोषों का शमन होता है।

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