Sunday, April 26, 2020

भगवान आदिनाथ जी का संक्षिप्त जीवन परिचय

आदिनाथ भगवान का परिचय

आदिनाथ भगवान के‌ प्रथम आहार के निमित्त दान तीर्थ का प्रवर्तन अक्षय तृतीया महापर्व महोत्सव दिनांक 26-4-2020 दिन ‌रविवार
 श्री आदिनाथ भगवान का संक्षिप्त जीवन परिचय


*प्रथम तीर्थंकर* 

नाम - *आदिनाथ जी*

चिन्ह - *वृषभ*

द्वीप का नाम - *जम्बूदीप*

क्षैत्र - *पूर्व विदेह*

देश प्रांत - *पुष्कलावती*

नगर - *पुंडरीकिनी*

वहाँ का नाम - *वज्रनाभि* *(ऋषभदेव का जीव तो चक्रवर्ती 11 अंग 14 पूर्व का वेत्ता था।)*

वहाँ के गुरु - *वज्रसेन*

कहां से आये - *सर्वार्थ सिद्धि विमान*

जन्म भूमि - *अयोध्या (साकेत पुरृ)*

वंश - *इक्ष्वाकु वंश*

पिता -  *नाभिराज जी*

माता - *मरुदेवी* 

गर्भ तिथि - *आषाढ़ कृष्णा   दूज*

गर्भ नक्षत्र - *उत्तराषाढ़ा*

जन्म तिथि - *चैत्र कृष्णा नवमी*

जन्म नक्षत्र - *अभिजित*

जन्म राशि - *धनु*

शरीर वर्ण - *तपा हुआ स्वर्ण*

शरीर की ऊंचाई - *500 धनुष*

कुमार काल - *20 लाख पूर्व वर्ष*

राजभोग काल - *63 लाख पूर्व*

केवली काल  - *एक हजार वर्ष कम एक लाख पूर्व वर्ष*

पूर्ण आयु - *84 लाख पूर्व वर्ष*

दीक्षा तिथि - *चैत्र कृष्णा 9*

दीक्षा समय , नक्षत्र - *अपरान्ह , उत्तराषाढ़ा*

दीक्षा पालकी - *सुदर्शन*

दीक्षा नगर ,वन - *प्रयाग , सिद्धार्थ वन* 

दीक्षा वृक्ष ,वृक्ष ऊंचाई - *वट वृक्ष , 6000 धनुष*

वैराग्य निमित्त - *नीलांजना की मृत्यु*

दीक्षा उपवास नियम - *6 माह का उपवास*

कितने दिनों के बाद आहार -   *13 माह 9 दिन बाद*

प्रथम आहार - *इक्षुरस*


आहार दाता - *श्रेयांस राजा*

पारणा नगर - *हस्तिनापुर*

दीक्षित राजा - *चार हजार*

केवलज्ञान तिथि - *फाल्गुन कृष्ण 11*

केवलज्ञान समय ,नक्षत्र - *पूर्वान्ह उत्तराषाढ़ा*

केवलज्ञान वन ,वृक्ष - *शकटावन , वटवृक्ष*

समोशरण विस्तार - *12 योजन*

कुल गणधर - *84*

मुख्य गणधर - *वृषभसेन*

समवशरण में सामान्य केवली- *20000 हजार*

पूर्वधारी - *4750*

शिक्षक - *4150*

विपुलमति मन: पर्यय ज्ञानी - *12705*

विक्रिया ऋद्धिधारी - *20600*

अवधिज्ञानी - *9000*

वादियों की संख्या - *12750*

मुख्य गणिनी - *ब्राम्ही*

मुख्य श्रोता - *भरत*

श्रावक - *तीन लाख*

श्राविका - *5 लाख*

यक्ष - *गोमुख (वृषभ)*

यक्षिणी - *चक्रश्वरी*

योग निरोध - *14 दिन पहले*

मोक्ष तिथि - *माघ कृष्ण चौदस*

मोक्ष समय , नक्षत्र - *पूर्वान्ह उत्तराषाढ़ा*

मोक्षस्थली - *कैलाश पर्वत*

मोक्ष आसन - *पद्मासन*

ऋषभनाथ तीर्थ प्रवर्तन काल-  *50 लाख करोड़ सागरोपम + 1 पूर्वांग*
 🙏🏻अक्षय तृतीया पर्व  की  हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
🙏🏻दान दिवस जयवंत हो🙏🏻

Thursday, April 23, 2020

महामंत्र णमोकार और नवग्रह का संबंध

 
   
      महामन्त्र णमोकार और नवग्रह का सम्बन्ध
                                   आचार्य श्री सुविधिसागर
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🔯     णमोकार मंत्र और नव ग्रह

जैन आर्ष परंपरानुसार भवनवासी , व्यन्तर , ज्योतिषी और कल्पवासी ये देवोंके चार भेद है .उनमें ज्योतिषी देवों के सुर्य , चंद्र , ग्रह ,नक्षत्र और तारे ये 5 भेद माने गये है. चन्द्रमा ज्योतिषी देवोंके इंद्र है और सुर्य प्रतीन्द्र है.

त्रिलोकसार आदि करणानुयोग ग्रंथों में सुर्य और चंद्र को ग्रह नही माना है बल्की उनके संबंधित 88 ग्रह है.

ज्योतिर्विदो ने 9 ग्रह स्वीकार किये है . उनके अनुसार जीव  शुभ अशुभ कर्मोंका फल प्राप्त करता है , उसे जानने के लिए ग्रह साधन है.

णमोकारमन्त्र के द्वारा कर्मों के शुभफलदायक रस की अभिव्रुध्दि होती है और अशुभफलदायक रस की हानी होती है.

आइये देखते है 9 ग्रहोंके अशुभ फल को विनिष्ट  कर जीवन की सर्वतोमुखी प्रगति के लिए णमोकारमन्त्र किस प्रकार सहयोगी बन सकता है.

1.  सूर्य ग्रह -णमो सिद्धाणं
 इसका प्रकोप कम करने के लिए, लक्ष्मी व्रुध्दी करने के लिए , प्रताप बढाने के  लिए, तथा आसक्ती कम करने के लिए
णमो सिद्धाणं इस  पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये.

2.चंद्र ग्रह -णमो अरिहंताणं -
  चन्द्रमा की पाप प्रक्रुति का शमन करने के लिए , मानसिक शुध्दी के लिए , पुज्यजनों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए तथा धनलाभ के लिए  *णमो अरिहंताणं* इस पद का जाप करना चाहिये.

3.मंगल ग्रह -णमो सिद्धाणं-
 पराक्रम के वृद्धि के लिए, बहन भाइयों के साथ स्नेहभाव बढाने के लिए, शत्रुता नष्ट करने के लिए,  किसी कार्य में विजय प्राप्त करने के लिए तथा रोगों का क्षय करने के लिए मंगल का प्रकोप उपशमित होना आवश्यक है . इसलिए  *णमो सिध्दाणं*  इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये.

*4.बुधग्रह -णमोआइरियाणं-
विद्या की वृद्धि के लिए, वचनो के शुध्दी के लिए, तथा बुध ग्रह के अनिष्ठ फल के को दूर करने के लिए, *णमो आइरियाणं* इस पद का जप और ध्यान करना चाहीये.

5.गुरु ग्रह णमो आइरियाणं -
- गुरु के शुभ फल के रसभाग की अभिवृृद्धि के लिए, शरीर को पुष्ट करने के लिए, बुध्दी के विकास के लिए तथा आकाश तत्व के संतुलन के लिए *णमो आइरियाणं* इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये.

5.शुक्र ग्रह- णमो आइरियाणं-
स्वार्थ को परमार्थ में परिवर्तीत करने के लिए , व्यापार व्रुध्दी के लिये ,वाहनादि विभुतियों के सम्प्राप्ति के लिए, तथा कार्मोजा को आत्मोर्जा में रुपांतरीत करने के लिए *णमो आइरियाणं* इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये .

7. शनि ग्रह -णमो लोएसव्वसाहूणं 
शनि का दुष्फल दूर करने के लिए, आयु की व्रुध्दी के लिए, विपत्तियोंका निवारण करने के लिए, सम्पत्ति को बढाने के लिए, वैराग्य के व्रुध्दी के लिए तथा मन को प्रसन्न करने के लिए *णमो लोए सव्वसाहुणं* इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये.

 8-राहु ग्रह-णमो लोए सव्वसाहूणं
राहु कि क्रूरता को कम करने के लिए, वैराग्य की स्थिरता के लिए, तथा सार्वभौमिक उन्नती के लिए *णमो लोए सव्व साहुणं*, इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये.

9. केतु ग्रह -णमो उवझायाणं-
केतु की क्रूरता का उपशम करने के लिए, जैविक उन्नती के लिए तथा अध्यात्मिक विकास के लिए *णमो उवज्झायणं* इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहीये.

Wednesday, April 22, 2020

बुधादित्य योग का बारह भावों में फल

*भावानुसार बुध आदित्य योग*
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वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार किसी कुंडली के किसी घर में जब सूर्य तथा बुध संयुक्त रूप से स्थित हो जाते हैं यूति होती हे  तो ऐसी कुंडली में बुध आदित्य योग का निर्माण हो जाता है।
इस योग का शुभ प्रभाव जातक को बुद्धि, विशलेषणात्मक क्षमता, वाक कुशलता, संचार कुशलता, नेतृत्व करने की क्षमता, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा तथा ऐसी ही अन्य कई विशेषताएं प्रदान कर सकता है। बुध हमारे सौर मंडल का सबसे भीतरी ग्रह है जिसका अर्थ यह है कि बुध सूर्य के सबसे समीप रहता है तथा बहुत सी कुंडलियों में बुध तथा सूर्य एक साथ ही देखे जाते हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि इन सभी कुंडलियों में बुध आदित्य योग बन जाता है जिससे अधिकतर जातक इस योग से मिलने वाले शुभ फलों को प्राप्त करते हैं।
जो वास्तविक जीवन में देखने को नहीं मिलता क्योंकि इस योग के द्वारा प्रदान की जाने वालीं विशेषताएं केवल कुछ विशेष जातकों में ही देखने को मिलतीं हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बुध आदित्य योग की परिभाषा अपने आप में पूर्ण नहीं है तथा किसी कुंडली में इस योग का निर्माण निश्चित करने के लिए कुछ अन्य तथ्यों के विषय में विचार कर लेना भी आवश्यक है।

किसी कुंडली में किसी भी शुभ योग के बनने के लिए यह आवश्यक है कि उस योग का निर्माण करने वाले सभी ग्रह कुंडली में शुभ रूप से काम कर रहे हों क्योंकि अशुभ ग्रह शुभ योगों का निर्माण नहीं करते अपितु अशुभ योगों अथवा दोषों का निर्माण करते हैं। इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कुंडली में बुध आदित्य योग के बनने के लिए कुंडली में सूर्य तथा बुध, दोनों का शुभ होना आवश्यक है तथा इन दोनों में से किसी एक ग्रह के अथवा दोनों के ही कुंडली में अशुभ होने से उस कुंडली में बुधादित्य योग का निर्माण नहीं होता बल्कि किसी प्रकार के दोष का निर्माण हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में सूर्य के अशुभ होने पर, बुध के शुभ होने पर तथा सूर्य बुध के संयुक्त होने पर कुंडली में बुधादित्य योग का निर्माण नहीं होगा बल्कि इस स्थिति में अशुभ सूर्य के कारण शुभ बुध को हानि पहुंचेगी जिसके कारण बुध की विशेषताओं से जुड़े हुए क्षेत्रों में जातक को हानि उठानी पड़ सकती है तथा कुंडली में बुध के अशुभ और सूर्य के शुभ होकर संयुक्त होने की स्थिति में भी इस दोष का निर्माण नहीं होगा बल्कि जातक को सूर्य की विशेषताओं से संबंधित क्षेत्रों में हानि उठानी पड़ेगी। किसी कुंडली में सबसे बुरी स्थिति तब पैदा हो सकती है जब कुंडली में सूर्य तथा बुध दोनों ही अशुभ होकर संयुक्त हों क्योंकि इस स्थिति में जातक को दोनों ही ग्रहों की विशेषताओं से संबंधित क्षेत्रों में हानि उठानी पड़ सकती है। इसलिए किसी कुंडली में बुधादित्य योग के निर्माण के लिए सूर्य तथा बुध दोनों का ही शुभ होना आवश्यक है।

यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि कुंडली में सूर्य तथा बुध दोनों के शुभ होकर संयुक्त हो जाने से बुधादित्य योग का निर्माण होने पर भी इस योग से संबंधित शुभ फलों को बताने से पहले कुंडली में सूर्य तथा बुध का बल तथा स्थिति देख लेनी अति आवश्यक है जिसके कारण इस योग के शुभ फलों में बहुत अंतर आ सकता है।
उदाहरण के लिए इस योग के किसी कुंडली में तुला अथवा मीन राशि में स्थित सूर्य तथा बुध के संयोग से बनने पर यह योग जातक के लिए अधिक फलदायी नहीं होगा क्योंकि तुला में सूर्य तथा मीन में बुध बलहीन अथवा नीच रहते हैं तथा कोई भी बलहीन ग्रह कोई शुभ योग बनाने पर भी जातक को बहुत अधिक शुभ फल प्रदान नहीं कर सकता। यह योग उस स्थिति में और भी कमजोर हो जाएगा जब शुभ सूर्य तथा बुध किसी कुंडली में मीन राशि में स्थित हों क्योंकि मीन राशि में बुधादित्य योग के बनने से बुध को दोहरी बलहीनता का सामना करना पड़ सकता है जिसमें से एक तो बुध के मीन राशि में स्थित होने से है तथा दूसरी सूर्य के अधिक पास होने के कारण बुध के अस्त हो जाने के कारण हो सकती है जिससे इस योग की फल प्रदान करने की क्षमता में और भी कमी आ जाएगी। इसी प्रकार कुंडली के किसी बलहीन घर में बनने वाला बुध आदित्य योग भी अपेक्षाकृत कम शुभ फल प्रदान करेगा तथा किसी कुंडली में सूर्य पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव होने के कारण पित्र दोष बनने पर भी इस योग का शुभ फल बहुत सीमा तक कम हो जाएगा। इसलिए बुध आदित्य योग के किसी कुंडली में बनने तथा इसके शुभ फलों से संबंधित निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों पर भली भांति विचार कर लेना चाहिए तथा उसके पश्चात ही किसी कुंडली में इस योग का बनना तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करना चाहिए।

किसी कुंडली में ठीक प्रकार से बनने पर बुधादित्य योग जातक को कुंडली के विभिन्न घर में अपनी स्थिति के आधार पर नीचे बताए गए कुछ संभावित फल प्रदान कर सकता है।

बुधादित्य योग यदि लग्न में हो तो
प्रथम भाव में बुधादित्य योग

👉  बालक का कद माता-पिता के बीच का होता है। यदि वृष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुंभ, राशि लग्न में हो तो लंबा कद होता है। जातक का स्वभाव कठोर तथा वात-पित्त-कफ से पीड़ित होता है।

बाल्यावस्था में कान, नाक, आंख, गला, दांत आदि में कष्ट सहन करना पड़ता है। स्वभाव से वीर, क्षमाशील, कुशाग्र बुद्धि, उदार, साहसी एवं आत्मसम्मानी होता है। स्त्री जातक में प्राय: चिड़चिड़ापन तथा बालों में भूरापन भी देखा जाता है।

मतांतर से लग्न में स्थित बुधादित्य योग जातक को मान, सम्मान, प्रसिद्धि, व्यवसायिक सफलता तथा अन्य कई प्रकार के शुभ फल प्रदान कर सकता है।

 द्वितीय भाव में यदि बु‍धादित्य योग हो तो
👉 जातक की तार्किक अभिव्यक्ति होती है, लेकिन व्यवहार में शून्यता-सी झलकती है। कई अभियंताओं, घूसखोरों एवं ऋण लेकर तथा दूसरों के धन से व्यवसाय करने वाले या दूसरों की पुस्तकें लेकर अध्ययन करने वाले लोगों के लिए स्‍थिति प्राय: बनी हुई होती है। यह योग जातक को धन, संपत्ति, ऐश्वर्य, सुखी वैवाहिक जीवन तथा अन्य कई प्रकार के शुभ फल प्रदान कर सकता है।

 तृतीय भाव में यदि बुधादित्य योग हो तो
👉  जातक स्वयं परिश्रमी होता है तथा भाई-बहनों में आत्मीय स्नेह नहीं पा सकता। मौसी को कष्ट रहता है तथा भाग्योदय के अनेक अवसर खो देता है। पात्रता के अनुरूप नौकरीपेशा तथा व्यवसाय अवश्य प्रदान करवाता है, लेकिन पारिवारिक खुशहाली में बाधक होता है।
तीसरे घर मे यह योग जातक को बहुत अच्छी रचनात्मक क्षमता प्रदान कर सकता है जिसके चलते ऐसे जातक रचनात्मक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त तीसर घर का बुध आदित्य योग जातक को सेना अथवा पुलिस में किसी अच्छे पद की प्राप्ति भी करवा सकता है।

चतुर्थ भाव में बुधादित्य योग
👉 इस भाव के योग को अधिकतर विद्वान एवं ग्रंथ श्रेष्ठ मानते हैं। चतुर्थ भाव में बुधादित्य योग मनुष्य को आशातीत सफलता प्रदान करने वाला होता है। संस्था प्रधान, तार्किक मति, कुलपति, प्रोफेसर, इंजीनियर, सफल राजनेता, न्यायाधीश या उच्च कोटि का अपराधी भी बना देता है।

माता का स्वास्थ्य चिंताजनक तथा पत्नी के भाग्य का भी सहारा मिलता है। अपनी स्थायी संपत्ति होते हुए भी दूसरों या सरकारी वाहनों, भवनों का उपयोग करने वाला तथा विषमलिंगी मित्रों का सहयोग एवं प्रेम करने वाला होता है। यह योग जातक को सुखमय वैवाहिक जीवन, ऐश्वर्य, रहने के लिए सुंदर तथा सुविधाजनक घर, वाहन सुख तथा विदेश भ्रमण आदि जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है।

पंचम भाव में 
👉  अल्प संतान लेकिन प्रतिभा संपन्न संतान प्रदान करवाता है। चित्त में उद्विग्नता वात रोग एवं यकृत विकार की प्रबल संभावना बन जाती है। घर में भाभी या बड़ी बहन से वैचारिक मतभेद होते हैं। मेष, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन राशि में यह योग अल्प संतान प्रदाता होता है। स्त्री ग्रहों से दृष्ट होने पर कन्या संतान की अधिकता संभव होती है। पांचवे घर का बुध आदित्य योग जातक को बहुत अच्छी कलात्मक क्षमता, नेतृत्व क्षमता तथा आध्यातमिक शक्ति प्रदान कर सकता है जिसके चलते ऐसा जातक अपने जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकता है।

छठवें भाव में  सूर्य बुध के साथ हो तो
👉  शत्रुओं की मिथ्या विरोधी क्रियाओं से चिंतायुक्त होते हुए भी आत्मविश्वास बना रहता है। मामा पक्ष से बचपन में लाभ मिलता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सहयोग नहीं मिल पाता है। इस भाव मे यह योग जातक को एक सफल वकील, जज, चिकित्सक, ज्योतिषी आदि बना सकता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक अपने व्यवसाय के माध्यम से बहुत धन तथा ख्याति अर्जित कर सकते हैं।

सप्तम भाव में सूर्य बुध के साथ हो तो
👉  शत्रुओं की मिथ्या विरोधी क्रियाओं से चिंतायुक्त होते हुए भी आत्मविश्वास बना रहता है। मामा पक्ष से बचपन में लाभ मिलता है लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सहयोग नहीं मिल पाता है। सप्तम भाव में बुधादित्य योग यौन रोगों को उत्पन्न करने वाला तथा अत्यंत कामी भाव को समय एवं परिस्थिति को ध्यान में रखकर उत्पन्न करने वाला होता है। ऐसे लोग अपने जीवनसाथी की उपेक्षा कर दूसरों की ओर विशेष आकृष्ट होने वाले होते हैं लेकिन कभी भी अंतरंग संबंधों में नहीं बंध पाते हैं। सप्तम के बुधादित्य योग वाले प्राय: चिकित्सक, अभिनेता निजी सहायक, रत्न व्यवसायी, समाजसेवा एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से संबद्ध होते हैं। सिंह या मेष राशि सप्तम में हो तो एकनिष्ठ होते हैं। शुभ ग्रहों की दृष्टि एवं सान्निध्य इन योगों में बड़ा भारी परिवर्तन भी कर देता है। जातक के वैवाहिक जीवन को सुखमय बना सकता है तथा यह योग जातक को सामाजिक प्रतिष्ठा तथा प्रभुत्व वाला कोई पद भी दिला सकता है।

आठवें भाव में यदि बु‍धादित्य योग हो तो
👉  जातक किसी को सहयोग करने के चक्कर में स्वयं उलझ जाता है। दुर्घटना में पैर, हाथ, गाल, नाखून एवं दांत पर चोट का भय बना रहता है। विदेशी मुद्रा से व्यापार, किडनी स्टोन, आमाशय में जलन तथा आंतों में विकार भी इस योग का परिणाम बन जाता है। कुंडली के आठवें घर में बनने वाला बुधादित्य योग जातक को किसी वसीयत आदि के माध्यम से धन प्राप्त करवा सकता है तथा यह योग जातक को आध्यात्म तथा परा विज्ञान के क्षेत्रों में भी सफलता प्रदान कर सकता है
नवमें भाव में 
👉 जातक को स्वाभिमानी के साथ-साथ अहंकारी बना देता है तथा प्रारंभ में कई सुअवसरों का परित्याग बड़े भारी पश्चाताप का कारण बनता है। नौवें घर में बुध आदित्य योग जातक को उसके जीवन के अनेक क्षेत्रों में सफलता प्रदान कर सकता है तथा इस योग के शुभ प्रभाव में आने वाले जातक सरकार में मंत्री पद अथवा किसी प्रतिष्ठित धार्मिक संस्था में उच्च पद भी प्राप्त कर सकते हैं।

दशम भाव में बुधादित्य योग
👉  बुद्धिमान, धन कमाने में चतुर, साहसी एवं संगीत प्रेमी बनाता है। पुत्र-पौत्रादि सुख से संपन्न लेकिन एक संतान से चिंतित भी बनाता है। धार्मिक स्थानों का निर्माण लंबी ख्याति प्रदान कराता है। इस घर में बनने वाला बुधादित्य योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में सफलता प्रदान कर सकता है तथा ऐसा जातक अपने किसी अविष्कार, खोज अथवा अनुसंधान के सफल होने के कारण बहुत ख्याति भी प्राप्त कर सकता है।

एकादश भाव में यदि सूर्य बुध के साथ हो तो
👉👉यशस्वी, ज्ञानी, संगीत विद्या प्रिय, रूपवान एवं धनधान्य से संपन्न करवाता है। लोकसेवा के लिए सरकार एवं अनेक प्रतिष्ठानों से धन की प्राप्ति होती है।ग्यारहवें घर में बनने वाला बुधादित्य योग जातक को बहुत मात्रा में धन प्रदान कर सकता है तथा इस प्रकार के बुध आदित्य योग के प्रभाव में आने वाला जातक सरकार में मंत्री पद अथवा कोई अन्य प्रतिष्ठा अथवा प्रभुत्व वाला पद भी प्राप्त कर सकता है।

द्वादश भाव में बुधादित्य योग
👉  चाचा-ताऊ से विरोध करवाता है तथा अपनी संपत्ति उनके चंगुल में फंस जाती है। जुआ, सट्टा, शेयर या अन्य आकस्मिक धन-लाभ के व्यवसायों में फंसकर अपना सर्वस्व लूटा देता है। बारहवें घर में बुधादित्य योग जातक को विदेशों में सफलता, वैवाहिक जीवन में सुख तथा आध्यात्मिक विकास प्रदान कर सकता है।
इस योग के कई अपवाद भी है बुधादित्य योग को राशि एवं अन्य ग्रहों के संबंध भी प्रभावित करते हैं लेकिन अलग-अलग भावों में एकाकी हो तो ऐसा ही फल प्रदान करता है।

Monday, April 20, 2020

जानिए अष्टांग निमित्त क्या हैं ? उनसे आप सब कुछ जान साजरे हैं

अष्टांग निमत्त

जिन लक्षणों को देखकर भूत और भविष्यत् में घटित हुई और होने वाली घटनाओं का निरुपण किया जाता है, उन्हें निमित्त कहते हैं।

इन्हीं सूचक निमित्तों के संहिता ग्रन्थों में आठ भेद किये गये हैं।

(1) *व्यंजन* (2) *अंग*(3) *स्वर*(4) भौम
(5) *छिन्न*(6) *अंतरिक्ष*(7) लक्षण (8) स्वप्न ।

(1) व्यंजन- *तिल , मस्सा , चट्टा, आदि को देखकर शुभाशुभ का निरुपण करना व्यंजन निमित्त ज्ञान है*

*साधारणत: पुरुष के शरीर में दाहिनी और तिल मस्सा चट्टा शुभ समझा जाता है।*

* *नारी के शरीर में इन्ही व्यंजनों का बायीं ओर होना शुभ माना जाता है।*

(2) अंग निमित्त हाथ पांव, ललाट, मस्तक और वृक्ष: स्थल को देखकर शुभाशुभ फल का निरुपण करना अंग निमित्त है।*

*नासिका , नैत्र , दन्त , ललाट , मस्तक , वृक्ष स्थल ये छ: अवयव उन्नत होने से मनुष्य सुलक्षण युक्त होता है।*

*करतल , पदतल , नयनप्रान्त ,नख , तालु , अधर , और जिह्वा ये सात अंग लाल हो तो शुभप्रद है।*

(3)स्वर निमित्त - चेतन प्राणियों के और अचेतन वस्तुओं के शब्द सुनकर शुभाशुभ का निरुपण करना स्वर निमित्त कहलाता है।*

(4) भौम निमित्त भूमि के रंग, चिकनाहट ,रूखेपन , आदि के द्वारा शुभाशुभत्व अवगत करना भौम निमित्त कहलाता है।*

*(इस निमित्त से गृह-निर्माण योग्य भूमि , देवालय-निर्माण योग्य भूमि, , जलाशय- निर्माण योग्य भूमि आदि बातों की जानकारी प्राप्त की जाती है। )*

(5) छिन्न निमित्त - वस्त्र, शस्त्र , आसन और छत्रादि को हुआ देखकर शुभाशुभ फल कहना छिन्न निमित्त ज्ञान है।*

(6) अंतरिक्ष निमित्त- *ग्रह नक्षत्रों के उदयास्त द्वारा शुभाशुभ का निरुपण करना अन्तरिक्ष निमित्त है।*

*(शुक्र , बुध , मंगल , गुरु और शनि इन पांचों ग्रहों के उदयास्त द्वारा ही शुभाशुभ फल का निरुपण किया जाता है)*

(7) लक्षण निमित्त -स्वस्तिक , कलश , शंख , चक्र आदि चिन्हों के द्वारा एवं हस्त , मस्तक , और पदतल की रेखाओं द्वारा शुभाशुभ का निरुपण करना लक्षण निमित्त है।*

(8)  स्वप्न निमित्त-स्वप्न द्वारा शुभाशुभ का वर्णन करना स्वप्न निमित्त है।*

उपरोक्त निमित्तों का ज्ञान सम्यक रीत्या करना चाहिए 

Sunday, April 12, 2020

अपने जन्म नक्षत्र से करें अपना लक्ष्य निर्धारण

अपने जन्म नक्षत्र के अनुसार जानिए किस क्षेत्र में होंगे आप सफल...

1. अश्विनी नक्षत्र

अश्विनी नक्षत्र में जन्मे लोग अगर यातायात से जुड़ा कोई कार्य करेंगे तो उन्हें सफलता मिलेगी। इसके अलावा खेल, दवाइयां, कृषि, जिम, जौहरी, सुनार आदि से संबंधित क्षेत्र भी फायदा पहुंचाएंगे।

2. भरणी नक्षत्र

भरणी नक्षत्र में जन्मे जातकों को जन्म देने वाली दाई, गृह सेवक, शवगृह अधिकारी, दाह-संस्कार से संबंधित कार्य करने चाहिए। वे बच्चों का ध्यान रखने वाले या नर्सरी स्कूल के अध्यापक के तौर पर भी कार्य कर सकते हैं। तम्बाकू, कॉफी, चाय से जुड़े क्षेत्र भी लाभ पहुंचाएंगे।

3. कृत्तिका नक्षत्र

कृत्तिका नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग ऐसे क्षेत्र में सफल हो सकते हैं, जो नुकीली चीज या तेज धार से जुड़े हों। आप चाकू, तलवार के निर्माण से जुड़ सकते हैं या फिर अच्छे लोहार या वकील भी साबित हो सकते हैं। अगर आप ऐसे किसी कार्य से जुड़ते हैं जिसके अनुसार नशे के आदी लोगों को सुधारा जाता है तो अवश्य सफलता मिलेगी।

4. रोहिणी नक्षत्र

रोहिणी नक्षत्र से संबंधित लोग खानपान के कार्य से जुड़ेंगे तो सफलता मिलेगी। खाना बनाना हो या फिर बांटना, ये कार्य आपके लिए उत्तम हैं। इसके अलावा कला का क्षेत्र भी आपके लिए है। आप अच्छे कलाकार, गायक, संगीतकार भी हो सकते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे लोग रचनात्मक होते हैं।

5. मृगशिरा नक्षत्र

यात्रा से जुड़े कार्य में अगर आप संलग्न हैं तो आपको अवश्य ही सफलता मिलेगी। इसके अलावा शिक्षा, खगोलशास्त्र, पैसे का हिसाब-किताब रखना, ये सभी क्षेत्र भी आपको लाभ दिलवाएंगे। कपड़े के काम में लिप्त लोगों को भी लाभ मिलेगा।

6. आर्द्रा नक्षत्र

बिजली के उपकरण या बिजली से संबंधित कोई अन्य कार्य करना आपके लिए फायदेमंद रहेगा। कम्प्यूटर, तकनीक, गणित, वैज्ञानिक, गैमिंग आदि से संबंधित क्षेत्र आपके लिए हैं। इसके अलावा डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ का काम भी आपको सूट करेगा। अगर आप जासूस हैं या रहस्य सुलझाने जैसे कार्य कर रहे हैं तो भी आपको सफलता मिलेगी।

7. पुनर्वसु नक्षत्र

काल्पनिक कहानियां लिखने या खरीदने-बेचने से संबंधित कोई कार्य करना, ये आपके लिए फायदेमंद साबित होंगे। यात्रा और रखरखाव से संबंधित कार्य भी आप कर सकते हैं। अगर आप होटल मैनेजमेंट में कार्यरत हैं या फिर दीक्षा देने का काम करते हैं तो आपको फायदा मिलेगा। इतिहासकार या भेड़-बकरियों को पालने वाले लोग भी सफलता प्राप्त करेंगे।

8. पुष्य नक्षत्र

दूध से संबंधित व्यापार करने वाले लोग सफलता प्राप्त करेंगे। कैटरिंग करने वाले और होटल चलाने वाले लोग भी अच्छे व्यवसाय में हैं। नेता, शासक, धार्मिक कार्य करने वाले लोग, शिक्षक और अध्यापक आदि लोग लाभ प्राप्त करते हैं।

9. आश्लेषा नक्षत्र

पेट्रोलियम, सिगरेट, कानूनी, दवाइयों से संबंधित इंडस्ट्री से जुड़े लोग अवश्य लाभ प्राप्त करेंगे। इस नक्षत्र में जन्मे लोग तांत्रिक, सांप का जहर, बिल्ली पालने वाले, सीक्रेट सर्विस करने वाले, मनोवैज्ञानिक होते हैं। ये पोंगे पंडित और आत्माओं को बुलाने वाले भी होते हैं।


10. मघा नक्षत्र

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोग शाही तो नहीं होते लेकिन उनका शाही घरानों से सीधा संपर्क रहता है। वे उनके मैनेजर भी हो सकते हैं और महत्वपूर्ण कर्मचारी भी। इसके अलावा सरकार के अधीन बड़े पदों में काम करने वाले, बड़े वकील, जज, नेता, वक्ता, ज्योतिष, पुरातत्व वैज्ञानिक भी इसी नक्षत्र में जन्म लेने वाले होते हैं।

11. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र

इस नक्षत्र में जन्मे लोग अगर महिलाओं से संबंधित सामान या बहुमूल्य रत्नों का व्यापार करते हैं तो उन्हें अवश्य ही सफलता मिलती है। ब्यूटीशियन, गायक, घर की साज-सज्जा या अन्य रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोग अवश्य ही सफलता प्राप्त करते हैं। विवाह से संबंधित हर करियर भी आप ही के लिए हैं।

12. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र

मनोरंजन, खेल और कला से संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोग अवश्य ही सफलता प्राप्त करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे धार्मिक संस्थानों के मुखिया या पुजारी, परोपकार करने वाले, दान-पुण्य के कार्य से जुड़े, शादी-विवाह से संबंधित सलाह देने वाले या अंतरराष्ट्रीय मसलों से संबंधित लोग भी सफलता प्राप्त करते हैं।

13. हस्त नक्षत्र

गहने बनाने वाले लोग, सेहत से संबंधित कार्य करने वाले, हास्य कलाकार, काल्पनिक कहानियां लिखने वाले, उपन्यासकार, रेडियो या टेलीविजन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का संबंध अगर हस्त नक्षत्र से है तो उन्हें अवश्य ही सफलता मिलती है।

14. चित्रा नक्षत्र

अपना बिजनेस चलाने वाले, घर की साज-सज्जा, गहने बनाने, फैशन डिजाइनर, मॉडल्स, कॉस्मेटिक, वास्तु-फेंगशुई, ग्राफिक आर्टिस्ट, सर्जन, प्लास्टिक सर्जन, स्टेज आर्टिस्ट, गायक, इन क्षेत्रों में कार्यरत लोग सफलता प्राप्त अवश्य करते हैं।

15. स्वाति नक्षत्र

व्यवसाय चलाने वाले, गायक, वाद्य यंत्र बजाने वाले, अध्ययन कार्य में संलिप्त, स्वतंत्र कार्य करने वाले, सामाजिक सेवा में लिप्त लोग सफल होते हैं। इसके अलावा न्यूज रीडर, कम्प्यूटर्स और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में काम करने वाले लोग सफलता पाते हैं।

16. विशाखा नक्षत्र

शराब, फैशन, कला और साथ ही बोलने संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले ओग सफलता हासिल करते हैं। इसके अलावा सफल राजनेता, खिलाड़ी, धार्मिक नेता, नर्तक, सैनिक, आलोचक, अपराधियों का संबंध भी इसी नक्षत्र से है।

17. अनुराधा नक्षत्र

सम्मोहन क्रिया में लिप्त, ज्योतिष शास्त्री, सिनेमा संबंधित क्षेत्र, फोटोग्राफर, फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर, औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, डेटा एक्सपर्ट, अंकशास्त्र विशेषज्ञ, खदानों में काम करने वाले, विदेश व्यापार से संबंधित लोग सफलता प्राप्त करते हैं।

18. ज्येष्ठा नक्षत्र

नीति निर्माण से संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोग, सरकारी अधिकारी, रिपोर्टर्स, रेडियो जॉकी, न्यूज रीडर, टॉक शो होस्ट, वक्ता, काला जादू करने वाले, जासूस, माफिया, सर्जन, हस्त कारीगर, एथलीट्स आदि क्षेत्रों से संबंधित लोग सफलता प्राप्त करते हैं।

19. मूल नक्षत्र

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले लोगों के लिए दवाइयों से संबंधित क्षेत्र, न्याय, जासूसी, रक्षा, अध्ययन जैसे कार्य सफलता दिलवाएंगे। इसके अलावा वक्ता, सार्वजनिक नेता, सब्जियों के व्यापारी, अंगरक्षक, मल्लयुद्ध करने वाले, गणितज्ञ, सोने की खदान में काम करने वाले, घुड़सवार भी सफल होते हैं।

20. पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र

शिप संबंधी उद्योग में काम करने वाले प्रेरण, अध्यापक, भाषण देने वाले, फैशन एक्सपर्ट्स, कच्चे सामान का विक्रय करने वाले, बालों की सजावट देखने वाले, तरल पदार्थों का कार्य करने वाले लोग सफलता प्राप्त करते हैं।

21. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र

ज्योतिष, वकील, सरकारी अधिकारी, सेना में कार्यरत, अध्ययनकर्ता, सुरक्षा कार्य, व्यापारी, प्रबंधक, क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता और उत्तरदायित्व निभाने वाले कार्यों को करने वाले लोग सफल होते हैं।

22. श्रवण नक्षत्र

किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले अध्यापक, वक्ता, बौद्धिक, छात्र, भाषाविद, कहानीकार, हास्य अभिनेता, गायन से संबंधित क्षेत्र से जुड़े लोग, टेलीफोन ऑपरेटर्स, मनोवैज्ञानिक, यातायात से संबंधित क्षेत्र में कार्यरत लोग सफलतम होते हैं।

23. धनिष्ठा नक्षत्र

गायन, वादन, नृत्य, म्यूजिक बैंड इन सबसे संबंधित क्षेत्र के लोग सफलता पाते हैं। इसके अलावा मनोरंजन उद्योग, रचनात्मक क्षेत्र, कवि, ज्योतिष शास्त्री, प्रेत आत्माओं को बुलाने वाले लोग सफलता हासिल करते हैं।

24. शतभिषा नक्षत्र

ड्रग्स या दवाइयों से संबंधित क्षेत्र में काम करने वाले लोग सफलता प्राप्त करते हैं। सर्जन, मदिरा से जुड़े क्षेत्रों में कार्यरत लोग भी सफलता पाते हैं।

25. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र

मृत्यु से संबंधित किसी भी व्यवसाय से जुड़े लोग सफल होते हैं। कॉफिन बनाने वाले, कब्र खोदने वाले, अंतिम संस्कार से संबंधित सामान का व्यापार करने वाले सफलता पाते हैं। इसके साथ-साथ आतंकवादी, हथियार बनाने वाले, काला जादू करने वाले लोग भी सफलता पाते हैं।

26. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र

योग और ध्यान से संबंधित क्षेत्रों में कार्यरत लोग सफलता प्राप्त करते हैं। तंत्र-मंत्र करने वाले और रूहानी ताकतों से संपर्क स्थापित करने वाले लोगों को सफलता अवश्य मिलती है। इसके अलावा दान-पुण्य करने वाले लोग भी सफल होते हैं।

27. रेवती नक्षत्र

सम्मोहन क्रिया करने वाले लोग, जादूगर, गायक, कलाकार, आर्टिस्ट, हास्य कलाकार, मनोरंजन करने वाले, कंस्ट्रक्शन बिजनेस से जुड़े लोग सफलता पाते हैं।,,


डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य
*

Saturday, April 11, 2020

मोदी जी ने किया श्री महावीर स्वामी के अनेकांत सिद्धांत का पालन


मोदी जी ने किया श्री महावीर स्वामी के अनेकांत सिद्धांत का पालन 

 ✍️©डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य सगरा दमोह मध्य प्रदेश
                9826443973
जान भी और जहान भी
माननीय मोदी जी ने भगवान महावीर के अनेकांत सिद्धांत को अपनाकर भारत की रक्षा के साथ -साथ प्राणी मात्र की रक्षा के लिए अभूतपूर्व कदम उठाया है ।  उन्होंने 11 अप्रैल 2020 की मुख्यमंत्री वार्ता में एक संबोधन दिया  "जान भी और जहान भी "यह महावीर भगवान के अनेकांत का ही हिस्सा है । जिसमें बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के साथ  प्राणी मात्र रक्षणाय का  सिद्धान्त निहित होता है ।
ही और भी का सिद्धांत जिसे समझ आ गया वह विश्व विजेता के साथ कर्म विजेता भी बनने की सामर्थ्य प्रदान करता है ।
इसे कैसे समझें
जैसे किसी व्यक्ति ने  5 अंधे व्यक्तियों से कहा कि आप लोगों ने हाथी के स्वरूप को जानते हो , तब जन्मांध व्यक्तियों ने कहा कि हमने हाथी को देखा नहीं पर उसके स्वरूप का स्पर्श करके बता सकते हैं कि हाथी का स्वरूप कैसा होता है ।
उस व्यक्ति ने सर्कस के हाथी को महावत के साथ बुलाया और उन्हें स्पर्श कराया उनमें से किसी ने  हाथी के कान, किसी ने पूंछ ,किसी ने पैर ,किसी ने पेट तो किसी ने सूंढ़  का स्पर्श किया । फिर उनसे पूंछा गया कि बताइये हाथी का स्वरूप कैसा है ।

जिसने  हाथी के  कान पकड़े थे उसने कहा कि -हाथी सूपा जैसा है ।

जिसने पूंछ पकड़ी उसने कहा रस्सी के जैसा है ।
जिसने पैर पकड़े उसने कहा कि खंबे के जैसा है ।
जिसने पेट पकड़ा  उसने कहा कि बड़े मटके के जैसा है
जिसने सूढ़ पकड़ी वह उसने कहा कि कदली वृक्ष के जैसा है ।
पांचों में बहस छिड़ गई
हाथी -सूपा जैसा ही है,
रस्सी जैसा ही है,
खम्बे जैसा ही है,
 बड़े मटके जैसा ही है ,
कदली वृक्ष जैसा ही है ।
कोई किसी की बात को नहीं मान रहे थे
तब उस बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा कि आप सभी की बात सत्य है पर आप सभी हठाग्रह और दुराग्रह पूर्ण वार्तालाप कर रहे हैं । *इसमें आप लोग ही शब्द की  जगह भी शब्द लगा लें तो एक हाथी का सच्चा स्वरूप बन जायेगा और सभी के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी*

हाथी -सूपा के जैसा भी है
 ,रस्सी के जैसा भी है,
खम्बे के जैसा भी है,
बडे मटके के जैसा भी है,
कदली वृक्ष के जैसा भी है ।
इस अनेकांत सिद्धांत ने उनके आपसी झगड़े को समाप्त कर दिया । ही शब्द हठाग्रह, अशान्ति का प्रतीक है ।
और भी शब्द  अनुग्रह ,समन्वय ,सुमति शान्ति
का प्रतीक है।
आज मोदी जी के *जान भी और जहान भी*  संबोधन में अनेकांत का सिद्धान्त घटित होता है और भारत को विश्व गुरु बनने की स्वतः भूमिका को भी निभा रहा है ।
मोदी जी ने  इस सिद्धान्त से केवल भारत ही नहीं अपितु
अमेरिका भी ,
स्पेन भी,
बांग्लादेश भी,
 और भी अन्य देशों को अपने भारत में समेट लिया
मोदी जी  ने जो  संक्रिमत समस्त देशों  को औषधि दान दिया  है ।यह वैश्विक औषधि दान  है इसमें प्राणी मात्र की रक्षा का उद्देश्य निहित है जिसमें महावीर की अहिंसा के बृह्ददर्शन भी हो रहे हैं।
यही अनुग्रह ,परोपकार , धर्म  भारत के विश्व गुरु के स्वरूप का विग्रह दर्शन कराएगा।
भारत को पुराने ऋण से मुक्त भी कराया
अब भारत को विश्व गुरु बनने से कोई भी नहीं रोक सकता ।

*यत्र धर्म:तत्र जय:*
जहाँ धर्म होता है वहाँ विजय निश्चित होती है ।
अतः जो लोग ये कह रहे हैं कि भगवान के मंदिरों के पट  बंद हैं वे काम नहीं आये। उनसे कहूंगा कि मन्दिर और आराध्य की मूर्ति धर्म करने के प्रेरणा रूप कारण  स्रोत हैं और धर्म की भावना, परोपकार की भावना, प्राणी मात्र के हित की भावना, विश्वकल्याण की भावना धर्म के साक्षत कार्यरूप स्रोत हैं ।


जयदु जिण शासनं
जय महावीर

डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

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Tuesday, March 3, 2020

संज्ञा और संधि प्रकरण

*संज्ञाप्रकरणम् तथा सन्धिप्रकरणम्:-*

*माहेश्वर सूत्राणि:-*
माहेश्वर सूत्र (संस्कृत: शिवसूत्राणि या महेश्वर सूत्राणि) को संस्कृत व्याकरण का आधार माना जाता है। पाणिनि ने संस्कृत भाषा के तत्कालीन स्वरूप को परिष्कृत एवं नियमित करने के उद्देश्य से भाषा के विभिन्न अवयवों एवं घटकों यथा ध्वनि-विभाग (अक्षरसमाम्नाय), नाम (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण), पद, आख्यात, क्रिया, उपसर्ग, अव्यय, वाक्य, लिंग इत्यादि तथा उनके अन्तर्सम्बन्धों का समावेश अष्टाध्यायी में किया है। अष्टाध्यायी में ३२ पाद हैं जो आठ अध्यायों मे समान रूप से विभक्त हैं।

*उत्पत्ति:-*

माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति भगवान नटराज (शिव) के द्वारा किये गये ताण्डव नृत्य से मानी गयी है।

*नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।*
*उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥*
अर्थात:- "नृत्य (ताण्डव) के अवसान (समाप्ति) पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना का उद्धार (पूर्ति) के लिये नवपंच (चौदह) बार डमरू बजाया। इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों का ये जाल (वर्णमाला) प्रकट हुयी।"

डमरु के चौदह बार बजाने से चौदह सूत्रों के रूप में ध्वनियाँ निकली, इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ। इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है। प्रसिद्धि है कि महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को देवाधिदेव शिव के आशीर्वाद से प्राप्त किया जो कि पाणिनीय संस्कृत व्याकरण का आधार बना।

सूत्र संपादित करें
माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या १४ है जो निम्नलिखित हैं:
१. अइउण्।
२. ऋऌक्।
३. एओङ्।
४. ऐऔच्।
५. हयवरट्।
६. लण्।
७. ञमङणनम्।
८. झभञ्।
९. घढधष्।
१०. जबगडदश्।
११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्।
१३. शषसर्।
१४. हल्।

*माहेश्वर सूत्र:-*
उपर्युक्त्त १४ सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों (अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार से संयोजित किया गया है। फलतः, पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण समूहों (एक से अधिक) के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों) को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप मे ग्रहण करते हैं। माहेश्वर सूत्रों को इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं। प्रत्याहार बनाने की विधि तथा संस्कृत व्याकरण मे उनके बहुविध प्रयोगों को आगे दर्शाया गया है।

इन १४ सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों को समावेश किया गया है। प्रथम ४ सूत्रों (अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष १० सूत्र व्यंजन वर्णों की गणना की गयी है। संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यंजन वर्णों को हल् कहा जाता है। अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं।

*प्रत्याहार  प्रत्याहार:-*

प्रत्याहार का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का पाणिनि ने निर्देश किया है।

*आदिरन्त्येन सहेता;-*
 (१-१-७१): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्संज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है।
उदाहरण: अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘अइउण्’ के आदि वर्ण ‘अ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ऐऔच्’ के अन्तिम वर्ण ‘च्’ से योग कराने पर अच् प्रत्याहार बनता है। यह अच् प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘अ’ से लेकर इत्संज्ञक च् के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है। अतः,

अच् = अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ।

इसी तरह हल् प्रत्याहार की सिद्धि ५वें सूत्र हयवरट् के आदि अक्षर ह को अन्तिम १४ वें सूत्र हल् के अन्तिम अक्षर (या इत् वर्ण) ल् के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है। फलतः,

हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह।
उपर्युक्त सभी 14 सूत्रों में अन्तिम वर्ण (ण् क् ं च् आदि) को पाणिनि ने इत् की संज्ञा दी है। इत् संज्ञा होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है अर्थात् इनका प्रयोग नही होता है।
[2/14, 09:29] अक्षितादेवी: *अभिव्यंजना:-*
कालिदास की कविता की प्रमुख विशेषता है कि वह चित्रों के निर्माण में सबकुछ न कहकर भी अभिव्यंजना द्वारा पूरा चित्र खींच देते हैं।
जैसे:-
*एवं वादिनि देवर्शौ पार्श्वे पितुरधोमुखी।*
*लीला कमल पत्राणि गणयामास पार्वती।।*
अर्थात् देवर्षि के द्वारा ऐसी (पार्वती के विवाह प्रस्ताव की) बात करने पर, पिता के समीप बैठी पार्वती ने सिर झुका कर हाथ में लिये कमल की पंखुड़ियों को गिनना शुरू कर दिया।

*"परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथः!! "-श्री गीता 3‘11!!*

*ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् !*

*संस्कृत प्रथम सत्र- पाठ्यक्रम*

*1.संज्ञा प्रकरणम् -*
v     
*माहेश्वरसूत्राणि -*
पाणिनी रचित अष्टाध्यायी (माहेश्वराणि) सूत्राणि -
1. अइउण्
2. ऋलृक्
3. एओङ् 
4. ऐऔच् 
5. हयवरट् 
6. लण् 
7. ञ् मङणनम् 
8. झभञ् 
9. घढ़धष् 
10. जबगड़दश् 
11. खफछठथचटतव् 
12. कपय् 
13. शषसर् 
14. हल्।

*प्रत्याहार सूत्राणि:-*
                 प्रत्याहार सूत्र में दो वर्ण होते हैं। पहला पूर्ण होता है तथा दूसरा हल् होता है जैसे:-
अच्,
हल्,
जश्, ,
खर्,
झष्,
अल् इत्यादि।
     इसको बनाने के लिये - कोई भी माहेश्वर सूत्र के पूर्ण वर्ण से लेकर कोई भी हलन्त वर्ण तक लेकर इसको बनाया जा सकता है। जिसमें वे सूत्र प्रथम उस पूर्ण वर्ण से लेकर अन्तिम हल् वर्ण के पहले तक के सभी पूर्ण को निरूपित करता हैं। जैसे-
*अच्* -  अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ।
*जश्* - ज, ब, ग, ड़, द।
*झष्* - झ, भ, घ, ढ़, ध।
चर् - च, ट, त, व, क, प, श, ष, स।
*खर्* - ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स। आदि।
  इसी प्रकार और भी प्रत्याहार सूत्र बनाये जा सकते हैं।

*इत्संज्ञा:-*
1. हलन्त्यम् - (हल् $ अन्त्यम्) अर्थात् उपदेश की अवस्था के अन्तिम हल् (व्यंजन) की इत् संज्ञा होती है।
*जैसे:-*
अइउण्, ऋलृक्, चर्, हल्, खर्, अच्, सुप्, इत्यादि। इनमें ण्, क्, र्, ल्, र्, च् और प् हलन्त्य वर्ण होने से इत्संज्ञक होंगे।

*2. तस्य लोपः* - अर्थात्  जिसकी इत्संज्ञा होती है उसका लोप हो जाता है। जैसे- अइउण् में ण् इत्संज्ञक होने से इसका लोप हो जाएगा।

*3. अदर्शनं लोपः* - अर्थात् विद्यमान शब्द किन्तु न दिखाई दे न सुनाई दे वह लोप कहलाता है। और अदर्शन का लोप होता है।

*4. आदिरन्त्येन संहेताः* - (आदिः अन्त्येन संहेताः) अर्थात् अन्तिम इत्संज्ञक वर्ण के साथ उच्चारित होने वाला आदि वर्ण अपना तथा बीच में आने वाले अन्य वर्णों का बोध कराता है।
जैसे - अच् - अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ।

*5.       उपदेशेऽजनुनासिक इत्* - अर्थात् उपदेश की अवस्था में जो अनुनासिक है उसकी इत्संज्ञा होती है। जैसे - ण्, ङ्, ´् आदि।

*6.       ऊकालोझ्रस्वदीर्घप्लुतः* - अर्थात् उ, ऊ और ऊ३ काल वाले स्वरों की क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत संज्ञा होती हैं। अथवा एकमात्रिक स्वर ह्रस्व, द्विमात्रिक स्वर दीर्घ और त्रिमात्रिक स्वर प्लुत कहलाता है।
जैसे -  अ, इ, उ -   (ह्रस्व)
        आ, ई, ऊ -  (दीर्घ)
        आ३, ई३, ऊ३ - (प्लुत)

*7. उच्चैरुदा त्तः* - अर्थात् जिस स्वर का उच्चारण अपने निर्धारित स्थान से ऊपर वाले भाग से होता है वह उदात्त  कहलाता है।

*8.नीचैरनुदात्तः*  - अर्थात् अपने निर्धारित स्थान से नीचे वाले भाग से उच्चारण होने वाले स्वर अनुदाŸा कहलाते हैं।

*9.समाहारः स्वरितः* - जिस स्वर का उच्चारण उदात्त और अनुदात्त के एकीकरण से हो वह स्वरित कहलाता है।

*10. मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः* - अर्थात् जिस वर्ण का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से ही होता है, वह अनुनासिक कहलाता है। और जिस वर्ण का उच्चारण केवल मुख से होता है वह अननुनासिक कहलाता है।

                                                 *वर्णों का उच्चारण स्थान*

*11. तुल्यास्य प्रयत्नं सवर्णम्*- (तुल्य+आस्य(मुख आदि)+ प्रयत्नम्+ सवर्णम्) अर्थात् जिन वर्णों के कण्ठ मुख आदि स्थान और अभ्यान्तर यत्न दोनों ही समान होते हैं, वे परस्पर एक- दूसरे के सवर्ण कहलाते हैं।

*12. अकूहविसर्जनीयानां कण्ठः* - अर्थात् अ, कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह और विसर्ग (:) का उच्चारण स्थान कण्ठ है।


*13.इचुयशानां तालु* - अर्थात् इ, चवर्ग (च, छ, ज, झ, ´), य और श का उच्चारण स्थान तालु है।

*14.ऋटुरषाणां मूर्धा* - अर्थात् ऋ, टवर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), र और ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है।

*15. लृतुलसानां दन्ताः* - लृ, तवर्ग (त, थ, द, ध, न) स और ल का उच्चारण स्थान दांत हैं।

*16. उपूपध्मानीयानां ओष्ठौ* - उ, पवर्ग (प, फ, ब, भ, म), का उच्चारण स्थान ओष्ठ हैं।

*17. ञमङणनानां नासिका च*  ´, म, ङ, ण, न का उच्चारण स्थान नाक भी है

*18. एदैतोः कण्ठ तालुः*  ए, और ऐ दोनों का उच्चारण स्थान कण्ठ और तालु है।

*19. ओदौतोः कण्ठोष्ठम्* - ओ और औ का उच्चारण स्थान कण्ठ और औष्ठ है।

*20. वकारस्य दन्तोष्ठम्* - व का उच्चारण स्थान दांत और ओष्ठ है।

*21.जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्*  जिह्वामूलीय का उच्चारण स्थान जीभ का मूलभाग है।

*22. नासिकाऽनुस्वारस्य* - अनुस्वारों ( ं ) का उच्चारण स्थान नाक भी है।

                                      *यत्न विचार:-*

*23. यत्नो द्विधा* :- यत्न दो प्रकार के होते हैं- 
*‘‘अभ्यान्तरो बाह्यश्च’’* -
1.अभ्यांतर(आंतरिक) 2.बाह्य ।

*आद्याः पंचधा* -  आद्याः (पहला,) अभ्यान्तर पाँच प्रकार का होता है-
*स्पृष्टेषत्स्पृष्टेषद्विवृतविवृतसंवृतभेदात्* :-
अर्थात् स्पृष्ट्, ईषत्स्पृष्ट्, ईषत् विवृत, विवृत, संवृत।

 *स्पर्श* - (कुचुटुतुपु) वर्ग की स्पृष्ट संज्ञा होती है
कुचुटुतुपु - कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग।

*ईषत्स्पृष्ट* :-  अन्तःस्थों (य, व, र, ल ) की संज्ञा होती है।

*ईषद्विवृत*  ऊष्मकों (श,ष,स,,ह) की संज्ञा होती है।

  *विवृत* -  जितने स्वर हैं उनकी विवृत संज्ञा होती है। जैसे- अ, इ, उ, ऋ, लृ आदि।

 *संवृत* -  लिखने की अवस्था में ‘अ’ की संवृत संज्ञा होती है।

*2. बाह्यप्रयत्न एकादशधा* : -
1.विवारः,
2.संवारः,
3.श्वासः,
4.नाद,
5.घोष,
6.अघोष,
7.अल्पप्राण,
8.महाप्राण,
9.उदात्त,
10.अनुदात्त,
11.स्वरित।

*24.हशः संवारानादघोषाश्च* :-- हश् प्रत्याहार के अन्तर्गत संवार, नाद और घोष आते हैं।

*25. खरः विवाराः श्वासा अघोषश्च* :-  खर् प्रत्याहार के अन्तर्गत विवार, श्वास और अघोष आते हैं।

*26.वर्गाणां प्रथमतृतीयपंचमयणश्चाल्पप्राणाः* - वर्गों के प्रथम, तृतीय तथा पंचम और यण् प्रत्याहार (य, व, र, ल) अल्पप्राण कहलाते हैं।

*27.वर्गाणां द्वितीयचतुर्थाैशलश्च महाप्राणाः* - वर्ग का दूसरा, चैथा और शल् प्रत्याहार (श, ष, स, ह) महाप्राण कहलाते हैं।

*28.अनुदित् सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः*  अविधियमान अण् प्रत्याहार (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल) और उदित प्रत्याहार (कुचुटुतुपु) वर्ग अपने तथा अपने सवर्ण स्वरूप की संज्ञा होती है।

*29.परः सन्निकर्षः संहिता* - वर्णों की अत्यन्त समीपता को संहिता कहते हैं। जैसे- राम +कुमारः - रामकुमार। अन् +अनुनासिक-  अननुनासिक।

*30.हलोऽनन्तरा संयोगः*  दो हलों के बीच में किसी अच् का व्यवधान न हो उसकी संयोग संज्ञा होती है। जैसे - प्र,श्र, द्य, उन्नति आदि।

*31.सुप्तिङ्न्तं पदम्* - सुबन्त और तिङ्न्त की पदम् (पद) संज्ञा होती है। जिसके अन्त में सुप् प्रत्यय हो वह सुबन्त और जिसके अन्त में तिङ् प्रत्यय हो उसे तिङ्न्त कहते हैं।

सुप् + अन्त -  सुबन्त
तिङ् + अन्त - तिङ्न्त

                                        *!! इति संज्ञाप्रकरणम् !!*

 *संधि विच्छेद, संस्कृत में संधि, संस्कृत व्याकरण*

*SANDHI:- Sanskrit Sandhi*

संस्कृत में संधि विच्छेद दो वर्णों के निकट आने से उनमें जो विकार होता है उसे ‘सन्धि’ कहते है। इस प्रकार की सन्धि के लिए दोनों वर्णो का निकट होना आवश्यक है, क्योकि दूरवर्ती शब्दो या वर्णो में सन्धि नहीं होती है। वर्णो की इस निकट स्थिति को ही सन्धि कहते है। अतः संक्षेप में यह समझना चाहिए कि दो वर्णो के पास-पास आने से उनमें जो परिवर्तन या विकार होता है उसे संस्कृत व्याकरण में सन्धि कहते है।
उदाहरण -
हिम + आलयः = हिमालयः
रमा + ईशः = रमेंशः
सूर्य + उदयः = सूर्योदयः

संस्कृत संधि के भेद/प्रकार
*संस्कृत भाषा में संधियां तीन प्रकार* की होती है-
●स्वर संधि
●व्यंजन संधि
●विसर्ग संधि

*1. स्वर संधि* - अच् संधि
नियम - दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं।
*उदाहरण-*
हिम+आलय= हिमालय।
रवि + इंद्र = रवींद्र
मुनि + इंद्र = मुनींद्र
नारी + इंदु = नारींदुई
मही + ईश = महीश
भानु + उदय = भानूदय
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व

संस्कृत में *स्वर-संधि आठ प्रकार की होती हैं-*
●दीर्घ संधि - अक: सवर्णे दीर्घ:
●गुण संधि - आद्गुण:
●वृद्धि संधि - ब्रध्दिरेचि
●यण् संधि - इकोऽयणचि
●अयादि संधि - एचोऽयवायाव:
●पूर्वरूप संधि - एडः पदान्तादति
●पररूप संधि - एडि पररूपम्
●प्रकृति भाव संधि - ईदूद्विवचनम् प्रग्रह्यम्

*2. व्यंजन संधि :-* हल् संधि
व्यंजन का स्वर या व्यंजन के साथ मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते है। उदाहरण-
उत + उल्लास = उल्लास
अप + ज = अब्ज

*व्यंजन संधि (हल् संधि) के प्रकार -*
●श्चुत्व संधि - स्तो श्चुनाश्चु
●ष्टुत्व संधि - स्तो ष्टुनाष्टु
●जश्त्व संधि - झालम् जशोऽन्ते

*3. विसर्ग संधि:-*
विसर्ग का स्वर या व्यंजन के साथ मेल होने पर जो परिवर्तन होता है ,उसे विसर्ग संधि कहते है। *उदाहरण–*
निः + चय = निश्चय
दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
ज्योतिः + चक्र = ज्योतिश्चक्र
निः + छल = निश्छल

*विसर्ग संधि के प्रकार -*
●सत्व संधि
●उत्व् संधि
●रुत्व् संधि
●विसर्ग लोप संधि

*"परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथः!! "-श्री गीता 3‘11!!*

*ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् !*

*SWAR SANDHI , अच् (स्वर) सन्धिः* Samskritam
By *तोलाराम मीना* April 07, 2019
*अच्न्धि प्रकरणम् :-*
दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं।

*अच् (स्वर) सन्धिः -*
दो स्वरों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं।

*इसके निम्न प्रकार हैं -*

*1. दीर्घ स्वर सन्धिः -  ‘‘अकः सवर्णे दीर्घः’’ -* अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद में यदि कोई सवर्ण स्वर वर्ण हो तो पूर्व और पर दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश होता है। जैसे-
अ, आ + अ, आ = आ
इ, ई +इ, ई = ई
उ, ऊ + उ, ऊ = ऊ
ऋ, ऋृ + ऋ, ऋृ = ऋृ

*उदाहरण* - 
राम + आलयः = रामालयः (अ+आ)
दैत्य + अरिः = दैत्यारिः (अ+अ)
विष्णु + उदयः = विष्णूदयः (उ+उ)
श्री + ईशः = श्रीशः (इ+ई)
होतृ + ऋकारः = होतृकारः (ऋ+ऋ) आदि।

*2. गुणस्वर सन्धिः -  ‘‘आद्गुणः’’* - आत् (अवर्ण- अ, आ) से इक् (इ,उ,ऋ,लृ) परे होने पर पूर्व- पर के स्थान पर गुण एकादेश होता है।

जैसे- 
अ, आ + इ, ई = ए
 अ, आ + उ, ऊ = ओ
 अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
  अ, आ + लृ = अल्

नोटः- गुण तीन प्रकार के होते हैं-
*‘‘अदेङ्गुणः’’* -   अर्थात् अत् (अ), एङ् (ए, ओ) का नाम गुण है।
जैसे-
गंगा + उदकम् = गंग् आ + उदकम् = गंग् ओ दकम् = गंगोदकम्
उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः (अ + इ = ए)

*3. वृद्धि सन्धिः - ‘‘वृद्धिरेचि’’*-  अवर्ण (अ, आ) से एच् (ए, ओ, ऐ, औ) परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि संज्ञक एकादेश होता है।

*वृद्धि* = 
अ, आ + ए, ऐ = ऐ
अ, आ + ओ, औ = औ

जैसे :-
तथा +एव = तथैव
एक + एकम् = एकैकम्
महा +औषधिः = महौषधिः
शर्करा +ओदनः = शर्करौदनः
राज + ऐश्वर्यम् = राजैश्वर्यम्

*4. पररूप सन्धिः -  ‘‘एङिपररूपम्’’* -   अवर्णान्त (जिसके अन्त में ‘अ’ हो) उपसर्ग से एङ आदि (जिसके अन्त में ए और ओ हो) धातु के परे होने पर  पर और पूर्व के स्थान पर पररूप एकादेश होता है। 
जैसे-
प्र +एजते = प्रेजते
उप + एहि = उपेहि
प्र + ओषति = प्रोषति

*5. पूर्वरूप सन्धिः -   ‘‘एङ्पदान्तादति’’*    - पद के अन्त में यदि एङ् (ए, ओ) हो तो उनके बाद में यदि ह्रस्व अकार है तो पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है।
ए + अ = ए
ओ + अ = ओ
जैसे -
हरे + अव = हरेऽव
विष्णो + अव = विष्णोऽव
नमो + अस्तु = नमोऽस्तु
लोके + अस्मिन् = लोकेऽस्मिन्
   
*6. अयादि सन्धिः -  ‘‘एचोऽयवायावः’’*  -  एचः अय् अव् आय् आव् अर्थात् एच् (ए, ऐ, ओ, औ) के बाद यदि अच् हो तो एच् के स्थान पर अय्, आय्, अव्, आव् आदेश होता है।
‘‘यथा संख्यः मनुदेशः समानाम्’’  -  बराबर संख्या वाली विधि क्रम से होती है।
ए = अय्
ओ = अव्
ऐ = आय्
औ = आव्

जैसे- 
भो + अति = भ् ओ + अति = भ् अव् + अति = भवति
करौ + एतौ  = करावेतौ (औ + ए)
गै + अति = गायति(ऐ+अ)
मनो + ए = मनवे

*7. यण् सन्धिः  -  ‘‘इकोयणचि’’*   -  इक् (इ, उ, ऋ, लृ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है यदि ‘अच्’ परे हो तो।

इ, ई + अच् हो  = य्
उ, ऊ +   अच् हो   = व्
ऋ, ऋृ +  अच् हो   = र्
लृ + अच् हो  = ल्
जैसे - 
यदि + अपि = यद् इ अपि = यद् यपि = यद्यपि
   
 मनु + आदि = मन्वादि
 पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

*सत्यमेव जयते जयतु भारतम्:* *"परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथः!! "-श्री गीता 3‘11!!*

*ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् !*

*SWAR SANDHI , अच् (स्वर) सन्धिः* Samskritam
By *तोलाराम मीना* April 07, 2019
*अथ सन्धि प्रकरणम् :-*
दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं।

*अच् (स्वर) सन्धिः -*
दो स्वरों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं।

*इसके निम्न प्रकार हैं -*

*1. दीर्घ स्वर सन्धिः -  ‘‘अकः सवर्णे दीर्घः’’ -* अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद में यदि कोई सवर्ण स्वर वर्ण हो तो पूर्व और पर दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश होता है। जैसे-
अ, आ + अ, आ = आ
इ, ई +इ, ई = ई
उ, ऊ + उ, ऊ = ऊ
ऋ, ऋृ + ऋ, ऋृ = ऋृ

*उदाहरण* - 
राम + आलयः = रामालयः (अ+आ)
दैत्य + अरिः = दैत्यारिः (अ+अ)
विष्णु + उदयः = विष्णूदयः (उ+उ)
श्री + ईशः = श्रीशः (इ+ई)
होतृ + ऋकारः = होतृकारः (ऋ+ऋ) आदि।

*2. गुणस्वर सन्धिः -  ‘‘आद्गुणः’’* - आत् (अवर्ण- अ, आ) से इक् (इ,उ,ऋ,लृ) परे होने पर पूर्व- पर के स्थान पर गुण एकादेश होता है।

जैसे- 
अ, आ + इ, ई = ए
 अ, आ + उ, ऊ = ओ
 अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
  अ, आ + लृ = अल्

नोटः- गुण तीन प्रकार के होते हैं-
*‘‘अदेङ्गुणः’’* -   अर्थात् अत् (अ), एङ् (ए, ओ) का नाम गुण है।
जैसे-
गंगा + उदकम् = गंग् आ + उदकम् = गंग् ओ दकम् = गंगोदकम्
उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः (अ + इ = ए)

*3. वृद्धि सन्धिः - ‘‘वृद्धिरेचि’’*-  अवर्ण (अ, आ) से एच् (ए, ओ, ऐ, औ) परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि संज्ञक एकादेश होता है।

*वृद्धि* = 
अ, आ + ए, ऐ = ऐ
अ, आ + ओ, औ = औ

जैसे :-
तथा +एव = तथैव
एक + एकम् = एकैकम्
महा +औषधिः = महौषधिः
शर्करा +ओदनः = शर्करौदनः
राज + ऐश्वर्यम् = राजैश्वर्यम्

*4. पररूप सन्धिः -  ‘‘एङिपररूपम्’’* -   अवर्णान्त (जिसके अन्त में ‘अ’ हो) उपसर्ग से एङ आदि (जिसके अन्त में ए और ओ हो) धातु के परे होने पर  पर और पूर्व के स्थान पर पररूप एकादेश होता है। 
जैसे-
प्र +एजते = प्रेजते
उप + एहि = उपेहि
प्र + ओषति = प्रोषति

*5. पूर्वरूप सन्धिः -   ‘‘एङ्पदान्तादति’’*    - पद के अन्त में यदि एङ् (ए, ओ) हो तो उनके बाद में यदि ह्रस्व अकार है तो पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है।
ए + अ = ए
ओ + अ = ओ
जैसे -
हरे + अव = हरेऽव
विष्णो + अव = विष्णोऽव
नमो + अस्तु = नमोऽस्तु
लोके + अस्मिन् = लोकेऽस्मिन्
   
*6. अयादि सन्धिः -  ‘‘एचोऽयवायावः’’*  -  एचः अय् अव् आय् आव् अर्थात् एच् (ए, ऐ, ओ, औ) के बाद यदि अच् हो तो एच् के स्थान पर अय्, आय्, अव्, आव् आदेश होता है।
‘‘यथा संख्यः मनुदेशः समानाम्’’  -  बराबर संख्या वाली विधि क्रम से होती है।
ए = अय्
ओ = अव्
ऐ = आय्
औ = आव्

जैसे- 
भो + अति = भ् ओ + अति = भ् अव् + अति = भवति
करौ + एतौ  = करावेतौ (औ + ए)
गै + अति = गायति(ऐ+अ)
मनो + ए = मनवे

*7. यण् सन्धिः  -  ‘‘इकोयणचि’’*   -  इक् (इ, उ, ऋ, लृ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है यदि ‘अच्’ परे हो तो।

इ, ई + अच् हो  = य्
उ, ऊ +   अच् हो   = व्
ऋ, ऋृ +  अच् हो   = र्
लृ + अच् हो  = ल्
जैसे - 
यदि + अपि = यद् इ अपि = यद् यपि = यद्यपि
   
 मनु + आदि = मन्वादि
 पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

*सत्यमेव जयते जयतु भारतम्...सन्धिप्रकरणम् - संस्कृतव्याकरणम्*

*सन्धि* शब्द का
●प्रकृति प्रत्यय - सम्+धा+कि(इ) = सन्धि: ।
●लिङ्ग - पुर्लिंग ।
● *कारण:-* "कि" प्रत्यय द्वारा निर्मित सभी शब्द पुर्लिंग होते हैं। यथा:- सन्धि , विधि , प्रविधि , निधि , व्याधि , उपाधि , समाधि इत्यादि।
*विशेष:-* "कि" प्रत्यय धा धातु में ही लगता है, धा धातु से पूर्व उपसर्ग होना चाहिए।

●परिभाषा:- वर्ण सन्धानं सन्धि: ।
- अर्थ :- दो वर्णों के मेल से उत्पन्न विकार सन्धि कहलाता है।
अर्थात् -
संस्कृत में संधि विच्छेद दो वर्णों के निकट आने से उनमें जो विकार होता है उसे ‘सन्धि’ कहते है। इस प्रकार की सन्धि के लिए दोनों वर्णो का निकट होना आवश्यक है, क्योकि दूरवर्ती शब्दो या वर्णो में सन्धि नहीं होती है। वर्णो की इस निकट स्थिति को ही सन्धि कहते है। अतः संक्षेप में यह समझना चाहिए कि दो वर्णो के पास-पास आने से उनमें जो परिवर्तन या विकार होता है उसे संस्कृत व्याकरण में सन्धि कहते है।
उदाहरण -
१. हिम + आलयः = हिमालयः
२. रमा + ईशः = रमेंशः
३. सूर्य + उदयः = सूर्योदयः

*●संस्कृत संधि के भेद/प्रकार:-*
 *लघुसिद्धान्तकौमुदी* के अनुसार संस्कृत भाषा में संधियां तीन प्रकार की होती है-
१. स्वर संधि
२. व्यंजन संधि
३. विसर्ग संधि
*किन्तु सिद्धान्तकौमुदी* के अनुसार या व्याकरणशास्त्र की दृष्टि से सन्धि के पाँच भेद माने गए हैं। जो निम्नलिखित हैं :-
१. स्वरसन्धि (अच्सन्धि)
२. व्यञ्जनसन्धि (हल्सन्धि)
३. विसर्गसन्धि
४. स्वादिसन्धि
५. प्रकृतिभावसन्धि

*विशेष:-*
आचार्य वरदराज  ने लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वादिसन्धि को विसर्ग सन्धि में तथा प्रकृतिभावसन्धि को अचसन्धि के अन्तर्गत ही समावेशित किया है।

*1. स्वर संधि - अच् संधि:-*
●परिभाषा:-
नियम - दो या दो से अधिक स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं।
उदाहरण-
हिम+आलय= हिमालय।
रवि + इन्द्र = रवीन्द्र:
मुनि + इन्द्र = मुनीन्द्र:
नारी + इन्दु = नारीन्दु
मही + ईश = महीश
भानु + उदय = भानूदय
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व

*●स्वरसन्धि/अचसन्धि के भेद:-*
संस्कृत में स्वर-संधि मुख्य रूप से सात भेद होतें हैं। जिनका उचित क्रम सिद्दांतकौमुदी के अनुसार निम्नलिखित है:-
१. यण् संधि - इकोऽयणचि
२. अयादि संधि - एचोऽयवायाव
३. गुण संधि - आद्गुण:
४. वृद्धि संधि - वृध्दिरेचि
५. पररूप संधि - एडि पररूपम्
६. दीर्घ संधि - अक: सवर्णे दीर्घ:
७. पूर्वरूप संधि - एडः पदान्तादति
*स्वरसन्धि में समावेशित सन्धि:-*
१.प्रकृति भाव संधि - ईदूद्विवचनम् प्रग्रह्यम्

*●१. यणसन्धिप्रकरणम्:-*
*सूत्र:-*  इकोऽयणचि ।
*पदच्छेद:-* इक: यण् अचि।
*वृति:-* इक: स्थाने यण् स्यात् अचि परे संहितायां विषये।
*अर्थ:-* यदि इक् प्रत्याहार (इ उ ऋ लृ)  बाद कोई आसमान स्वर हो तो इक् के स्थान पर यण् (य् व् र् ल्) आदेश हो जाता है।
*नोट:-*  सन्धि सदैव संहिता के विषय में ही होती है।

 इ/ई   -> य् ।
उ/ऊ   -> व् ।
ऋ/ऋ  -> र् ।
लृ/--   -> ल् ।
*●उदाहरण:-*
सुधी+उपास्य = सुद्युपास्य / सुद्ध्पास्य ।
मधु + अरि: = मध्वरि: / मद्ध्वरि: ।
धात्रृ + अंश: = धात्रंश: / धात्त्रंश: ।
लृ + आकृति: = लाकृति:।

*नोट:-* प्रथम तीन उदाहरणों में *अनचि च* सूत्र द्वारा विकल्प से द्वित्व हुआ है।
 
*अन्य उदाहरण:-*
1. पठतु + अत्र = पतत्वत्र।
2. कुरु + इदम् = कुर्विदम् ।

यण् संधि के चार नियम होते हैं!

*(क) इ, ई के आगे कोई विजातीय (असमान) स्वर होने पर इ ई को ‘य्’ हो जाता है।*
इ + आ = य् --> अति + आचार: = अत्याचार:
इ + अ = य् + अ --> यदि + अपि = यद्यपि
ई + आ = य् + आ --> इति + आदि = इत्यादि।
ई + अ = य् + अ --> नदी + अर्पण = नद्यर्पण
ई + आ = य् + आ --> देवी + आगमन = देव्यागमन


*(ख) उ, ऊ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर उ ऊ को ‘व्’ हो जाता है।*
उ + आ = व् --> सु + आगतम् = स्वागतम्
उ + अ = व् + अ --> अनु + अय = अन्वय
उ + आ = व् + आ --> सु + आगत = स्वागत
उ + ए = व् + ए --> अनु + एषण = अन्वेषण

*(ग) ‘ऋ’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ को ‘र्’ हो जाता है। इन्हें यण-संधि कहते हैं।*
ऋ + अ = र् + आ --> पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

*(घ) ‘ल्र’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ को ‘ल्’ हो जाता है। इन्हें यण-संधि कहते हैं।*
लृ + आ = ल् --> लृ + आकृति = लाकृति: ।

*●२.अयादिसन्धिप्रकरणम्:-*

*सूत्र:-* - एचोऽयवायाव: ।
*पदच्छेद:-* एच: अय् अव् आय् आव: ।
*वृति:-* एच: क्रमाद् अय् अव् आय् आव् एतै आदेशा: स्यु: अचि।
*अर्थ:-* यदि एच् प्रत्याहार (ए ओ ऐ औ) के बाद कोई असमान स्वर हो तो इन चारों वर्णों के स्थान पर क्रमशः अय् अव् आय् आव् आदेश हो जाता है।
*उदाहरण:-*
1. हरे + ए = हरये । (हर्+अय्+ए=हरये)
2. विष्णो + इति =विष्णविति।
3. पौ + अक: = पावकः ।
4. नै + अक: = नायक: ।
5. तौ + एकता = तावेकता।
6. इन्द्रौ + उदिते = इन्द्रावुदिते।

●अयादि संधि का सूत्र *एचोऽयवायाव:* होता है।
●अयादि संधि के चार नियम होते हैं!

ए, ऐ और ओ औ से परे किसी भी स्वर के होने पर क्रमशः अय्, आय्, अव् और आव् हो जाता है। इसे अयादि संधि कहते हैं।
(क)
ए + अ = अय् + अ --> ने + अन = नयन
(ख)
ऐ + अ = आय् + अ --> गै + अक = गायक
(ग)
ओ + अ = अव् + अ --> पो + अन = पवन
(घ)
औ + अ = आव् + अ --> पौ + अक = पावक
औ + इ = आव् + इ --> नौ + इक = नाविक

*●३.गुणसन्धिप्रकरणम्:-*

*सूत्र:-  आद्गुण:।
*वृति:-* अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेश: स्यात्।
*अर्थ:-* अ या आ के बाद इ/ई ,उ/ऊ , ऋ/ऋ , लृ होतो दोनों के स्थान पर गुण एकादेश: हो जाता है अर्थात् ये दोनों स्वर मिलकर क्रमशः ए, ओ,अर् तथा अल् में बदल जाता है।

गुण संधि के चार नियम होते हैं!
अ, आ के आगे इ, ई हो तो ए ; उ, ऊ हो तो ओ तथा ऋ हो तो अर् हो जाता है। इसे गुण-संधि कहते हैं। जैसे -
(क)
उप+इन्द्र: = उपेन्द्र:।
अ + इ = ए ; नर + इंद्र = नरेंद्र
अ + ई = ए ; नर + ईश= नरेश
आ + इ = ए ; महा + इंद्र = महेंद्र
आ + ई = ए महा + ईश = महेश
(ख)
अ + उ = ओ ; ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश ;
आ + उ = ओ महा + उत्सव = महोत्सव
अ + ऊ = ओ जल + ऊर्मि = जलोर्मि ;
आ + ऊ = ओ महा + ऊर्मि = महोर्मि।
(ग)
अ + ऋ = अर् देव + ऋषि = देवर्षि
(घ)
आ + ऋ = अर् महा + ऋषि = महर्षि

*●४. वृद्धिसन्धिप्रकरणम्:-*
*
*सूत्र:-* वृद्धिरेचि ।
*पदच्छेद:-* वृद्धि: एचि।
*वृत्ति:-* आदेचि परे वृद्धिरेकादेश: स्यात्। गुणापवाद।
*अर्थ:-*  अ या आ के बाद एच् प्रत्याहार का कोई वर्ण हो तो दोनों  के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है अर्थात् ये दोनों मिलकर क्रमशः ऐ तथा औ में बदल जाते हैं।
(अ/आ+ए/ऐ = ऐ)
(अ/आ+ओ/औ = औ)
*विशेष:-* वृद्धि सन्धि गुणसंधि का अपवाद है क्योंकि गुणसन्धि में सम्पूर्ण अच् परे होने का विधान है जबकि वृद्धिसंधि केवल एच् परे होने पर ही होती है।
1. कृष्ण+एकत्वम् = कृष्णैकत्वम्।
2. देव+ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम्।

वृद्धि संधि के दो नियम होते हैं!
अ, आ का ए, ऐ से मेल होने पर ऐ तथा अ, आ का ओ, औ से मेल होने पर औ हो जाता है। इसे वृद्धि संधि कहते हैं। जैसे -
(क)
अ + ए = ऐ --> एक + एक = एकैक ;
अ + ऐ = ऐ --> मत + ऐक्य = मतैक्य
आ + ए = ऐ --> सदा + एव = सदैव
आ + ऐ = ऐ --> महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
(ख)
अ + ओ = औ --> वन + औषधि = वनौषधि ;
आ + ओ = औ --> महा + औषधि = महौषधि ;
अ + औ = औ --> परम + औषध = परमौषध ;
आ + औ = औ --> महा + औषध = महौषध

*●५. पररूपसन्धिप्रकरणम्:-*

 *सूत्र:-* - एडि पररूपम्,
पररूप संधि के नियम
नियम - पदांत में अगर "अ" अथवा "आ" हो और उसके परे 'एकार/ओकार' हो तो उस उपसर्ग के एकार/ओकार का लोप हो जाता है। लोप होने पर अकार/ओकार 'ए/ओ' उपसर्ग में मिल जाता है।
पररूप संधि के उदाहरन्
प्र + एजते = प्रेजते
उप + एषते = उपेषते
परा + ओहति = परोहति
प्र + ओषति = प्रोषति
उप + एहि = उपेहि

यह संधि वृद्धि संधि का अपवाद भी होती है।

*●६. दीर्घसन्धिप्रकरणम्:-*

 *सूत्र:-*  अक: सवर्णे दीर्घ:।

दीर्घ संधि के चार नियम होते हैं!
सूत्र-अक: सवर्णे दीर्घ: अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद उसका सवर्ण आये तो दोनो मिलकर दीर्घ बन जाते हैं। ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ के बाद यदि ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ आ जाएँ तो दोनों मिलकर दीर्घ आ, ई और ऊ, ॠ हो जाते हैं। जैसे -


(क) अ/आ + अ/आ = आ
अ + अ = आ --> धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
अ + आ = आ --> हिम + आलय = हिमालय
अ + आ =आ--> पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
आ + अ = आ --> विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
आ + आ = आ --> विद्या + आलय = विद्यालय
(ख) इ और ई की संधि
इ + इ = ई --> रवि + इंद्र = रवींद्र ; मुनि + इंद्र = मुनींद्र
इ + ई = ई --> गिरि + ईश = गिरीश ; मुनि + ईश = मुनीश
ई + इ = ई --> मही + इंद्र = महींद्र ; नारी + इंदु = नारींदु
ई + ई = ई --> नदी + ईश = नदीश ; मही + ईश = महीश .
(ग) उ और ऊ की संधि
उ + उ = ऊ --> भानु + उदय = भानूदय ; विधु + उदय = विधूदय
उ + ऊ = ऊ --> लघु + ऊर्मि = लघूर्मि ; सिधु + ऊर्मि = सिंधूर्मि
ऊ + उ = ऊ --> वधू + उत्सव = वधूत्सव ; वधू + उल्लेख = वधूल्लेख
ऊ + ऊ = ऊ --> भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व ; वधू + ऊर्जा = वधूर्जा


(घ) ऋ और ॠ की संधि
ऋ + ऋ = ॠ --> पितृ + ऋणम् = पित्रणम्

*●७. पूर्वरूपसन्धिप्रकरणम्:-*
*सूत्र:-*  एडः पदान्तादति ।

पूर्वरूप संधि के नियम
नियम - पदांत में अगर "ए" अथवा "ओ" हो और उसके परे 'अकार' हो तो उस अकार का लोप हो जाता है। लोप होने पर अकार का जो चिन्ह रहता है उसे ( ऽ ) 'लुप्ताकार' या 'अवग्रह' कहते हैं।
पूर्वरूप्  संधि के उदाहरन्


ए / ओ + अकार = ऽ --> कवे + अवेहि = कवेऽवेहि
ए / ओ + अकार = ऽ --> प्रभो + अनुग्रहण = प्रभोऽनुग्रहण
ए / ओ + अकार = ऽ --> लोको + अयम् = लोकोSयम्
ए / ओ + अकार = ऽ --> हरे + अत्र = हरेSत्र

यह संधि आयदि संधि का अपवाद भी होती है।

*●८. प्रकृतिभावसन्धिप्रकरणम्:-*
*सूत्र:-*  - ईदूद्विवचनम् प्रग्रह्यम्।


प्रकृति भाव संधि के नियम
नियम - ईकारान्त, उकारान्त , और एकारान्त द्विवचन रूप के वाद यदि कोइ स्वर आये तो प्रक्रति भाव हो जाता है। अर्थात् ज्यो का त्यो रहता है ।
*प्रकृति भाव संधि के उदाहरन्*
हरी + एतो = हरी एतो
विष्णू + इमौ = विष्णु इमौ
लते + एते = लते एते
अमी + ईशा = अमी ईशा
फ़ले + अवपतत: = फ़ले अवपतत:

*इति अच्सन्धिप्रकरणम्....*

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...