Tuesday, May 17, 2022

मांसाहार और वैदिक ग्रंथ विमर्श

 🌹 *वैदिक शास्त्रों में शाकाहार!*

🌹 *महाभारत में राजा वसु की कथा*


प्रायः लोग मांस भोजन के लिए शास्त्रों का अपने अनुसार विकृत अर्थ लगाते हैं। विशेषकर भारत में वामपन्थियों का उद्देश्य है कि भारत में गो पूजा परम्परा नष्ट करने के लिए गोमांस भोजन की परम्परा दिखायी जाय। उनको केवल ३ शब्द अलग अलग स्थानों से खोज कर जोड़ देना है-गो, मांस, भोजन। विभिन्न प्रसंगों में इनके क्या अर्थ हैं, उनसे इनको कोई मतलब नहीं है। ये ३ शब्द मिलते ही उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया।

१. यज्ञ में पशुबलि-

(१) मांसाहार के लिए मिथ्या अर्थ-यज्ञ में उपरिचर वसु ने पशु बलि का समर्थन किया था जिस पर ऋषियों ने उनको शाप दिया था।

महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३३७-

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात्॥१३॥

छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा।

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः॥१४॥

ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थविदिनम्।

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद दिवः पत॥१५॥

अद्यप्रभृति ते याजन्नाकाशे विहता गतिः।

अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्वा प्रवेक्ष्यसि॥१६॥

यहां अज का अर्थ बीजी पुरुष कहा गया है, जिसकी यज्ञ द्वारा उपासना होती है।

(२) रन्तिदेव पर दैनिक गोहत्या का आक्षेप-महाभारत, द्रोण पर्व, अध्याय ६७-

सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत्।

आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः॥१४॥

= जो भी अतिथि संकृति पुत्र रन्तिदेव के यहाँ रात में आता था, उसे २१,००० गौ छू कर दान करते थे।

कोई भी २१,००० गौ एक बार क्या, जीवन भर में नहीं खा सकता है। यहां गो शब्द सम्पत्ति की माप भी है। मुद्राओं के नाम बदलते रहे हैं। उनका स्थायी नाम था-गो, धेनु। किसी को एक लाख गाय दी जायेगी तो वह उनको रख नहीं पायेगा, न देख भाल कर सकता है। यहाँ गो बड़ी मुद्रा (स्वर्ण), धेनु छोटी मुद्रा (रजत), निष्क सबसे छोटी मुद्रा है। निष्क से पंजाबी में निक्का, या धातु नाम निकेल हुआ है। निष्क मिलना अच्छा है, अतः नीक का अर्थ अच्छा है।

अन्नं वै गौः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/८/३ आदि)

इन्द्र मूर्ति १० धेनु में खरीदने का उल्लेख है-

क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः। (ऋक, ४/२४/१०)

२१००० गो या स्वर्ण मुद्रा देने के बाद उनको अच्छा भोजन कराते थे-

तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्ट मणिकुण्डलाः।

सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा॥

वहाँ कुण्डल, मणि पहने रसोइये पुकार पुकार कर कहते थे-आप लोग खूब दाल भात खाइये। आज का भोजन पहले जैसा नहीँ है, उससे अच्छा है।

यही वर्णन शान्ति पर्व (६७/१२७-१२८) में भी है।

अनुशासन पर्व (११५/६३-६७) में बहुत से राजाओं की सूची है जिन्होंने तथा कई अन्य महान् राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था। इनमें रन्तिदेव का भी नाम है-

श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च।

रैवते रन्तिदेवेन वसुना, सृञ्जयेन च॥६३॥

एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च।

दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा॥६४॥

विरूपश्वेन निमिना जनकेन च धीमता।

ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह॥६५॥

इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च।

अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना॥६६॥

हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च।

एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम॥६७॥

श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव , वसु, सृञ्जय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्व, निमि, बुद्धिमान जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत-इन सबने तथा अन्य राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था।

(३) भगवान् राम आदि कई राजाओं का ऊपर उल्लेख है कि उन लोगों ने जीवन में कभी मांस नहीं खाया।

(४) वामपन्थी झूठ-उत्तर रामचरित में एक प्रसंग है कि वसिष्ट दशरथ से मिलने आये तो उनको वत्सतरी दी गयी। वत्सतरी के बाद मडमड ध्वनि हुई। इसका अर्थ किया गया कि २ वर्ष की गाय दी गयी जिसे देखते ही वसिष्ठ ने उसे खाना आरम्भ कर दिया जिसकी हड्डियों के टूटने से मडमड शब्द हुआ। उसके बाद दशरथ ने कहा कि मधुपर्क हो गया अब प्रसंग पर चर्चा करें। यहां स्पष्टतः वत्सतरी का अर्थ मधुपर्क है जो सभी अतिथियों को दिया जाता है। अतिथि यात्रा में थके होने से उनको मीठा तथा जल की कमी होने से जल देते हैं। छोटे बच्चों को भी पेट खराब होने पर नमक-चीनी का घोल देते हैं। खाली पेट में मधुपर्क जाने पर हलका शब्द होता है। कभी कभी जोर की डकार भी होती है। गाय को खाना बाघ या मगरमच्छ के लिये भी सम्भव नहीं है। उसके पैर मे मनुष्य की हड्डी भले ही टूट जाय, मनुष्य उसे मुंह में नहीं ले सकता।

इसी प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक वोल्गा से गंगा में लिखा है कि ऋषि लोग घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। यह श्वेताश्वतर उपनिषद् के नाम का मूर्खतापूर्ण अनुवाद है। अश्व = घोड़ा, उसका श्वेत भाग = हड्डी, तर = सूप। वास्तव में इस उपनिषद् में घोड़े की चर्चा ही नहीं है। यहां सूर्य या वरुण को अश्व कहा है, उससे बड़े ब्रह्म की व्याख्या होने से यह श्वेताश्वतर है।

२. शमिता-

यज्ञ में पशु का आलभन करते हैं-उसका पीठ, कन्धा आदि छूते है। इसे शमिता कहते हैं, अर्थात् शान्त करने वाला। शान्त करने के लिए हत्या नहीँ की जाती है। पर इसका अर्थ किया जाता है कि पशु का कन्धा आदि छू कर देखते हैं कि कहाँ से उसका मांस काटना अच्छा होगा। आजकल भी घुड़सवारी सिखाई जाती है कि घोड़े पर चढ़ने के पहले उसकी गर्दन तथा कन्धा थपथपाना चाहिए। इससे वह प्रसन्न हो कर अच्छी तरह दौड़ता है। बच्चों की भी प्रशंसा के लिए उनकी पीठ थपथपाते हैं, यद्यपि वे भाषा भी समझ सकते हैं। यही आलभन है। शिष्य भी पहले गुरु को जा कर नमस्कार करता है तो गुरु उसके कन्धे पर हाथ रख कर आलभन करते हैं। यदि आलभन द्वारा उसकी हत्या करेंगे तो शिक्षा कौन लेगा? गुरु को भी फांसी होगी। हर अवसर पर यदि कोई पैर छूकर नमस्कार करे तो उसकी पीठ पर ही हाथ रख कर ही आशीर्वाद दिया जाता है।

शमितार उपेतन यज्ञं देवेभिरिन्वितम्। पाशात् पशुं प्र मुञ्चत बन्धाद् यज्ञपतिं परि। (तैत्तिरीय सं, ३/१/४/१०)

प्राजापत्या वै पशवः तेषां रुद्रो अधिपतिः यत् एताभ्यां उपाकरोति, ताभ्यां एव एनं प्रतिप्रोच्या आलभत आत्मनो अनाव्रस्काय द्वाभ्यां उपाकरोति

 द्विपाद् यजमानः प्रतिष्ठित्या उपाकृत्य पञ्च जुहोति। पाङ्क्ताः पशवः पशून् एव अवरुन्धे, मृत्यवे वा एष नीयते यत् पसुः तं यत् अन्वारभेत प्रमायुको यजमानः स्यात् नाना प्राणो यजमानस्य पशूनेत्याह व्यावृत्यै॥१॥ यत् पशुः मायुं अकृत इति जुहोति शान्त्यै शमितार उपेनेत्याह यथा यजुः एव एतत् वपायां वा आह्नियमाणायां अग्नेः मेधो अपक्रामति त्वां उ ते दधिरे हव्यवाहमिति वपामपि जुहोति अग्नेः एव मेधं अवरुन्धे अथो शृतत्वाय पुरस्तात् स्वाहा कृतयो वा अन्ये देवा उपरिष्टात् स्वाहा कृतयो अन्ये स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा इति अभितो वपां जुहोति॥२॥  (तैत्तिरीय सं, ३/१/५/१-२)

इसका आशय है कि प्रजापति से पशु हुए, उनका स्वामी रुद्र है (पशुपति)। उनको २ मन्त्रों से तैयार करता है जिससे उनको क्षति नहीं पहुंचे। यजमान के २ पाद (रंगाचारी कश्यप के अनुसार चेतना के २ स्तर) हैं, जो उसके आधार हैं। उसके बाद वह ५ पशुओं का प्रयोग करता है। पशु को कष्ट नहीं होना चाहिए। उनकी शान्ति के लिए मन्त्र पढ़ता है। इसकी त्रुटिपूर्ण नकल कुरान में है, पशु को मारते समय मन्त्र पढ़ते हैं। यहां, ५ प्रकार के पशुओं के कई अर्थ हैं, जिनकी व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों में है।

देव, पिता, माता आदि को शमिता कहा गया है। स्पष्टतः उनका उद्देश्य अपने सन्तान का पालन है, हत्या नहीं-

दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। ... उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ,,, अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वं अध्रिगो। अध्रिगुश्च अपापश्च उभौ देवानां शमितारौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)

इसी प्रकार उपनयन, विवाह आदि में सन्तान माता-पिता से अलग होती है, तो माता-पिता को कष्ट की शान्ति करायी जाती है, सन्तान को आश्वासन देते हैं कि दैव सहायक होगा। पहले माता को सान्त्वना दी जाती है, जिसे लोकभाषा में इमली घोटाना कहते हैं।

शक्ति का प्रयोग या खर्च होना आंशिक मृत्यु है। यदि पशु नहीं रहेगा तो प्रयोग किसका होगा-

मृत्युः तत् अभवत् धाता शमिता उग्रः विशां पतिः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/९/६)

अथर्व सं (१०/९) शतौदना गौ के विषय में है। गौ यज्ञ या निर्माण स्वरूप है-(१) निर्माण स्थान (शरीर, वेदी), (२) गति या क्रिया (गम् = गति), (३) स्रोत तथा निर्मित पदार्थ। गौ पशु भी मूल यज्ञ कृषि का साधन है तथा उसका दुग्ध भोजन है। इसके बिना जीवन नहीं चल सकता है अतः गौ पशु तथा यज्ञ दोनों अवध्य हैं (यजुर्वेद प्रथ सूक्त में अघ्न्या)। १०० ओदन (पकाया चावल, भात) के कई अर्थ हैं-(१) १०० प्रकार की निर्माण सामग्री , (२) शरीर में हृदय से निकली १०० नाड़ियां (कठोपनिषद्, २/३/१६), (३) या लोकों के निर्माण के प्रत्येक स्तर पर आनन्द के १०० भाग में १ भाग का उपयोग जिससे मनुष्य लोक से आरम्भ कर उच्च लोकों में आनन्द १००-१०० गुणा बढ़ता जाता है (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/८)

हिरण्य ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥७॥

घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति। पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीः दिवं प्रेहि शतौदने॥११॥ (अथर्व, १०/९)

कुछ वनस्पति शान्त करती हैं, उनको भी शमिता कहा है-

वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन। (ऋक्, १०/११/८, अथर्व, ५/१२/१२, वाज. यजु, २९/३५, मैत्रायणी सं, ४/१३/३, काण्व सं, १६/२०, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/३/४) = गार्हपत्य अग्नि (वनस्पतिः) दक्षिणाग्नि (शमिता) और आहवनीय अग्नि (देवः अग्निः) मिष्ट और घृत के साथ (मधुना घृतेन) हवि का आस्वादन करावे (हव्यं स्वदन्तु)।

शान्तिपूर्वक २ हाथों से निर्माण करना भी शमिता है-

सोमस्य या शमितरा सुहस्ता (ऋक्, ५/४३/४)

निर्माण के क्रम अश्वत्थ हैं (ऊर्ध्व मूल अश्वत्थ-गीता, १५/१), शमी वृक्ष से भी शान्ति मिलती है, अतः शमी नाम है। पत्नी में दोनों गुण होते हैं अतः कहा है कि शमी और अश्वत्थ पर चढ़ो-शमीमश्वत्थमारूढ (अथर्व, ६/११/१)

व्यवसाय या यज्ञ भी शमी है जिससे कर्ता सूर्य जैसा तेजस्वी होता है-

विष्ट्वी शमी तरणित्वेन वाधतः (ऋक्, १/११०/४)

शमी से यज्ञ करने पर शान्ति होती है-

शमीभिर्यज्ञमाशत (ऋक्, १/२०/२)

इच्छाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया (ऋक्, १/८३/४, अथर्व, २०/२५/४)

यज्ञ के लिए बिना बाधा लगातार क्रिया चाहिये, जिसे अध्रिगु कहा है (निरुक्त, ५/११) = मन्त्र, अग्नि, इन्द्र आदि। बाधा  दूर करना शमिध्वम् है-

अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। (मैत्रायणी सं, ४/१३/४, काण्व सं, १६/२१, ऐतरेय ब्रा, २/७/११, तैत्तिरीय ब्रा, ३/६/६/४)

बुद्धि के आवरण या कर्म बन्धन भी शमी द्वारा काटे जाते हैं (गीता, १५/२)-

धिया नहुषि अस्य बोधताम् (ऋक्, १०/९२/१२)-यहां बुद्धि प्रेरित करने वाला नहुष (तन्त्र का कुण्डलिनी?) कहा है।

जीवन यज्ञ पत्नी के साथ शान्ति पूर्वक (शंयु) रहने से होता है-

शंयुना पत्नी संयाजान् (वाज यजु, १९/२९)

अथा नः शं योरपो दधात (ऋक्, १०/१५/४, वाज यजु, १९/५५, मैत्रायणी सं, ४/१०/६, काण्व सं, २१/१४)

तच्छं योरावृणीमहे। गातुं यज्ञाय यज्ञपतये। (ऋक् खिल, १०/१९१/१५, तैत्तिरीय सं, २/६/१०/३, मैत्रायणी सं, ४/ १३/१०, शतपथ ब्रा, १/९/१/२७, तैत्तिरीय ब्रा, ३/५/११/१, तैत्तिरीय आरण्यक, १/९/७) = शंयु के निकट प्रार्थना करते हैं कि यज्ञ का देवों के प्रति गमन हो (गातु यज्ञाय) और यजमान का देवों के प्रति गमन हो (गातुं यज्ञ पतये)। यही गीता (३/१०) में कहा है कि देव (आन्तरिक और बाह्य प्राण) और मनुष्य यज्ञ द्वारा परस्पर की उन्नति करते हैं।

शंयु को बृहस्पति का पुत्र कहा है, अर्थात् बुद्धि के अभ्यास से शान्ति होती है।

३. यज्ञ, पशु, मेध-

(१) ब्रह्म, कर्म, यज्ञ-(गीता, ८/१-४)-ब्रह्म सब कुछ है।

जो गति है, वह कर्म है।

चक्रीय कर्म में आवश्यक उत्पादन यज्ञ है।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविध्यष्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ (गीता ३/१०)

एवं प्रवर्तितं चक्रं ... (गीता ३/१६)

यज्ञ चक्र (गीता, ३/१४-१६)

अक्षर-ब्रह्म-कर्म-यज्ञ-पर्जन्य-अन्न-भूत-(भूत के अक्षर रूप से पुनः आरम्भ।

(२) निर्माण, उत्पाद-निर्माण के लिए २ प्रकार का मिश्रण होता ह-

अग्नि या अन्नाद - भोक्ता

सोम = आकाश में बिखरा पदार्थ, भुक्त, अन्न।

पाक ४ प्रकार से है-१. अग्नि + अग्नि, २, अग्नि + सोम (क) पूरा सोम इन्धन कि तरह जलता है। (ख) अग्नि ही सोम की तरह फैल जाता है। ३. सोम + सोम-जैसे गैस + गैस, वायु + जल (मेघ), जल + ठोस। २ प्रकार का मिश्रण वेद में वराह (जल स्थल का पशु) या मेघ कहा गया है।

(३) पशुमेध-१. पशु-कोई भी दृश्य पदार्थ (पश्य = देखना)। प्रजापति द्वारा दृश्य जगत् में जो कुछ भी निर्माण हुआ वह पशु है। यह ५ प्रकार के हैं-१’ पुरुष (मनुष्य, जो पुर या किसी रचना में रहे), २. अश्व (घोड़ा, चलाने वाली ऊर्जा), ३. गौ (निर्माण क्रिया, गति, स्थान), ४. अवि (भेड़ा, अग्र गति), ५. अज (बकरा, अजन्मा, सनातन निर्माण चक्र)।

(अग्निः) एतान् पञ्च पशून् अपश्यत्। पुरुषं अश्वं गां, अविं, अजं-यद् अपश्यत्, तस्मात् एते पशवः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/२/१/२) 

देवा यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥१५॥

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥८॥ (पुरुष सूक्त)

 मेध-चेतन तत्त्व पुरुष २ प्रकार से निर्माण करता है-

२. मेध (विचार, योजना) यह क्रिया करने की शक्ति मेधा = बुद्धि है।

मेधृ मेधा-हिंसनयोः संगमे च (पाणिनीय धातु पाठ, १/६११)-कई विचारों को आत्मसात् (हिंसा) कर योजना (योग, संगम) होती है।

३. तप-कर्म, श्रम।

यत् सप्तान्नानि मेधया तपसा अजनयत् पिता। इति मेधया हि तपसा अजनयत् पिता। (शतपथ ब्राह्मण, १४/४/३/१, बृहदारण्यक उपनिषद्, १/५/१) 

यहां निर्माण करने वाला चेतन तत्त्व पुरुष या पिता है। निर्माण का स्थान माता है (मा माने, माप करना, माता)।

यो नः पिता यो जनिता विधाता। (ऋक्, १०/८२/३, वाज. यजु, १७/२७, काण्व सं, १८/१, तैत्तिरीय सं, ४/६/२/१)

निर्माण के लिये प्रयुक्त बुद्धि मेधा है, उसके लिए किसी वस्तु का प्रयोग मेध है। जिन वस्तुओं का प्रयोग निर्माण के लिए हो सकता है, वे मेध्य या ग्राम्य पशु हैं। जो उपलब्ध या उपयोगी नहीं हैं वे आरण्य पशु हैं।

विश्वरूपं वै पशूनां रूपम् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ५/४/६) 

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥६॥ (पुरुष सूक्त)

सप्त ग्राम्याः पशवः सप्तारण्याः (शतपथ ब्राह्मण, ३/८/४/१६, ९/५/२/८)

अस्मै वै लोकाय ग्राम्याः पशवः आलभ्यन्ते। अमुष्मा आरण्याः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/३/१)

४. अन्न, मद्य, मांस-

(१) जो प्राणियों द्वारा खाया जाय वह अन्न है (अद् भोजने)-

अद्यते अत्ति च भूतानि। तस्मात् अन्नं तदुच्यते। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/२)

अद्भ्यो वा अन्नं जायते (तैत्तिरीय आरण्यक, ८/२) = जल (या उसके जैसे फैले पदार्थ) से अन्न होता है।

अन्न पशु है (केवल देखता है, कर नहीं शकता)-अन्नमु वै पशवः (जैमिनीय उपनिषद्, ३/१४१)

(२). मद-पदार्थों का सत्त्व (सत्) अन्न है। यह आनन्द देता है। 

रसो वै मदः (जैमिनीय उपनिषद्, १/२१५, २१६, ३/२८, १५९, २२२, २९५)

दृश्य रूप ऋक् है, उसका प्रभाव साम या रस है-

यो वा ऋचि मदो यः सामन् रसो वै सः (माध्य. शतपथ, ४/३/२५)

जो भी स्वादिष्ट है तथा ऊर्जा देता है वह मद है-

मदन्तीभिः प्रोक्षति। तेज एवास्मिन् दधाति। (तैत्तिरीय आरण्यक, ५/४/१)

मदिन्तम इति स्वादिष्ट इत्येवैतदाह। (माध्य. शतपथ, ३/८/३/२५)

(३) मांस-उत्तम अन्न जो आकाश की तरह फैला विराट् (पृथ्वी पर उत्पन्न) है-

नभो मांसानि (तैत्तिरीय सं. ७/५/२५/१) मांसानि विराट् (छन्दः) जैमिनीय उपनिषद् (२/५८)

एतदु ह वै परममन्नाद्यं यन्मांसम् (माध्य. शतपथ, ११/७/१/३)

(४) मद्य, मांस, काम का निषेध-न मांसं समश्नीयात्। न स्त्रियं उपेयात्। यन्मांसं अश्नीयात्, यत् स्त्रियं उपेयात्, निर्वीर्यः स्यात्। न एनं अग्निं उपनमेत्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/१/९/७-८)

शरीर या फल दोनों का कोमल भाग मांस है। पशु शरीर के कोमल भाग को मांस इसलिए कहते हैं कि यह कहता है कि मैं उसे (सः) खाऊंगा, जो मुझे (मां) खाता है-

मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम्। 

एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनु स्मृति, ५/५५)

बकरे का मांस अधिक खाने वाले प्रायः उसके जैसी दाढ़ी भी रखते हैं।

मद्य, मांस, मैथुन मनुष्य की प्रवृत्ति है। उसे पूरी तरह बन्द नहीं किया जा सकता है। किन्तु कल्याण तथा उन्नति के लिए उसे सीमित और नियन्त्रित करना चाहिए।

न मांस भक्षणे दोषः न मद्ये न च मैथुने। 

प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥ (मनुस्मृति, ५/५६)

मनु स्मृति (५/३९-४१) के अनुसार केवल यज्ञ के लिए पशु बलि दी जा सकती है। यहां यज्ञ का अर्थ उपयोगी निर्माण है, अनावश्यक बलि नहीं होती है। बलि का अर्थ हत्या नहीं, उसकी  ऊर्जा या श्राम् का उपयोग है। मरने पर बेकार हो जायेगा।

(५) बाइबिल, कुरान में निषेध-

Genesis-(1/29) And God said, Behold, I have given you every herb bearing seed, which [is] upon the face of all the earth, and every tree, in the which [is] the fruit of a tree yielding seed; to you it shall be for meat.

Koran (2/61) And when you said, Musa , we will no longer confine ourselves to a single food: So, pray for us to your Lord that He may bring forth for us of what the earth grows — of its vegetable, its cucumbers, its wheat, its lentils and its onions. He said, do you want to take what is inferior in exchange for what is better? 

Koran (2/174) also prohibits eating of-Khinjar = which is seen. But it is taken only as swine.

एक प्रकार से यहां वही कहा है जो वेद या स्मृति में लिखा है। बाइबिल (जेनेसिस, १/२९) या कुरान (२/६१) में कहा है कि पृथ्वी से जो निकले वही खाना चाहिये। इसका अर्थ है कि कृषि उत्पाद ही खाना चाहिये। जैन लोग इसका विशेष अर्थ करते हैं कि केवल सतह से ऊपर का अन्न खाना चाहिए, आलू आदि नीचे की जड़ नहीं। जड़ से पुनः उत्पत्ति होती है, अतः उत्पादन स्रोत नहीं बन्द करना है, या उसके साथ सूक्ष्म जीव रहते हैं जिनकी हिंसा नहीं करनी है। अपने लोभ के कारण बाइबिल, कुरान में इसी का विपरीत अर्थ किया जाता है कि पृथ्वी के ऊपर जो कुछ है वह खाया जा सकता है। मनुस्मृति में पूर्ण निषेध मना किया है, क्योंकि सभी मानते नहीं है। कुरान में पूर्ण निषेध के कारण सदा मांस मैथुन की योजना बनाते रहते हैं।  

६. मेध यज्ञ-

(१) अश्वमेध- किसी जीव से अश्रु की तरह पिण्ड से तेज निकलता है, अतः उस तेज को अश्रु या परोक्ष में अश्व कहते हैं। जैसे पशु अश्व गाड़ी खींचता है, उसी प्रकार किसी भी कार्य के लिये ऊर्जा को अश्व कहते हैं। इंजन की शक्ति की माप भी अश्वशक्ति कहते हैं।

प्रजापतेरक्ष्यश्वयत्। तत्पराततत्ततोऽश्वः समभवद्, यदश्वयत् तत् अश्वस्य अश्वत्वम्। (शतपथ ब्राह्मण, १३/३/१/१)

वारुणो वा अश्वः। (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/२/१८) सौर्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९) अश्वो मनुष्यान् (अवहत्)- (शतपथ ब्राह्मण, १०/६/४/१)

प्राचीन साहित्य में कई रथों में हजारों अश्व लगाने का वर्णन है, जो भौतिक रूप में किसी गाड़ी में लगाना असम्भव है। ऋक् (८/४६/२९) में ६०,००० अश्वों के रथ का वर्णन है। महाभारत, वन पर्व (४२/२-७) में इन्द्र के रथ में १०,००० अश्व का उल्लेख है। महाभारत, आदि पर्व (२२४/१०-१५) के अनुसार अर्जुन के दिव्य रथ में दिव्य गान्धर्व अश्व थे जिनसे तेज प्रकाश निकलता था। महाभारत, द्रोण पर्व (१७५/१३) के अनुसार घटोत्कच के रथ में सैकड़ों घोड़े थे तथा वह आकाश में चल सकता था।

आकाश में ऊर्जा का स्रोत सूर्य ही अश्व है। सूर्य का स्रोत वरुण (आकाशगंगा का विरल अप्) भी अश्व कहा है।

पृथ्वी पर वायु अश्व है जो मेघ को चलाता है, तूफान लाता है या समुद्र की पाल-नौका को चलने की शक्ति देता है। पूर्व एशिया के जापान-कोरिया को भद्राश्व कहते थे (भारत से ९० अंश पूर्व), क्योंकि वहां समुद्री वायु की गति कम होती है (आधुनिक भूगोल में-horse latitude)

किसी देश में परिवहन और सञ्चार अश्व है। राजा का कर्तव्य है इनकी बाधा दूर करना, जिसे अश्वमेध कहते हैं। नाटकीय रूप से घोड़ा पूरे देश में घूमता रहता है, जिसके पीछे राजा सेना ले कर चलते हैं। बिना खाये पिये घोड़ा नहीं घूम सकता है, न उसको पता है कि अगले देश में जाने का मार्ग क्या है। उसके पीछे राजा भी सेना ले कर नहीं चल सकता, लाखों की सेना एक साथ नहीं चल सकती है। उनको रोकने के लिए अन्य देश का राजा चेक गेट पर नहीं बैठा रहेगा।

मनुष्य शरीर में नाड़ी तथा नस में प्राण का सञ्चार अश्व है। इसको पुनः सशक्त करना अश्वमेध है जिसे वाजीकरण (वाजि = अश्व) या काया-कल्प भी कहते हैं। दशरथ की पुत्र प्राप्ति यज्ञ को भी रामायण में अश्व (हय) मेध कहा है। दशरथ और उनकी रानियों की पुत्र जन्म देने की आयु बीत चुकी थी। पुत्र जन्म के लिए उनमें प्राण का सञ्चार आवश्यक था। यहां घोड़ा छोड़ने का अर्थ है प्राण प्रवाह मुक्त करना।

वीर्यं वा अश्वः (शतपथ ब्राह्मण २/१/४/२३) 

प्राणापानौ वा एतौ देवानाम्। यदर्काश्वमेधौ। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/९/२१/३) 

सुतार्थी वाजिमेधेन किमर्थं न यजाम्यहम् (रामायण, बालकाण्ड, ८/२)

तदर्थं हयमेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम (बालकाण्ड, ८/८)

(२) नरमेध-ब्रह्म पुराण, गौतमी माहात्म्य, अध्याय ३४ में सूर्य वंश के राजा हरिश्चन्द्र (प्रायः ७,३०० ईपू) की कथा है जिनको वरुण ने ऐसे पुत्र होने का वरदान दिया था जिसके कर्म और गुणों की ख्याति तीनों लोकों में फैलेगी। जैसे ही उनके पुत्र रोहित का जन्म हुआ, वरुण ने उसकी बलि की मांग की। हरिश्चन्द्र उसे कई बार टालते गये-दांत नहीं निकला है, यज्ञोपवीत नहीं हुआ या शिक्षा नहीं हुई, आदि। वरुण ने क्रुद्ध हो कर उनको जलोदर होने का शाप दिया। तब रोहित भाग गया और एक व्यक्ति शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लाया। किन्तु वरुण उनकी पूजा से प्रसन्न हो गये और कहा कि बलि की आवश्यकता नहीं है।

यही कथा भागवत पुराण (९/७), ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय ३१, ऋक् सूक्त (१/२४) में है जिसमें शुनःशेप के मन्त्र हैं।

इसका एक अर्थ है कि मिथ्या आचरण से अप्वा (जलोदर-Ascites) होता है (अथर्व, ३/२/५, ऋक्, १०/१०३/१२)। इसकी ओषधि रोहित (Tecomella undulata) नाम की वनस्पति है (चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, १३/४५-८४)। किन्तु मुख्य अर्थ है कि यदि रोहित को मार कर बलि दी जाती, तो वरुण के वरदान का कोई अर्थ नहीं था कि पुत्र तीनों लोकों में विख्यात होगा। यहां बलि का अर्थ है अपनी पूरी शक्ति शिक्षा तथा देश की उन्नति में लगा देना।

इसी प्रकार अब्राहम की कथा बाइबिल और कुरान में है। अब्राहम ईराक के उर नगर में रहते थे। उनको भी गुणी पुत्र होने का वरदान मिला था। पर जन्म होते ही पुत्र इस्माइल की बलि मांगने लगे। मार कर बलि देने पर वह गुणी कैसे होता? अपने या पुत्र के बदले मुस्लिम लोग भेड़ (अरब में) या बकरे की बलि देते हैं। शुनःशेप सूक्त (ऋक्, १/२४) में भी कहा है कि राजा वरुण ने उरु नगर बनाया था। ईराक में इसके अवशेष प्रायः ८,००० वर्ष पुराने अनुमानित हैं। 

उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)। 

अतः नरमेध का अर्थ है किसी उद्देश्य या देश के लिए जीवन लगाना। हत्या से कोई लाभ नहीं होना है। इसके लिए माता-पिता भी सन्तान को शान्त कर कर्मठ होने का आशीर्वाद देते हैं, जिसे शमिता कहते हैं।

दैव्याः शमितार उत मनुष्या आरभध्वम्। उपनयत् मेध्या दुरः। अन्वेनं माता मनयताम्। अनुं पिता। ... उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात्। ... अध्रिगो शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो। अध्रिगुश्चापापश्च उभौ शमितारौ॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/६/६/४)

(३) गोमेध-एक अर्थ में सभी यज्ञ गो हैं। इसके मेध का अर्थ है, इसके उत्पाद का उपभोग। शतोदना गौ के मेध का आध्यात्मिक अर्थ है हृदय से निकली १०० नाड़ियों का मार्ग छोड़ कर १०१वी नाड़ी से जा कर मोक्ष प्राप्त करना। 

शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। 

तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति, विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥ (कठोपनिषद्, २/३/१६)

हिरण्यं ज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्। यो ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः॥ (अथर्व, १०/९/७)

आधिभौतिक रूप में गोमेध का अर्थ है गो रूपी पृथ्वी (स्थल, जल, वायु और जीव मण्डल इसके ४ स्तन हैं) या उसके अंश अप्ने देश का पालन करना।

अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)

इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)

इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/२/१७) 

धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)

(४) सर्वमेध यज्ञ-सभी यज्ञों में समन्वय का भाव सर्वहुत या गीता का ब्रह्म यज्ञ है। ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। अतः यज्ञ स्थान, हवि, हवन, उत्पाद, कर्ता आदि सभी कुछ ब्रह्म है। ब्रह्म का ही ब्रह्म में हवन हो रहा है। कर्ता, कर्म आदि सभी एक हैं, अतः इसे सुकृत कहा है। बाइबिल में इसका अनुवाद है कि हर सृष्टि के बाद भगवान् ने कहा कि बहुत अच्छा बना है। उनको किसी से अपने काम का प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं थी।

असत् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सत् अजायत। तदा आत्मानं स्वयं अकुरुत। तस्मात् तत् सुकृतं उच्यत, इति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/१) 

तत् सर्वेषु भूतेषु आत्मानं हुत्वा, भूतानि चात्मनि, सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यम् पर्यैत्, तथैव एतद् यजमानः सर्वमेधे सर्वान् मेधान् हुत्वा सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यं पर्येति (शतपथ ब्राह्मण, १३/७/१/१)

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतं।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना। (गीता, ४/२४)

Friday, May 6, 2022

शारिरीक तंत्र और कुंडलिनी

 💥  #शारीरिक_तंत्र_विज्ञान 🚩🚩


🔸हमारे शरीर में नौ द्वार हैं, दो आँख, दो कान, दो नाभि छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये आठवाँ गुद्दा द्वार और नौवाँ मूत्र द्वार । 


🔸सात द्वार देवताओं के ठहरने का स्थान है। इसपर रहने वाले समस्त  देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं।


🔸अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में; पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में; वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।


🔸चैतन्य आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीतिपूर्वक रहते हैं सबके काम बंटे हुये हैं सब अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं। 


🔸नौ द्वार अर्थात नौ चक्र प्रकृति के है। तीन द्वार अधोमुखी तथा छह ऊर्ध्वमुखी हैं । भौतिक मृत्यु के समय हमारे कर्मों के फल के अनुसार ,किसी एक द्वार से हमारे प्राण निकलते हैं। 


🔸दशम द्वार जिसे शून्य चक्र भी कहते हैं; परमात्मा का स्थान है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं ।


🔸मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी द्वार से होकर निकले और ऊर्ध्वगामी गति प्राप्त करे।


🔸योगशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्ता का मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है।


🔸हमारे शरीर मे कुल 114 चक्र में से 7 मुख्य चक्र, 21 मध्यम चक्र और 86 सूक्ष्म चक्र है। इनमें से दो चक्र हमारे  शरीर से बाहर रहते हैं। 


🔸मुख्य 7 चक्र में से एक सहस्रार चक्र शरीर से बाहर होता हैं।मध्यम 21चक्र आंखें, नाक, कान,कन्धा, हाथ,

घुटना ,पैर आदि में होते है। 


🔸शरीर मे 108 चक्र कार्यशील रहते हैं बाकी चार निष्क्रिय रहते है कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो इन चार में शक्ति का संचार हो उठता है। 


आठ चक्र अष्ट प्रकृति के प्रतीक है जैसे ;-


1  पृथ्वी


2   जल 


3   अग्नि


4    वायु 


5    आकाश 


6      मन


7     बुद्धि


 8  अहंकार का प्रतीक है।


🔸आज्ञाचक्र में ऊर्जा के तीन स्तर है ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना या त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश की ऊर्जा। 


🔸पहला तीन गुणों का प्रतीक है दूसरा उच्चतर शक्ति का प्रतीक है और तीसरी जो तीनो गुणों से परे जाती है। उन्हें विभिन्न नाम से जाना जाता है।  


🔸मेरुदण्ड पोला है । उससे अस्थि खण्डों के बीच में होता हुआ एक छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है । इसी के भीतर अदृश्य रूप से सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान है ।


🔸ओर इसी में पाँच मुख्य चक्र हैं परन्तु छठे आज्ञा चक्र का स्थान मेरुदण्ड में नहीं आता। यह दोनों भवों के बीच होता है। यह मन का प्रतीक माना जाता। 


🔸बुद्धि का प्रतीक ललाट चक्र माथे के बीच स्थित होता है। ललाट पूरे माथे को कहा जाता ओर यह पीनियल ग्रन्थि और तन्त्रिका तन्त्र को नियन्त्रित करता है। 


🔸अहंकार का प्रतीक रोहिणी चक्र बिंदु चक्र के भीतर छुपा होता नवम द्वार जहाँ पर शून्य चक्र तक पहुंचने का सरलतम मार्ग हैं ।


🔸बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ। 


🔸उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं असाधारण कह सकते ।


🔸संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है ओर इसे सृष्टि का मूल माना गया है।


🔸तंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है।शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है।


🔸जहाँ से सभी पदार्थों का प्रकटीकरण और  जिसमें सभी का लय हो जाता हैआकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि सभी उसी की निष्पत्तियाँ है।


🔸ललाट चक्र और बिन्दु चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट नहीं होती है बल्कि आज्ञाचक्र में ही छिपी रहती है । इसीलिए आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणी कहते हैं। 


🔸आठवा चक्र तक प्रकृतिलय ही हैं। नवम द्वार ,बिन्दु चक्र आत्मा  का स्थान हैं । इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव एवं शक्ति का नाम देते हैं।


🔸यह सृजन से पहले की अवस्था हैं,अर्थात ब्रह्मा की ऊर्जा। शक्ति से मिलकर शिव आत्माराम हो जाते हैं अर्थात इड़ा और पिंगला का मिलन और सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश।


🔸दो चक्र हमारे शरीर से बाहर रहते हैं। सहस्रार चक्र हैं,जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं,तथा दूसरा हैं ,निर्वाण चक्र।


🔸सहस्रार चक्र ,आत्मा का प्रतीक भौतिक शरीर से साढे 3 इंच ऊपर हजार पंखुड़ियों का कमल है ,और अद्वैत, निर्गुण,निराकार ब्रह्म: का आसन हैं । यह वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है।


🔸सहस्रार चक्र  6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है। ऊपर से देखने पर इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देती है।


🔸इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं। 


🔸इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं। जो असीम आनन्द का केन्द्र होता है। इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है।


🔸इस चक्र में अ से क्ष तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है। 


🔸यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण,स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है। यह आत्मा का उच्चतम स्थान है।


🔸सहस्रार का सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से सीधा नहीं है। पर फिर भी सूक्ष्म शरीर पाँच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ वाले सभी सातों चक्रों को श्रृंखला में बाँधे हुए है।


🔸सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह जुड़े हैं । 


🔸शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।


🔸वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं । इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं। उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों । 


🔸इसलिए हजारों का उद्बोधक 'सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है।


🔸यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं ।


🔸सहस्रार चक्र के भीतर विद्यमान है निर्वाण चक्र जिसके भीतर निर्गुण, निराकार ब्रह्म: विराजमान है। 


🔸निर्वाण का सही अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है।


🔸सैद्धांतिक तौर पर निर्वाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो "न आ रहा है भाव, और न जा रहा है विभाव और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, 


🔸सामान्य मृत्यु में केवल हमारा स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। शेष छः शरीर बचे रहते हैं जिनसे जीवात्मा अपनी वासनानुसार अगला जन्म प्राप्त करती है ।


🔸किंतु महामृत्यु में सभी छः शरीर नष्ट हो जाते हैं फ़िर पुनरागमन संभव नहीं होता। इसे ही मोक्ष,निर्वाण,कैवल्य कहा जाता है।


🔸मृत्यु के समय तक जिसका सहत्रार खुल गया फिर मोक्ष मिल जाती है | स्थिरता, और शांति भी इसके अर्थ हैं। निर्वाण की प्राप्ति की तुलना अविद्या के अंत से की जाती है। 


🔸जिससे उस मन:स्थिति की चेतना जागृत होती है जो जीवन चक्र से मुक्ति दिलाती है। एक स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति निर्वाण को मानसिक चेतना की तरह अनुभव करता है। 


🔸संसार मूलत: तृष्णा और अज्ञानता की उपज है। व्यक्ति बिना मृत्यु के भी निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है। ओर जब मृत्यु होती है, तो उस मृत्यु को मोक्ष कहते हैं।


🔸क्योंकि वह जीवन-मरण से छूट जाता है और उसका फिर से जन्म नहीं होता । पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था।


🔸भगवान् ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भीक्षा माँगी । बलि तैयार हो गये । तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया।


🔸हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है । चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान्-अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई लोक-लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है ।


🔸और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं!



Sunday, April 24, 2022

पंचक शुभाशुभ

 पंचक में किए जा सकते हैं शुभ कार्य..


 भारतीय ज्योतिष में पंचक को अशुभ माना गया है। हालांकि कुछ ज्योतिष मानते हैं कि पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो भी  किये जा सकते हैं।


 पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं।


 धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र कुछ विशेष काम वर्जित किये गए हैं।


 1. रोग पंचक.....


 रविवार को शुरू होने वाले इस पंचक के प्रभाव से पांच दिन शारीरिक और मानसिक परेशानियों रह सकती हैं। इस दौरान कोई शुभ काम नहीं करना चाहिए,  हर तरह के मांगलिक कार्यों में ये पंचक अशुभ माना गया है।


2.राज पंचक....


 सोमवार को शुरू होने वाला पंचक राज पंचक कहलाता है। ये पंचक शुभ माना जाता है। इसके प्रभाव से इन पांच दिनों में सरकारी कामों में सफलता मिलती है। राज पंचक में संपत्ति से जुड़े काम करना भी शुभ रहता है।


 3.अग्नि पंचक.....


 मंगलवार को शुरू होने वाला पंचक अग्नि पंचक कहलाता है। इन पांच दिनों में कोर्ट कचहरी और विवाद आदि के फैसले, अपना हक प्राप्त करने वाले काम किए जा सकते हैं। 


इस पंचक में अग्नि का भय होता है। इस पंचक में किसी भी तरह का निर्माण कार्य, औजार और मशीनरी कामों की शुरुआत करना अशुभ माना गया है।


4. मृत्यु पंचक....


शनिवार को शुरू होने वाला पंचक मृत्यु पंचक कहलाता है। नाम से ही पता चलता है कि ये पंचक मृत्यु के बराबर परेशानी देने वाला होता है। इसके प्रभाव से विवाद, चोट, दुर्घटना आदि होने का खतरा रहता है।


5. चोर पंचक....


 शुक्रवार को शुरू होने वाला पंचक चोर पंचक कहलाता है। विद्वानों के अनुसार, इस पंचक में यात्रा करने की मनाही है।


 इस पंचक में लेन-देन, व्यापार और किसी भी तरह के सौदे भी नहीं करने चाहिए।


 बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है।


 इन दो दिनों में शुरू होने वाले दिनों में पंचक के पांच कामों के अलावा किसी भी तरह के शुभ काम किए जा सकते हैं।


 पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से पहले किसी योग्य पंडित की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।


शव के साथ पांच पुतले आटे या कुश (एक प्रकार की घास) से बनाकर अर्थी पर रखना चाहिए और इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार करना चाहिए, तो पंचक दोष समाप्त हो जाता है। ऐसा गरुड़ पुराण में भी लिखा है।


ये शुभ कार्य कर सकते हैं


1. घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र चल संज्ञक माने जाते हैं। इनमें चलित काम करना शुभ माना गया है जैसे-यात्रा करना, वाहन खरीदना, मशीनरी संबंधित काम शुरू करना शुभ माना गया है।


2. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र स्थिर संज्ञक नक्षत्र माना गया है। इसमें स्थिरता वाले काम करने चाहिए जैसे- बीज बोना, गृह प्रवेश, शांति पूजन और जमीन से जुड़े स्थिर कार्य करने में सफलता मिलती है।


3. रेवती नक्षत्र मैत्री संज्ञक होने से इस नक्षत्र में कपड़े, व्यापार से संबंधित सौदे करना, किसी विवाद का निपटारा करना, गहने खरीदना आदि काम शुभ माने गए हैं।

Saturday, April 23, 2022

योग शास्त्र में छः अध्व

 योग शास्त्र में छः अध्व माने गये है। 


जो सूक्ष्म से स्थूल की ओर जाकर जगत का रूप लेते है। छः अध्व है। 


१ भुवन

२ तत्व

३ कला

४ मन्त्र

५ पद 

६ वर्ण


इनसे पद व मन्त्र बनते है।  इसी प्रकार कला का सूक्ष्म है। तथा इसी से तत्व व भुवन की रचना होती है। 


जो स्थूल रूप है। इस प्रकार यह सारा जगत सूक्ष्म और पररूप में विद्यमान है। योगी इस पर चलकर सूक्ष्म का चिंतन करे तथा सूक्ष्म से भी पर स्वरूप का चिंतन करता हुवा उसी में अपने को बीलिन कर दे।


यही सारा विश्व उस विश्व और विश्वात्मक उस परब्रह्म की क्रिया शक्ति का विस्तार है। यह शब्द ब्रह्म ही छः अध्व रूप होता है।


अतः पर ही सूक्ष्म में तथा सूक्ष्म ही स्थूल में विद्यमान रहता है। ब्याप्य ब्यापक भाव से ब्यापक वाप्य रहता है।


जिस प्रकार वर्ण से पद बनते है। उसी प्रकार कला से ही तत्व व भुवन बनते है। वे सब सूक्ष्म से ही स्थूल रूप लेते है। जो अभिन्न रूप से स्थूल में विद्यमान रहते है। 


इनको भिन्न भिन्न नही माना जा सकता जिस  प्रकार घट में मिट्टी रहती है। इसी प्रकार बाद में आविभ्रृत होने वाला पदार्थ अपने पूर्णवर्ती कारण तत्व में विद्यमान रहता ही है। 


जैसे बीज में पूरा वृक्ष सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता ही है। अन्यथा वह प्रकट कैसे हो सकता है? 


इस प्रकार विश्व के सभी पदार्थ अपने कारणतत्व मे विद्यमान रहते है। अतः सभी पदार्थ एक दूसरे से सम्बंध है। अतः ये सब सर्वात्मक है। और ये सभी उस परमेस्वर की स्वातन्त्र्य का ही विलाश है।


योगी को स्थूल से सूक्ष्म में तथा सूक्ष्म से पर भाव मे अर्थात चिन्मय के वोध में अपने मन का विलयन कर देना चाहये इसी प्रक्रिया से साधक का चित्त शिवशक्ति में विलीन हो जाता है। इस सारी शक्ति का अधिपति महेष्वर है। जो पराशक्ति के अधिष्ठाता है।


ओ३म

Tuesday, April 19, 2022

रामायण के भौगोलिक एवं ऐतिहासिक स्थान

 #रामायण_में_वर्णित_भौगोलिक मुख्य_स्थान ::


1.#तमसानदी : अयोध्या से 20 किमी दूर है तमसा नदी। यहां पर उन्होंने नाव से नदी पार की।

 

2.#श्रृंगवेरपुरतीर्थ : प्रयागराज से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। श्रृंगवेरपुर को वर्तमान में सिंगरौर कहा जाता है।

 

3.#कुरईगांव : सिंगरौर में गंगा पार कर श्रीराम कुरई में रुके थे।

 

4.#प्रयाग: कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। कुछ महीने पहले तक प्रयाग को इलाहाबाद कहा जाता था ।

 

5.#चित्रकूट : प्रभु श्रीराम ने प्रयाग संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

 

6.#सतना: चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। हालांकि अनुसूइया पति महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे, लेकिन सतना में 'रामवन' नामक स्थान पर भी श्रीराम रुके थे, जहां ऋषि अत्रि का एक ओर आश्रम था।

 

7.#दंडकारण्य: चित्रकूट से निकलकर श्रीराम घने वन में पहुंच गए। असल में यहीं था उनका वनवास। इस वन को उस काल में दंडकारण्य कहा जाता था। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर दंडकाराण्य था। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के अधिकतर हिस्से शामिल हैं। दरअसल, उड़ीसा की महानदी के इस पास से गोदावरी तक दंडकारण्य का क्षेत्र फैला हुआ था। इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

 

8.#पंचवटीनासिक : दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। यह आश्रम नासिक के पंचवटी क्षे‍त्र में है जो गोदावरी नदी के किनारे बसा है। यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

 

9.#सर्वतीर्थ: नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया था जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में 'सर्वतीर्थ' नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है। जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

 

10.#पर्णशाला: पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को 'पनशाला' या 'पनसाला' भी कहते हैं। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था। इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

 

11.#तुंगभद्रा: सर्वतीर्थ और पर्णशाला के बाद श्रीराम-लक्ष्मण सीता की खोज में तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

 

12.#शबरी_का_आश्रम : तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा। 'पम्पा' तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। पौराणिक ग्रंथ 'रामायण' में हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है। केरल का प्रसिद्ध 'सबरिमलय मंदिर' तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

 

13.#ऋष्यमूक_पर्वत : मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। पास की पहाड़ी को 'मतंग पर्वत' माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था जो हनुमानजी के गुरु थे।

 

14.#कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने वानर सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है। यहां श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला और श्रीराम ने अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित कर विचार विमर्ष किया। लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

 

15..#रामेश्‍वरम: रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

 

16.#धनुषकोडी : वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।

 

इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

 

17.'#नुवारा_एलिया' पर्वत श्रृंखला :

 वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। 'नुवारा एलिया' पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

 

श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए है।


#रामायण.।।

Tuesday, April 12, 2022

भगवान महावीर के अपराध उन्मूलक एवं विश्वशांति के अभिकरण सिद्धांत तथा भारतीय दंड संहिता। डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य

 महावीरोत्सव 2022 के उपलक्ष्य में                                  *भगवान महावीर के अपराध उन्मूलक एवं विश्वशांति के अभिकरण सिद्धांत तथा भारतीय दंड संहिता*    📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📓📓📓📔📓          *डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य*  

 अध्यक्ष, संस्कृत विभाग,

एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह मध्यप्रदेश ©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©©  


          भारत को संस्कारित एवं सुव्यवस्थित करने में मूलत: वैदिक संस्कृति एवं श्रमण संस्कृति का अवदान अविस्मरणीय है । दोनों संस्कृतियों ने एक दूसरे को सुरक्षित रखा जैन संस्कृति के निवृत्ति परक सिद्धांतों ने वैदिक संस्कृति को तथा वैदिक संस्कृति के भक्ति परक  गुणानुवाद प्रवृत्ति ने जैन संस्कृति को प्रभावित किया। जैन धर्म शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित है, जिनका प्रथम प्रतिपादन एवं विवेचन भगवान ऋषभदेव ने किया था यह सभी सिद्धांत 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर तक प्रवर्तमान रहे । भगवान महावीर श्रमण संस्कृति के प्रमुख उन्नायक थे । आपने जिन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था, वे किसी वर्ग विशेष से संबंद्ध ना होकर सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक होने से ,वे भगवान महावीर के काल की सामाजिक धार्मिक आर्थिक  राजनैतिक परिस्थितियों में जितने उपयोगी थे,वे  आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की भावना से ओतप्रोत थे । जिसके कारण जन्म सामान्य का  सुदृढ़ समाज, निरपराधी, न्याय अध्यात्म सहिष्णुता अहिंसा आत्म कल्याण और विश्व शांति की ओर  मार्ग प्रशस्त हो सके ।इसीलिए उन्होंने पांच व्रतों की अवधारणा पर अधिक बल दिया

 *व्रत की अवधारणा* भगवान महावीर ने विश्व शांति एवं विश्व कल्याण और प्राणी मात्र के कल्याण की भावना से समाज की तत्कालीन परिस्थितियों,समाज में व्याप्त विषमताओं, अन्याय, अधिकार हनन आदि दूरवस्था को देख उन्होंने आध्यात्मिक क्रांति के द्वारा उन्हें दूर करने का निर्णय लिया और वे त्यागी तपस्वी और ज्ञानी बन कर इस कार्य में अग्रसर हुए उन्होंने लोक कल्याण के लिए -अहिंसा,सत्य,अचौर्य  और अपरिग्रहादि पांच व्रतोंकी अवधारणा को समाज के सामने अपने आचरण और उपदेशों के माध्यम से स्थापित किया जिससे समाज में व्याप्त बुराइयों पर नियंत्रण होना प्रारंभ हो गया जैन धर्म के अनुसार भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान पार्श्वनाथ के काल तक चातुर्याम धर्म प्रभावना में -अहिंसा सत्य,अस्तेय और अपरिग्रह को विशेष महत्व दिया जाता था ,तथा अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने पंच व्रतो और महाव्रतों की उद्भभावना करते हुए समग्र धर्म व्यवस्था को नवीन दिशा प्रदान की

 भगवान महावीर के द्वारा प्रतिपादित पंच महाव्रत एवं अणुव्रतरूप व्रतों को श्रमण और श्रावक के आध्यात्मिक जीवन का उत्कर्ष तथा मूल आधार कहा जाता है । इन  पंचव्रतों की परिभाषाओं, भावनाओं को उनके अतिचारों (दोषों)का अध्ययन करने से श्रमण और श्रावक स्वत: ही अपराध से मुक्त हो जाता है या जिनसे अपराध हुए हैं उन्हें स्वयं के अपराधों का बोध हो जाने से वह अपराध जन्य निराशा, हताशा, कुंठा,अस्थिरता आदि अनेक नकारात्मक मनोविकारों से मुक्त हो जाते हैं क्योंकि महावीर ने व्रतों को राग-द्वेष,शुभ-अशुभ रुप पापों की निवृत्ति का बुद्धि पूर्वक दृढ़ संकल्प कर जीवों पर अनुकंपा,दया,संयमधारण, सदाचरण ,मर्यादा पालन कर  आत्मशुद्धि पूर्वक करने का अमोघ उपाय माना है।  जो विश्व कल्याण एवं विश्व शांति के लिए आवश्यक है ।

 हिंसा झूठ चोरी कुशील और परिग्रह को जैन साधना पद्धति में पाप की संज्ञा से संज्ञापित किया गया है । श्रमण इनका  पूर्णतया त्यागी होता है सो महाव्रती कहा जाता है तथा श्रावक (गृहस्थ) इनका आंशिक त्यागी होकर पूर्णता त्यागी बनने के लिए सतत प्रयत्नशील रहकर वहअहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की साधना में संलग्न रहता है । जैन आचार संहिता में वर्णित इन पांच पापों को संसार के समस्त अपराधों का जन्म स्थान कहा गया है और इनके कुफलों एवं दंड की चर्चा भी विस्तृत रूप से जैन आचार ग्रंथों में जैन आचार्यों एवं विद्वानों के द्वारा की गई है । इस लेख के माध्यम से मैं भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित अपराध निर्मूलक पांच सिद्धांतों को भारतीय दंड विधान से जोड़कर सुधी पाठकों के मध्य प्रस्तुत कर रहा हूं जो सामान्य श्रावकों  के विधिक ज्ञान में वृद्धि करने में सहायक होगा ।

*पांच पाप व्रत और भारतीय दंड विधान*  जैन दर्शन में हिंसा,  झूठ, चोरी, कुशील एवं परिग्रह को पांच पापों  की श्रेणी में रखा गया है ।  इन्हें जीव के इह लोक एवं परलोक पतन में कारण भी बताया गया है क्योंकि इन पांचों के आश्रय से जीव अनेकों अनेकों दोषों-अपराधों को जन्म देता है। भारतीय दंड संहिता में भी अपराधों में प्रमुख रूप से हिंसा, झूठ (असत्य)' चोरी 'कुशील (यौन अपराध) परिग्रह (संपत्ति,कर) आदि को प्रमुख अपराध माना है तथा इनके आश्रित अन्य दोषों को भी अपराध की श्रेणी में मान्यता ही नहीं दी है अपितु दंड का निर्धारण भी किया गया है । सभी अपराधों पर अलग-अलग धाराओं का निर्माण कानून निर्माताओं के द्वारा किया गया है भारतीय दंड संहिता के निर्माण के समय जैन धर्म का प्रभाव भारतीय दंड संहिता में स्पष्ट दिखाई देता है ।

 *हिंसा पाप*- प्रमत्त योगात प्राण व्यपरोपणं हिंसा प्रमाद अर्थात अयत्न,असावधानी के योग से  किसी जीव के प्राणों का घात- जिसमें उसके द्रव्य प्राण(शरीरिकरूप)भाव प्राण  (भावनात्मक विचारात्मक) का वियोग करना हिंसा है ।।       

       

  *अहिंसाणु व्रत की भावनाएं* -


वचन की प्रवृत्ति तथा मन की प्रवृत्ति को रोकना, जमीन को चार हाथ आगे देख कर चलना आदि भावनाएं एक अहिंसक की भावनाएं हैं । अतिचार या दोष  -वध, बन्धन,अंग छेदन,  अतिभार आरोपण और अन्न पान निरोध कराना  यह पांच अ अहिंसानुव्रत के अतिचार हैं दोष है और यह हिंसा को बढ़ावा देते हैं जिन्हें जैन दर्शन में दोष माना गया है उन्हें भारतीय दंड विधान में भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है                                *हिंसा से संबंधित धाराएं* -धारा 302 धारा 304 धारा 304(अ) धारा 96से 106 तथा घरेलू हिंसा धारा 294 धारा 342 धारा 323 धारा 325 धारा 370 धारा 376 श्रम कानून अधिनियम बाल अधिकार अधिनियम 498 ये  समस्त धारायें हिंसा से संबंधित हैं।                      भगवान महावीर की अहिंसा वैचारिक हिंसा को भी हिंसा मानती है । यदि कोई इस नियम का पालन करे तो कहीं भी हिंसा ना हो, जिससे अपराध प्रवृति रुक जाएगी क्योंकि अहिंसानुव्रत का पालक स्वतः ही उपरोक्त अपराधों से परे हो जाता है ।


*झूँठ पाप* *असदभिधानमनृतम।*     


असत का अभिधान करना असत्य है । प्रमाद आलस्य के योग से जीवों को दुखदायक मिथ्यारूप वचन  बोलने को असत्य कहते हैं । जिसके अंतर्गत यथार्थ को छोड़ यथार्थ को कथन करना, यथारूप बात ना कहना, कषायाविष्ट होकर क्रोध,मान, मायाचारी और लोभ के प्रभाव में आकर दुर्भावनापूर्ण वचनों के प्रयोग करने को  झूठ कहा जाता ।हित मित्र प्रिय वचनों का प्रयोग करना सत्य है और सत्य से समाज में प्रतिष्ठा स्थापित होती है तो असत्य से खण्डित होती है  सत्यव्रत की भावनाएं- एक सत्यभाषी,सत्य निष्ठ सत्यव्रती के लिए क्रोध लोभ भय हास्य का त्याग कर शास्त्र सम्मत वचनों के प्रयोग का संकल्पी होना अनिवार्य है ।                 

 *सत्यव्रत के अतिचार दोष-*

 मिथ्या उपदेश करना, गोपनीयता भंग करना, मिथ्या लेखन एवं कूट लेखन करना, धरोहरको  हड़पना, गबन करना, गुप्त बातों का सार्वजिनिक करना सत्यव्रती के लिए महान दोष का कारण है ।।                   


 भारतीय दंड संहिता में क्रोध, लोभ, भय, हास्य के प्राश्रय से अपमान के उद्देश्य अनावश्यक अनर्गल वार्तालाप छल कपट आदि को अपराध माना गया है । *असत्य से संबंधित कानूनी धाराएं* धारा 500, 417,419, 191, 177 ,203,110 से लेकर 120 तक ,120 ख, धारा 124 क, धारा 232-233-234- 235 धारा 255, 257,477 अ, धारा 208- 209 आदि समस्त धाराएं सत्यानुव्रत के अतिचारों  से संबंधित धाराएं हैं जिन्हें भारतीय दंड विधान में अपराध माना गया है और झूठ,फरेब, जालसाजी षड्यंत्र, संपत्ति हड़पना आदि के निराकरण हेतु प्रयोग किया जाता है भगवान महावीर  द्वारा उपदेशित सत्यानुव्रत का पालन करने वाले जन सामान्य के मन में इन अपराधों का स्थान ही नहीं रहता। वह सदा सत्य का सन्धाता रहता है ,असत्य का त्यागी  होता है । 


*चोरी पाप*-अदत्ता दानं स्तेयम 7/15 


 प्रमाद के योग से बिना दी हुई किसी वस्तु के ग्रहण करने को चोरी कहते हैं इसका त्याग करना अचौर्य व्रत कहलाता है । सामान्य शब्दों में कहें तो किसी की रखी हुई पड़ी हुई वस्तु को उसके स्वामी की आज्ञा के बिना ग्रहण करना चोरी है। चोरी की है यह सूक्ष्म  परिभाषा जैन दर्शन में ही प्राप्त होती है ।

 *अचौर्यव्रत की भावनाएं-*

 निर्जन स्थानों किराए की अथवा खाली मकान को स्वयं का ना मानना, स्वयं निवास करना एवं अन्य को करने देना, मानवीय आवश्यकताओं हेतु कदाचण ना करना, आनावश्यक अधिकार हेतु  सधर्मीयों  से विवाद ना करना ये अचौर्य व्रत की भावनाएं है। जिससे उनका व्रत दृढ़ होता है ।   *अचौर्य व्रत अतिचार* -चोरी करने की प्रेरणा एवं उपाय बताना, चुराए हुए माल को खरीदना ,शासन एवं शासक के विरुद्ध कार्य करना ,शासकीय करों की चोरी करना, नापतोल परिमाण में घटा बड़ी करना, समान दिखने वाली वस्तुओं में व्यापारिक लाभ हेतु मिलावट करना आदि यह चोरी को बढ़ावा देने वाले दोष हैं । अचौर्य व्रती को इनसे बचना चाहिए ।कानून की दृष्टि से ये अपराध है।


चोरी से संबंधित कानूनी धाराएं 


धारा 379, 380, 381, 392,414, 363, 363 क, धारा 411, 412, 413, 216, 153 ख, 171 ख, धारा 265, 266, 267, 246, 247, धारा 270 ,272 ,273, 274, 275, 260 और 249 यह सभी धाराएं चोरी से संबंधित धाराएं हैं ।जो अपराध निराकरण में सहायक होती हैं और अपराधी को दंडित करने में सक्षम है भगवान महावीर स्वामी के द्वारा उपदेशित अचौरव्रत का पालन करने से इन सभी धाराओं के दंड से बचा जा सकता है ।।   

     

  *कुशील पाप-* मैथुनमब्रह्म


 मैथुन को अब्रह्म कहा है तथा मैथुन का त्याग ब्रह्मचर्य है ।प्रत्येक जीव के आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चार  संज्ञाए होती हैं या यूं कहें यह चार आवश्यकताएं होती है जिनमें से मैथुन संज्ञा कुशील पाप  में मुख्य भूमिका निभाती है। असंयम ही इस पाप  में मुख्य कारण है जिसके कारण प्राणी का स्वयं की इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रह पाता है और वह कुशील पाप में प्रवृत्त हो जाता है। जैन धर्म एवं दर्शन में ब्रह्मचर्य व्रत का उपाय ही कुशील पाप से बचा सकने में सक्षम है।।                                      जीवन के विकास एवं सामाजिक उत्थान, धार्मिक, सांस्कृतिक,आध्यात्मिक एवं न्याय आदि अनेक दृष्टियों से इस व्रत का पालन श्रेष्ठ है। ब्रह्मचर्य व्रत को स्वदारसंतोष व्रत कहा जाता है जिसका अर्थ यह है कि स्वयं की पत्नी में संतुष्टि रखने का संकल्प करना और शेष समस्त स्त्री जाति चाहे वह मनुष्य तिर्यंच,देव जाति की जड़-चेतन स्त्रियां हो उनका मन वचन काया से उनके सेवन का त्याग करना यह व्रत मानसिक वाचनिक एवं शारीरिक रूप से व्रती को समस्त अपराधों से बचाता है दूर रखता है।।                                

  *ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएं* 

स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथाओं के पढ़ने सुनने का त्याग,स्त्रियों के मनोहर अंगों को देखने का त्याग, पूर्व में भोगे भोगों के स्मरण का त्याग कामोद्दीपक पदार्थों का त्याग और अपने शरीर को श्रृंगार करने का त्याग आदि भावनाएं ब्रह्मचर्य व्रत को दृढ़ करती हैं ।। 

           *ब्रह्मचर्य व्रत के  दोष - अतिचार-* 


पर विवाह करण ,स्त्रियों से संबंध एवं संपर्क में रहना, वेश्या स्त्रियों तथा देह व्यापार में संलिप्त स्त्री समूहों से संबंध एवं संपर्क में रहना ,अप्राकृतिक काम सेवन करना, विषय वासनाओं से संबंधित कार्यों को स्वयं करना एवं अन्य को प्रेरणा देना यथा- यौन शोषण, अश्लीलता, बाल यौन शोषण ,बाल दुर्व्यवहार, लिंग आधारित शोषण ,बलात्कार ,यौन उत्पीड़न से संबंधित यातनाएं ,स्त्री बंधन ,अपहरण,स्त्री दुष्प्रेरण आदि कार्य करना अपराध की श्रेणी में आते हैं ।।       

      

  *कुशील पाप से संबंधित कानूनी धाराएं* 


धारा 354 अ ब स  , धारा 375, 376, 378 धारा 292 293 धारा 498 ,493 ,494, 496 धारा 370 ,295 का धारा 366 का 372 ,373 बाल दुर्व्यवहार अधिनियम 2003, बाल यौन शोषण अधिनियम 2012, पास्को एक्ट 2012  ये सभी कुशील पाप से सम्बंधित धाराएं हैं । जिनके द्वारा अपराध पर नियंत्रण किया जाता है। पर महावीर भगवान के ब्रह्मचर्याणुव्रत के सिद्धांत का अनुपालन इन अपराधों से स्वत:सुरक्षित रखता है ।।     


 *परिग्रह पाप*                     

  *मूर्च्छा परिग्रह:* मूर्छा से तात्पर्य आसक्ति एवं ममत्व भाव से है, जिसे परिग्रह कहा गया है ।बाह्य धन-धान्य आदि तथा अंतरंग क्रोधादि कषायों ,इन्द्रिय विषयों में  ये मेरे हैं ऐसा भाव मूर्च्छा है और मूर्च्छा को परिग्रह कहते हैं । धन -संपत्ति की आसक्ति ,लोभ ही  पारिवारिक कलह ,आपसी मनमुटाव,अधिकार-"उत्तराधिकार की भावनाओं को जन्म देता है । जो क्षेत्र-वास्तु,हिरण्य-स्वर्ण, धन-धान्य,दासी-दास आदि के आवश्यकता से अधिक संग्रह और उनमें आसक्ति के भाव यह मेरे हैं का भाव उत्पन्न करता है ।जिसे महावीर ने महान दुख का कारण बताया है । परिग्रह परमाण व्रत की भावनाएं स्पर्शन, रसना,घ्राण, चक्षु, कर्ण इन पांच इंद्रियों के विषयों में राग-द्वेष नहीं करना परिग्रहपरमाण व्रत की भावनाएं हैं ।    


                  परिग्रह पाप की कानूनी धाराएं    ----     

  जब आवश्यकता से अधिक संग्रह होता है तो उसके प्रबंधन ,संचालन एवं व्यवस्थापन में समस्या उत्पन्न होने लगती है जिनसे अनेक विषमताओं का जन्म होता है और वे ही विषमताएं अपराध की ओर अग्रसर करती हैं ।परिग्रह के कारण हिंसा-झूठ-चोरी कुशील ये सभी पाप होने लग जाते हैं।  धन-संपत्ति और स्त्री के ममत्व के कारण हिंसादि भाव उत्पन्न होते हैं जो अपराध वृत्ति को बढ़ावा देते हैं । कानूनी धाराओं के विषय में यह कह सकते हैं जो हिंसा ,झूँठ,चोरी और कुशील पाप  की धाराएं हैं वे सभी धाराएं इस पाप में  है अंतर्निहित हैं।।         


 भगवान महावीर के अहिंसादि पांच अणुव्रतों के अतिरिक्त दिग्व्रत,देशव्रत, अर्थदण्ड व्रत, शिक्षा व्रतों का अध्ययन और परिपालन से भारतीय कानून की व्यवस्था में चिंतनीय सहयोग अपराध निर्मूलन में मिलेगा । मेरा एक निवेदन है कि भारत की दंड व्यस्था के साथ महावीर के इन सिद्धांतों का अध्ययन कानून के अध्येताओं को करना चाहिये और जेल में रहने वाले कैदियों को भी इनकी शिक्षा प्रदान की जाना चाहिए । क्योंकि ये सिद्धांत अपराध उन्मूलक हैं और विश्व शांति के अभिकरण हैं ।

भगवान महावीर की अहिंसा का सिद्धांत विश्वयुद्धों की शांति का अमोघ उपाय

 *भगवान महावीर की अहिंसा का सिद्धांत विश्वयुद्धों की शांति का अमोघ उपाय* 


 डॉ आशीष जैन शिक्षाचार्य अध्यक्ष,संस्कृत विभाग, एकलव्य विश्विद्यालय दमोह मध्यप्रदेश


  *भगवान महावीर की अहिंसा*


 अहिंसा का सिद्धांत प्राचीन काल से ही जैन दर्शन में सर्वोपरि रहा है। जैन धर्म में महावीर एवं अहिंसा एक मूलभूत तत्व नहीं अपितु अहिंसा सिद्धांत का प्रतिपादन जैन धर्म के पांच मुख्य सिद्धांतों अहिंसा,सत्य,अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह में भगवान महावीर स्वामी के लिए सर्वोपरि और श्रेष्ठ प्रतिपादक के रूप में स्थान प्रदान करता है ,उन्होंने अहिंसा की परिभाषा प्रतिपादित की है -- मानसिक, वाचनिक, शारीरिक या अस्पष्ट या स्पष्ट रूप से जाने या अनजाने में साभिप्राय  और बिना शर्त के स्वयं से या दूसरों के द्वारा किसी छोटे-बड़े जीव को आघात ना पहुंचाना,आहत ना करना और ना ही हत्या करना है, अहिंसा है ।          

जियो और जीने दो का सिद्धांत वाक्य अहिंसा है । 

दूसरों की पीड़ा दूर करने में सहायता करना और जीने में सहायता एवं प्रेरणा मार्गदर्शन देना अहिंसा है ।।              

*अहिंसक के गुण-*


स्नेह, हर्ष, शांति,सहनशीलता, दया, विश्वसनीयता, सज्जनता तथा आत्मनियंत्रण महावीर की अहिंसा के पालक के गुण हैं । जिनका विकास मानव में होते ही उसके मन में सबके प्रति आदर का भाव, दूसरों के विचारों के प्रति सम्मान, घृणा और मोह का परित्याग,कर्मों के अंत:प्रवाह में कमी, शत्रु के प्रति क्षमा-सद्भावना का सर्वोत्कृष्ट विकास स्वतः ही होने लग जाता है ।।  


 जीव दया, अनुकम्पा,क्षमा संयम,समता, सुखोपलब्धि में सहायता,क्रोधादि कषाय शांति,क्लेशोपशान्ति आदि अनेक गुणों की खान अहिंसा मानव संस्कृति व प्राणी मात्र की संरक्षक होने से विश्व शांति का बीज मंत्र है । जो विश्वयुद्धों को शांत करने में सक्षम है।  


सुत्रकृतांग में कहा भी गया है-

*सर्वाणि सत्वानि सुखे रतानि,*

*दुःखाच्च सर्वाणि समुद विजन्ति ।*

*तस्मात सुखार्थी सुखमेव दद्यात ,*

*सुख प्रदाता लभते सुखानि ।*      

 सभी जीव सुख चाहते हैं, दुख से भयभीत रहते हैं, इसलिए सुखार्थी के लिए सुख देने वाले सुख प्रदाता को सुख की प्राप्ति होती है ।                         

   अर्थात जो व्यवहार  स्वयं के लिए अप्रिय है वह दूसरों के लिए कैसे प्रिय हो सकता है ।

गाय के गोबर का महत्व

 आयुर्वेद ग्रंथों  में हमारे ऋषि मुनियों ने पहले ही बता दिया गया  था कि   *धोवन पानी पीने का वैज्ञानिक तथ्य और आज की आवश्यकता* वायुमण्डल में...